Monday, October 26, 2020
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लप्रेकी रवीश कुमार! घर लौट आओ, तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा

एक स्थापित पत्रकार होने के बाद भी राहुल गाँधी जैसे मनचले चिरयुवा के बचपने पर देश और दुनिया को गुमराह करना आपको शोभा नहीं देता था, फिर भी आप राफ़ेल डील पर ‘द हिन्दू’ अखबार की एक टुकड़ी लेकर लहरा गए।

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के परम सम्मानित जातिवाचक कुलपति महोदय को ज्ञानवाचक का नमस्कार। क्योंकि मैं आपसे अक्सर सवाल पूछता रहता हूँ, इस कारण आपके अनुसार मैं स्वतः ही एक ट्रॉल भी हो जाता हूँ। लेकिन क्या आपने कभी ख़ुद भी सोचा था कि आपको सुरक्षा कारणों से ड्राइव करते समय ईयरफ़ोन लगाने होंगे और जवाबों की कमी के चलते किसी को ट्रॉल कहना पड़ेगा? ये ट्रॉल आज आपको बताना चाहता है कि यूँ ही नहीं वो ट्रॉल बन जाता है बल्कि वो आप से निराश होने के बाद ही ट्रॉल बनकर उभरा है।

पत्रकारिता के उस सुनहरे दौर को याद करते हैं, यानी वर्ष 2004 से 2014 तक का दशक, जब देश में चुनाव का माहौल नहीं हुआ करता था, प्राइम टाइम में किसी मनगढंत घोटाले के ख़िलाफ़ अख़बार की फ़र्ज़ी अधूरी कटिंग मुद्दा नहीं हुआ करती थी, प्रिंस पूरा दिन गड्ढे में गिरा रहता था, दिल्ली में बर्फ़ गिर जाया करती थी और दर्शकों को बाद में पता चलता था कि दिल्ली में बर्फ़ आसमान से नहीं बल्कि चुस्की बनाने वाली बर्फ़ की सिल्ली गिरी थी।

ये वो समय था जब ‘उभरते हुए कहानीकारों’ की जगह न्यूज़ रूम और अख़बारों में नहीं बल्कि बॉलीवुड और साहित्य में हुआ करती थी। इन सब के बीच दर्शकों को एक राहत की साँस मिली थी, रवीश की रिपोर्ट से। रवीश उस दौर में बहुत ख़ुश रहा करते थे। आपने गिर रही बर्फ़ के बीच गिर रही पत्रकारिता को दिशा दे डाली थी।

उस समय को याद करने में भी गौरव महसूस होता है, जब आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल प्रोपेगैंडा के लिए नहीं बल्कि ‘लप्रेक’ लिखने के लिए किया करते थे। आप TV देखने पर ज़ोर दिया करते थे, क्योंकि आप जानते थे कि दर्शक TV पर रवीश को देखना चाहते थे। आपको ‘अटेंशन’ के लिए स्टूडियो में कलाकारों को नहीं लाना होता था। ‘साँय-साँय’ की हवा सिर्फ़ मौसम सम्बंधित ख़बरों तक सीमित हुआ करती थी।

अचानक आप नींद से जागे, देश में राजनीति होने लगी। सत्ता के ध्रुव और हेडक्वार्टर बदल गए, और रवीश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो छटपटाहट में इधर-उधर भागने लगा। मानो सत्ता नहीं रवीश के सर से आसमान सरक गया हो। उसका शब्दों का जादूगर रवीश कुमार माइक लेकर ग़रीबों की बस्ती और खेतों से उठकर किरण बेदी के क़िस्सों के बारे में रूचि लेने लगा, ख़ासकर कुछ ऐसे क़िस्सों में, जिन्होंने उन्हें एक मज़बूत महिला की छवि दी और अन्य महिलाओं को भी आगे आने लिए प्रेरणा बनाया। रवीश केजरीवाल जैसे अदाकार की खाँसी दिखाने लगा।

कॉन्ग्रेस के हाथों से सत्ता छूटी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री क्या बने कि आप ग़रीबों को भूल गए, लप्रेक की जगह आप मनुस्मृति ढूँढ-ढूँढ़कर पढ़ने लगे, वामपंथियों में आप और ज़्यादा रूचि लेने लगे। आप मेरे जैसे युवा की प्रेरणा हुआ करते थे, लेकिन जिस तरह से आप सरकार और संस्थाओं को नीचा दिखाने के लिए उन पर बेवजह लगातार आरोप लगाने के लिए प्रयासरत रहा करते हैं, उसने मुझे निराश किया है।  

आप ‘ऑड डेज़’ पर संविधान, संस्थान और लोकतंत्र में यक़ीन रखने को कहते हैं और ‘इवन डेज़’ पर कहते हैं कि ये सब संस्थाएँ बिक चुकी हैं। आप एक दिन कहते हैं कि TV मत देखिए, लेकिन दूसरे दिन रोते हैं कि NDTV की TRP नहीं आ रही है, फिर आप कहते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह लोगों की छत पर चढ़कर उनकी केबल के तार काट रहे हैं और लोग TV नहीं देख पा रहे हैं।

हालात ये हो चुके हैं कि आप में और ‘यो बिक गई गोरमिंट’ वाली काकी में अब फ़र्क़ ख़त्म हो चुका है।आप शादी-विवाहों में दूल्हे के वो फूफा बनकर रह गए हैं, जिसकी ज़िन्दगी का बस ‘एक्के’ मक़सद रह गया है और वो है खिसियाए रहना।

पत्रकार महोदय, आपने अपने विशेष मीडिया गिरोहों, जैसे कारवाँ , द वायर, ऑल्टन्यूज़ आदि से सनसनी मचाते हुए ख़ुलासे किए, लेकिन सबका नतीजा शून्य ही रहा। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट इन सभी से विनती कर चुकी है कि संस्थाओं का समय बर्बाद ना करें और सलाह दी कि पत्रकारिता में ज़िम्मेदारी को समझें।  

