Tuesday, October 19, 2021
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शाहीन बाग़ की तल्ख़ हकीकत: विरोध का असली मकसद देश में अस्थिरता का माहौल पैदा कर सरकार गिराना

इसी शाहीन बाग़ के घोषणा पत्र के आधार पर देश के कई जगहों से आपने यह भी सुना होगा कि अब विरोध CAA का है ही नहीं, बल्कि सरकार को, मोदी और अमित शाह को हटाने का है। अगली सरकार वही आएगी, जिसे मुस्लिम चाहेगा।

शाहीन बाग़ को CAA और अदृश्य NRC के खिलाफ प्रतिरोध का अड्डा बनाकर स्थापित करने की सुनियोजित कोशिश की गई। इसे स्वतःस्फूर्त स्थापित और संचालित होने के रूप में कुछ खास चुने हुए मीडिया संस्थानों द्वारा प्रचारित किया गया। पूरे देश में खासतौर से मुस्लिम समुदाय के भीड़ को उकसा कर कुछ वामपंथी और मुस्लिम महत्वाकांक्षी नेताओं या बनने की इच्छा रखने वालों द्वारा मीडिया गिरोह के रूप में ऐसे ही कई शाहीन बाग बनाने की अपील की गई।

शाहीन बाग के मास्टरमाइंड शरजील इमाम की शुरुआती प्लानिंग और जक्का जाम या देश भर में शांति भंग करने के मॉडल के आधार पर कई शाहीन बाग़ दिल्ली के मुस्तफाबाद, खूँरेजी, लखनऊ के घंटाघर सहित अलग-अलग जगहों पर बनाए गए। लेकिन क्यों? क्या सिर्फ CAA और NRC का विरोध करने के लिए? अगर आप भी अभी तक यही सोच और समझ रहे हैं तो आप भी उसी भ्रम और झूठ के शिकार हैं, जिसे सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया गया। पिछले कई दिनों तक ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने (पहचान छुपाकर, सामान्य नागरिक बन कर गए थे) शाहीन बाग में क्या और कैसे हो रहा है, इस पर मेहनत की। पता लगाया कि जो लोग विरोध प्रदर्शन के मोहरे हैं वो कौन हैं? जो प्रोटेस्टर के नाम पर मीडिया गिरोह के चेहरे हैं वो कौन हैं? जो वक्ता हैं वो कौन हैं? और जो परदे के पीछे हैं वो कौन? जो पता चला वो चौंकाने वाला है कि किस तरह से वहाँ सब कुछ पूरी तरह से व्यवस्थित है, जिसे अगर बीजेपी और देश विरोधी शाहीन बाग़ मॉडल कहा जाए तो ज़्यादा सही होगा।

चालिए शाहीन बाग के इस पूरे प्रदर्शन मॉडल और इसके उद्देश्यों की गहराई में उतरते हैं। ऑपइंडिया के रिपोर्टरों की विस्तृत पड़ताल की बदौलत उन सभी पक्षों से आपको परिचित कराता हूँ, जिन पर बहुत कम बात हुई है या जिस पर शाहीन बाग में चर्चा करना भी आज के दौर में आपको मुसीबत में डाल सकता है।

काल्पनिक डर

आपको याद होगा कि कैसे CAA और NRC को मिलाकर देखने की बात करते हुए वामपंथी, विपक्षी नेताओं और राष्ट्र विरोधी एक्टिविस्टों (जिनकी सबसे बड़ी चिंता किसी एक पार्टी की मजबूती है) ने CAA लागू होने के बाद इस डर से कि कहीं इस कानून के तहत नागरिकता पाने वाले तीन देशों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश और 6 धर्मों (हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, ईसाई) के अल्पसंख्यक जिनमें एक रिपोर्ट के अनुसार 70% से अधिक दलित हैं, बीजेपी के मजबूत वोटर बन गए तो उसका बड़ा लाभ इस पार्टी को मिलेगा। इस कानून के तहत मुस्लिम समुदाय को छोड़ दिया गया लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें नागरिकता देने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। बस इस कानून के तहत इसे शामिल नहीं किया गया। चूँकि, ये तीनों देश खासतौर से मुस्लिमों के लिए ही हैं और इस्लाम इनका राष्ट्रीय मज़हब है। अगर मुस्लिम को शामिल कर लें तो किसी कानून की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। यहीं से डर का माहौल बनाकर पहले से ही ‘डरे हुए मुस्लिमों’ के बीच मीडिया और वामपंथी गिरोह के माध्यम से फैलाया गया कि इस कानून में अगर NRC को भी मिला दें तो मुस्लिमों की नागरिकता ही छीन जाएगी।

