इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निजी संपत्ति में भीड़ जुटाकर नमाज अदा करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की बेंच ने 25 मार्च 2026 को यह फैसला दिया। यह मामला बरेली में एक मुस्लिम शख्स द्वारा अपने घर में नमाज के लिए भीड़ जुटाने से जुड़ा था और याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि वह निजी संपत्ति में नमाज के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा।
हाईकोर्ट के इस फैसले को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि खाली जगह पर नमाज पढ़ने या प्रेयर करने की आड़ में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक पैटर्न रहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला अगर नजीर की तरह लिया जाता है और देशभर में इस पर अमल किया जाता है तो यह डेमोग्राफी में बदलाव और धर्मांतरण से जुड़ी कई समस्याओं पर लगाम लग सकती है।
‘शांति-व्यवस्था को खतरा’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?
आरोपित अपने घर में दर्जनों लोगों को बुलाकर नमाज पढ़वा रहा था और इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई थी। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई हुई और यह मामला कोर्ट में पहुँच गया। इस मामले के याचिकाकर्ता का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई सही नहीं है। वहीं पुलिस ने इस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी बताया।
25 मार्च को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने वचन दिया कि वह इस मामले से जुड़ी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा। वहीं, इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वचन का उल्लंघन करने पर पुलिस को कार्रवाई करने की छूट दी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “अगर याचिकाकर्ता इस वचन का उल्लंघन करता है और बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ नमाज के लिए इकट्ठा करता है, जिससे इलाके में शांति और व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”
वहीं, कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ जारी चालान वापस लिया जाए। साथ ही, अवमानना (कंटेम्प्ट) के जो नोटिस जारी किए गए थे उन्हें भी कोर्ट ने समाप्त कर दिया है। याचिकाकर्ता की सुरक्षा को वापस लेते हुए कोर्ट ने यह याचिका निस्तारित कर दी।

क्या है यह पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत 16 जनवरी 2026 को बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गाँव से हुई। वहाँ एक निजी खाली घर में सामूहिक नमाज पढ़े जाने से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और पुलिस ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई करनी शुरू की। पुलिस ने इसे बाद 18 जनवरी 2026 को नमाज अदा करने के आरोप में 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया।
इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरु हो गई। लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने सोशल मीडिया पर यह दावा करना शुरू कर दिया कि इन लोगों को नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया है। दावा किया जाने लगा कि पुलिस अब घरों के अंदर इबादत करने वाले नागरिकों को परेशान कर रही है। मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए ‘विक्टिमहुड’ का एजेंडा सोशल मीडिया पर चलाया जाने लगा। हालाँकि, अधूरा सच और प्रोपेगेंडा था।
पुलिस ने बताया कि इन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया है। एसपी अंशिका वर्मा ने स्पष्ट किया कि संदिग्ध मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेना केवल एहतियातन उठाया गया कदम था। यह कार्रवाई उस समय की गई जब पुलिस को मोहम्मदगंज गाँव के निवासियों से जानकारी मिली कि पिछले कुछ हफ्तों से एक खाली पड़े घर का उपयोग मदरसे के रूप में किया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी शिकायत की थी कि बिना प्रशासनिक अनुमति के वहाँ नियमित रूप से सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी।
‘अवैध मदरसे’ से परेशान थे ग्रामीण
पुलिस ने यह कार्रवाई ऐसे ही नहीं कर दी थी। पुलिस ने ग्रामीणों की लगातार चिंता पर यह कदम उठाया था। ग्रामीणों ने इस मामले में पुलिस-प्रशासन को 29 दिसंबर 2025 को ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को दी शिकायत में बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अवैध रूप से मदरसा का निर्माण करा लिया है जो गलता है क्योंकि इसके लिए किसी से कोई अनुमित नहीं ली गई है। ग्रामीणों ने शिकायत में कहा कि उन्हें धमकाया भी जा रहा है और उन्होंने इसकी जाँच कराए जाने की माँग की।

