दरअसल शिमला शहर से करीब 14 km दूर चंडीगढ़ के नाम से जुड़ा ‘हिम चंडीगढ’ शहर बसाने की तैयारी है। कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे मंजूरी दे दी है, लेकिन ग्रामीण पूरे प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि कृषि और फ्लोरीकल्चर के लिए ये इलाका काफी मशहूर है। ग्रामीणों की आजीविका इससे जुड़ी है। पहले बंजर जमीनों को लिया गया था लेकिन अब गाँवों को हटाने की तैयारी है। इसको लेकर ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के सामने अपनी शिकायत दर्ज करा चुके हैं।
प्रस्तावित सैटेलाइट टाउनशिप के लिए केन्द्र को औपचारिक मंजूरी के लिए भेजा गया है लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। इसके बावजूद राज्य सरकार लैंड पूलिंग मॉडल के तहत काम कर रही है।
2014 में प्रोजेक्ट की प्लानिंग हुई
हिमाचल प्रदेश हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (HIMUDA) ने जाठिया देवी क्षेत्र में एक रिहायशी प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही है। शिमला पर पड़ रहे जनसंख्या के भारी दबाव को देखते हुए इस प्रोजेक्ट को 2014 में राज्य सरकार ने शुरू करने की योजना बनाई थी। अब इसे लेकर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। जाठिया देवी पंचायत समेत पूरे इलाके में नोटिस चिपकाए गए हैं। इसमें लोगों से उनकी आपत्तियाँ और सुझाव माँगे गए हैं।
जाठिया देवी टाउनशिप प्रोजेक्ट क्या है
जाठिया देवी शिमला से 14 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत बागी में आने वाली जगह है। इसका नाम इलाके में एक पुराने जाठिया देवी मंदिर के नाम पर पड़ा है। प्रस्तावित टाउनशिप को शिमला पर दबाव कम करने, नए इकोनॉमिक हब बनाने और टिकाऊ, आपदा-रोधी शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए एक योजनाबद्ध सैटेलाइट माउंटेन टाउनशिप के तौर पर विकसित किए जाने का प्लान है।
स्टेट हाईवे 16 और नेशनल हाईवे 5 के पास मौजूद जाठिया देवी टाउनशिप बनेगा। यह जुब्बरहट्टी में शिमला एयरपोर्ट से 3–4 km और ISBT शिमला से करीब 22 km दूर है। यह इलाका समुद्र तल से 1,300 से 1,500 मीटर ऊपर है। यहाँ पहाड़ियाँ, घाटियाँ और छोटी-छोटी नदियाँ मौजूद हैं।
नवंबर 2025 में टाउनशिप से जुड़ी SIA रिपोर्ट सामने आई। इसके मुताबिक, टाउनशिप करीब 249 हेक्टेयर में फैला होगा, जिसमें से 35 हेक्टेयर सरकारी ज़मीन होगी। प्रस्तावित ज़मीन के इस्तेमाल में रेजिडेंशियल ज़ोन (55.16 हेक्टेयर) शामिल हैं। हाई इनकम ग्रुप (HIG), मीडियम इनकम ग्रुप (MIG), लो इनकम ग्रुप (LIG), और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके (EWS) के लिए अलग अलग घर होगा।
कमर्शियल एरिया 13.36 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होगा, जबकि नॉन-पॉल्यूशनिंग इंडस्ट्रियल ज़ोन 15.7 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। 16.42 हेक्टेयर भूमि पर ग्रीन जोन होगा। रिवर डेवलपमेंट एरिया 16.56 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। चौड़ी सड़कें 13.78 हेक्टेयर में होगी। यूटिलिटी सर्विस, स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम, हेलीपैड कनेक्टिविटी, और इको-सेंसिटिव प्लानिंग एरिया टाउनशिप की खासियत होगी। इस पूरे प्रोजेक्ट पर 50 हजार करोड़ रुपए खर्च आएँगे।
टाउनशिप के फेज 1 में HIG, MIG, LIG, और EWS कैटेगरी में 895 रेजिडेंशियल यूनिट्स का प्रस्ताव है। 84.22 हेक्टेयर में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल हिस्से भी होंगे, जबकि ग्रीन और रिवर डेवलपमेंट जोन में और 33 हेक्टेयर जमीन होगी।
