Sunday, April 5, 2020
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जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफ़न की गई थी मंदिरों से लूटी गई हिन्दू प्रतिमाएँ, ये रहा सबूत

'24-25 मई, 1689, दिन- रविवार। ख़ान जहाँ बहादुर जोधपुर से मंदिरों को तबाह कर के लौटा था। हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाओं को देखकर बादशाह औरंगज़ेब बहुत खुश हुआ।' - साक़ी मुस्तक़ ख़ान अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि इसके बाद...

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

आज के ज़माने में जब औरंगजेब को लेकर ऐसी बातें कही जा रही हैं कि उसने मंदिर बनवाए और मंदिरों को ज़मीनें दीं, ऐसे में सच्चाई को छिपाने वाले इन करतूतों को ध्वस्त करना आवश्यक है। औरंगज़ेब को लेकर कोई अनपढ़ व्यक्ति ऐसे दावे करे तो चलता है लेकिन अगर कोई इतिहासकार ऐसा करे तो आप क्या कहेंगे? सर्वेश्वरी डिग्री कॉलेज के प्राध्यापक और कथित इतिहासकार प्रदीप केशरवानी ने कहा था कि उन्होंने (औरंगज़ेब ने) महादेव मंदिर को दान दिया और संरक्षण दिया। आजकल टीपू सुल्तान और औरंगजेब जैसे क्रूर राजाओं को उदार साबित करने की एक होड़ सी चल पड़ी है।

इस सम्बन्ध में औरंगज़ेब की जीवनी में ही कुछ घटनाओं का जिक्र है, जो इन तथाकथित इतिहासकारों की पोल खोलता है। औरंगज़ेब पर साक़ी मुस्तक़ ख़ान द्वारा लिखित पुस्तक ‘मसीर-ई-आलमगीरी’ में एक घटना का जिक्र है, जिसे आज के ज़माने के किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा है। ये घटना रविवार (मई 24-25, 1689) की है। उस दिन ख़ान जहाँ बहादुर जोधपुर से मंदिरों को तबाह कर के लौटा। औरंगज़ेब की जीवनी में लिखा हुआ है कि ख़ान जहाँ बहादुर द्वारा मंदिरों को ध्वस्त किए जाने, उन्हें लूटने और प्रतिमाओं को विखंडित किए जाने पर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ। बादशाह को बहादुर के इन कृत्यों पर गर्व महसूस हुआ।

‘मसीर-ई-आलमगीरी’ के अनुसार, खान जहाँ बहादुर जोधपुर से कई गाड़ियों में भर कर हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ लाया था। ये प्रतिमाएँ उन मंदिरों की थीं, जिन्हें मुगलों ने उसके नेतृत्व में लूटा और तबाह किया। इन लूटी गई प्रतिमाओं को बादशाह औरंगज़ेब के सामने पेश किया गया, जिस देख कर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। इनमें एक से बढ़ कर एक प्रतिमाएँ थीं। कुछ सोने-चाँदी के थे, कुछ पीतल की थीं तो कुछ ताँबे से गढ़े गए थे। इनमें कई ऐसी मूर्तियाँ भी थीं, जो पत्थरों की थीं और उन पर उत्तम नक्काशियाँ की गई थीं।

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औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि इन प्रतिमाओं को उसके दरबार के जिलाऊखाना में डाल दिया जाए। दीवारों से घिरे आँगन जैसी जगह को जिलाऊखना कहते हैं। इसके बाद औरंगज़ेब ने जो आदेश दिया, वो जानने लायक है। बादशाह ने कहा कि जोधपुर से लूट कर हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे गाड़ दिए जाएँ। और इस तरह से जामा मस्जिद के नीचे हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को दफ़न कर दिया गया। इसी औरंगज़ेब के बारे में आज के कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वो उदार था। आज जब राम मंदिर पर फ़ैसला आता है और हिन्दुओं को 500 वर्षों बाद न्याय मिलता है तो ऐसे ही लोगों की सुलगती है, जो ग़लत इतिहास पढ़ा कर लोगों को बरगलाने में लगे हैं।

