Wednesday, December 2, 2020
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‘जब कारसेवक बाबरी गिराकर निकले, तो अयोध्या दीपों से जगमगा रही थी, ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी’

"रामभक्ति का ऐसा जूनून था कि अनेक लोग देखते ही देखते प्राण गँवाकर भी कारसेवा में जुटे रहे। तुरंत सरयू तक कतारें लग गईं। हाथों-हाथ मलबा नदी तक पहुँचाया गया। हर कारसेवक को एक एक ईंट घर ले जाने के लिए सूचना मिली। शाम होते-होते..."

भगवान राम की जन्मभूमि पर सदियों से खड़ा कलंक का बाबरी ढाँचा सदा ही हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती देता रहा था। मैं 1984 में संघ का स्वयंसेवक बना। संयोग से उन्हीं दिनों श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति का नव आन्दोलन आरम्भ हुआ था।

1984 में ही रामलीला मैदान दिल्ली में श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का एक कार्यक्रम इन्द्रप्रस्थ विश्व हिन्दू परिषद के तत्वाधान में आयोजित किया गया था। मैं स्वयंसेवक तो नया था, लेकिन एक प्रसिद्द चित्रकार के रूप में जाना जाता था। तब भी मंच सज्जा का कुछ कार्य मेरे जिम्मे लगा था।

ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में आमंत्रित अथितियों की सूची में तत्कालीन इंदिरा गाँधी के मंत्रीमंडल के सदस्य बसंत साठे जी का नाम भी था। मुझे अच्छी तरह से स्मरण है कि कार्यक्रम आरम्भ हुए आधा घंटा हो चुका था, मैं भी प्रबंधको में मंच के पीछे ही था।

संघ के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रचारक ब्रह्मदेव जी बेचैनी से टहल रहे थे। तभी उन्होंने एक साथ खड़े अधिकारी से कहा – “इंदिरा अम्मा ने मना कर दिया होगा, इसीलिए साठे जी नहीं आए।”

उस समय राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के सबसे बड़े चेहरे स्वर्गीय श्री बैकुंठ लाल शर्मा प्रेम ही थे। ये मेरा सौभाग्य रहा कि उनके साथ मिलकर संघर्ष के अनेक कार्यों में सहभागी होने का अवसर मिला।

मैंने इस आन्दोलन के प्रारम्भ से ही उसके हर अवसर पर पूरी शक्ति से भाग लिया था। पहले हम नारे लगाते थे – “आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो।”

इसके लिए खूब जलसे जुलूस निकाले गए। राजीव गाँधी की सरकार के समय जन्मभूमि का ताला खुल गया। फिर राम शिलाएँ एकत्र की जाने लगीं। उन्हें लेकर भी बहुत बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए। गली गली में राम मंदिर के नारे लगते थे।

सारा मीडिया और सेकुलर दरिन्दे पूरी ताकत से भगवान राम के मुकाबले बाबर को खड़ा करने का षड्यंत्र करते रहे। मैं 1988 में प्रचारक था। हाथों में माइक लेकर अनेक स्थानों पर नुक्कड़ सभाएँ होती थीं। हिन्दू समाज की जागृति के लिए भरसक प्रयास किए।

आडवाणी जी ने रथयात्रा के माध्यम से ढोंगी सेकुलरों को कड़ा उत्तर दिया था। 1990 में कारसेवा की घोषणा हुई। देशभर से लाखों लोग अयोध्या के लिए चले। मुलायम सिंह ने हर रामभक्त कारसेवक पर भयंकर अत्याचार किए।

जेल भर दिए गए, लेकिन फिर भी निश्चित तिथि तक हजारों रामभक्त अयोध्या में पहुँच चुके थे। मुलायम सिंह ने हजारों जिहादियों को पुलिस के वेश में नियुक्त कर दिया था। रामभजन करते भक्तों पर गोलियाँ चलवाई गईं। सैकड़ों को मार दिया गया। फिर भी अनेक रामभक्तों ने मुलायम सिंह के मुख पर कालिख पोतते हुए अपने प्राणों की परवाह नहीं की और बाबरी ढाँचे पर भगवा फहरा ही दिया।