इस डर को जायज ठहराने के लिए कई कहानियाँ गढ़ी गईं। उनमें से सबसे प्रबल था कि कागज नहीं दिखाना है! कौन सा कागज? तो कभी कहा गया कि आजादी के पहले का तो कभी 1971 के पहले का तो कभी ये भी कह दिया गया चार पीढ़ी पहले का दिखाना होगा। ऐसे कई झूठ और भ्रामक सूचनाओं से लैस शाहीन बाग के प्रोटेस्टर अपने अंदर मीडिया गिरोह द्वारा तरह-तरह से बैठाए डर, जो कई कल्पनाओं में तमाम झूठ मिलकर गढ़ा गया है, उसके जीवंत पुतले मिलेंगे। ये तमाम झूठ वहाँ बैठे प्रोटेस्टर के अंदर NDTV तथा लिबरल गिरोह के कुछ अन्य मीडिया चैनलों द्वारा खासतौर से ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के आसान शिकार मुस्लिम महिला-पुरुषों और वंचित तबके के बीच भरा गया। जो आपको वहाँ बात करते हुए साफ नजर आएगा।

झूठ को गाढ़ा करने के लिए मंच के पास लगाया गया एक भ्रामक पोस्टर जिसे अब हटा दिया गया है

उन्हें बताया गया है कि ये सरकार मुस्लिम विरोधी है, जानबूझकर पहले CAA ले आई। जब आसाम में हिन्दू NRC के अंदर फँस गए फिर पूरे देश में NRC लाएगी तो मुस्लिमों को नागरिकता से ही ख़ारिज कर दिया जाएगा। लेकिन आगे ये नहीं बताते कि ख़ारिज करके आखिर कहाँ भेजेंगे? कौन सा देश उन्हें अपनाएगा? तो इसके लिए ये तर्क इसी मीडिया और वामपंथी गिरोह ने फैलाया कि जो नागरिकता से ख़ारिज हो जाएँगे उन्हें डिटेंशन कैम्पों में रखा जाएगा। उसकी तुलना बाकायदा हिटलर के कंसंट्रेशन कैम्पों से की गई। लेकिन आगे न ऐसे डरे हुए लोगों ने ये सवाल पूछा कि क्या 25 करोड़ से ज़्यादा लोगों को रखने के लिए कोई भी सरकार सब कुछ ठप्प कर कैंप क्यों बनाएगी? आखिर क्यों ऐसा करेगी? इसके पीछे मुस्लिम विरोधी छवि को उभारा गया क्योंकि सच बताने से यहाँ वे सभी फँसेंगे जो अभी तक झूठ बोल रहे हैं और भ्रम फैला रहे हैं।

भ्रामक पोस्टर और डिटेंशन कैंप का डर जो मुख्य सेल्फी पॉइंट भी है

खास तरह की मीडिया का ही प्रवेश

‘मुस्लिमों को देश से बाहर कर दिया जाएगा’ शाहीन बाग में ऐसे कई वक्ता मंच से इस काल्पनिक डर को अपने लच्छेदार भाषणों से हर रोज मजबूती प्रदान करते हैं। जो इस स्थापित नैरेटिव से अलग बोलेगा उसका प्रवेश ही वहाँ प्रतिबंधित है फिर चाहे वो कोई स्पीकर हो या मीडिया का ही क्यों न हो? वहाँ आसानी से प्रवेश की अनुमति है तो उन्हीं को जो लगातार देश में अस्थिरता को हवा देने का काम कर रहे हैं।

सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया शाहीन बाग का ‘वीजा’ ही माँगते रह गए

आपने इसका सबूत NDTV, India TV, वायर, Quint, बीबीसी की रिपोर्टिंग में देखा होगा, जो डर को कायम रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन्हें सच्चाई नहीं पता पर वो सच इनके एजेंडे को शूट नहीं कर रहा है। शाहीन बाग में मौजूद ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने बताया कि इनके लिए बाकायदा वहाँ प्लानिंग की जाती है, नकाब और बुर्के में कुछ खास प्रोटेस्टर प्लेस किए जाते हैं ताकि फेक नैरेटिव के हिसाब से ही बातें बाहर आएँ।

NDTV और India Today का विशेष स्वागत

कई ऐसे मीडिया संस्थान जिन पर इसी गिरोह के ‘मठाधीश’ रवीश कुमार ‘गोदी मीडिया’ का टैग दिया है, उनका शाहीन बाग में प्रवेश भी वर्जित है। बहुत बाद में कुछ को सशर्त अनुमति मिली भी तो लाइव करने का दबाव बनाया गया पर चूँकि वो रैंडम प्रदर्शनकारियों से सवाल कर रहे थे तो बने-बनाए फेक नैरेटिव की हवा निकल रही थी। जिस वजह से कई बार ऑपइंडिया रिपोर्टर के सामने ही पहले न्यूज़ नेशन और बाद में इंडिया टीवी के रिपोर्टरों के साथ बदसलूकी की गई।

