Sunday, September 27, 2020
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उत्तराखंड में पौराणिक शिवमंदिर के सामने नजर आ रहे ‘चर्चनुमा संदिग्ध’ निर्माण से ग्रामीण हैरान

गुपचुप धर्मांतरण के बाद अब चर्च निर्माण के लिए भी ईसाई मिशनरी साहस जुटाने लगे हैं। यही नहीं, 'टारगेट' को अपनी स्थानीय परम्परा के लोकगीत, संस्कृति से भी परहेज करने की सलाह इन 'बाहरी लोगों' के द्वारा दी जाती है।

उत्तराखंड राज्य में धर्म स्वतंत्रता कानून होने के बावजूद कितने शातिराना तरीके से इस काम को अंजाम दिया जा रहा है, यह ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। कोरोना वायरस की महामारी के दौरान ईसाई मिशनरियों द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति के धर्मांतरण की बात उठाने के बाद ग्रामीण लोगों ने इसी क्षेत्र के आसपास के और गाँवों के बारे में भी अवगत कराया, जहाँ पर ईसाइयों द्वारा बड़े पैमाने पर गरीब, एससी-एसटी जाति के लोगों को लालच देकर सिर्फ उन्हें ईसाई ही नहीं बनाया जा रहा बल्कि घर बनाने के बहाने वहाँ चर्च निर्माण का भी कार्य प्रगति पर चल रहा है।

हाल ही में ऑपइंडिया पर एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस प्रकार से मसूरी से करीब चालीस किलोमीटर दूर स्थित घने देवदार के वन के बीच बसे देवलसारी महादेव मंदिर के आसपास की आबादी में एससी-एसटी जाति को ईसाई बनाने का कार्य कई वर्षों से चलाया जा रहा है।

ईसाई मिशनरियों ने कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन का फायदा उठाते हुए एकबार फिर आर्थिक रूप से पिछड़े इन परिवारों को निशाना बनाते हुए इन्हें राशन से लेकर मांस, जिसमें बकरी, मुर्गा आदि शामिल हैं, उपलब्ध करवा रहे हैं और इन सबकी आड़ में इन परिवारों का ईसाईकरण करना है।

इस घटना के प्रकाश में आने के बाद स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐसा सिर्फ एक ही गाँव में नहीं बल्कि कुछ ही दूरी पर बसे एक और गाँव में, जहाँ भगवान शिव का ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर भी स्थित है, में भी इस कार्य को दूसरे स्तर पर पहुँचा दिया गया है।

घने देवदारों के बीच बसा पौराणिक कोणेश्वर महादेव मंदिर

हालाँकि, लोग स्पष्ट रूप से इस बारे में ना कहते हुए बताते हैं कि यहाँ पर चल रहे ये घर जैसे निर्माण कार्य संदिग्ध हैं, जो कि कुछ ‘बाहरी लोगों’ के इशारे पर किया जा रहा है। जिन जगहों पर यह भवन निर्माण हो रहे हैं, वह जमीन भी अनुसूचित जाति के ही लोगों की ही है, जिस पर वो कभी खेती किया करते थे।

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नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक ग्रामीण युवक ने कहा कि वो कई समय से इन लोगों को धर्मांतरण के खिलाफ जागरूक करने का प्रयास कर रहा है लेकिन वो असफल रहा है। युवक ने बताया कि इन्हें इतनी बड़ी मात्रा में बाहरी लोग धन और संसाधन उपलब्ध करवा रहे हैं कि ये सरकारी योजनाओं जैसे- मनरेगा आदि में भी काम करने को अब तैयार नहीं होते।

यह भी उल्लेखनीय है कि ये अनुसूचित जाति के लोग ग्रामीण परिवेश का हिस्सा होने के कारण किसी ना किसी पारंपरिक व आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा हुआ करते थे, जिससे कि सभी जाति और परिवारों के आर्थिक और सामाजिक हित जुड़े होते थे। लेकिन अब ये लोग अपने पारम्परिक कार्य को भी अपनी आगे की पीढ़ी को नहीं सिखा रहे हैं, ना ही उन्हें गाँव की परिपाटी का हिस्सा बने रहने में अब दिलचस्पी है।

यह भी गौर करने की बात है कि यह ‘चर्चनुमा भवन’ ठीक पौराणिक कोणेश्वर महादेव मंदिर के सामने बन रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि किस प्रकार से अनुसूचित जाति की असहाय महिलाओं को मसूरी में रहने वाले ‘डेविड’ द्वारा मदद भेजी जाती है, जो कुछ दिन उनके बीच ही ठहरते हैं, उनकी पूरी जानकारी हासिल कर उनकी ‘मदद’ का आश्वासन देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ‘अंग्रेज’ अब स्थानीय बोली के साथ अच्छी हिंदी में भी बात करने लगे हैं और उन्हें इन परिवारों से जुड़ने में ख़ास समस्या नहीं होती।

हिंदुत्व के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति से भी विमुख करता ईसाईकरण

