साइबर ठगों ने अब धोखाधड़ी का एक और भी खतरनाक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) तरीका अपना लिया है, जिसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) कहा जाता है। इसमें अपराधी पुलिस या सीबीआई जैसी सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ितों पर किसी बड़े अपराध, जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी साजिश में शामिल होने का झूठा आरोप लगाते हैं और तुरंत ‘गिरफ्तार’ करने की धमकी देते हैं।
खासकर हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह पाकिस्तानी जासूसों को पकड़ा गया, उसी का बहाना बनाकर आम लोगों को डराया जा रहा है कि उनके नाम पर देश विरोधी काम हो रहा है। डर के मारे लोग खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ठगों के बताए फर्जी ‘सरकारी खातों’ में अपनी जीवन भर की कमाई ट्रांसफर कर देते हैं। अकेले भारत में इस तरह की धोखाधड़ी में लोग ₹3,000 करोड़ से ज़्यादा गँवा चुके हैं।
पहले कैसे होती थी डिजिटल धोखाधड़ी?
पहले के समय में डिजिटल धोखाधड़ी ज्यादातर तकनीकी चालों पर आधारित होती थी। इसमें अपराधी सीधे लोगों की तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते थे। सबसे आम तरीका फिशिंग और ओटीपी स्कैम था, जिसमें ठग खुद को बैंक कर्मचारी या कस्टमर केयर अधिकारी बताकर फोन करते थे। वे खाते में गड़बड़ी, KYC अपडेट या कार्ड ब्लॉक होने का डर दिखाते थे और बहाने से एटीएम पिन, डेबिट कार्ड नंबर या OTP पूछ लेते थे। जैसे ही ओटीपी मिलता, कुछ ही मिनटों में खाते से पैसे गायब हो जाते थे और पीड़ित को तब तक कुछ समझ नहीं आता था।

एक और तरीका सिम स्वैप फ्रॉड का था। इसमें अपराधी किसी तरह पीड़ित की निजी जानकारी हासिल कर लेते थे और टेलीकॉम कंपनी से उसका सिम बंद करवा देते थे। इसके बाद उसी नंबर का नया सिम अपने नाम पर जारी करवा लेते थे। इससे बैंक के सभी मैसेज, कॉल और OTP अपराधियों के पास पहुँचने लगते थे। फिर वे आराम से बैंक अकाउंट में लॉगिन कर पैसे निकाल लेते थे, जबकि असली खाताधारक को तब तक पता भी नहीं चलता था कि उसके सिम के साथ कुछ गलत हो चुका है।
इसके अलावा रिमोट एक्सेस फ्रॉड भी काफी आम था। इसमें अपराधी किसी बहाने से पीड़ित को एक ऐप डाउनलोड करने को कहते थे, जैसे कि कस्टमर सपोर्ट ऐप या स्क्रीन शेयरिंग ऐप। जैसे ही ऐप डाउनलोड होता, अपराधी फोन या कंप्यूटर का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते थे। फिर वे सामने बैठकर ही बैंकिंग ऐप खोलते, ट्रांजेक्शन करते और खाते से पैसा निकाल लेते थे, जबकि पीड़ित सिर्फ स्क्रीन पर सब कुछ होता हुआ देखता रह जाता था।

कई मामलों में अपराधी लॉटरी या इनाम का लालच भी देते थे। लोगों को फोन या मैसेज करके बताया जाता था कि उन्होंने बड़ी लॉटरी, कार या लाखों रुपए का इनाम जीत लिया है। इनाम पाने के लिए उनसे पहले ‘रजिस्ट्रेशन फीस’, ‘प्रोसेसिंग चार्ज’ या ‘टैक्स’ के नाम पर कुछ पैसे भेजने को कहा जाता था। जैसे ही लोग लालच में आकर पैसे भेजते थे, अपराधी गायब हो जाते थे और न तो इनाम मिलता था, न ही भेजा गया पैसा वापस आता था।
कुल मिलाकर, पहले की डिजिटल धोखाधड़ी में अपराधी तकनीकी तरीकों और लालच का इस्तेमाल करते थे। वे सीधे बैंक की जानकारी, ओटीपी या डिवाइस तक पहुँच बनाने की कोशिश करते थे। लेकिन अब यही अपराधी एक कदम आगे बढ़कर डर, दबाव और मानसिक तनाव का सहारा लेने लगे हैं, जिसे आज हम ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए और खतरनाक फ्रॉड के रूप में देख रहे हैं।
डर/’डिजिटल अरेस्ट’ नया हथियार
साइबर अपराधियों ने अब लोगों को ठगने के लिए केवल टेक्नोलॉजी (तकनीक) का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है। अब वे लोगों के डर का फायदा उठाकर उन्हें फँसाते हैं। इसी नए और खतरनाक तरीके को ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहते हैं।
