Thursday, May 13, 2021
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केरल का सिंह, जिससे काँपते थे टीपू और ब्रिटिश: अंग्रेजों ने बताया स्वाभाविक सरदार, इतिहासकारों ने नेपोलियन से की तुलना

पजहस्सी राजा का जीवन दो मोर्चों पर संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ। एक मैसूर की इस्लामी सत्ता और एक ईस्ट इंडिया कंपनी। जब उत्तरी केरल में भगदड़ की स्थिति मची हुई थी और अधिकतर जमींदारों से लेकर प्रभावशाली हस्तियों तक अपने लोगों को छोड़ कर त्रावणकोर चले गए थे, जब उन्होंने अपने राज्य में रह कर जनता की सेवा करने की ठानी।

केरल को ‘God’s Own Country’ भी कहा जाता है, जहाँ एक से बढ़ कर एक वीर हुए हैं। लेकिन, वहाँ के लोगों के मन में पजहस्सी राजा के लिए ऐसा सम्मान है, जैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले। उन्हें ‘केरल वर्मा’ के नाम से भी जाना जाता है। वे मालाबाद में कोट्टयम (Cotiote) के हिन्दू राजा थे। उन्हें दक्षिण में ‘केरल सिंहम’ के नाम से पुकारा जाता है, अर्थात, केरल का शेर। वो शेर, जो अंग्रेजों के सामने भी एक योद्धा की तरह लड़ा।

पजहस्सी राजा का जन्म 3 जनवरी 1753 को हुआ था। आज से 215 वर्ष पहले 30 नवंबर 1805 को 52 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हुई थी। वे ऐसे काल में वयस्क हुए थे, जब औरंगजेब की मृत्यु के 50 वर्ष से अधिक बीत चुके थे। एक तरफ मुग़ल साम्राज्य तहस-नहस हो रहा था, दूसरी तरफ अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाएँ हिलोरे मार रही थीं। हाँ, मराठा साम्राज्य ज़रूर अपने चरम पर पहुँच गया था।

लेकिन, ये ऐसा समय था जब खतरा इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ-साथ अंग्रेजों से भी था। मालाबार के लिए वो समय बहुत ही त्रासद थे, क्योंकि टीपू सुल्तान का अब्बू हैदर अली अपने साम्राज्य के विस्तार में लगा हुआ था और समूचे केरल पर उसकी नजर थी। हैदर अली किसी तरह मालाबार के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा करने में कामयाब रहा, जिस कारण वहाँ के राजा को भाग कर त्रावणकोर में शरण लेनी पड़ी।

त्रावणकोर में तब शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई थी, क्योंकि हैदर अली के आक्रमण के बाद हिन्दुओं और ईसाइयों में भय का माहौल था। लेकिन, कोट्टायम में स्थिति काफी खराब थी और पजहस्सी राजा वैसे तो गद्दी की लाइन में चौथे नंबर थे, लेकिन उन्हें राजा बनना पड़ा। उन्होंने 1774-1793 में लगभग दो दशक की अवधि में मैसूर की फ़ौज को रोकने के लिए संघर्ष किया। अंत में राजपरिवार और सेना के अन्य लोगों ने भी उनकी बहादुरी को देखते हुए उन पर अपना विश्वास जताया।

इस तरह से पजहस्सी राजा का जीवन दो मोर्चों पर संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ। एक मैसूर की इस्लामी सत्ता और एक ईस्ट इंडिया कंपनी। जब उत्तरी केरल में भगदड़ की स्थिति मची हुई थी और अधिकतर जमींदारों से लेकर प्रभावशाली हस्तियों तक अपने लोगों को छोड़ कर त्रावणकोर चले गए थे, जब उन्होंने अपने राज्य में रह कर जनता की सेवा करने की ठानी। उन्होंने पहले टीपू सुल्तान की फ़ौज के खिलाफ अंग्रेजों की सहायता ली।

लेकिन, उन्हें अंग्रेजों की धोखेबाजी भरी चालें समझने में देर नहीं लगी और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को धता बता कर उन यूरोपियन आक्रांताओं के खिलाफ युद्ध लड़ा। 1790 में तीसरे मैसूर युद्ध में अंग्रेजों ने वादा किया था कि पजहस्सी राजा द्वारा की जा रही मदद के बदले में कोट्टायम को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया जाएगा। लेकिन, अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के साथ जो 1792 की संधि की, उसमें कोट्टायम के साथ विश्वासघात किया गया।

पजहस्सी राजा ने इसके बाद अंग्रेजों की सेना पर एक के बाद एक आक्रमण शुरू किए। 7 जनवरी 1997 को कैप्टन बोमैन के नेतृत्व वाली 80 ब्रिटिश ट्रूप्स की टुकड़ी पर हमला बोला गया। कैथरी अम्बु नायर इस हमले का नेतृत्व कर रहे थे। ये हमला इतना तेज था कि कैप्टन बोमैन ही मारा गया। कई अंग्रेज अधिकारी भी मारे गए और घायल हुए। सेना को खासी क्षति पहुँची। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों की सेना पर फिर हमला हुआ।

