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महर्षि कपिल का श्राप, भगवान विष्णु के चरण और महादेव की जटाएँ: गंगा दशहरा पर जानिए धरती पर कैसे हुआ ‘मैया’ का अवतरण, पवित्र धाराओं के क्या हैं 7 प्रमुख नाम

माना जाता है कि गंगा जल कभी अशुद्ध नहीं होता और उसमें दिव्य ऊर्जा विद्यमान रहती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने गंगा को सात धाराओं में विभाजित किया था। ये धाराएँ थीं, नलिनी, हृदिनी, पावनी, सीता, चक्षुष, सिंधु और भागीरथी। इनमें भागीरथी धारा ही आगे चलकर गंगा कहलायी।

सनातन धर्म में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था, जीवन, मोक्ष और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक मानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति में माँ गंगा को ‘मोक्षदायिनी’, ‘पापहारिणी’ और ‘पतित पावनी’ कहा गया है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा इसी दिव्य आस्था और पौराणिक परंपरा का महापर्व है।

मान्यता है कि इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, आस्था, तपस्या, त्याग और मोक्ष की भावना का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें प्रकृति, नदियों और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति सम्मान करना भी सिखाता है।

क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा?

गंगा दशहरा माँ गंगा के स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन माँ गंगा राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर धरती पर आई थीं। गंगा का अवतरण केवल पृथ्वी को पवित्र करने के लिए नहीं था, बल्कि राजा सगर के पुत्रों की आत्मा को मोक्ष दिलाने और समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए हुआ था।

‘दशहरा’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है, ‘दश’ यानी दस और ‘हरा’ यानी नाश करने वाला। वराह पुराण के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान और पूजा करने से मनुष्य के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इसलिए इसे गंगा दशहरा कहा जाता है।

मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन माँ गंगा में स्नान करने, गंगा जल का प्रयोग करने, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक शुद्धि आती है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़ जाता है।

गंगा अवतरण की पौराणिक कथा

गंगा दशहरा का सबसे प्रमुख आधार राजा भगीरथ और माँ गंगा की पौराणिक कथा है, जिसका उल्लेख कई पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। कथा के अनुसार, सूर्यवंशी राजा सगर ने अपनी शक्ति और साम्राज्य की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था।

यज्ञ का घोड़ा पूरे राज्य में घूम रहा था, लेकिन देवराज इंद्र ने भय और ईर्ष्या के कारण उस घोड़े को चुराकर महर्षि कपिल के आश्रम में बाँध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते-करते कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँच गए। वहाँ घोड़ा देखकर उन्होंने महर्षि कपिल पर चोरी का आरोप लगाना शुरू कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)

उनके शोर और अपमान से महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई। क्रोधित होकर उन्होंने अपने तेज से सभी पुत्रों को भस्म कर दिया। बाद में बताया गया कि इन आत्माओं को तभी मुक्ति मिल सकती है जब स्वर्ग की पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतरकर उनकी अस्थियों को स्पर्श करे। कई पीढ़ियों तक प्रयास चलता रहा, लेकिन सफलता नहीं मिली।

आखिरकार राजा सगर के वंशज महाराज भगीरथ ने कठोर तपस्या की। वर्षों तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। लेकिन एक समस्या थी वो ये कि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी।

तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। गंगा का तेज और वेग शिव की जटाओं में बंध गया। बाद में शिव जी ने धीरे-धीरे अपनी जटाओं से गंगा की धाराओं को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। यही दिव्य घटना ‘गंगावतरण’ कहलाती है।

गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई उस स्थान तक पहुँचीं जहाँ राजा सगर के पुत्रों की अस्थियाँ थीं। गंगा के जल के स्पर्श से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कारण गंगा को ‘भागीरथी’ भी कहा जाता है।

माँ गंगा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ और आध्यात्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माँ गंगा को सबसे पवित्र नदी माना गया है। पुराणों के अनुसार, गंगा का उद्भव भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था और वे भगवान शिव की जटाओं में निवास करती हैं। यही कारण है कि गंगा को देवत्व प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा स्नान से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।