इस सम्बन्ध में उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज का भी एक बयान है, जो उन्होंने नवम्बर 2018 में दिया था। साक्षी महाराज ने कहा था कि दिल्ली के जामा मस्जिद को ढाह देना चाहिए क्योंकि इसे हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर बनाया गया है। साक्षी महाराज का मानना था कि लोगों को मथुरा, काशी और अयोध्या को छोड़ कर जामा मस्जिद पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने चुनौती दी थी कि अगर जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ न मिलें तो उन्हें फाँसी पर लटका दिया जाए। साक्षी महाराज के आँकड़ों के अनुसार, अकेले मुगलों ने ही 3000 हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर उनकी जगह मस्जिदों का निर्माण करवाया।

औरंगज़ेब की जीवनी ‘मसीर-ई-आलमगीरी’ का अंश

जामा मस्जिद के बारे में बता दें कि इसे औरंगज़ेब के पिता शाहजहाँ द्वारा सन 1644-1656 में बनवाया गया था। औरंगज़ेब ने लाहौर में बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया था, जिसकी रूप-रेखा जामा मस्जिद से मिलती है। जामा मस्जिद के निर्माण में 5000 से भी अधिक मजदूरों को खटवाया गया था और मध्य सत्रहवीं सदी में इसके निर्माण में 10 लाख रुपए से भी ज्यादा ख़र्च आया था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब अंग्रेजों ने दिल्ली जीती तो उन्होंने जामा मस्जिद को भी अपने कब्जे में ले लिया था। अंग्रेजों ने मस्जिद में अपनी आर्मी रखी हुई थी और वो दिल्ली को सज़ा देने के लिए इस मस्जिद को ध्वस्त करना चाहते थे। अंग्रेजों ने दिल्ली के अकबराबादी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था।

औरंगज़ेब पर लिखी गई इसी पुस्तक में इसका भी जिक्र किया गया है कि किस तरह रमजान के महीने में मथुरा के मंदिरों को ध्वस्त किया गया। राजस्थान के खंडेला में 300 लोगों की नृशंस हत्या कर के वहाँ के सबसे बड़े मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। उदयपुर में राणा के महल के सामने स्थित मंदिर को तोड़ डाला गया। राजस्थान के एम्बर से लौटे मुग़ल कमांडर अबू तरब ने 66 मंदिरों को ध्वस्त किए जाने की सूचना बादशाह को दी थी। हामुउद्दीन ख़ान को कर्नाटक के बीजापुर में मंदिरों को ध्वस्त कर उनकी जगह मस्जिदों का निर्माण करवाने के लिए भेजा गया। उसने लौट कर सूचना दी कि मंदिरों को ढहाए जाने से बड़ी संख्या में हिन्दू बेरोजगार हो रहे हैं।

आजकल जब क्रूर बादशाहों को आक्रांता न मानते हुए उन्हें उदार दिखाने की कोशिश हो रही है, उन्हीं के ज़माने की पुस्तक ऐसे प्रयास करने वाले लोगों को लानतें भेज रहे हैं। वहीं वीर शिवाजी के बारे में बात नहीं की जाती, जिन्होंने अपनी सेना को आदेश दे रखा था कि अगर कहीं भी कुरानशरीफ मिलता है तो उसे बाइज्जत आसपास के मस्जिद में रखा जाए। उनका आदेश था कि अगर कोई महिला युद्धबंदी है तो उसे पूरी इज्जत के साथ उसके घर पहुँचाया जाए। उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। लेकिन, यहाँ छत्रपति शिवाजी जैसे वीर राजाओं, जिन्होंने कभी किसी अन्य मजहब के प्रतीकों को नुकसान नहीं पहुँचाया, के मुक़ाबले मंदिरों को तोड़ कर उनकी जगह मस्जिद बनाने वाले मुगलों को महान बनाने की कोशिशें हो रही हैं।

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