माथे पर घाव लिए लहुलुहान अशोक सिंघल जी भी अयोध्या पहुँच गए थे। कालान्तर में सरकार बदली। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 06, 1992 को मोक्षदा एकादशी का दिन कारसेवा के लिए चुना गया।

देशभर से लाखों लोग अयोध्या जाने के लिए तैयार थे। बहुत नियोजित रूप से जत्थे बनाकर, वाहिनियाँ बनाकर उनके प्रमुख तय कर कारसेवक भेजे गए। मैं भी 1 दिसंबर को अपने यहाँ की एक वाहिनी के साथ गया।

देश के हर कोने से कारसेवक पहुँचे थे। आतंकग्रस्त कश्मीर और पंजाब से भी योद्धा हिन्दू अपने शस्त्रों के साथ पहुँचे थे। अयोध्या में नित्य ही रात को अलग-अलग स्तर पर बैठकें होती थी।

5 दिसंबर की रात तक भी कारसेवा का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। सभी बहुत दुखी थे। सोचते थे कि अगर कारसेवा नहीं हुई तो क्या मुख लेकर वापस जाएँगे। अधिकारियों ने घोषणा की कि सभी कारसेवक जत्थों में सरयू तक जाएँगे और सांकेतिक रूप से एक एक मुठ्ठी रेत कारसेवा के लिए लाएँगे।

ये सब बहुत अपमानजनक सा लग रहा था। 6 दिसंबर को सुबह ही हम ढाँचे के निकट पहुँच गए, सभी गलियाँ भरी पड़ी थीं। अनेक स्वयंसेवक दंड लिए ढाँचे के चारों और खड़े थे। कलंक के ढाँचे को देखकर सभी की आँखों में आँसू थे।

उसी समय लगभग साढ़े 9 बजे आडवाणी जी वहाँ पहुँचे। आगे-पीछे ढेर सारे ब्लैक कैट एनएसजी कमांडो दौड़ते चल रहे थे। हमने सरयू से रेत लाने के स्थान पर सभा स्थल पर साध्वी ऋतंभरा जी का भाषण सुनना चुना।

अभी आचार्य धर्मेन्द्र जी का भाषण समाप्त ही हुआ था कि कुछ शोर सा उठा। सब निगाहें ढाँचे की ओर उठीं थीं। देखा तो दो जने हाथों में ध्वज लिए ढाँचे के एक गुम्बद की ओर बढ़ रहे थे।

एक क्षण में मस्तिष्क में ढेरों विचार कौंध गए। सबसे पहले, 1990 में चली गोलियाँ याद आईं। फिर स्वयं के दिए बलिदान वाले भाषण याद आए। एक क्षण में मैंने निर्णय कर लिया। मेरे साथी इतनी देर में कुछ सोचते, मैं बहुत तेजी से भागा।

ढाँचे की परिधि में जाने का द्वार दूर था। आस-पास लगभग 15 फुट ऊँची कंटीली तारे लगी थीं। हम कई जने आनन-फानन में उन्हीं पर चढ़कर परिसर में कूद गए। अभी ढाँचे के निकट बहुत कम लोग पहुँचे थे। मैंने देखा, वहाँ स्थित सुरक्षाकर्मियों पर कई कारसेवक काबू करने का प्रयास कर रहे हैं।

मैंने सोचा पहले इन सुरक्षाकर्मियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद करूँ। तब तक और अनेक कारसेवक पहुँच गए। फिर तो जिसे जहाँ मौक़ा मिला, बाबरी ढाँचा ध्वस्त करना आरम्भ हो गया।

नीचे से भी तोड़ रहे थे… ऊपर से भी तोड़ रहे थे। ऊपर से छत गिरती तो नीचे और ऊपर वाले दोनों का मरना तय था। लेकिन रामभक्ति का ऐसा जूनून था कि अनेक लोग देखते ही देखते प्राण गँवाकर भी कारसेवा में जुटे रहे।

