मामा नेहरू वाली नयनतारा की नई लिबरपंथी: अपना मामा लोकतान्त्रिक, मोदी हुए अवैध

क्यूट लिबरपंथियों की यह आम आदत है कि वो खाँसते भी हैं तो दो किताब और तीन विदेशी लेखक के नाम मुँह से निकल जाते हैं। जिस तरह की बात इन्होंने फलाने विदेशी प्रोफेसर की थ्योरी लेकर की है, उस से पता चल जाता है कि इनके आर्टिकल की सीमा कहाँ तक है, ख़ास कर तब जब वो राजनीति पर 2019 के चुनाव परिणामों को लेकर लिख रही हों।

चूँकि साहित्य अकादमी पुरस्कार नयनतारा सहगल ने खुद ही लौटा दिया था, इसलिए ‘नेहरू जी की भान्जी’ ही उनकी बची-खुची पहचान है। यह नेहरू-गाँधी परिवार का पुराना इतिहास रहा है कि जब तक किसी भी निर्वाचन के नतीजे मन-मुताबिक होते हैं, जब तक बहुमत उनके साथ खड़ा होता है, तब तक तो बहुमत की इच्छा ‘लोकतंत्र की जीत’ होती है, लेकिन जहाँ लोकतंत्र ने इन्हें ‘गच्चा’ दिया, वहाँ से ‘लोकतंत्र की रक्षा’ यह परिवार लोकतंत्र और बहुमत के जनादेश का गला रेत कर करने पर उतारू हो जाता है।

यही सहगल जी के मामाजी पंडित नेहरू के लिए मोहनदास गाँधी ने किया, जब उन्होंने ‘मामाजी’ को पराजित कर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए बोस को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। यही हुआ जब ‘मामाजी’ की बजाय कॉन्ग्रेस राष्ट्रपति (और स्वतंत्र भारत के प्रथम संभावित प्रधानमंत्री) बनने जा रहे सरदार पटेल को गाँधी जी ने ‘नैतिकता’ की लाठी से लँगड़ी लगाकर ‘मामा नेहरू’ के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया। और आज वही काम अपने खानदान के फड़फड़ाते चिराग राहुल गाँधी की हार पर नयनतारा सहगल कर रहीं हैं- लोकतंत्र के जनादेश द्वारा, गणतंत्र द्वारा स्थापित सभी नियमों का पालन करते हुए निर्वाचित मोदी के शासन को अवैध साबित करने का प्रयास।

नयनतारा सहगल लेखिका हैं, वह भी ‘नेहरूवियन’, अतः जाहिर है कि उनकी नज़र में आम आदमी मूर्ख है, मामूली पढ़ा-लिखा है, उसने तो कोई किताबें पढ़ी नहीं होंगी, जो मर्ज़ी आए किताबों का नाम लेकर पढ़ा दो। और दक्षिणपंथियों को तो अबौद्धिक साबित करने और बनाए रखने में ही आधी समाजवादी-वामपंथी-साम्यवादी राजनीति खेत हुई है। इसीलिए नयनतारा सहगल बतातीं हैं कि गेब्रियल गार्सिआ मार्क्वेज़ की किताब ‘द क्रॉनिकल ऑफ़ अ डेथ फोरटोल्ड’ पढ़ लेने के कारण उन्हें पहले ही मालूम था कि मोदी के आने के बाद क्या होगा, 2014 से 2019 के बीच क्या-क्या होगा, और कैसे मोदी 2019 में वापसी करेगा।

- विज्ञापन - - लेख आगे पढ़ें -

क्यूट लिबरपंथियों की यह आम आदत है कि वो खाँसते भी हैं तो दो किताब और तीन विदेशी लेखक के नाम मुँह से निकल जाते हैं। उन्हें लगता है कि लोग सोचेंगे कि बहुत जानकार व्यक्ति है। लेकिन ये ट्रिक घिस चुकी है और नयनतारा जैसे लिबरपंथियों की सच्चाई बाहर आ चुकी है। जिस तरह की बात इन्होंने फलाने विदेशी दर्शन शास्त्र प्रोफेसर की थ्योरी लेकर की है, उस से पता चल जाता है कि इनके आर्टिकल में आगे क्या होने वाला है। बिलकुल उसी तरह जैसे इन्होंने मार्क्वेज़ की किताब के सन्दर्भ में कहा है कि सबको पहले ही पता होता है कि क्या हुआ। हमें भी पहले ही पता था कि नयनतारा जी के लेखन की सीमा कहाँ तक है, ख़ास कर तब जब वो राजनीति पर 2019 के चुनाव परिणामों को लेकर लिख रही हों।

