दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने हाल ही में पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। द वायर को दिए इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि देश में मुसलमानों की हालत बहुत गंभीर हो गई है और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बनने के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
उनके इस बयान के बाद एक बार फिर वही पुरानी बहस शुरू हो गई है, जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार चलती रही है। थोड़े-थोड़े इंटरवल पर कोई न कोई बड़ा नेता, अभिनेता, प्रोफेसर या रिटायर्ड अधिकारी यह कहता फिरता है कि भारत में मुसलमानों असुरक्षित होते जा रहे हैं।
शब्द बदल जाते हैं, उदाहरण बदल जाते हैं, लेकिन मूल संदेश वही रहता है कि मुसलमान धीरे-धीरे भारत में अपनी जगह खो रहे हैं। लेकिन, अब जब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है, तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या ये भविष्यवाणी सच में जमीन पर दिखाई देती है?
मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर नजीब जंग की चिंता
इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि आज मुसलमान खुद को मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं। उनके मुताबिक समुदाय के भीतर यह भावना बढ़ रही है कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हो रहा और उन्हें देश की प्रगति से अलग किया जा रहा है। जंग ने कहा कि यह सिर्फ आम लोगों की भावना नहीं है, बल्कि राजनीति और संस्थानों में भी दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में, जहाँ मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है, वहाँ हालिया चुनावों में बीजेपी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद पहली बार केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम कैबिनेट मंत्री नहीं है और संसद में बीजेपी का कोई मुस्लिम सांसद भी नहीं है।
जंग के मुताबिक, उच्च नौकरशाही, न्यायपालिका और बड़े संस्थानों में भी मुसलमानों की मौजूदगी पहले के मुकाबले कम हुई है। उनका कहना था कि जब लगभग 20 करोड़ की आबादी वाला समुदाय खुद को राजनीतिक रूप से महत्वहीन महसूस करने लगे, तो यह देश के सामाजिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ समाज का उदारवादी वर्ग ही इस मुद्दे को लेकर खुलकर चिंता जाहिर करता दिखता है और इसे उन्होंने भारत के लिए विनाशकारी बताया। हालाँकि इस तर्क के आलोचक कहते हैं कि इस तरह की आशंकाएँ वर्षों से जताई जाती रही हैं।
लेकिन इसके बावजूद भारत के मुसलमान चुनाव लड़ रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, सरकारी नौकरियों में हैं और खुले तौर पर अपने मजहब का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी एक पार्टी में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना अपने आप में दूसरे दर्जे की नागरिकता साबित नहीं करता।
असहिष्णुता की बहस काफी पहले शुरू हो चुकी थी
नजीब जंग पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मोदी सरकार के दौर में देश की दिशा को लेकर चिंता जताई हो। दरअसल यह बहस मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई थी। 2015 और फिर 2017 में कई बड़े नामों ने भारत में असहिष्णुता और मुसलमानों में असुरक्षा की भावना की बात कही थी।
इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का था। अगस्त 2017 में अपना कार्यकाल खत्म होने के करीब उन्होंने कहा था कि देश के कई मुसलमान बेचैन और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने यह मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के सामने उठाया था।
बॉलीवुड में भी मुस्लिमों पर बहस
हामिद अंसारी के बयान से पहले बॉलीवुड के कई बड़े चेहरे भी इस बहस का हिस्सा बन चुके थे। नवंबर 2015 में शाहरुख खान ने भारत में बढ़ती असहिष्णुता की बात कही थी। अपने 50वें जन्मदिन के आसपास दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि समाज में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। उनका बयान तुरंत राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।
इसके कुछ समय बाद अभिनेता आमिर खान ने रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में इससे भी ज्यादा बड़ा बयान दिया था। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी और फिल्ममेकर किरण राव ने एक समय देश छोड़ने तक की बात कही थी, क्योंकि उन्हें माहौल को लेकर डर महसूस हो रहा था और बच्चों की सुरक्षा की चिंता थी।
आमिर ने कहा था कि उनकी पत्नी रोज अखबार पढ़कर तनाव महसूस करती थीं और समाज में बढ़ते तनाव से परेशान थीं। इस बयान पर जमकर चर्चा हुई। टीवी डिबेट और अखबारों में कई दिनों तक यही मुद्दा छाया रहा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चेतावनियाँ नई नहीं हैं। लगभग एक दशक पहले भी यही बातें कही गई थीं कि मुसलमान असुरक्षित हैं, लोकतंत्र खत्म हो रहा है और देश असहिष्णु बनता जा रहा है, लेकिन भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर उन भविष्यवाणियों से काफी अलग रही।
बारह साल बाद क्या मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए?