- सरकारी अधिकारी बनकर धमकाना- इस तरीके में अपराधी खुद को सीबीआई, पुलिस, ईडी या कस्टम विभाग के बड़े अधिकारी बताते हैं। वे स्पूफिंग नाम की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आपके फोन पर असली सरकारी एजेंसी का नंबर दिखाई देता है, ताकि आपको तुरंत यकीन हो जाए। वे अक्सर आपको डराते हैं कि आपके बैंक खाते, आधार कार्ड या फोन नंबर का इस्तेमाल किसी बड़े और गंभीर अपराध (जैसे मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स तस्करी या आतंकी फंडिंग) में हुआ है।
हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले जैसी सच्ची घटनाओं का बहाना बनाकर भी वे लोगों को फँसाते हैं। उदाहरण के लिए, वे किसी 67 साल की महिला को फोन करके डराते हैं कि उनका खाता हजारों करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। कुछ मामलों में, वे पहले TRAI का अधिकारी बनकर फोन करते हैं, और फिर तुरंत ‘क्राइम ब्राँच’ को कॉल ट्रांसफर करके दबाव बनाना शुरू कर देते हैं।
- वीडियो कॉल पर ‘नकली कोर्ट’ दिखाना- डर पैदा करने के लिए अपराधी आपको वीडियो कॉल पर आने को कहते हैं। कॉल पर वे खुद पुलिस की वर्दी या जज के काले कपड़े पहनकर बैठते हैं। वे पीछे का बैकग्राउंड भी किसी फर्जी पुलिस स्टेशन या कोर्ट रूम जैसा दिखाते हैं। वे पीड़ित को नकली सरकारी पहचान पत्र और नोटिस भी भेजते हैं।
इसके बाद वे पीड़ित को धमकी देते हैं कि उसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ के तहत पकड़ा गया है, और अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो उसे तुरंत जेल भेज दिया जाएगा या उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। कुछ बड़े मामलों में, जैसे ₹58 करोड़ के एक केस में, ठग 40 दिनों तक लगातार वीडियो कॉल पर बने रहे और नकली कोर्ट की सुनवाई करके बार-बार जुर्माना या शुल्क भरने के लिए दबाव बनाते रहे।
- डर दिखाकर पैसे हड़पना- डर और दबाव के आगे हार मानकर, पीड़ित खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए अपराधियों की बात मानने लगता है। ठग उन्हें समझाते हैं कि ‘जाँच’ या ‘जमानत’ के लिए उन्हें तुरंत अपनी सारी रकम उनके बताए ‘सरकारी खातों’ में ट्रांसफर करनी होगी। अपराधी पीड़ितों को किसी से भी बात न करने की धमकी देते हैं, यहाँ तक कि अपने परिवार से भी नहीं।
इसी डर के कारण, पीड़ित मिनटों के अंदर अपनी जिंदगी भर की कमाई (करीब 80 से 90 प्रतिशत) ठगों के खातों में बार-बार ट्रांसफर कर देता है। जाँच में पता चला है कि ठगी का यह सारा पैसा फिर क्रिप्टोकरेंसी में बदला जाता है और म्यांमार या अरब देशों में बैठे अपराधियों के पास पहुँच जाता है, जहाँ ये गैंग ‘स्लेव कंपाउंड्स’ में बैठकर लोगों को ठगने का काम करते हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुजरात के कुछ ऐसे ही आरोपितों पर ₹104 करोड़ से ज्यादा की ठगी का आरोप लगाया है, जिन्होंने पूरा नकली पुलिस स्टेशन ही बना रखा था।
डिजिटल अरेस्ट के झाँसे से बचने के आसान तरीके
यह जरूरी है कि आप इन साइबर जालसाजों के डर के झाँसे में न आएँ और समझदारी से काम लें। इसके लिए ये तीन आसान उपाय अपनाएँ।

- फौरन उठाएँ ये कदम- अगर कोई आपको अचानक फोन करके खुद को पुलिस, सीबीआई, या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताता है और आपको किसी बड़े अपराध में फँसा होने की बात कहकर डराता है, तो बिना देर किए तुरंत कॉल काट दें। यह बात हमेशा याद रखें कि किसी भी सरकारी अधिकारी या एजेंसी को फोन या वीडियो कॉल पर पैसे देने की कोई जरूरत नहीं होती।
वे कभी भी ‘जाँच फीस’, ‘जमानत राशि’ या ‘वेरिफिकेशन चार्ज’ के लिए आपसे ऑनलाइन पैसा नहीं माँगते। अगर वीडियो कॉल पर कोई वर्दी में भी दिखे तो भी घबराएँ नहीं, क्योंकि भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई चीज नहीं है।
- सच्चाई की जाँच करें और शिकायत दर्ज कराएँ- फोन काटने के बाद तुरंत उस सरकारी एजेंसी (जैसे CBI या पुलिस) के ऑफिशियल हेल्पलाइन नंबर पर खुद फोन करें और इस दावे की सच्चाई पता लगाएँ। अगर आपको लगता है कि आपको ठगा जा रहा है या कोई आपको धमकी दे रहा है, तो देरी न करें।
