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‘दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षित…’: बहराइच हिंसा के फैसले में मनुस्मृति का श्लोक पढ़कर लिबरलों में लगी आग, क्या समझ भी आया इसमें छिपा निहितार्थ

जज शर्मा ने फैसले में मनुस्मृति के अध्याय 7, श्लोक 14 का उद्धरण किया- 'दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षित। दंड सुप्तेषु जागर्ति, दंड धर्म विदुर्वधा।' लिबरलों ने मनुस्मृति उद्धरण को 'मनुवादी' बताकर सेक्युलरिज्म पर सवाल उठाए, लेकिन कोर्ट ने इसे नैतिक संदर्भ के रूप में ही इस्तेमाल किया, न कि कानूनी आधार पर।

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की कोर्ट ने 2024 के दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर हुए हमले में सजा का ऐलान किया है। 13 अक्टूबर 2025 को राम गोपाल मिश्रा की हत्या के मामले में कोर्ट ने मुख्य दोषी सरफराज उर्फ रिंकू को फाँसी की सजा सुनाई है, जबकि 9 साथियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने राम गोपाल की गोली मार कर हत्या करने वाले को फाँसी, सरफराज के अब्बा अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब उर्फ सबलू के साथ ही सैफ, जावेद, जीशान, ननकाउ, शोएब और मरुफ को भी उम्रकैद की सजा दी।

न्यायालय प्रथम अपर जिला एवँ सत्र न्यायाधीश पवन कुमार शर्मा की अदालत ने यह फैसला सुनाया है। जज पवन कुमार शर्मा ने 142 पन्नों के आदेश में मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख भी किया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए दोषियों के बारे में कहा कि ऐसे शैतानों के लिए न्याय की समुचित मंशा में दंड दिया जाना चाहिए, जिससे समाज में पनप रहे ऐसे हैवानों के अंदर भय उत्पन्न हो और सामाजिक न्याय व्यवस्था के लिए विश्वास पैदा हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में मनुस्मृति के श्लोक- ‘दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षित। दंड सुप्तेषु जागर्ति, दंड धर्म विदुर्वधा।’ का उद्धरण किया है। इसका अर्थ है – “दंड ही सभी प्रजाओं पर शासन करता है, दंड ही उनकी रक्षा करता है, जब सभी सो रहे होते हैं, तब भी दंड जागता है; इसलिए बुद्धिमान लोग दंड को ही धर्म कहते हैं।”

कोर्ट के फैसले में मनुस्मृति के श्लोक का जिक्र

लोकतंत्र में मनुस्मृति के श्लोक का महत्वपूर्ण अर्थ- फैसले के संदर्भ में

मनुस्मृति के अध्याय 7 में श्लोक-14 का जिक्र बेहद महत्वपूर्ण है। यह श्लोक मूल रूप से कानून के शासन (Rule of Law) और न्यायपालिका की सर्वोच्चता के विचार को प्रतिध्वनित करता है। यह श्लोक प्राचीन है, लेकिन इसका संदेश आज भी महत्वपूर्ण है। इसका सार यह है कि समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक निष्पक्ष और शक्तिशाली न्याय प्रणाली (जिसे यहाँ ‘दंड’ कहा गया है) आवश्यक है।

यहाँ ‘दंड’ से तात्पर्य सिर्फ सजा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष कानून व्यवस्था से है जो समाज को अनुशासित रखती है। लोकतंत्र में इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और गलत करने वालों को दंडित करे।

जज ने राम गोपाल की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि यह अपराध इतना भयावह था कि इससे समाज की नींव हिल गई, एक वर्ग की आस्था पर चोट पहुँची और हिंसा की आग भड़क गई। उचित दंड के बिना इसका दोहराव हो सकता है।

अब सवाल उठता है, इस श्लोक का लोकतंत्र में क्या मायने हैं? हमारा लोकतंत्र संविधान पर टिका है, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय का गान गाता है। लेकिन यह श्लोक उसी न्याय की याद दिलाता है। लोकतंत्र में ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून का राज) सबसे ऊपर है- कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी ताकतवर हो, कानून से ऊपर नहीं। दंड का भय ही समाज को विचलन से बचाता है, जैसा कि श्लोक कहता है।

लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने वाला श्लोक

ये श्लोक याद दिलाता है कि राज्य का काम है निर्दोषों की जान-माल बचाना। हमारे संविधान में भी यही बात है- अनुच्छेद 21 में जीवन का अधिकार। तो ये श्लोक लोकतंत्र की रक्षा का सबक देता है, बिना किसी भेदभाव के। कल्पना कीजिए, अगर राम गोपाल जैसे युवक की हत्या के बाद कोई सजा न मिलती, तो कितने परिवारों का दर्द अनसुना रह जाता? कितनी आग लग जाती?

यह श्लोक हमें बताता है कि न्याय सिर्फ सजा नहीं, बल्कि एक जागरूक व्यवस्था है जो रात-दिन सतर्क रहती है। लोकतंत्र में इसका मतलब है कि पुलिस, कोर्ट और सरकार मिलकर निर्दोषों की रक्षा के लिए एक ढाल बनें। लोकतंत्र में दंड का यह सिद्धांत हमें याद दिलाता है कि हमारी आजादी दूसरों की आजादी पर निर्भर है। अगर एक की हत्या पर चुप्पी साध ली, तो कल आपकी बारी आ सकती है। इसलिए यह श्लोक प्राचीन भले हो, लेकिन लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने वाला है।

राम गोपाल मिश्र की हत्या में जो क्रूरता बरती गई, उसमें गोलियाँ चलाकर शरीर छलनी करना और पैरों को जलाना(नाखून तक बाहर निकल आए) भी दर्ज है। इन सबको देखते हुए कोर्ट ने कठोरतम सजा को ही न्याय के अनुरूप माना। जज ने यह स्पष्ट किया कि बहराइच हिंसा में जो हुआ वह केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि यह समाज में आस्था, विश्वास और शांति की भी हत्या थी। इसलिए कठोर दंड आवश्यक था।

लिबरल्स को क्यों लगी मिर्ची?

