Saturday, November 28, 2020
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CAA विरोधी बेंगलुरु आर्कबिशप पीटर मैकाडो पर $42 मिलियन के घोटाले का आरोप: जानें क्या है मामला

28 अगस्त को, AKCCA ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा आशा धर्मार्थ ट्रस्ट के वित्तीय गबन की जाँच करने की माँग की है, जो कि अभिलेखागार के स्वामित्व में है। समूह ने बेंगलुरु में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में ट्रस्ट पर 3 बिलियन ($ 42 मिलियन) के बेइमानी का आरोप लगाया है।

कर्नाटक कैथोलिक क्रिश्चियन एसोसिएशन (AKCCA) ने बेंगलुरु आर्कबिशप पीटर मैकाडो पर मल्टी-मिलियन डॉलर के घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया है। मैकाडो को पोप फ्रांसिस द्वारा बैंगलोर के महानगर आर्कबिशप के रूप में नियुक्त किया गया था। वह नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के एक मुखर आलोचक रहे हैं।

28 अगस्त को, AKCCA ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा आशा धर्मार्थ ट्रस्ट के वित्तीय गबन की जाँच करने की माँग की है, जो कि अभिलेखागार के स्वामित्व में है। समूह ने बेंगलुरु में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में ट्रस्ट पर 3 बिलियन ($ 42 मिलियन) के बेइमानी का आरोप लगाया है।

AKCCA नेता राफेल राज ने मीडिया को सूचित करते हुए बताया, “यह तीन अरब का घोटाला है, और इसकी जाँच की जरूरत है।” राज ने कहा कि विदेशों से धन इकट्ठा किया गया, मगर वादे के मुताबिक उसका इस्तेमाल नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया गया था, लेकिन अभिलेखागार ने इसे नजरअंदाज कर दिया और ‘दोषी’ के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए, मैकाडो ने बुधवार को कहा, “मैं किसी भी जाँच के लिए तैयार हूँ, क्योंकि मेरे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। वे राई को पहाड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।” उन्होंने ₹2 मिलियन ($ 28,000) की ‘हेरफेर’ के बारे में पता चलने के बाद एक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने का दावा किया। कथित तौर पर इस मामले की बेंगलुरु पुलिस द्वारा जाँच की जा रही है।

गोवा क्रॉनिकल में एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश माइकल एफ सल्दान्हा ने 2018 में कूर्ग आपदा राहत कार्य के लिए एकत्रित 49.5 करोड़ रुपए के आपराधिक गबन के लिए पीटर मैकाडो और मैसुरु के बिशप केए विलियम के लिए दोषी ठहराया था।

विलियम पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए, उन्होंने लिखा, “हर कोई इस तथ्य को नजरअंदाज कर देता है कि यह आदमी वास्तव में धोखा दे रहा था और लूट रहा था क्योंकि चार महीने बाद भी पीड़ितों तक एक रुपया नहीं पहुँचा। प्राकृतिक आपदा के मामलों में राहत तत्काल और तेज होनी चाहिए। मगर इस मामले में कभी नहीं हुआ।”

पूर्व न्यायाधीश ने खुलासा किया कि विलियम और मैकाडो दोनों ने मिलकर दान के नाम पर 6 करोड़ रुपए जुटाए। उन्होंने कहा कि दोनों ने गायक सोनू निगम को सेंट जोसेफ हाई स्कूल ग्राउंड में मुफ्त में प्रदर्शन करने के लिए मना लिया, जबकि उन्होंने टिकट, प्रायोजकों से 13 करोड़ रुपए का शुल्क लिया। कुल मिलाकर, उन्होंने 49.50 करोड़ रुपए एकत्र किए। 

विलियम ने राहत कार्य का वादा किया था, मगर प्रभावित लोग 24 महीने समाप्त होने के बाद अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। पूर्व न्यायाधीश ने अफसोस जताते हुए कहा कि इस आदमी ने यीशु का नाम लेकर कहा था कि पुनर्वास वास्तविक और सार्थक होगा।

मैकाडो पर गलत व्यवहार का आरोप लगाते हुए, पूर्व न्यायाधीश माइकल एफ सल्दान्हा ने लिखा, “शायद आर्कबिशप पीटर मैकाडो हमें बता सकते हैं कि बेघर व्यक्तियों के लिए कितने रैन बसेरों का निर्माण किया है क्योंकि संगीत समारोह के समय एक वर्ष पहले उनकी एक अपील यह भी थी। यदि यह अनुलग्नक में लिखा गया है तो वह निश्चित रूप से जवाबदेह है।”

Letter by Justice Michael F Saldanha – Page 1 (Image Courtesy: Goa Chronicle)

अपने बचाव में, पीटर मैकाडो ने कहा, “जस्टिस सलदान्हा के लिए बहुत सम्मान है लेकिन मुझे नहीं पता कि वह तथ्यों को सत्यापित किए बिना इस तरह के आरोप क्यों लगाते हैं। अगर हम पारदर्शी नहीं थे, तो हमने पुलिस को सूचना क्यों दी? सलदान्हा जैसे व्यक्ति से इस परिमाण के आरोप केवल चर्च की छवि को धूमिल करेंगे। हमें मिलने वाले हर पैसे का हिसाब है। हम हर साल अपने खातों का ऑडिट करते हैं और आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं।”

गौरलब है कि इससे पहले जनवरी में, बेंगलुरु आर्कबिशप ने प्रधानमंत्री से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की थी। इस तथ्य की पूरी अवहेलना के साथ कि इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया गया, पीटर मैकाडो ने एक ज्ञापन में कहा, “हम केंद्र सरकार से अपील करते हैं कि वह उनके धर्मों के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर अवैध प्रवासियों को नागरिकता न दें।” ध्रुवीकरण के ‘खतरों ’पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने आगे कहा, “धर्म कभी भी किसी देश की नागरिकता का मापदंड नहीं होना चाहिए। और न ही मतभेद होने पर हिंसा उसका समाधान हो सकता है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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