Tuesday, August 3, 2021
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लल्लनटॉप समेत मीडिया गिरोह ने रचा ‘मुस्लिम लुक वाले’ की गिरफ्तारी की फर्जी खबर पर भावुक साहित्य

पिछले 5 दिनों में ये तीसरी फेक न्यूज है, जिसे मुस्लिमों पर हमला करार देकर प्रोपगैंडा चलाया जा रहा था। इससे पहले, ऑपइंडिया पर गुरूग्राम औऱ बेगूसराय के हमलों से जुड़ी फेक न्यूज का भी पर्दाफाश किया गया है।

पिछले कुछ सालों में अचानक से मीडिया में असहिष्णुता और डरा हुआ अल्पसंख्यक जैसे शब्दों को स्थापित करने का जमकर प्रयास किया गया है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो लेकिन मीडिया का एक विशेष गिरोह है, जो यह चाहता है कि इस प्रकार की शब्दावली को वो एक आकार और रूप देकर समाज के बीच स्थापित करे ताकि इसके ऊपर जमकर अपनी घटिया विचारधारा की रोटियाँ सेंकता रहे। ख़ास बात यह है कि मजहब विशेष के हित की ‘अच्छी बातें’ करते हुए ये लोग बाहर से तो बढ़िया नजर आते हैं (जिसका उदाहरण आप आगे पढ़ेंगे), लेकिन यदि गहराई में उतरकर देखा जाए, तो समुदाय विशेष को सबसे ज्यादा डराने का काम इन्हीं कुछ लोगों ने किया है। किसी झूठ को बार-बार बोलकर उसे दिशा देना स्वघोषित निष्पक्ष और क्रन्तिकारी पत्रकारों को बखूबी आता है।

इस बात को इस ताजा प्रकरण से समझा जा सकता है, जिसमें मीडिया ने एक ऐसी वाहियात और फर्जी खबर को ‘समुदाय विशेष पर होने वाले जुर्म’ की दास्तान बनाकर पेश किया है, जो वास्तव में कभी हुई ही नहीं। यानी, पूर्ण रूप से काल्पनिक घटना पर जमकर ज्ञान दिया जा रहा है।

मई 29, 2019 को टीवी9 गुजराती ने एक खबर ट्वीट की, जिसमें कहा गया कि मुंबई पुलिस ने फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले 2 मुस्लिम युवकों को इसीलिए आतंकी समझकर गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उनका ‘गेट-अप’ आतंकियों जैसा था। साथ ही, यह भी बताया गया कि ये दोनों रितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ की मूवी की शूटिंग के लिए जा रहे थे।

फिर क्या था, ‘समुदाय विशेष‘ शब्द सुनते ही लार टपकाकर बैठे हुए मीडिया के गिरोहों के प्रमुख एनडीटीवी, टीवी-18, इंडियन एक्सप्रैस, इंडिया टुडे, आज तक और रशिया टुडे जैसे कई इंटरनेशनल मीडिया ग्रुप ने इस खबर को बिना सत्यापित किए ही ज्यों का त्यों छाप दिया। सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस से ‘दर्शनशास्त्र’ में पीएचडी कर रहे महान विचारकों, क्रांतीजीवों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों ने जमकर अपनी भड़ास निकाली।

डर का माहौल शब्द को ही नाश्ता, लंच और डिनर में भेजने वाले क्रांतिकारियों ने यहाँ तक भी निष्कर्ष निकला कि भाजपा शासित महाराष्ट्र के मुंबई में क्या हालात हैं। लोगों को मुस्लिम हुलिए के कारण ही आतंकी समझकर गिरफ्तार किया जा रहा है। पाकिस्तान में भी इस खबर पर इंडिया के खिलाफ जमकर माहौल बनाया गया।

सोशल मीडिया पर भी अरस्तू और सुकरात के बाद जन्मे कुछ ‘महान विचारकों’ ने जमकर इस घटना पर सत्संग और ‘अच्छा महसूस होने वाला’ साहित्य लिखा, लेकिन आखिरकार मुबंई पुलिस ने इस खबर की सच्चाई उजागर कर दी। मुंबई पुलिस ने ट्वीट करके बताया कि मुंबई पुलिस ने ऐसे किसी शख्स को गिरफ्तार नहीं किया है, कृपया फैक्ट्स की जाँच करें।”

लेकिन मीडिया में कुछ ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो स्वयं को संस्थाओं से भी ऊपर सिर्फ इस वजह से रखते हैं क्योंकि केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार नहीं है। ये मीडिया गिरोह अभी भी अपने समाचार में लिख रहे हैं कि पुलिस के बताए पर इन्हें यकीन नहीं है। ठीक इसी तरह का दुराग्रह करते हुए इसी प्रकार की विचारधारा वाली फ्रीलांस प्रोटेस्टर और चंदा-भक्षी शेहला रशीद भी पुलवामा आतंकी हमले के समय देखी गई थी। उत्तराखंड पुलिस के तमाम स्पष्टीकरण के बावजूद भी उसने अपने ही सुविधाजनक झूठ को सच मानने का प्रण किया। यदि बारीकी से देखें तो इन सभी दुराग्रही लोगों में एक चीज कॉमन है और वो है ‘लाल सलाम’ और क्रांति की चॉइस।

इन्हीं कुछ चुनिंदा क्रांति के सेवकों के कारण हमारे लिए यह समझ पाना मुश्किल होता जा रहा है कि कथित तौर पर समुदाय विशेष को डराने वाले लोग तो वास्तव में यही लोग हैं, जो झूठी ख़बरों को सिर्फ अपनी दुकान चलाने के लिए भुनाते हैं। ये लोग पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ इसी प्रकार की कुछ चुनिंदा झूठी अफवाहों का इन्तजार करते हैं, ताकि अपनी छवि को चमका सकें और उन पर अंधों की तरह यकीन करने वाले कुछ लोग इस पर यकीन कर के डरना शुरू करें।

इसी का एक उदाहरण सोशल मीडिया पर इसी एक घटना पर वायरल हो रहे पोस्ट्स के माध्यम से समझा जा सकता है कि कितनी भावुक कलम से एक सज्जन ने इसी एक घटना को आधार बनाकर जमकर ज्ञान और सत्संग किया है। इस सज्जन के प्रोफ़ाइल पर जाने पर पता चलता है कि ये तो उसी ‘दी लल्लनटॉप’ नामक पत्रकारिता के संक्रामक रोग के ही एक कर्मचारी हैं, जो हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने के कारण पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

ये वही दी लल्लनटॉप (The Lallantop) है जो कुछ दिन पहले ही एक के बाद एक फेकिंग न्यूज़ और पेरोडी वेबसाइट्स की ख़बरों का फैक्ट चेक कर जीवनयापन करते हुए पाया गया है। ‘दी लल्लनटॉप’ (The Lallantop) में तो ये सब चलता रहता है लेकिन, कुछ बड़े मीडिया गिरोहों ने भी इस खबर के जरिए जमकर ‘ज्ञान’ दिया है और समुदाय को डराने का प्रयास किया है।

फर्जी खबर की काफी सुंदर किन्तु ‘अपमानास्पद’ विवेचना – दी लल्लनटॉप

‘फर्जी खबर’ से मुहम्मद असगर को डर सता रहा है कि ‘कपड़े देखकर एन्काउंटर भी हो सकता था’, अपना फर्जी डर अपने साथियों में बाँटते हुए –

फर्जी खबर पर इतना साहित्य लिखने के लिए आपको दी लल्लनटॉप का कर्मचारी होना पड़ता है। क्या ये कम बड़ा खौफ है?
तो मोहम्मद असगर भी मारक मजा देने की ‘मम्मी कसम’ से बंधे हैं
बहुत ज्यादा क्रांतिकारी
फेक ख़बरों की हैट्रिक बनाकर ‘दी लल्लनटॉप’ वर्ड कप क्रिकेट में सबसे आगे चल रहे हैं

दी लल्लनटॉप के ‘सूत्र’

दी लल्लनटॉप यानी ‘फेकिंग न्यूज़ 2.0’
‘डर का माहौल’
मीडिया गिरोह प्रमुख

यानी, मीडिया ने बिना मुंबई पुलिस से फैक्ट वेरिफाई किए ही एक फेक न्यूज को प्रोपगैंडा की तरह खूब चलाया। आपको बता दें कि पिछले 5 दिनों में ये तीसरी फेक न्यूज है, जिसे मुस्लिमों पर हमला करार देकर प्रोपगैंडा चलाया जा रहा था। इससे पहले, ऑपइंडिया पर गुरूग्राम औऱ बेगूसराय के हमलों से जुड़ी फेक न्यूज का भी पर्दाफाश किया गया है। इसके अलावा, मीम्स और फेकिंग न्यूज़ की ख़बरों का फैक्ट चेक करने वालों का फैक्ट चेक तो हम समय-समय पर करते ही हैं।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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