ये हमला इतना भयंकर था कि पूरी ब्रिटिश टुकड़ी में सिर्फ एक ही व्यक्ति जिंदा बचा, बाकी सभी मारे गए। इसके बाद आक्रमण के डर से वायनाड और इसके आसपास के क्षेत्रों में जितने भी ब्रिटिश सेना की टुकड़ियाँ थीं, वो भी भाग खड़ी हुईं। उन्हें आक्रमण के भय से वापस बुला लिया गया। कनवरथ संकरम नाम्बियार इन हमलों में पजहस्सी राजा के सबसे विश्वस्त सिपहसालार थे। लेकिन, अंग्रेजों ने भी तैयारी शुरू कर दी थी।

फ़रवरी 1797 में अंग्रेजों ने वायनाड और उसके आसपास के पजहस्सी राजा के ठिकानों पर हमला बोल दिया। इस बार अंग्रेज बड़ी संख्या में थे और हमला चारों दिशाओं से बोला गया गया। लेकिन, मार्च आते-आते किस्सा बदलने लगा और कोट्टायम की सेना के साथ जनता भी आ गई। मार्च 9, 10, 11 को तीन दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और नायर व कुरुचिया समुदाय के योद्धाओं ने अंग्रेजों को भगा दिया।

ब्रिटिश के लिए स्थिति इतनी बुरी हो गई कि वापस मैदानों में भागने के लिए भी उनके पास रास्ते नहीं बचे थे। पजहस्सी राजा ने एक चालाकी की थी कि उन्होंने अपनी सेना के एक समूह को टीपू सुल्तान की फ़ौज के ड्रेस में डाला था। ब्रिटिश अभी ये सोच ही रहे थे कि वो केरल में कौन सी रणनीति अपनाएँ, तभी चौथा मैसूर युद्ध शुरू हो गया और उन्हें अपनी योजनाएँ ठप्प करनी पड़ीं। वो पजहस्सी राजा के साथ संधि के लिए मिन्नतें करने लगे।

इसके लिए बॉम्बे के गवर्नर जोनाथन डंकन खुद मालाबार आए। उन्होंने पजहस्सी राजा के दुश्मनों के साथ किए करारों को रद्द कर दिया और उन्हें अपना विरोध वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश की। इसके लिए उनके राज्य को 8000 रुपए प्रतिवर्ष देने की योजना भी बनी। तब तक कोट्टायम के वरिष्ठ राजा भी त्रावणकोर से आ गए थे। सारी संधि के बावजूद अंग्रेजों का मानना था कि पजहस्सी राजा उनके भरोसे के लायक नहीं हैं और वो कुछ भी कर सकते हैं।

लेकिन, जल्द ही लोगों को पता चल गया कि अंग्रेजों के साथ संधि पजहस्सी राजा की एक रणनीतिक चाल थी। इसी तरह की रणनीतिक चाल, जैसे छत्रपति शिवाजी जैसे राजाओं ने इतिहास में इस्लामी आक्रांताओं के साथ अपनाया था। अंग्रेजों ने केरल में मसालों की खेती (मिर्च इत्यादि) भी शुरू कर दी थी, ताकि केरल के राजाओं के व्यापार को ठप्प किया जा सके। लेकिन, पजहस्सी राजा ने जहाँ-जहाँ ऐसा किया गया था, वहाँ हमला बोला।

अनजारकंडी में अंग्रेजों की खेती को बर्बाद कर दिया गया। कोडोली और मंताना में अंग्रेजों के आउटपोस्ट्स को निशाना बनाया गया। कर्नल वेलेस्ली कहीं और व्यस्त था और वो वहीं से सेना को निर्देश दे रहा था। इसी कारण अंग्रेजों ने 1801 में कर्नल स्टीवेंसन को एक बहुत बड़ी सेना के साथ वहाँ भेजा। अपनी सेना के दम पर वो दक्षिण मालाबार में पजहस्सी राजा के अनुयायियों को उनसे अलग करने में सफल हुआ।

फिर वो समय आ गया, जो दिन कभी महाराणा प्रताप जैसे राजाओं ने देखा था, लेकिन राष्ट्र की स्वतंत्रता को हमेशा सर्वोपरि रखा। मई 1801 आते-आते वायनाड और उसके आसपास की सारी रणनीतिक स्थलों पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया और पजहस्सी राजा अपनी पत्नी के साथ जंगलों में भटकने के लिए मजबूर हो गए। वो चिरक्कल, कोट्टायम, कदठनाद और कुरुम्ब्रनाड के जंगलों में ठिकाने बनाने लगे।