ग्रामीणों ने 8 जनवरी 2026 को बरेली के SSP को भी पत्र लिखा था। ग्रामीणों ने अवैध मदरसे का निर्माण कराए जाने पर कार्रवाई करने की माँग की थी। इसमें कहा गया कि मुस्लिम लोगों ने गाँव में मकान का बहाना बनाकर मदरसा का निर्माण करा दिया है।

16 जनवरी को नमाज पढ़े जाने के बाद भी उसके अगले दिन यानी 17 जनवरी 2026 को ग्रामीणों ने पत्र लिखकर कार्रवाई की माँग की। ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को लिखे पत्र में कहा, “मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव में मदरसा का निर्माण करा लिया है जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं और किसी से कोई अनुमति नहीं ली गई है।”
उन्होंने आगे लिखा, “विरोध करने पर हनीफ के मकान में अवैध रूप से नमाज अदा करते हुए पकड़े गए हैं। 15 लोगों को पुलिस ने पकड़ा है और कई भाग गए हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अवैध रूप से नमाज अदा की जा रही है, उसे रुकवाया जाए और अवैध रूप से बने मदरसे को ध्वस्त किया जाए।”

तारिक खान नामक शख्स ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका डाली थी। जिसेक बाद अदालत ने बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और SSP अनुराग आर्य के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। कोर्ट ने इस मामले में यूपी सरकार को फटकार भी लगाई और अब जुर्माना भी लगाया है। हालाँकि, यूपी सरकार ने कोर्ट में दावा किया है कि उस जगह पर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाई गई है।
घरों में नमाज-प्रेयर: मस्जिद-चर्च की नींव
इस विषय पर तर्क रखें उससे पहले जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश उदाहरणों के जरिए करते हैं। दिल्ली के ब्रह्मपुरी में एक मस्जिद है ना है अल-मतीन। यह मस्जिद बनने की प्रक्रिया इस साजिश को दिखाने के लिए काफी है। 2013 में यहाँ मुस्लिमों ने एक फ्लैट खरीदा, धीरे-धीरे वहाँ लोग नमाज पढ़ने आने लगे जैसा बरेली में हो रहा है। बाद में यह मस्जिद बन गई और कुछ समय बाद यह मस्जिद 4 मंजिला बना दी गई। कुछ वर्षों बाद बगल के प्लाट को खरीदकर इसे विस्तार देने और मंदिर के ठीक सामने इसका गेट बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। ये कहानी राष्ट्रीय राजधानी की है लेकिन देशभर में हालात यहीं है।
गुजरात के सूरत में 2022 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था। वहाँ ‘शिव शक्ति सोसाइटी’ में कुछ प्लॉट्स मुस्लिमों ने खरीदे और वहाँ भी यही सिलसिला शुरू हुआ। लोग आते, नमाज पढ़ते और बात आगे बढ़ती रही। बाद में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो मुस्लिमों ने दावा किया गया कि यह जमीन वक्फ बोर्ड की है और यहाँ अब मस्जिद-मदरसा है। यह प्लॉट की जमीन मुस्लिमों के लिए पवित्र हो गई। इस जमीन को वक्फ को मिली असीम ताकत के जरिए मस्जिद बना दिया गया और शिकायत करने वालों के लिए मुँह ताकते के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।
ऐसा ही मामला हिमाचल प्रदेश के शिमला से भी सामने आया। मोहम्मद सलीम नाम का एक व्यक्ति 1990 में संजौली आया। उसने उस सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया, जहाँ पहले एक स्कूल था जिसे बाद में कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया था। उसने वहाँ एक मंजिला ढाँचा बनाया, जो धीरे-धीरे कई मंजिलों की इमारत में बदल गया। बाद में उसने इसे मस्जिद का रूप दे दिया और वक्फ बोर्ड से NOC भी हासिल कर ली। यह एक मंजिला ढाँचा बढ़कर 5 मंजिला मस्जिद बन गया और नमाज पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी। इसके साथ ही टकराव भी शुरू हो गया।
ईसाइयों में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है। वहाँ भी घरों में प्रार्थना सभाओं और उनकी आड़ में धर्मांतरण के खूब मामले सामने आते हैं। शुरुआत अक्सर बहुत साधारण तरीके से होती है।
किसी व्यक्ति के घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं। यह आयोजन छोटा होता है और स्थानीय स्तर पर ज्यादा ध्यान नहीं खींचता। धीरे-धीरे इसमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ने लगती है। नियमित तौर पर लोग जुटने लगते हैं और वहाँ लाउडस्पीकर, कुर्सियां, बैनर और अन्य व्यवस्थाएँ होने लगती हैं, जिससे वह स्थान एक चर्च का रूप ले लेता है। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और छत्तीसगढ़ तक ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं।
क्यों खतरनाक है घरों में नमाज-प्रेयर का ट्रेंड?
