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होली: भारतीय सभ्यता की आत्मा और आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

एक बात मुझे गर्व से भरती है। होली आज चालीस से अधिक देशों में मनाई जाती है। लंदन में, न्यूयॉर्क में, सिडनी में, टोक्यो में। वहाँ के लोग जो हमारी भाषा नहीं जानते, हमारे शास्त्र नहीं पढ़े, वे भी इस रंगोत्सव में शामिल होना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि इस पर्व में कुछ ऐसा है जो भाषा और सीमा से परे है। जो किसी को भी छू लेता है। यह उस सभ्यता की ताकत है जो जीवन को उत्सव की तरह जीना जानती है।

मैं जब भी होली की बात करता हूँ, मन में पहले अपने ब्रज की याद आती है। मथुरा के उस बाज़ार की, जहाँ फाल्गुन आते-आते गुलाल की दुकानें सज जाती हैं और हवा में टेसू के फूलों की हल्की-सी महक घुल जाती है। शायद यही कारण है कि मैं होली को महज एक त्योहार नहीं मानता।

भारत एक भौगोलिक सीमा में बँधा राष्ट्र तो है ही, लेकिन उससे भी पहले यह एक जीवंत सभ्यता है। दुनिया की सबसे पुरानी, सबसे निरंतर बहने वाली सभ्यताओं में से एक। और इस सभ्यता को एक सूत्र में पिरोने का काम हमारे पर्वों ने किया है। ये उत्सव केवल खुशी मनाने के बहाने नहीं हैं। इनमें दर्शन है, पारिस्थितिकी है, सामाजिक न्याय है और एक गहरी आध्यात्मिक समझ भी है।

होली इन सबमें सबसे अलग है। सबसे खुली। सबसे निडर। यह किसी एक जाति की नहीं, किसी एक क्षेत्र की नहीं। अपने असली रूप में यह पूरी मानवता के भीतर जो आनंद छुपा है, उसका उत्सव है।

प्राचीन जड़ें: जब इतिहास और आस्था एक हो जाते हैं

होली कब शुरू हुई? यह प्रश्न उतना ही कठिन है जितना यह पूछना कि गंगा कब से बहती है। भविष्य पुराण और नारद पुराण में इस पर्व के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। यानी जब यूरोप में सभ्यता अंकुरित भी नहीं हुई थी, तब भी इस भूमि पर होली के रंग उड़ते थे।

सबसे प्रसिद्ध कथा तो हम सब जानते हैं। प्रह्लाद और होलिका की। लेकिन मैं कहूँगा कि इसे केवल एक धार्मिक कहानी मत समझिए। यह एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य है। हिरण्यकश्यप के पास सत्ता थी, सेना थी, वरदान था। और प्रह्लाद के पास क्या था? बस एक अटूट विश्वास। और उसी विश्वास ने जीत हासिल की।

होलिका को अग्नि से अभय का वरदान था, फिर भी वह जल गई। प्रह्लाद के पास कोई वरदान नहीं था, फिर भी वह बचा। यही होली का मूल संदेश है: सत्य और भक्ति, अंततः किसी भी बाहरी शक्ति से बड़े होते हैं।

और ब्रज की होली? वह तो बिल्कुल अलग ही दुनिया है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की फूलों वाली होली। जो एक बार देख ले, भूल नहीं सकता। यहाँ होली केवल उत्सव नहीं रही, यह राधा और कृष्ण के बीच उस दिव्य प्रेम की पुनर्रचना है जिसे हर पीढ़ी अपने रंगों में जीती है।

होली और प्रकृति: जब विज्ञान और परंपरा एक साथ चलते हैं

आधुनिक पीढ़ी के कुछ लोग कहते हैं कि हमारे त्योहार पुराने हो गए, अब इनकी ज़रूरत नहीं। मैं ऐसे लोगों से विनम्रतापूर्वक असहमत हूँ।

होली फाल्गुन और चैत्र के संधिकाल पर आती है। ठंड जा रही होती है, गर्मी दस्तक दे रही होती है। खेतों में फसल पक चुकी होती है। प्रकृति खुद रंगों में नहाई होती है। क्या यह संयोग है? बिल्कुल नहीं। हमारे पूर्वजों ने इस ऋतु-परिवर्तन के ठीक समय पर यह पर्व रखा, बहुत सोच-समझकर।

होलिका दहन की परंपरा लीजिए। पूर्णिमा की रात जलने वाली यह अग्नि हवा को शुद्ध करती है। शीत और बसंत के बीच के इस संक्रमण काल में जो रोगाणु पनपते हैं, यह धुआँ उन्हें नष्ट करता है। यह बात आधुनिक विज्ञान भी अब मान रहा है। और इसी अग्नि में नई फसल के दाने भूनने की परंपरा, वह धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का सबसे सादा और सबसे सच्चा तरीका है।

टेसू, हल्दी, नीम, चंदन: इन प्राकृतिक रंगों में केवल सौंदर्य नहीं था, औषधि भी थी। गर्मी शुरू होने से पहले त्वचा को इन रंगों से मज़बूत करना, यह हमारे पूर्वजों की स्वास्थ्य-प्रज्ञा थी। उत्सव के भीतर छुपा विज्ञान। आज हम इसे ‘holistic wellness’ कहते हैं, हमारे पुरखे इसे बस होली कहते थे।

होली: जहाँ ऊँच-नीच की दीवारें रंगों में डूब जाती हैं

भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है सदियों से? सामाजिक विभाजन। जाति, वर्ग, आयु, प्रतिष्ठा के वे बंधन जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करते रहे।