चूज़हली नाम्बियार और पेरुवय्यल नाम्बियार जैसे उनके सिपहसालारों को अंग्रेजों ने बंदी बना लिया। पेरुवय्यल को दो अन्य लोगों के साथ कन्नवम भेज कर फाँसी पर लटका दिया गया। उनकी सारी सम्पत्तियों को जब्त कर लिया गया। अंग्रेजों ने ऐलान किया कि जो उसके पाले में आ जाएँगे, उनकी सम्पत्तियों को छोड़ दिया जाएगा और उन्हें बख्श दिया जाएगा, लेकिन इस ऑफर को लेने वालों की भारी कमी रही, जिससे ये कदम फेल हो गया।

कन्नावांथ नाम्बियार को फाँसी पर लटका दिया गया। इसके बाद पजहस्सी राजा के आत्मसमर्पण की अटकलें लगाई जानें लगीं, क्योंकि बाहर अंग्रेज खूनी दरिंदे बन गए थे और एक के बाद एक जानें ले रहे थे। विद्रोही गतिविधियों को लगभग रोक दिया गया। मालाबार के प्रिंसिपल कलक्टर मेजर मैक्लेऑड ने इसका फायदा उठा कर पूरे जिले को Disarm करने का निर्णय लिया, जिसके तहत सभी के हथियार छीन लिए गए।

जिन्होंने भी अपने हथियार नहीं लौटाए या छिपा लिए, उन्हें पकड़े जाने पर मौत की सज़ा दी गई। 1802 की शुरुआत में ये सब होने के बाद अंग्रेज निश्चिंत होने लगे कि विद्रोह को दबा दिया गया है और पजहस्सी राजा की अब खास ताकत बची नहीं। लेकिन, अक्टूबर में वायनाड के परमणरम किला पर हमला कर विद्रोहियों ने उसे अपने हाथ में ले लिया। वहाँ 70 अंग्रेजों और उनके वफादारों को मार डाला गया।

एडाचिन्ना कुंगन नायर ने इस हमले का नेतृत्व किया था। इसके बाद वल्लियूरकावु मंदिर में उनकी हजारों की सेना जमा हुई और उन्होंने वायनाड पास के साथ-साथ पेरिया को भी अपने कब्जे में ले लिया। मैसूर से लेकर मननतोडी तक के पूरे रास्ते पर कुंगन नायर के ही निर्देश चलने लगे। अंग्रेजों ने पजहस्सी राजा पर 3000 रुपए का इनाम रख दिया। उनके साथ के अन्य देशभक्तों पर 300 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक का इनाम रखा।

इसका नुकसान ये हुआ कि रुपए के लालच में गद्दारों ने पजहस्सी राजा की खोज शुरू कर दी। कोलकरों को भड़का कर उनके खिलाफ लगाया गया। कोलकरों ने दक्षिण वायनाड में उनके ठिकाने पर हमला बोला, जहाँ पजहस्सी राजा तो बाल-बाल बच गए, लेकिन उनके दो लोगों को धर लिया गया। वहाँ 1300 की कोलकर सेना को लगाया गया था, लेकिन वायनाड में मौसम बदलने लगा और उनमें से बहुत कम बच गए।

पजहस्सी राजा ने हार नहीं मानी थी और उन्होंने अंतिम युद्ध के लिए अपनी सेना को संगठित करना शुरू कर दिया। वायनाड में कुरुचिया और कुरुम्बर सेनाओं को इकठ्ठा किया जाने लगा, ताकि अंतिम युद्ध लड़ा जा सके। लेकिन, कुरुचिया सेनापति तरक़्क़ुल चंदु को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उन्हें बंदी बना लिया। उनके कैम्प में रसद वगैरह जिस रास्ते से आता था, उस पर कब्ज़ा कर लिया गया, ताकि वो बाहर निकलने को मजबूर हों।

अब वो अपने समर्थकों के साथ राज्य के एक ऐसे हिस्से में घिर चुके थे, जहाँ भोजन-पानी तक की व्यवस्था नहीं थी। एक तरह से वो अलग-अलग थलग हो गए। सब कलक्टर टीएच बाबर उनके खिलाफ युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे। 30 नवंबर 1805 को उन्हें जंगल में ही एक छोटी सी नदी के किनारे चारों ओर से घेर लिया गया। अंग्रेजों के इतिहास के मुताबिक, अंग्रेजों की सेना ने ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसानी शुरू की। पजहस्सी राजा को भी गोली लगी और उनकी मृत्यु हो गई।