इंडिया टीवी के लाइव प्रोग्राम को रुकवाते और रिपोर्टरों को परेशान करते प्रोटेस्टर

शाहीन बाग की जमीनी हकीकत

चलिए अब आपको ऑपइंडिया के रिपोर्टरों ने वहाँ जो देखा और महसूस किया उस पर और विस्तार से बताते हैं। दिल्ली-नॉएडा हाइवे जाम किए शाहीन बाग के इस चक्का जाम मॉडल में दोनों तरफ धरना स्थल से थोड़ी दूरी पर बैरिकेडिंग की गई है, जिसके पार कोई नहीं जा सकता, स्कूल बस या एम्बुलेंस तो छोड़िए इसके पार पुलिस को भी जाने की अनुमति नहीं है। जब तक कोई विशेष विवाद न हो।

बैरिकेडिंग के बाहर तैनात पुलिस और शाहीन बाग ‘गणराज्य ‘ की सीमा

पुलिस वहाँ है जरूर पर बैरिकेडिंग के पहले ही। यहाँ तक कि तमाम वामपंथियों द्वारा फैलाए गए इस प्रपंच कि कागज नहीं दिखाएँगे लेकिन एक छोटे से प्रदर्शन स्थल की सुरक्षा के नाम पर आपको तगड़ी सुरक्षा जाँच से गुजरना होगा, बाकायदा आपकी तलाशी ली जाएगी, बैग चेक होंगे, पूछताछ होगी और शक होने या अतिरिक्त सुरक्षा के नाम पर आपसे कागज परिचय पत्र भी माँगा जाएगा। लेकिन शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि जब बात देश की सुरक्षा की हो तो किसी भी तरह का कागज न माँगा जाए वैसे उनसे अभी तक माँगा भी नहीं गया है।

सुरक्षा जाँच के लिए हर प्रवेश द्वार पर तगड़ा चेक पॉइंट है

कल तो मीडिया के लिए भी एक विशेष ‘वीजा’ जारी किया गया, जिसमें उसकी पूरी डिटेल और उद्देश्य के साथ निर्धारित समय भी लिखा हुआ है।

जारी किया गया परमिट

भड़काऊ भाषण और गलत बयानी का अड्डा

वहाँ मंच से जितने भी वक्ता अपना भाषण देंगे सभी के भाषणों में झूठ और गलत तथ्यों की भरमार होगी ताकि जो फेक नैरेटिव खड़ा किया गया है, उसका भ्रम बरक़रार रहे। बोलने को मंच से कोई भी बोल सकता है लेकिन उसे एजेंडे के तहत ही बोलना होगा और एजेंडा क्या है? जितना ज़्यादा आप मोदी-शाह या बीजेपी के विरोध में बोल सकें उतना अच्छा, भाषण में सत्ता से नफ़रत या उसे उखाड़ फेंकने या देश ने सत्ता को नकार दिया है, शाहीन बाग ने सत्ता को ख़ारिज कर दिया है जैसी जितनी भी बहकी-बहकी बातें होंगी। तालियों की गड़गड़ाहट उतनी ही सुनने को मिलेगी।

मंच से खुद को बहादुर शाह जफ़र का वंशज बताने वाले, बीच में सेकुलरिज्म मेंटेन करने के लिए एक ईसाई प्रचारक और एक सिख भाई

कुछ उदाहरण देता हूँ, सबके अलग-अलग नाम लेकर बताऊँ तो काफी लम्बा हो जाएगा फिर भी अधिकांश का लब्बोलुआब ये रहेगा, “पूरे देश में मुस्लिमों की लिंचिंग की जा रही है। मुस्लिमों को देश से निकालने की साजिश हो रही है। उनकी नागरिकता छीनने के लिए ये कानून लाया गया। वहाँ बार-बार जुनैद, रोहित बेमुला, अख़लाक़ जैसे कुछ नाम लेकर ये याद दिलाया जाता रहेगा कि कैसे सरकार मुस्लिमों और वंचितों के खिलाफ काम कर रही है।”

थोड़ा और डिटेल में ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने बताया कि पिछले दिनों के अगर कुछ नामों का जिक्र किया जाए तो कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी वहाँ सॉलिडेरिटी के नाम पर भ्रामक और भड़काऊ बयान दिए। बहुत कुछ है जो मीडिया रिस्ट्रिक्शन के कारण बाहर आसानी से उपलब्ध नहीं है। पिछले दिनों खुद को बहादुर शाह जफ़र का वंशज बताने वाले एक शख्स ने तो ये भी कह दिया, “अब गजवा-ए-हिन्द का वक़्त आ चुका है। आर-पार की लड़ाई का समय है, मुस्लिम चुप नहीं बैठेगा।”