वह दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जेसन स्टैनली के एक अध्ययन का हवाला देतीं हैं कि कैसे ‘दक्षिणपंथी अतिवाद’ की तरफ देश के जनमानस को झुकाने के एक ‘स्टैण्डर्ड फॉर्मूला’ होता है, जिसका मोदी ने इस्तेमाल किया है। इस फॉर्मूले के अंतर्गत वह वही सब बातें बतातीं हैं जो उनका छद्म-लिबरल गैंग पिछले पाँच सालों से रोता आ रहा है- मोदी ने ‘हम-बनाम-वो’ की राजनीति की, मुसलमानों को इस देश की संस्कृति से अलग दिखाने की कोशिश की, फलाना-ढिकाना। जबकि हास्यास्पद बात यह है कि यह सब मोदी ने, या हिन्दुओं ने किया नहीं है, उनके ही साथ यह सब हुआ है।

नयनतारा सहगल कहतीं हैं कि मोदी ने एक ‘नैरेटिव’ बुना हिन्दुओं को ‘पीड़ित’ दिखाने और महसूस कराने का। नयनतारा जी, क्या यह महज़ एक नैरेटिव था, वो भी मोदी का बुना हुआ, कि हिन्दुओं ने मुसलमानों के हाथों जो सामूहिक हत्याकांड, बलात्कार, लूटपाट लगभग एक हज़ार साल तक झेले, उन्हें इतिहासकारों ने न केवल सत्ता के इशारे पर (जिसके शीर्ष पर आपके प्रिय मामाजी थे) दफना दिया, बल्कि उसे उठाने वाले हिन्दुओं के सत्य दावों को नकार कर उनके साथ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक दुर्व्यहवहार (‘गैसलाइटिंग’, एक सोशिओ-साइकोलॉजिकल एब्यूज़) किया गया?

या यह महज़ एक नैरेटिव था, वो भी मोदी का बुना हुआ, कि आपके मामाजी के समय से ही हिन्दुओं के मंदिरों को, उन मंदिरों की सम्पत्तियों को सरकार हड़पती गई, और उनसे हज यात्रा की सब्सिडी देती गई? क्या यह महज़ एक नैरेटिव था, वो भी मोदी का बुना हुआ, कि संविधान के अनुच्छेद 25-30 में दी गई धर्म के पालन की सुरक्षा, बिना सरकारी हस्तक्षेप के, हिन्दुओं को नहीं मिली है? क्या यह महज़ एक नैरेटिव था, वो भी मोदी का बुना हुआ, कि हिन्दुओं की कितनी शादियाँ होंगी, इसका फैसला आपके मामाजी ने कर लिया, लेकिन मुसलमानों के निजी जीवन में हस्तक्षेप को आपकी पार्टी ‘कम्यूनलिज़्म’ कहती है?

हिन्दुओं ने मुसलमानों को बाहरी बनाया, नयनतारा सहगल को बताना चाहिए, या मुसलमानों ने खुद इस देश की ‘एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति’ का फायदा उठा कर, और उसके ऊपर और खिलाफ ‘मेरे अल्लाह को जो इकलौती ताकत न माने वह काबिले-कत्ल है’ थोपने की कोशिश की? मुसलमान इस देश से अलग तब दिखे जब हिन्दुस्तान के हिन्दुओं ने ‘बेगानी शादी में <समुदाय विशेष का व्यक्ति> दीवाना’ की तर्ज पर खिलाफत आंदोलन में कूदने का निर्णय लिया, या तब जब उस्मानी ख़लीफ़ा के समर्थन में मोपलाह मुसलमानों ने अपने हिन्दू पड़ोसियों का कत्लेआम कर दिया?