होली साल में एक दिन इन सभी बंधनों को तोड़ देती है। जमींदार और मजदूर एक ही रंग में भीगते हैं। बेटा बाप के पैर छूता है और फिर उन्हें गुलाल से पोत देता है। कोई बुरा नहीं मानता। कोई छोटा नहीं महसूस करता। यह जादू कैसे होता है? मैंने बहुत सोचा इस पर।

इसका जवाब ब्रज की होली में मिलता है। श्यामवर्ण कृष्ण और गौरवर्णा राधा। जब कृष्ण राधा के गाल पर रंग लगाते हैं, तो वे वर्ण-भेद को, रंग-भेद को एक हँसी में उड़ा देते हैं। यह कोई आधुनिक प्रगतिशील विचार नहीं है, यह हमारी परंपरा में हज़ारों साल से मौजूद है।

वाराणसी की तंग गलियाँ हों, मथुरा के खुले आँगन हों, अवध के गाँव हों या बुंदेलखंड के मेले, होली हर जगह वही काम करती है। भेद को रंगों में बहा देती है। यह समावेशी भारत का मूल विचार है, किसी से उधार नहीं लिया, हमारी अपनी ज़मीन से उगा हुआ।

रंग बाहर के नहीं, भीतर के भी

एक बात जो अक्सर हम भूल जाते हैं वह यह कि होली केवल बाहरी उत्सव नहीं है। इसका एक भीतरी आयाम भी है, और वह शायद ज़्यादा ज़रूरी है।

गुलाल का लाल रंग, जीवन और प्रेम का संकेत है। हल्दी का पीला, ज्ञान और शुभता का। प्रकृति का हरा, नवीनता और विकास का। जब हम एक-दूसरे पर ये रंग लगाते हैं तो अनजाने ही हम एक-दूसरे में उस परम चेतना को स्वीकार कर रहे होते हैं जिसे वेदांत ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहता है। हर चेहरे में वही दिव्य प्रकाश।

और होलिका दहन? वह भी केवल एक प्रतीक नहीं है। हमें उस अग्नि में अपना अहंकार डालना है, अपनी ईर्ष्या, अपना क्रोध, अपनी घृणा। यह वार्षिक आत्मशुद्धि का अवसर है। मन की होली, आत्मा की होली।

आज की होली: क्या हम इसके योग्य हैं?

यह प्रश्न मुझे खुद से भी पूछना होगा। क्या हम होली को उसकी गरिमा के साथ मना रहे हैं?

रासायनिक रंग जो बाज़ार में बिकते हैं, वे त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं। आँखों को और पर्यावरण को भी। यह उस होली का अपमान है जो टेसू और हल्दी से खेली जाती थी, जो देह को नुकसान नहीं, शक्ति देती थी। सुखद बात यह है कि देश भर में प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने का एक जागरूक आंदोलन बढ़ रहा है। यह छोटी-सी वापसी है, पर बहुत ज़रूरी है।

पानी का सवाल भी है। जब देश के कई हिस्सों में पानी की किल्लत हो तो हज़ारों लीटर पानी बर्बाद करना क्या उचित है? अनेक समुदायों ने सूखी होली की परंपरा अपनाई है। मुझे लगता है यह कोई समझौता नहीं, यह होली की असली भावना के और करीब जाना है।

होली अब दुनिया की है

एक बात मुझे गर्व से भरती है। होली आज चालीस से अधिक देशों में मनाई जाती है। लंदन में, न्यूयॉर्क में, सिडनी में, टोक्यो में। वहाँ के लोग जो हमारी भाषा नहीं जानते, हमारे शास्त्र नहीं पढ़े, वे भी इस रंगोत्सव में शामिल होना चाहते हैं।

क्यों? क्योंकि इस पर्व में कुछ ऐसा है जो भाषा और सीमा से परे है। जो किसी को भी छू लेता है। यह उस सभ्यता की ताकत है जो जीवन को उत्सव की तरह जीना जानती है।

उत्तर प्रदेश इस विरासत का हृदय है। राम और कृष्ण की यह भूमि, तुलसीदास और सूरदास की यह वाणी-भूमि, कबीर और मीराबाई का यह रंग-मंच। कबीर ने ज्ञान की होली खेली जिसमें विवेक के रंग आत्मा को रँगते हैं। मीरा ने होली को दिव्य प्रेम का उन्माद माना। यह विरासत अतीत नहीं है, यह एक जीती-जागती शक्ति है जो आज भी हमें दिशा देती है।

जब तक रंग हैं, होली है

होली शाश्वत क्यों है? क्योंकि इसका सवाल शाश्वत है। जब तक दुनिया में अंधेरा है, प्रकाश की ज़रूरत रहेगी। जब तक दीवारें हैं, रंगों की ज़रूरत रहेगी। जब तक दिल में ठंडक है, बसंत की घोषणा की ज़रूरत रहेगी।

भारत ने दुनिया को एक विचार दिया है- जीवन उत्सव है। होली उस विचार की सबसे रंगीन, सबसे खुली, सबसे निर्भीक अभिव्यक्ति है।

इस होली पर, जब होलिका दहन हो तो एक पल रुकिए। अपने भीतर झाँकिए। जो जलाना हो, जला दीजिए। और जब रंग खेलें, तो हर चेहरे में वह दिव्य प्रकाश देखिए जिसे कोई रंग ढक नहीं सकता और कोई अंधकार बुझा नहीं सकता।

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Harish Chandra Srivastava
Harish Chandra Srivastavahttp://up.bjp.org/state-media/
Spokesperson of Bharatiya Janata Party, Uttar Pradesh

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