इसके बाद सनसनीखेज़ ख़ुलासे और आरोपों को ठीक से जाँच परख करने के बाद ही जनता के समक्ष लाने के बजाए आपने ‘डिस्क्लेमर’ लगाना बेहतर समझा। ताकि ‘प्रोपेगैंडा ऊँचा रहे हमारा’ की क्रान्ति जारी रहे। आप दर्शकों के इस मनोविज्ञान में अब महारत हासिल कर चुके हैं। आप जानते हैं कि आपको पढ़ने वाले सब भटके हुए और मनचले युवा हैं और जो भी भविष्यवाणी आप उगलेंगे, उसे ‘ब्रह्मवाक्य’ मानकर वो लोगों को गाली देना और नीचा दिखाना शुरू कर देंगे।

हाल ही में राफ़ेल डील की आधी जानकारी को लेकर आपके चरमोत्कर्ष को देखना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। कॉन्ग्रेस पार्टी की मोदी सरकार को लेकर छटपटाहट एक बार के लिए स्वीकार्य है, क्योंकि वो आम चुनाव से पहले किसी ना किसी तरह से मोदी सरकार को घेरने के लिए कोई न कोई घोटाले का आरोप लगाना चाहते हैं। प्रोपेगैंडा पत्रकारिता का समुदाय विशेष दिन-रात इस मशक्कत में जुटा होने के बावजूद भी इन चार सालों में अब तक विपक्ष के पास कोई भी ऐसा घोटाला नहीं आ पाया है, जिसे लेकर वो मोदी सरकार को घेर सकें।

मोदी सरकार को घेरने के लिए अनाप-सनाप सुबूत हाथ आते ही रवीश कुमार उत्तेजित होकर उन्हें  तुरंत ‘नई सड़क ‘पर खींच लाते हैं

विपक्ष के दलों की छटपटाहट एक बार के लिए वाजिब है, लेकिन एक स्थापित पत्रकार होने के बाद भी राहुल गाँधी जैसे मनचले चिरयुवा के बचपने पर देश और दुनिया को गुमराह करना आपको शोभा नहीं देता था, फिर भी आप राफ़ेल डील पर ‘द हिन्दू’ अख़बार की एक टुकड़ी लेकर लहरा गए। आप जानते हैं कि आपके सारे बयान और प्राइम टाइम बेबुनियाद हैं, फिर भी आप छाती चौड़ी कर के रोज नया प्रोपेगैंडा लेकर बैठ जाते हैं। अगर शाहरुख़ ख़ान की एक के बाद एक फ़्लॉप फ़िल्मों का मुक़ाबला आपके फ़्लॉप प्रोपेगैंडा की सीरीज़ से की जाए तो आप नि:संदेह आगे निकल जाएँगे।

आपने मुझे एक इंटरनेट ट्रॉल की संज्ञा दी है, मेरा स्तर आपको समझाने-बुझाने के लिए बेहद छोटा है, लेकिन फिर भी कोशिश कर के देखिए। आप ग़रीबों की नहीं बल्कि विचारधारा और अहंकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। आज जो रवीश कुमार लाल माइक पकड़ता है, उसका मुद्दा ग़रीब और विद्यार्थी नहीं बल्कि टकराव है। इस रवीश की कलम लप्रेक नहीं बल्कि चुनावी बागों में बहार तलाश रही है और इस काम के लिए ये किसी भी हद तक जाने के लिए आतुर दिखता है।

रवीश जी, आपकी पत्रकारिता में विश्वास करने वाले युवा का हाल मुहब्बत में धोखा खाए हुए लड़के जैसा हो चुका है, वो चाहकर भी अब मोहब्बत करने को राजी नहीं है। उसे अब किसी भी तरह के लिबास में रंगी गई पत्रकारिता और मीडिया में यकीन नहीं रह गया है। वो बदहवास हालात में न्यूज़ डिबेट्स से लेकर कारवाँ और वायर तक में सत्य ढूँढ रहा है, लेकिन सत्य है कि मिलता नहीं। उसका मन प्रोपेगैंडों से आतंकित है, उसका मानना है कि अगर सस्ती लोकप्रियता के लिए रवीश कुमार प्रोपगैंडा के लिए काम करते हैं, तो फिर किसी और में किस तरह यक़ीन किया जाए?

आज के दिन पर आपको पढ़ने-देखने वालों के दिमाग में बस प्रोपेगैंडा और दिल में ग़ालिब बज रहा है, “ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा ज़ालिम, कहीं ऐसा न हो यां भी वही क़ाफ़िर सनम निकले।”

हम सबकी आपसे विनती है: “हे रवीश कुमार, आप भटक चुके हैं। आप घर लौट आइए, आपको कोई कुछ नहीं कहेगा।” हे राजा रवीश कुमार, परमादरणीय रवीश कुमार! अपना ‘कारवाँ’ रोक दीजिए, आपको हिंदी पत्रकारिता का वास्ता। लप्रेक लिखने और पढ़ने वाली प्रजाति विलुप्ति के कगार पर है, उसे बचा लीजिए। जिस तरह तमाम माया-मोह को त्यागकर अर्जुन ने गाण्डीव उठाया था, आप क़लम उठाइये, आप शब्दों के जादूगर हैं। राजनीति नहीं, बस अपने हिस्से की पत्रकारिता शुरू कर दीजिए, TV पर सच सुनने और मीडिया में सच पढ़ने के इच्छुक व्यक्ति की ये बहुत बड़ी जीत होगी।

आपका प्रशंसक: ज्ञानवाचक

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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