सेना का सम्मान किए जाने को भी नयनतारा सहगल फासीवाद को बढ़ावा देने वाला कदम बतातीं हैं, राष्ट्र के गौरव पर गर्व महसूस करने और अपने भूतकाल में जो अच्छी बातें थीं, उन्हें याद करने और उनकी बातें करने को भी ‘फ़ासीवादी साज़िश’ का हिस्सा करार देतीं हैं। ऐसी बातों का जवाब देने की कोशिश न ही की जाए तो बेहतर होगा।

आगे वह यह बतातीं हैं कि युद्ध की ‘लोकतंत्र में’ प्रशंसा नहीं की जाती। पहली बात तो यह नयनतारा जी कि न ही मोदी, और न ही अन्य तथाकथित ‘चरम-दक्षिणपंथी’ नेताओं ने युद्ध की प्रशंसा की है। अगर प्रशंसा हुई है तो हिंदुस्तान पर थोपे गए युद्धों में शौर्य का प्रदर्शन करने वाले वीरों की। और अगर आपको लगता है कि वह भी नहीं होना चाहिए तो ऐसी सोच कितनी गिरी हुई है, कि किसी सैनिक की वीरता और उसके शौर्य की प्रशंसा केवल इसलिए मत करो कि इससे राजनीतिक शत्रु को फायदा मिल जाएगा, इसकी कोई सीमा नहीं है। और दूसरी बात, अगर एक क्षण के लिए मान भी लिया जाए कि हिंदुस्तान अपने युद्धों की प्रशंसा करता भी है तो? यह वामपंथी को पसंद आने वाला लोकतंत्र भले नहीं होगा (क्योंकि वामपंथ कमज़ोरियों और विक्टिम्स की ओर ही नज़र रखता है), लेकिन दक्षिणपंथी लोकतंत्र तो होगा (क्योंकि दक्षिणपंथ शक्ति और क्षमता पर ज़ोर देता है)। या फिर वामपंथियों का लोकतंत्र ही इस देश का इकलौता लोकतंत्र हो सकता है?

नयनतारा सहगल मोदी पर जिस ‘कहानी’ के ज़रिए सत्ता में आने का और सत्ता में वापसी का आरोप लगातीं हैं, पहली बात तो वह ‘story-telling’ होने भर से असत्य या ‘reality’ से परे नहीं हो जाती। वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते सहगल को यह बात पता होना चाहिए कि ‘story-telling’ असलियत के जितना करीब होती है, उसकी सफलता उतनी ज़्यादा होती है। उनकी खुद की किताबों प्रशंसा इसलिए हुई है कि ‘फिक्शन’ होते हुए भी उनमें (एक समय) कहीं-न-कहीं सच्चाई प्रतिबिम्ब होती थी। आज मोदी वही ‘कहानी कहना’ इस्तेमाल कर रहा है। और मज़े की बता यह है कि जो कहानी आज मोदी, या इस देश का दक्षिणपंथी-राष्ट्रवादी वर्ग कह रहा है, उस कहानी की पृष्ठभूमि नयनतारा के मामाजी और उनके ‘भक्तों’ ने ही हिन्दुओं के शोषण, उनके साथ दोगले व्यवहार से तैयार की है।

नयनतारा सहगल जैसे लोग केवल व्यक्ति नहीं हैं, प्रतीक हैं- उस मानव-प्रवृत्ति का, उस ध्यानाकर्षण की लिप्सा और लोलुपता का, जिसके चलते इंसान अपने बूढ़े हो जाने, और अपने विचारों का समय निकल जाने के चलते हाशिए पर पहुँच जाने, अप्रासंगिक हो जाने को स्वीकार नहीं कर पाता। ऐसी ही मानसिक अवस्था में, अपने पुराने रौब के लिए छटपटाता व्यक्ति अनर्गल प्रलाप करने लगता है। उसे इससे भी मतलब नहीं होता कि उसके इस प्रलाप से किसका फायदा हो रहा है, किसका नुकसान (जैसे मोदी को गाली देते-देते यशवंत सिन्हा मोदी का तो कुछ नहीं बिगड़ पाए, उल्टा अपने ही बेटे की ‘नौकरी खा गए’); ऐसी ही हालत में इंसान नयनतारा सहगल जैसी बातें करने लगता है…

शेयर करें, मदद करें:
Support OpIndia by making a monetary contribution

बड़ी ख़बर

बीएचयू, वीर सावरकर
वीर सावरकर की फोटो को दीवार से उखाड़ कर पहली बेंच पर पटक दिया गया था। फोटो पर स्याही लगी हुई थी। इसके बाद छात्र आक्रोशित हो उठे और धरने पर बैठ गए। छात्रों के आक्रोश को देख कर एचओडी वहाँ पर पहुँचे। उन्होंने तीन सदस्यीय कमिटी गठित कर जाँच का आश्वासन दिया।

सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं ख़बरें

ताज़ा ख़बरें

हमसे जुड़ें

114,578फैंसलाइक करें
23,209फॉलोवर्सफॉलो करें
121,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

ज़रूर पढ़ें

Advertisements
शेयर करें, मदद करें: