Saturday, September 25, 2021
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‘हेनरी’ लड़की छेड़ता था, इसलिए वामपंथियों ने उसे ‘हरि’ बना दिया: NCERT की किताबों से हिंदू घृणा की खेती, बच्चे शिकार

एनसीईआरटी की चौथी क्लास की ईवीएस की पुस्तकों में कई अध्यायों में अब्दुल नाम का एक चरित्र बार-बार आता है और हर बार वह या तो किसी की मदद करता है या वह कोई अच्छा काम करता है।

भारतीय सनातन संस्कृति से वामपंथी इतिहासकारों और शिक्षाविदों की घृणा का चरम यह है कि वे हर उस चरित्र का भारतीयकरण कर देते हैं जिससे किसी न किसी तरह सनातन प्रतीक चिह्नों को बदनाम किया जा सके। दुर्भाग्य यह है कि स्कूलों में भारतीय शिक्षा पद्धति को लागू करने का दावा करने वाले भी वामपंथियों की इन मंशाओं को अभी तक भाँप नहीं पाए हैं। पिछले कई वर्षों से बच्चों के दिमाग में यह जहर भरा जा रहा है।

पिछले चौदह-पंद्रह सालों से एनसीईआरटी (NCERT) की पाँचवी क्लास की अंग्रेजी की पुस्तक मैरीगोल्ड के यूनिट आठ के सिर्फ एक अध्याय ‘द लिटिल बुली’ से तत्कालीन प्रोपेगेंडा वाले शिक्षाविदों और टेक्स्टबुक डेवलपमेंट कमेटी की मंशाओं को समझा जा सकता है। एडवाइजरी कमेटी फॉर टेक्स्टबुक एट द प्राइमरी लेवल की अध्यक्ष अनिता रामपाल रहीं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में प्रोफेसर रहीं तथा नई शिक्षा नीति की आलोचक भी।

अनिता रामपाल के नेतृत्व में वर्ष 2007 में तैयार की गई इस पुस्तक में ‘द लिटिल बुली’ चैप्टर के माध्यम से छोटे बच्चों में सनातन संस्कृति में विष्णु भगवान के प्रचलित नाम ‘हरि’ के नाम पर एक ऐसे बच्चे की कहानी कही गई है जो लड़कियों को चिढ़ाता है, उन्हें चिकोटी काटता है, उन पर धौंस जमाता है। सब बच्चे उससे डरते हैं और उससे नफरत करते हैं। उससे दूर रहते हैं और आखिर में एक केकड़ा उसे काटकर सबक सिखाता है। ‘हरि’ नाम के उस बच्चे की नकारात्मक छवि बनाकर पाँचवी क्लास में पढ़ने वाले छोटे बच्चों के मन में सनातन संस्कृति के प्रति घृणा के बीज डाले जाते हैं। पिछले पंद्रह सालों से यह कार्य अनवरत किया जा रहा है।

अँग्रेजी की पुस्तक मैरीगोल्ड का अध्याय ‘द लिटिल बुली’

क्या यह वाकई प्रोपेगेंडा है?

इस बात को समझने के लिए ‘द लिटिल बुली’ की मूल लेखक और उसकी मूल कहानी को तलाशना होगा। यह कहानी मूल रूप से बच्चों की कहानी लिखने वाली ब्रिटेन की एनिड ब्लिटन के 1946 में प्रकाशित कहानियों के लोकप्रिय संग्रह ‘चिमनी कॉर्नर स्टोरीज’ से लिया गया है। इस कहानी में मूल चरित्र का नाम है ‘हेनरी’। यहाँ तक कोई बात नहीं थी, लेकिन जैसे ही इस कहानी के मूल चरित्र को बदलकर जानबूझकर उसे ‘हरि’ किया गया, तो बात आसानी से समझ में आती है कि वामपंथियों की मंशा क्या रही होगी। अब ‘हेनरी’ को ‘हरि’ करना तो वामपंथियों के लिए बहुत आसान था।

द लिटिल बुली की मूल कहानी जिसमें पात्र का नाम हेनरी है

अगर वे इसे अब्दुल करते तो किसी को तकलीफ हो सकती थी। मगर ‘हरि’ में किसे दिक्कत होगी? किसी को भी क्या पड़ी थी कि इस कहानी के मूल चरित्र को ढूँढा जाए। तत्कालीन सियासत ने तो वैसे भी शिक्षा क्षेत्र को दशकों से वामपंथियों के मानसिक दिवालियेपन को भेंट कर रखा था। जो उन्होंने लिख दिया, उसे बदस्तूर पढ़ाया जा रहा है। उन्हें पढ़ाया जा रहा है कि ‘हरि’ लड़कियों को छेड़ता है, उन्हें चिकोटी काटता है और इसमें उसे मजा आता है। वामपंथियों को अपनी पूर्वाग्रह से दूषित मानसकिता का प्रदर्शन करना था। वे हर उसे मौके की तलाश में रहते हैं कि कैसे भी भारतीय प्रतीक चिह्नों के बारे में भारतीय बच्चों में ही खराब छवि प्रस्तुत की जाए। इस प्रोपेगेंडा को ऐसे समझा जा सकता है कि इसी पुस्तक में दूसरी अन्य कहानियों में चरित्रों के नाम मूल चरित्र के नाम पर रखे गए हैं। उनमें किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया गया है।

अब्दुल बहुत अच्छा लड़का है

एनसीईआरटी की चौथी क्लास की ईवीएस की पुस्तकों में कई अध्यायों में अब्दुल नाम का एक चरित्र बार-बार आता है और हर बार वह या तो किसी की मदद करता है या वह कोई अच्छा काम करता है। चौथी क्लास के ईवीएस के चैप्टर 27 ‘चुस्की गोज टू स्कूल’ में अब्दुल एक भला बच्चा है और अपाहिज लड़की चुस्की की स्कूल जाने में मदद करता है। इसी पुस्तक के चैप्टर-19 ‘अब्दुल इन द गार्डन’ में अब्दुल बहुत मेहनती बच्चा है और गार्डन में अपने अब्बू की मदद करता है।

एनसीईआरटी के पाँचवीं तक के पाठ्यक्रम में लगभग हर विषय की किताब में बादशाह अकबर होता है और बहुत अच्छे रूप में आता है। ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान में अकबर के अलावा कोई दूसरा राजा हुआ ही नहीं है। बच्चे अकबर को तो जानते हैं, लेकिन पाँचवीं क्लास तक के पाठ्यक्रम में न तो प्रताप हैं, न शिवाजी और न लक्ष्मीबाई।

चीजें कब बदलेंगी?

सवाल यह है कि ये चीजें कब बदलेंगी? यह इतनी छोटी मगर महत्वपूर्ण बातें हैं। भारतीय संस्कृति और शिक्षा का झंडा ऊँचा करने वालों के बीच पिछले छह सात सालों से बातें तो खूब हो रही हैं, मगर धरातल पर चीजें उतर रही हैं, ऐसा कम ही नजर आता है। बच्चों को उनकी किस्मत के भरोसा छोड़ा जाना एक गैर जिम्मेदाराना काम होगा। 

 

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