रणवीर सिंह की फिल्म धुरंधर रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर फिल्म क्रिटिक्स और दर्शकों के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वरिष्ठ समीक्षक अनुपमा चोपड़ा ने फिल्म को टेस्टोस्टेरोन-हेवी, श्रिल नेशनलिज़्म और एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव वाला बताते हुए नेगेटिव रिव्यू दिया, जिसके बाद उन्हें भारी आलोचना का सामना करना पड़ा और उन्होंने अपना वीडियो रिव्यू निजी कर दिया।
इसी माहौल में फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड (FCG) ने ऑनलाइन हमलों और डराने-धमकाने की कोशिशों की निंदा करते हुए लंबा बयान जारी किया। दिलचस्प यह है कि जिस संगठन ने यह बयान जारी किया है, उसकी अध्यक्ष अनुपमा चोपड़ा ही हैं। इस कारण गिल्ड की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह स्वतंत्र आलोचना की सुरक्षा है या स्वयं की आलोचना से सुरक्षा?
अनुपमा चोपड़ा के रिव्यू से शुरू हुआ विवाद?
फिल्म धुरंधर पर अपने रिव्यू में अनुपमा चोपड़ा ने फिल्म को पुरुषों पर केंद्रित, पूरी तरह से मेल सेन्ट्रिक एनर्जी, ज्यादा राष्ट्रवादी और पाकिस्तान-विरोधी नैरेटिव पर आधारित बताया। उनकी समीक्षा में उपयोग हुए शब्द ‘टेस्टोस्टेरॉन-हेवी’, ‘श्रिल नेशनलिज़्म’ और एंटी-पाकिस्तान सोशल मीडिया पर तुरंत बहस का विषय बन गए।
कई दर्शकों ने आरोप लगाया कि यह समीक्षा फिल्म की कहानी के बजाय विचारधारा के चश्मे से लिखी गई है। आलोचना का स्वर तेज होने पर चोपड़ा ने अपना रिव्यू वीडियो प्राइवेट कर दिया, जिससे विवाद और भी बढ़ गया।
फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड ने क्या कहा
फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड एक ऐसा ग्रुप है, जिसमें भारत के कई बड़े फिल्म रिव्यू करने वाले लोग और एंटरटेनमेंट पत्रकार शामिल होते हैं। इसका काम फिल्मों की समीक्षा को सही ढंग से ईमानदारी के साथ और प्रोफेशनल तरीके से करना है।
यह लोग फिल्मों, वेब सीरीज और ऑनलाइन कंटेंट पर अपनी राय देते हैं और हर साल अवॉर्ड्स भी घोषित करते हैं। जब किसी रिव्यू को लेकर विवाद होता है या कोई सवाल उठता है, तब यह पूरा ग्रुप मिलकर एक आधिकारिक बयान जारी करता है, ताकि लोगों को उनकी बात साफ-साफ समझ आ सके और उनकी विश्वसनीयता बनी रहे।
रिव्यू विवाद बढ़ते ही फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड ने एक बयान जारी किया। गिल्ड ने कहा कि कई समीक्षकों को हाल के दिनों में टारगेटेड अटैक, हैरेसमेंट और नफरत का सामना करना पड़ा है। बयान में कहा गया कि असहमति से शुरू हुई बहस अब ऑनलाइन कैंपेन, व्यक्तिगत हमलों और धमकियों तक पहुँच गई है।
Official statement from the Film Critics Guild on the targeted attacks and harassment faced by film critics and journalists this week. The Guild strongly condemns this behaviour and stands in solidarity with our colleagues. pic.twitter.com/R3ltKUkfFo
— Film Critics Guild (@theFCGofficial) December 11, 2025
कुछ मौजूदा रिव्यू को बदलवाने, एडिटोरियल राय को प्रभावित करने और प्रकाशनों पर दबाव बनाने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया। गिल्ड ने इसे इंडिपेंडेंट फिल्म क्रिटिसिज़्म पर हमला बताया और कहा कि किसी भी प्रोफेशनल को केवल अपना काम करने के लिए बदनाम करना गलत है। साथ ही जनता से अपील की गई कि फिल्म पसंद या नापसंद करना उनका अधिकार है, लेकिन समीक्षकों से किसी लाइन में आने की उम्मीद करना नहीं।
इस बयान पर क्यों हुआ विवाद?
गिल्ड का यह बयान सामान्य परिस्थितियों में फिल्म आलोचना की स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि गिल्ड की मैनेजिंग कमिटी की चेयरपर्सन खुद अनुपमा चोपड़ा हैं। वही व्यक्ति जिनके रिव्यू पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएँ आईं।

आलोचकों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि जिस आलोचक को आलोचना झेलनी पड़ी, उसी के नेतृत्व वाले संगठन ने आलोचकों पर आलोचना बंद करो जैसा बयान जारी कर रहा है जिससे उसका बचाव किया जा सके। इससे गिल्ड की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए और बयान के पीछे की मंशा पर बहस शुरू हो गई।

अनुपमा चोपड़ा के रिव्यू की भाषा और फोकस कई दर्शकों को फिल्म के मूल संदर्भ से हटकर लगी। फिल्म में युद्ध, सैनिकों और दुश्मन देश के हिसाब से जैसे तत्व कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन दर्शकों का आरोप था कि चोपड़ा ने इन्हें राजनीतिक चश्मे से देखा।
श्रिल नेशनलिज़्म (जोर-जबरदस्ती वाला राष्ट्रवाद) जैसे शब्दों को देशभक्ति का मजाक बताया गया, जबकि एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव वाली टिप्पणी को फिल्म की कहानी का स्वाभाविक हिस्सा माना गया। इसी वजह से यह मामला साधारण रिव्यू विवाद से आगे बढ़कर विचारधारा की बहस में बदल गया।