वास्तव में यह धर्मान्तरण उत्तराखंड की पारम्परिक छवि को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है। शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहाँ पर ईसाई मिशनरियों ने अपने ‘एजेंट’ ना स्थापित कर रखे हों। ये टूरिस्ट से किस प्रकार अनुसूचित जाति के रखवाले बन जाते हैं, इस बारे में हम पहले भी बता ही चुके हैं।

लेकिन यह देखना आश्चर्यजनक है कि गुपचुप धर्मांतरण के बाद अब चर्च निर्माण के लिए भी ईसाई मिशनरी साहस जुटाने लगे हैं। हमें इस बारे में जानकारी देने वाले स्थानीय युवक ने बताया कि यह ईसाई धर्मांतरण इस कारण भी खतरनाक है क्योंकि यह लोग उन्हें हिन्दुओं के खिलाफ भी भड़काते हैं और उन्हें ऐसे धर्म से परहेज करने की सलाह भी देते हैं जो उन्हें रूढ़िवादी बनाता है। यही नहीं, ‘टारगेट’ को अपनी स्थानीय परम्परा के लोकगीत, संस्कृति से भी परहेज करने की सलाह इन ‘बाहरी लोगों’ के द्वारा दी जाती है।

हालाँकि, इसी क्षेत्र का हिस्सा होने के बाद भी मैं स्वयं भी आज तक वह अंतराल देख पाने में असमर्थ हूँ, जो ईसाइयों ने इन गरीब और असहाय हिन्दुओं के धर्मांतरण के बाद इनके जीवनस्तर में लाया हो। इसके विपरीत वह लोग अब कृषि से विमुख हो गए हैं, शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं, मुख्यधारा में जुड़ने से बचने लगे हैं और तो और अपने साथ के ग्रामीणों से भी दूरी बनाकर चलते नजर आने लगे हैं।

क्या मजार और चर्च में डूब जाएगी देवभूमि कहा जाने वाला उत्तराखंड?

उत्तराखंड में एक और प्रचलन भी देखने को मिला है कि सड़क किनारे या किसी आम रास्ते के पास कुछ दिन पहले एक हरी चादर रखी जाती है और कुछ ही समय में वो ऐसा आकार लेने लगता है, जिसे लोग मजार कहते हैं। ऐसे में यदि इस्लामिक और ईसाईयत का निशाना देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड जैसे राज्य, जो कि जनजातीय समाज से मिलकर बना है, जिसकी संस्कृति ही उसकी पहली पहचान है, बनते हैं तो फिर इस उत्तराखंड राज्य को गोआ बनते समय ही कितना लगेगा, वो भी तब जब लोगों को यह यकीन है कि वो दक्षिणपंथी नेतृत्व के तले सुरक्षित हैं?

स्कूल निर्माण

यहाँ पर ‘अंग्रेजी शिक्षा’ के नाम पर ईसाइयों द्वारा आठवीं कक्षा तक के स्कूल भी खोले जा रहे हैं, जिनमें पढ़ाने वालों की योग्यता और मानक भी विचारणीय है। लेकिन ग्रामीण लोगों के लिए ये स्कूल सहूलियत बनकर उभरे हैं क्योंकि ये ऐसी जगहों पर तैयार किए गए हैं, जो सिर्फ गाँव से कुछ ही कदम की दूरी पर बने हैं।

करीब आठ-दस किलोमीटर दूर मुख्य बाजार में अपने बच्चों को जो ग्रामीण पढ़ाने नहीं भेज सकते, उस बड़ी आबादी को मुख्य बाजार के उस सरकारी स्कूल और सुविधाओं से कहीं बेहतर यही मिशनरी स्कूल नजर आते हैं। उन्हें यह सुकून रहता है कि जो स्कूल उनके बच्चे जाते हैं, वह कम से कम कोई अंग्रेजी नाम वाली एकेडमी तो है! ऊपर से बरसात, पानी, गर्मी के मौसम में लम्बी दूरी पैदल जाने से भी बच्चे बच जाते हैं।

मुझे भी अच्छे से अपने बचपन का समय याद है, जब बरसात के दिनों हमें घर से पाँच-सात किलोमीटर दूर स्कूल भेजते समय घर के लोग पहाड़ से सटकर चलने की राय देते थे, ताकि ऊपर की पहाड़ी से अगर पत्थर गिरें भी, तो वो हमें ना लगे।

ईसाइयों द्वारा गुपचुप तरीके से किए जा रहे इन धर्मांतरणों पर स्थानीय नेताओं और हिंदूवादी संगठनों की भी विशेष दिलचस्पी नहीं है। जो कुछ गिने-चुने लोग इन घटनाओं से निराश हैं, वह भी लाचार हैं और उनका कहना है कि विदेशी मुद्रा से लड़ पाने में वो सक्षम नहीं हैं और उनकी अपनी सीमाएँ हैं। भले ही, लोग अवश्य चाहते हैं कि ईसाइयों की गिद्धदृष्टि से समाज को किसी तरह से बचाया जा सके।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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