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पत्नी नहीं करने देती थी सेक्स, तलाक के लिए कोर्ट चला गया पति: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना- जीवनसाथी को लंबे समय तक संभोग की इजाजत न देना मानसिक क्रूरता

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी पक्ष द्वारा अदालत में शादी को बचाने के लिए कोई दलील नहीं दी गई। इससे यह साबित हो गया कि दोनों की शादी पहले ही टूट चुकी है और आगे दोनों साथ रह सकते हैं, इसकी कोई संभावना नहीं है। इसके बाद बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को तलाक की डिक्री दे दी।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) पिछले दिनों विवाह संबंधों को लेकर बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा है कि जीवनसाथी को अधिक दिनों तक यौन संबंध बनाने की इजाजत नहीं देना मानसिक क्रूरता माना जाएगा। यदि पति या पत्नी बिना किसी कारण के अधिक समय तक सेक्स से इनकार करते हैं तो यह तलाक का आधार भी बन सकता है।

वाराणसी के रहने वाले रवीन्द्र प्रताप यादव ने फैमिली कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ 28 नवंबर 2005 में हाईकोर्ट में अपील की थी। वाराणसी फैमिली कोर्ट ने यादव की तलाक याचिका ठुकरा दी थी। पति ने अकारण दूरी बनाने के लिए पत्नी पर मानसिक क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट से तलाक की माँग की थी। फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका ठुकरा दी थी। इसके बाद रवीन्द्र ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

16 मई 2023 को दिए गए अपने फैसले में जस्टिस सुनीत कुमार और जस्टिस राजेंद्र कुमार वाली हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अति तकनीकी दृष्टिकोण अपनाकर रवीन्द्र की अर्जी खारिज की थी। बेंच ने कहा कि पत्नी लंबे अरसे से पति के साथ नहीं रह रही है। पत्नी ने वैवाहिक बंधन का कोई सम्मान नहीं किया। उसने अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी पक्ष द्वारा शादी को बचाने के लिए कोई कोशिश नहीं की गई। इससे यह साबित हो गया कि दोनों की शादी पहले ही टूट चुकी है और आगे दोनों साथ रह सकते हैं, इसकी कोई संभावना नहीं है। इसके बाद बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को तलाक की डिक्री दे दी।

कोर्ट में रवीन्द्र द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उनका विवाह मई 1979 में हुआ था। शादी के बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया। वह अपने पति के साथ कभी भी पत्नी की तरह नहीं रही। एक ही घर में रहने के बावजूद दोनों अलग-अलग सोते थे और आपसी संबंध नहीं बने। कुछ दिनों के बाद पत्नी अपने मायके चली गई। 6 महीने बाद तक रवीन्द्र अपनी पत्नी को मनाता रहा, लेकिन वह नहीं मानी और ससुराल आने से मना कर दिया।

वर्ष 1994 में गाँव के पंचायत में मामला पहुँचा। पंचायत ने पति द्वारा 22,000 रुपए के गुजारा भत्ता पर विवाह विच्छेद की इजाजत दे दी। इसके बाद पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। पंचायत के फैसले के बाद रवीन्द्र ने पत्नी से मानसिक प्रताड़ना और पारस्परिक सहमति के तहत तलाक अनुबंध के आधार पर तलाक देने की माँग की, लेकिन रवीन्द्र की पत्नी अदालत गई ही नहीं। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक अर्जी को खारिज कर दिया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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