ग्रामीण कर रहे हैं विरोध
इस प्रोजेक्ट का कई गाँवों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। 10 जनवरी 2026 को बागी ग्राम पंचायत ने अपने यहाँ के गाँवों के विस्थापन का विरोध करते हुए कहा है कि टाउनशिप बनाने के लिए वह अपना गाँव नहीं उजाड़ने देंगे। इस पंचायत में 11 में से 8 गाँव आते हैं, जिसका अधिग्रहण किया जाना है। ग्रामीणों ने एकमत होकर प्रस्ताव पास किया कि वे अपनी जमीन का अधिग्रहण नहीं होने देंगे।
SIA रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्राम पंचायत बागी के अंदर आने वाले 8 गाँवों के लगभग 249 हेक्टेयर (लगभग 2,959 बीघा) जमीन है, जिसे अधिग्रहण के लिए चुना गया है। ये गाँव हैं- चानन (568 बीघा), पन्टी (109 बीघा), आंजी (396 बीघा), शिल्ली बागी (699 बीघा), मझोला (78 बीघा), शिलरू (214 बीघा), धनोकरी (270 बीघा), और क्यारागी (303 बीघा)।
ये सभी गाँव ग्रामीण शिमला में आते हैं। इसके अलावा पड़ोसी सोलन जिले की ममलिग तहसील में मंजियारी गाँव (लगभग 441 बीघा) की भी पहचान की गई है। SIA रिपोर्ट के मुताबिक, 386 परिवार सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे। साथ ही 158 परिवारों की सीधे रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है।
ग्रामीणों को विस्थापन का डर
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस अधिग्रहण से उपजाऊ खेती की जमीन, पुश्तैनी घरों और कुलदेवी-देवताओं के स्थान समेत सदियों पुरानी सामाजिक और धार्मिक इमारतों को हटाया जा सकता है।
ये केवल जमीन का मामला नहीं है, बल्कि पुर्वजों की इस निशानी से भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। पुश्तैनी जमीन और अपने कुल देवताओं के मंदिर को छोड़ना इतना आसान नहीं है। आखिर बाहरी लोगों को बसाने के लिए उन्हें क्यों उजाड़ा जा रहा है?
29 दिसंबर 2025 की सुनवाई में प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले नीरज ठाकुर ने कहा, “हमें बताया गया है कि खेती की जमीन और घरों समेत पूरे गाँव के लिए जाएँगे। सरकार पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को हटाकर नए लोगों के लिए घर बनाना चाहती है।”
खेती ही आजीविका का एकमात्र साधन है- ग्रामीणों का कहना है कि वे बड़े किसान नहीं है। लेकिन खेती ही उनका जीवन जीने का साधन है। जब बंजर पहाड़ियाँ ली थी तो किसी ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब गाँव माँग रहे हैं। आखिर गाँव से बेदखल करने के बाद ग्रामीण कैसे अपना पेट पालेंगे।
ग्रामीणों ने एक मत होकर प्रोजेक्ट का विरोध किया है। ग्राम पंचायत बागी के प्रधान नरेश कुमार ठाकुर ने कहा, “हालाँकि प्रस्ताव पास करने के लिए 418 घरों में से 120 घरों के समर्थन की जरूरत थी, लेकिन प्रस्ताव पर हर परिवार के 280 लोगों ने साइन किए।”
ग्रामीणों का कहना है कि बहुत पहले हिमुडा ने पहाड़ी टाउनशिप के लिए 250 बीघा से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया था। अब तक अधिग्रहित जमीन पर एक भी ईंट नहीं रखी गई है। वह जमीन बंजर थी। लेकिन इस बार लोगों के घरों के साथ-साथ खेती-बाड़ी की जमीन भी लेने की बात है।
कम मुआवजे और पुनर्वास पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि बिना सहमति और समाधान के उन्हें भूमि का अधिग्रहण स्वीकार नहीं होगा। ग्रामीण सोशल इंपेक्ट सर्वे टीम गो बैक के नारे लगाए थे।