माना जाता है कि गंगा जल कभी अशुद्ध नहीं होता और उसमें दिव्य ऊर्जा विद्यमान रहती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने गंगा को सात धाराओं में विभाजित किया था। ये धाराएँ थीं, नलिनी, हृदिनी, पावनी, सीता, चक्षुष, सिंधु और भागीरथी। इनमें भागीरथी धारा ही आगे चलकर गंगा कहलायी।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार ऋषि जह्नु की तपस्या में गंगा के वेग से बाधा उत्पन्न हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर गंगा को पी लिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को अपनी जांघ से बाहर निकाला। तभी से गंगा ‘जान्हवी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

स्कंद पुराण और वराह पुराण में गंगा दशहरा के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, गंगा केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की भी शुद्धि करती हैं।

गंगा दशहरा पर क्या-क्या किया जाता है?

गंगा दशहरा के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। यदि संभव हो तो गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। जो लोग गंगा तट तक नहीं पहुँच पाते, वे घर में स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं।

इस दिन श्रद्धालु माँ गंगा की विशेष पूजा करते हैं। पूजा में दस प्रकार के पुष्प, दस दीपक, दस फल या दस प्रकार की पूजन सामग्री रखने की परंपरा है। यह दस पापों के नाश का प्रतीक माना जाता है। गंगा स्तोत्र, गंगा चालीसा और ॐ नमः शिवाय जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है। कई लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गंगा आरती में भाग लेते हैं।

दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और पितरों की शांति के लिए तर्पण भी करते हैं।

हरिद्वार, प्रयागराज और काशी में गंगा दशहरा की भव्यता

गंगा दशहरा के अवसर पर देशभर के प्रमुख गंगा घाटों पर विशेष रौनक दिखाई देती है। हरिद्वार की हर की पौड़ी पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर गंगा स्नान करते हैं। मान्यता है कि यहाँ अमृत की बूंदें गिरी थीं और भगवान विष्णु के चरण चिह्न आज भी मौजूद हैं।

हरिद्वार में गंगा दशहरा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ (फोटो साभार:NDTV)

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालु गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं। यहाँ लोग पितृ तर्पण और विशेष पूजा भी करते हैं।

काशी यानी वाराणसी में गंगा दशहरा का अलग ही आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिलता है। बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान को अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम के समय दशाश्वमेध घाट की भव्य गंगा आरती श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

काशी में गंगा आरती का अलौकिक दृश्य (फोटो साभार: Tripadvisor)

गंगा दशहरा का आध्यात्मिक संदेश

गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन को शुद्धता, सेवा, तपस्या और मोक्ष का संदेश देने वाला उत्सव है। राजा भगीरथ की तपस्या यह सिखाती है कि संकल्प और श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। माँ गंगा का अवतरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए होती है।

आज जब नदियों को बचाने और प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब गंगा दशहरा हमें यह भी याद दिलाता है कि गंगा केवल पूजा की नहीं, संरक्षण की भी अधिकारी हैं। आस्था तभी पूर्ण होगी जब हम माँ गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने का संकल्प भी लें।

गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, श्रद्धा और अध्यात्म का ऐसा पर्व है जो केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी देता है। माँ गंगा की पावन धारा सदियों से मानवता को जीवन, शांति और मुक्ति का संदेश देती आई है और आगे भी देती रहेगी। यह पर्व हमें अपने धर्म, संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान करना सिखाता है।

गंगा की धारा केवल जल नहीं बहाती, बल्कि युगों-युगों से श्रद्धा, विश्वास और मुक्ति की भावना भी प्रवाहित करती आ रही है। इसलिए गंगा दशहरा का पर्व भारतीय संस्कृति में सदैव विशेष महत्व रखेगा और आने वाली पीढ़ियों को भी आध्यात्मिकता और मानवता का मार्ग दिखाता रहेगा।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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