साध्वी ऋतंभरा लगातार ओजस्वी वाणी में भाषण दे रहीं थीं। मेरे लिए उस समय की मनोदशा का वर्णन करना कठिन है। शाम होते-होते तीनों ढाँचे ढह गए। अजीब उल्लास सा छा गया था।

तभी आकाश में हेलीकॉप्टर मंडराने लगे। साध्वी जी ने कहा – देखो बाबर के मरने पर ये चील कव्वे मंडरा रहे हैं। हजारों कारसेवक अयोध्या तक आने वाली सड़कों को अवरुद्ध करने में जुट गए, ताकि केंद्र से भेजे गए सुरक्षाबल ना पहुँच सकें।

फिर तुरंत सरयू तक कतारें लग गईं। हाथों-हाथ मलबा नदी तक पहुँचाया गया। हर कारसेवक को एक एक ईंट घर ले जाने के लिए सूचना मिली। शाम होते-होते चबूतरा बनना आरम्भ हो गया। राम लला विराज दिए गए। रात को जब सीढ़ियाँ बनाई जा रही थीं, मैंने भी उनमें थोड़ा योगदान दिया।

शाम ढलने के बाद जब अयोध्या की गलियों में निकले तो हर घर के बाहर दिए जले हुए थे। मानो वर्षों के बाद राम अयोध्या लौटे हों। ऐसी दिवाली कभी नहीं देखी थी। एक घर में टीवी पर सुना – नरसिंह राव इसे राष्ट्रीय शर्म बता रहे थे। शायद उसी दिन भाजपा सरकारों को हटाने की और संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा हो गई थी।

अब कारसेवकों को वापस भेजने की योजना बनने लगी। मेरे साथ जामिया के पास मुस्लिम बहुल क्षेत्र के सुरेश जी, और अनेक कारसेवक भी आए हुए थे। देशभर से मुस्लिमों के आक्रमण के समाचार आने आरम्भ हो गए थे।

हमने सबसे पहले ओखला वाले कारसेवकों को रात को ही रेल में चढ़ा दिया। पता चला कि रास्ते में अनेक स्थानों पर मुसलमानों ने रेल पर पथराव किया। मैं 10 दिसंबर के बाद ही दिल्ली वापस आ पाया। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन यह एक अकाट्य सत्य है कि स्वतन्त्र भारत का इतिहास अब दिसंबर 06, 1992 से पहले और बाद के इतिहास के रूप में जाना जाएगा।

पहली बार हिन्दुओं ने विरोधियों के सीने पर लात रख कर जूतों की ठोकर से अपने अधिकार को प्राप्त करके दिखाया था। ये स्मृति सदैव बनी रहनी चाहिए। और अब, नवम्बर 09, शनिवार 2019 को उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ श्री रामजन्मभूमि पर भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और श्रीराम जन्मभूमि संघर्ष के एक बहुत बड़े अध्याय का पटाक्षेप हुआ।

जिसने भी इस संघर्ष में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अपना योगदान दिया, बलिदान दिया, उन सभी के चरणों में एक रामभक्त सनातनी हिन्दू के नाते मैं नमन करता हूँ। अयोध्या में भव्य श्रीरामजन्म भूमि मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाले सभी लोगों के प्रति मैं ह्रदय के अंतरतम से आभार और अभिनन्दन प्रकट करता हूँ।

पिछले तीस वर्षों में मैंने एक चित्रकार के नाते भी राम मंदिर आन्दोलन के लिए हजारों ही डिजाइन बनाए। अनेकों शुभकामना पत्रों और काल-निर्णयों के भी डिजाइन बनाए। पिछले वर्ष, संवत 2075 के लिए वैदिक गणनाओं वाला एक बारह पेज का टेबल कालनिर्णय मैंने मनमोहन गुप्ता जी के सूर्य इम्प्रेशन के लिए तैयार किया था। अब जब भगवान के भव्य मंदिर का निर्माण होगा, तो उसमें मैं भी अपनी सेवाएँ प्रदान करके जीवन को धन्य बनाने का अवश्य प्रयास करूँगा।

यह लेख बलराज जी द्वारा लिखा गया है, जो कि आरएसएस में रहते हुए श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के प्रत्यक्ष गवाह रह चुके हैं।

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