जज पवन कुमार शर्मा द्वारा फैसले में मनुस्मृति के उद्धरण ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। यह ठीक उसी तरह है जैसे कभी जज महत्मा गाँधी का उद्धरण देते हैं, तो कभी स्वामी विवेकानंद का। अर्थात् उद्धरण का मतलब यह नहीं कि कोर्ट के फैसले का आधार वही है। यह बात लिबरल समूह अक्सर जानकर भी अनदेखी करते हैं ताकि अपनी वैचारिक राजनीति को हवा दे सकें।

चूँकि मनुस्मृति का उल्लेख होते ही लिबरल इसे ‘मनुवादी विचारधारा’ बताते हुए पूरे प्रकरण को राष्ट्रवाद बनाम समानता की बहस में बदल देते हैं। मीडिया नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जाती है।

न्यूज पोर्टल्स, सोशल मीडिया थ्रेड्स और टीवी डिबेट्स में इसे संविधान के खिलाफ बताया जाता है। वे यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अगर अदालतें धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख करेंगी तो यह सेक्युलर न्याय व्यवस्था पर खतरा है। ऐसे में इस बार भी हल्ला होने लगा।

एक यूजर ने तो न्याय व्यवस्था में ही बदलाव का रोना रो दिया।

हालाँकि इस मामले में लिबरल नैरेटिव पूरी तरह कमजोर साबित हुआ, क्योंकि कोर्ट ने मनुस्मृति को ‘कानूनी आधार’ नहीं बनाया बल्कि सिर्फ नैतिक सिद्धांत यानी राजधर्म और दंड व्यवस्था को समझाने के लिए इसे उद्धरित किया। इस फैसले में कठोर सजा संविधान और दंड संहिता के आधार पर ही दी गई न कि मनुस्मृति के आधार पर। अपराधिरों के अपराध इतने जघन्य थे कि किसी भी विचारधारा के लोग बचाव की स्थिति में नहीं थे। इसलिए लिबरलों की प्रतिक्रियाएँ यहाँ माहौल बनाने की कोशिश भले ही कर रही थी, लेकिन वो पूरी तरह से असरहीन रहीं। इसके बावजूद मुस्लिम आईटी सेल जैसे हैंडल्स से संविधान के खिलाफ ही जहर उगलना जारी रहा।

विरोध के बावजूद क्यों मनुस्मृति का संदर्भ दिया जाता है?

यह सच है कि सामाजिक असंतोष के नाम पर इसे फाड़ा जाता है। डॉ. बीआर अंबेडकर ने तो 1927 में महाड सत्याग्रह में मनुस्मृति जलाई थी- वो प्रतीक था असमानता के खिलाफ। आज भी 25 दिसंबर को दलित संगठन इसे ‘मनुस्मृति दहन दिवस’ मानते हैं। लेकिन जब न्यायिक और ऐतिहासिक दृष्टि से मनुस्मृति को देखते हैं तो यह भारतीय ‘धर्म’ आधारित विधि-व्यवस्था का प्राचीन आधार है। ब्रिटिश काल में मनुस्मृति को हिंदू कानून बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया-शादी-ब्याह, संपत्ति के मामलों में।

हालाँकि आधुनिक समय की कोर्ट्स आज इसे कानून नहीं मानतीं, बस नैतिक संदर्भ के रूप में उद्धृत करती हैं। बहराइच फैसले में भी इसे इसी तरह से तरह से ‘कोट’ किया गया। वैसे, सच कहें तो अगर कोई ग्रंथ हजारों वर्षों से दंड, धर्म और शासन पर विचार देता आया है, तो जज उसका उद्धरण एक नैतिक तर्क के रूप में तो दे ही सकते हैं।

कोर्ट के 142 पन्नों के फैसले में अपराधियों की बर्बरता दर्ज

बहराइच कोर्ट के 142 पन्नों के फैसले में 12 गवाहों के बयान दर्ज हैं। इसमें मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी हैं। केस के दौरान पेश किए घए फॉरेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ घटनास्थल की तस्वीरें और पीड़ित परिवार का बयान भी दर्ज है। इन सबको दृष्टिगत करते हुए कोर्ट ने कहा, “यह हत्या पूर्वनियोजित, क्रूरतापूर्ण और मानवता को शर्मसार करने वाली है। ऐसे अपराधियों को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं।” और फिर जज ने अपने पेन का निब तोड़ दिया।

बहराइच हिंसा केस का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि समाज को संदेश भी है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब हत्या इतनी क्रूर हो कि समाज का विश्वास हिल जाए, तब कानून को कठोर होना ही पड़ेगा। मनुस्मृति के जिक्र पर भले लिबरल हलकों में नाराजगी हो, लेकिन समाज में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दंड का होना बेहद जरूरी है। अन्यथा ऐसी भयावह हत्याएँ, हिंसा, आगजनी की घटनाएँ बार-बार होती रहेंगी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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