लेकिन, केरल के स्थानीय इतिहास में कुछ और ही दर्ज है। कहते हैं कि पजहस्सी राजा न तो अंग्रेजों के हाथों मरना चाहते थे और न ही पकड़ा जाना चाहते थे। इसीलिए, उन्होंने अपनी हीरे की अंगूठी पूरी की पूरी निगल ली, ताकि उनकी मृत्यु हो जाए। उनके 4 साथियों को मौके पर ही अंग्रेजों ने मार डाला और 2 को अपने साथ ले गए। उनकी पत्नियों और समूह में शामिल महिलाओं को भी अंग्रेज अपने साथ लेकर गए।

अंग्रेज उनकी युद्धकला से इतना प्रभावित थे कि पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। 31 दिसंबर 1805 को मालाबार के प्रिंसिपल कलक्टर ने बाबर को भेजे गए पत्र में लिखा था, “हालाँकि वो एक विद्रोही थे, लेकिन पजहस्सी राजा भारत के स्वाभाविक सरदारों में से एक थे। उन्हें इसी तरह याद रखा जा सकता है, बजाए एक मृत दुश्मन की तरह याद रखने के।” उत्तर केरल में उनकी मृत्यु के साथ ही संघर्ष भरा आंदोलन ख़त्म हो गया।

टीएच बाबर को अंग्रेजों ने बड़े इनाम से नवाजा। उसके ही शब्दों में देखें तो केरल के पजहस्सी राजा एक ‘असाधारण और विलक्षण योद्धा’ थे। केरल के इतिहास के वो सबसे बड़े योद्धाओं में से एक थे। कुशल क्षमता, किरदार की मजबूती और अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्धता उनकी पहचान थी। इतिहासकार ए श्रीधर मेनन अपनी पुस्तक ‘Kerala History And Its makers‘ में लिखते हैं कि पजहस्सी राजा अपनी कुशल संगठनात्मक क्षमता के लिए विख्यात थे। केरल डिस्ट्रिक गैजेट के एडिटर रहे मेनन लिखते हैं:

“वे एक जन्मजात नेता था। वे एक कभी न थकने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनके पास उच्च-स्तरीय संगठनात्मक क्षमता थी। अपने अनुयायियों के दिलों-दिमाग में वे जादुई रूप से छाए हुए थे और उन्हें वे सही कार्य के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देने के लिए प्रेरित करने की क्षमता रखते थे। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह उन्होंने सारे दुःख और क्लेश अपनी सेना के साथ खुद भी सहे, व्यक्तिगत उदाहरण स्थापित कर के अपने लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया। टीएच बाबर ने स्वीकार किया था कि उनके अनुयायियों में उनके लिए वो सम्मान और प्रभाव था, जो उनकी मृत्यु के बाद भी कम नहीं हो सका। उनके लोगों द्वारा किया गया गुरिल्ला युद्ध भारतीय इतिहास में बहुत कम ही देखने को मिला। उन्होंने अंग्रेजों की आधीनता की जगह मौत को चुना।”

उनकी यही खासियत थी कि वो व्यक्तिगत रूप से सारे खतरे खुद मोल लेते थे और जनता को इन मामलों में अपने पीछे रखते थे। जब उन्होंने 1793 में अंग्रेजों से लोहा लिया तो कोट्टयम की जनता से स्पष्ट कह दिया कि वो अंग्रेजों को टैक्स न दें। टैक्स कलेक्ट करने के लिए वे खुद जमीन पर उतरे। इन सबके बीच एक क्रूरमब्रनाड राजा था, जिसकी अंग्रेजों से खूब छनती थी और उसके कारण ही अंग्रेज पजहस्सी राजा को देखना तक नहीं चाहते थे।

उन पर 2009 में ‘केरल वर्मा पजहस्सी राजा’ नामक फिल्म भी बनी, जिसमें 3 नेशनल अवॉर्ड और 12 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले मलयालम अभिनेता मामूटी ने उनका किरदार निभाया था। ये उस समय की सबसे महँगी मलयालम फिल्म थी, जिसका बजट 27 करोड़ रुपया था। ढाई साल इसे बनाने में लगे और ऑस्कर विजेता रेसुल पुकुट्टी ने इसके लोकेशन के लिए इफेक्ट्स तैयार किए थे। फिल्म को 8 प्रमुख अवॉर्ड समारोहों में लगभग 4 दर्जन अवॉर्ड्स से नवाजा गया।

इसी तरह से त्रावणकोर के धर्मराज राम वर्मा और राजा केशवदास पिल्लई उनमें से एक थे, जिन्होंने टीपू सुल्तान को नेदुमकोट्टा के दीवार के युद्ध (Battle Of Nedumkotta) में नाकों चने चबवाए। ये वो समय था, जब केरल को बाहरी खतरों का भान हो चला था और उसने एक दीवार बनवाई थी, ताकि उत्तर से आने वाले दुश्मनों से रक्षा की जा सके। इसी दीवार को वहाँ ‘नेदुमकोट्टा’ या फिर ‘Travancore Lines’ कहा जाता था।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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