लोगों से जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और फिर से बसाने के अधिकार एक्ट, 2013 के सेक्शन 5 और नियम 8 के तहत जारी किए गए नोटिस में अधिग्रहण पर राय माँगी गई है। HIMUDA और रेवेन्यू अधिकारियों के मुताबिक, मुआवजा इलाके में जमीन की मौजूदा कीमतों और कलेक्टर रेट के आधार पर दिया जाना है।
हालाँकि गाँववालों ने मुआवजे के तौर पर क्या दिया जाएगा, इस पर विचार किए बिना अधिग्रहण का बॉयकॉट करने का फैसला किया है। इनका कहना है कि गाँवों की जमीनें जॉइंट प्रॉपर्टी हैं। इसलिए प्रॉपर्टी के मालिकों को मुआवजे के तौर पर ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे।
गाँववालों में से एक, 84 साल के हीरा सिंह ठाकुर ने कहा, “मेरे और मेरे भाइयों के पास कुल मिलाकर 12 बीघा जमीन है। बेटों और पोतों में बंटवारे के बाद, हर एक को कितना मिलेगा? खेती हमारी रोजी-रोटी है। आगे बढ़ने से पहले सरकार को मुआवजे के बारे में SIA रिपोर्ट में साफ करना चाहिए।”
दरअसल SIA के चैप्टर 3 में माना गया है कि जमीन अधिग्रहण से लोगों को हटाया जा सकता है। हटाए जाने वाली इमारतों में, सात मंदिर, पाँच स्कूल, करीब दो दर्जन दुकानें, नहरें, दूसरे एक्टिविटी से जुड़े संस्थान और घर शामिल हैं।
हालाँकि हिमुडा के CEO और सेक्रेटरी सुरेंद्र कुमार वशिष्ठ ने ग्रामीणों के डर को दूर करने की कोशिश करते हुए कहा है कि कोई भी जमीन जबरदस्ती नहीं ली जाएगी। उन्होंने कहा, “हम लोकल लोगों की मर्जी के खिलाफ कोई जमीन नहीं लेंगे। 29 दिसंबर की सुनवाई एक लंबे प्रोसेस का सिर्फ पहला कदम था। हमारे पास पहले से ही करीब 262 बीघा जमीन है, और हम इसे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन लोगों को हटाकर नहीं।”
उन्होंने आगे कहा कि रिहायशी घरों को अधिग्रहण से बाहर रखा जाएगा और किचन गार्डनिंग और रोजी-रोटी की सुरक्षा के लिए प्रोविजन मौजूद हैं। सुरेन्द्र कुमार वशिष्ठ ने कहा, “एक बीच का रास्ता निकाला जा रहा है ताकि उपजाऊ जमीन और घरों को बाहर रखा जा सके।” उन्होंने यह भी दावा किया कि 8 गाँवों की जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है।
प्रोजेक्ट की जरूरत क्यों पड़ी
शिमला में जबरदस्त भीड़भाड़ है। राजधानी होने की वजह से सरकारी ऑफिस और व्यावसायिक गतिविधियाँ भी काफी हैं। यातायात और जनसंख्या का भारी दबाव के चलते शहर से कुछ दूर रिहायशी इलाके बसाने की प्लानिंग हुई। इसे पिछली बीजेपी सरकार ने भी आगे बढ़ाया।
SIA रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के फायदे गिनाए जा रहे हैं। इसमें दावा किया गया है कि टाउनशिप से रोजगार के मौके और इकोनॉमिक मोबिलिटी पैदा होगी, शिक्षा, हेल्थकेयर और मार्केट तक पहुँच बेहतर होगी, ग्रामीण इलाकों को बड़े इकोनॉमिक कॉरिडोर से जोड़ा जाएगा, सामाजिक सुधार, स्किल डेवलपमेंट और लोकल एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण के अनुकूल, कम इंधन खर्च वाहनों को प्रोत्साहन के साथ सबको साथ लेकर चलने वाली मनोरंजन की जगहों का विकास किया जाएगा।
बाजार को बूस्ट किया जाएगा। होटल और मॉल बनेंगे। इससे नौकरियाँ सृजित होगी। काम और लिविंग का हब होगा।
पिछले एक दशक से जाठिया देवी टाउनशिप का काम ठप पड़ा है। अब फेज़ I का काम शुरू किया जा रहा है। लेकिन जब तक ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठते रहेंगे। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अधिकारी स्थानीय विरोध, मुआवजे की चिंताओं और पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कैसे सुलझाते हैं।