आपने उदाहरण देखे हैं कि किस तरह घर से शुरू होने वाली ये मजहबी गतिविधियाँ धीरे-धीरे स्थायी मजहबी ढाँचों में बदल जाती हैं। यह बहस आस्था से आगे बढ़कर कानून से लेकर डेमोग्राफी के संतुलन और धर्मांतरण की भी है।
शुरुआत अक्सर बेहद सामान्य दिखती है। किसी घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं या प्रार्थना सभा करते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है तो इन सभाओं का स्वरूप बदलने लगता है। लोगों की संख्या बढ़ती है और यह नियमित होने लगता है। धीरे-धीरे घर मजहबी स्थल बन जाता है। इसके बाद अगला चरण आता है और फिर बाहर से मौलवियों-उलेमाओं या पादरियों का आना शुरू हो जाता है। फिर तकरीरों और प्रवचनों का दौर शुरू होता है।
जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो डेमोग्राफी असंतुलन की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। पहले मस्जिद या चर्च के आस-पास मुस्लिमों और ईसाइयों को बसाया जाता है और फिर वहाँ रहने वालें हिंदुओं के साथ टकराव होने लगता है। धीरे-धीरे वहाँ पर अल्पसंख्यक हो गए हिंदू समुदाय को परेशान किया जाता है और फिर मजबूर कर दिया जाता है कि वो वहाँ से चले जाएँ। या अपना मजहब बदल लें। लालच देकर और ताकत के जरिए मतांतरण की खूब कोशिशें होती हैं। मकानों के बाहर बिक्री के पोस्टर लगाए जाने से जुड़ी खूब खबरें आपने पढ़ी होंगी।
हिंदुओं के हितों को देखना भी अदालत की जिम्मेदारी
अदालत के सामने यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है बल्कि भारत के सामाजिक संतुलन और हिंदुओं के अधिकारों से जुड़ा सवाल भी था। इस फैसले से लगता है कि कोर्ट को जमीनी वास्तविकताओं का शायद अंदाजा रहा होगा। कोर्ट सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करती बल्कि उस फैसले का सीधा असर आम लोगों के जीवन, उनकी सुरक्षा, उनकी आस्था और उनके अधिकारों पर पड़ता है।
दिल्ली, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि समस्या वास्तविक है। इस समस्या की शुरुआत में ही अगर हिंदू समाज प्रशासन के पास जाता है तो उसे कह दिया जाता है कि अभी कोई जमीनी परिवर्तन नहीं दिख रहा है तो अभी खतरा भी नहीं है।
वहीं, जब वही गतिविधियाँ आगे चलकर स्थायी हो जाती हैं और तब अगर कोई शिकायत करने जाता है तो कहा जाता है कि एक स्थापित चर्च, मस्जिद है या वक्फ संपत्ति है तो इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यह एक तरह का ‘कानूनी चक्रव्यूह’ बन जाता है जिसमें आम हिंदू समाज फँस जाता है। यदि किसी विशेष इलाके में हिंदू समुदाय खुद के लिए खतरा देखता है, खुद को असुरक्षित नजर पाता है तो यह भी अदालत का ही काम है कि उसे सुरक्षित महसूस हो। उसके साथ न्याय हो।