तुरंत नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करके या www.cybercrime.gov.in पर जाकर शिकायत दर्ज कराएँ। साथ ही, अपने बैंक को तुरंत सूचित करें। बैंक को बड़े लेनदेन के बारे में जरूर बताएँ और हमेशा कूलिंग पीरियड (एक समय सीमा जो बड़ी रकम ट्रांसफर करने से पहले मिलती है) का इस्तेमाल करें ताकि गलती होने पर उसे सुधारा जा सके।
- हमेशा रहें सुरक्षित और सचेत- सुरक्षित रहने के लिए, सबसे पहले अपने परिवार और खासकर बुजुर्गों को इन स्कैम के बारे में बताकर उन्हें जागरूक करें। फोन पर कभी भी अपना पासवर्ड, एटीएम पिन या ओटीपी (OTP) किसी के साथ शेयर न करें, बैंक भी यह जानकारी कभी नहीं माँगता। अगर अपराधी आपको धमकाएँ कि आप किसी से बात न करें तो यह सबसे बड़ा खतरे का निशान है। तुरंत अपने परिवार और दोस्तों को बताएँ ताकि आप अकेले न पड़ें।
सरकार और बैंकों के नियम-कानून
लोकसभा में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने चिंता जताते हुए कहा कि लोगों को इन डिजिटल धोखाधड़ी से बचाने के लिए सरकार और बैंकिंग सिस्टम को बड़े और जरूरी बदलाव करने होंगे।
पहला, उन्होंने AI-आधारित सुरक्षा नियम लागू करने की माँग की। इसका मतलब है कि बैंकों के सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल हो। यह AI, किसी भी ग्राहक के खाते से हो रहे अचानक और बड़ी रकम के असामान्य लेनदेन को तुरंत पहचान ले (जैसे एक बूढ़े व्यक्ति का अचानक लाखों रुपए भेजना)। ऐसे लेनदेन को खतरे का निशान (Red Flag) मानकर AI तुरंत रोक दे, ताकि ठगी पूरी न हो सके।
दूसरा, बृजमोहन अग्रवाल ने एस्क्रो मैकेनिज्म नाम की एक व्यवस्था शुरू करने का सुझाव दिया। यह एक तरह की सुरक्षा तिजोरी की तरह काम करेगी। जब कोई ग्राहक किसी नए व्यक्ति को बहुत बड़ी रकम भेजेगा, तो वह रकम तुरंत उस व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगी, बल्कि कुछ समय के लिए बैंक के पास सुरक्षित रहेगी। इससे पीड़ित को अपनी गलती का एहसास होने और उसे सुधारने का जरूरी समय मिल जाएगा, जिससे पैसा डूबने से बच जाएगा।
इसके अलावा, उन्होंने बैंकों की लापरवाही पर भी उंगली उठाई। उन्होंने महाराष्ट्र के उस बड़े मामले का उदाहरण दिया जहाँ एक व्यक्ति ने 40 दिनों के अंदर 27 बार जाकर ₹58 करोड़ ट्रांसफर कर दिए, लेकिन बैंक के सुरक्षा सिस्टम ने कोई अलर्ट या चेतावनी जारी नहीं की।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि बैंकों को अपने संदेहास्पद गतिविधि पहचानने वाले सिस्टम को बहुत मजबूत बनाना होगा। साथ ही, महाराष्ट्र साइबर विभाग और SBI जैसी संस्थाएँ लगातार लोगों को चेतावनी दे रही हैं कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है और पुलिस कभी फोन पर पैसे नहीं माँगती है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ सिर्फ एक साइबर क्राइम नहीं है, यह भरोसे और डर का सुनियोजित हत्यारा है। यह दिखाता है कि अपराधी अब केवल तकनीकी कमजोरियों को नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान को निशाना बना रहे हैं। जिस देश में लोग कानून और सरकारी अधिकारियों का बेहद सम्मान करते हैं, वहाँ सरकारी वर्दी का डर सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।
यह जरूरी है कि बैंक और सरकारें मिलकर काम करें। केवल लोगों को जागरूक करने से काम नहीं चलेगा। जैसा कि सांसद अग्रवाल ने कहा, जब कोई व्यक्ति दबाव में आकर अपनी जिंदगी की 80% कमाई मिनटों में ट्रांसफर कर देता है, तो हमारा बैंकिंग सिस्टम उसे ‘स्टैंडर्ड ट्रांजैक्शन’ मानकर आँखें बंद नहीं कर सकता। कड़े AI-आधारित सुरक्षा नियम, अनिवार्य कूलिंग पीरियड, और बैंकों की जवाबदेही ही इस नए मानसिक आतंकवाद को रोक सकती है। लोगों को भी यह समझना होगा कि कानून हमेशा कागज पर, आमने-सामने और सही प्रक्रिया से काम करता है, न कि एक अचानक आए वीडियो कॉल पर डर पैदा करके।