यहीं से बहस गंभीर हो जाती है। अगर सिर्फ राजनीतिक भाषणों और टीवी बहसों को देखा जाए, तो ऐसा लग सकता है कि भारत में मुसलमानों ने अपने सारे अधिकार खो दिए हैं, जबकि जमीन की सच्चाई कुछ और कहानी बताती है।
मुसलमान आज भी खुलकर चुनाव में वोट डालते हैं। मुस्लिम नेता और पार्टियाँ अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ती और जीतती हैं। मुसलमान व्यापार कर रहे हैं, संपत्ति खरीद रहे हैं, बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और फिल्मों से लेकर खेल, नौकरशाही और कानून तक हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
शाहरुख खान आज भी सुपरहिट फिल्में दे रहे हैं। आमिर खान भी अपने बच्चों के साथ भारत में ही रह रहे हैं, भले ही उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका हो।
कुल मिलाकर भारत में आज भी मुस्लिम अभिनेता बॉलीवुड पर प्रभाव रखते हैं, मुस्लिम उद्योगपति हैं, मुस्लिम जज हैं, मुस्लिम पत्रकार हैं, मुस्लिम खिलाड़ी हैं और मुस्लिम सिविल सेवक भी हैं। देशभर में मस्जिदें सुरक्षित हैं, ईद-बकरीद राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है और इस्लामिक संस्थाएँ कानूनी रूप से काम कर रही हैं।
भारत के मुसलमान उसी तरह जीवन जी रहे हैं जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय के लोग जीते हैं। लेकिन जब प्रभावशाली लोग बार-बार यह कहते हैं कि मुसलमान जल्द ही दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे, तो इससे समुदाय के भीतर डर और असुरक्षा की भावना बढ़ती है।
2014 के बाद से यह बात इतनी बार दोहराई गई कि कई लोगों के लिए यह एक राजनीतिक नारा बन गया। यह जमीन पर दिखने वाली वास्तविकता नहीं है। कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि अगर सरकार सच में मुसलमानों को पूरी तरह हाशिए पर धकेलना चाहती हैं, तो वह मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाएँ और कल्याणकारी कदम नहीं उठाती।
मुसलमानों को लेकर मोदी सरकार की पहल
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ आलोचक मोदी सरकार पर मुसलमानों की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, वहीं बीजेपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए कई कदम भी उठाए हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तीन तलाक के खिलाफ कानून था। मोदी सरकार ने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया। इस प्रथा में शौहर सिर्फ तीन बार तलाक बोलकर तुरंत अपनी बीवी को तलाक दे सकता था।
1 अगस्त 2019 को लागू हुए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अवैध और अमान्य घोषित किया गया। साथ ही इसे आपराधिक अपराध बनाया गया, जिसमें शौहर को तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया।
सरकार के समर्थकों ने इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ा सामाजिक सुधार और लैंगिक न्याय बताया, हालाँकि कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध भी किया था, फिर भी बीजेपी सरकार ने यह कानून लागू किया।
इसके अलावा 2025 में ईद से पहले बीजेपी ने सौगात-ए-मोदी अभियान भी शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत देशभर में करीब 32 लाख गरीब मुस्लिम परिवारों को खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान देने का दावा किया गया।
इन किट्स में सेवइयाँ, खजूर, चीनी, ड्राई फ्रूट्स, कपड़े और ईद से जुड़ी दूसरी चीजें शामिल थीं। महिलाओं को सूट का कपड़ा और पुरुषों को कुर्ता-पायजामा दिया गया। बीजेपी ने इसे गरीब मुस्लिम परिवारों तक सीधे पहुँचने और ईद से पहले सहायता देने की कोशिश बताया।
सरकार समर्थक इसी आधार पर सवाल उठाते हैं कि अगर मुसलमानों को सच में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा होता, तो क्या सरकार मुस्लिम महिलाओं और गरीब मुस्लिम परिवारों के लिए अलग योजनाओं पर इतना राजनीतिक और आर्थिक ध्यान देती?
बारह साल की चेतावनियाँ, लेकिन भारत अब भी वही लोकतंत्र
2014 से अब तक भारत में बार-बार यह कहा गया है कि मुसलमान समाज में अपनी जगह खोने वाले हैं। वामपंथी बुद्धिजीवियों पर आरोप लगता रहा है कि वे मुसलमानों के भीतर खतरे की भावना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी बताकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखा जा सके।
लेकिन पीएम मोदी के करीब 12 साल के शासन के बाद भी भारत के मुसलमानों के पास संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, वोट देने का अधिकार और सार्वजनिक जीवन में मौजूदगी बनी हुई है।
इससे कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि जब एक दशक से ज्यादा समय तक बार-बार डर की वही भविष्यवाणियाँ दोहराई जाएँ और फिर भी वैसी स्थिति जमीन पर दिखाई न दे, तो क्या डर को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया?
कई विश्लेषकों का मानना है कि शायद इसी वजह से कई वामपंथी दल और खुद को मुसलमानों का रक्षक बताने वाले राजनीतिक समूह हाल के वर्षों में चुनावों में कमजोर होते गए हैं। मुस्लिम मतदाता भी अब डर आधारित राजनीति से बाहर निकलकर अपने हितों को अलग नजरिए से देखने लगे हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