डर को और कायम रखने के लिए ये भी कहने से नहीं चुके जनाब बहादुर शाह जफ़र के तथाकथित वंशज, “मोदी सरकार रजिस्टरों से मुस्लिमों के नामों के पन्ने फाड़ रही है। अगर कभी कोई कागज बनवाने भी गया तो उसे रजिस्टर में अपना नाम ही नहीं मिलेगा।” जबकि ये बात कोरी बकवास है। बोलने वाला चाहे उमर खालिद हो या शुरूआती दिनों में शरजील इमाम, सभी के बातों में जहर साफ नजर आया और वह छिपा हुआ एजेंडा भी कि NRC या CAA तो बस बहाना है। असली मकसद कुछ और ही है।

भीड़ में मौजूद जिससे भी आप बात करेंगे आपको एक ही तरह की अर्धसत्य और भ्रामक बातें सुनने को मिलेंगी। अपनी तरफ से समझाने की आपने भूल की तो शाहीन बाग में आप मुसीबत में पड़ सकते हैं। जैसे जलाल, फकरूद्दीन और कई ऐसे लोग जिनसे नाम ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने मूल मुद्दे को समझने के बहाने से पूछ लिया, भाई जान विरोध किस बात का है? CAA तो प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है? बाहर भ्रम बहुत ज़्यादा है आप बताइए कि बात क्या है? तो जलाल ने छूटते ही कहा था, “मोदी और शाह दोनों मिलकर मुस्लिमों को देश से निकालना चाहते हैं। हम इन्हें ही निकाल देंगे अब हमारी लड़ाई ही इन्हें सत्ता से हटाना है।”

कई तो वही सुनी-सुनाई बात की रट लगाए थे कि हम संविधान बचाने के लिए लड़ रहे हैं। संविधान खतरे में आ गया है? कुछ ने आईडिया ऑफ़ इंडिया भी दे मारा कि वही खतरे में आ गया है। रिपोर्टर ने पूछा कैसे? तो यही सुनने को मिला आप NDTV नहीं देखते क्या उसमें बताया गया था कि देश में संविधान खतरे में आ गया है। एक ने तो बिन माँगे सलाह ही दे दी कि ‘गोदी मीडिया’ मत देखिए सिर्फ NDTV में हमारी (मुस्लिमों) बात वैसे ही आती है जैसे हम यहाँ बोल रहे हैं। हमें क्या और कैसे करना है ये भी हमें वहीं से पता चल जाता है।

नैरेटिव गाढ़ा करने के लिए हर तरफ पोस्टर ही पोस्टर

कुल मिलाकर अगर वहाँ मौजूद आम प्रदर्शनकारियों की बात करें तो वो उसी काल्पनिक डर से हलकान दिखे, जो उनके अंदर वामपंथी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और मीडिया गिरोह द्वारा फैलाया, सुनाया गया है। शाहीन बाग में रचे-बसे झूठ या नैरेटिव के खिलाफ वहाँ कोई भी अपने विचार नहीं रख सकता। वहाँ मौजूद रहकर या तो आपको भीड़ का हिस्सा बनना होगा या मूक दर्शक, जो देख और समझ तो सब सकता है पर प्रचलित नैरेटिव के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकता। अगर किसी ने ऐसी गुस्ताखी करने की कोशिश की तो आपको घेरे कर या आपके आस-पास की भीड़ आपको बीजेपी या आरएसएस का एजेंट साबित कर आपके विचारों या जो सत्य आप बताना चाहते हैं उसे एक झटके में ख़ारिज कर देगी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शाहीन बाग़ आपको कूप मण्डूकता का केंद्र नजर आएगा, जहाँ जैसे पूरे कुंएँ में ही भाँग पड़ी हो और सब एक से मतवाले नजर आएँगे।

मंच, बैकस्टेज, स्वास्थ्य केंद्र, लाइब्रेरी, पोस्टर मेकिंग, इंस्टॉलेशन

मंच जहाँ से पिछले 50 से अधिक दिनों से भड़काऊ बयानबाजी इस दम पर की जा रही है कि ये शाहीन बाग का मंच और यहाँ बैठे चंद भटके और पॉलिटिकली मोटिवेटेड लोग संसद और देश के चुने हुए प्रतिनिधियों से बढ़कर हैं। बीच-बीच में आजादी के नारों के बीच आपको ये दलील पुरजोर और अक्सर सुनाई देगी कि हम यहाँ से कहीं नहीं जाएँगे। अब शाहीन बाग़ ने फैसला कर दिया है मोदी-शाह को यहाँ आना होगा और लिखित में यह बताना होगा कि NRC, (अब इस एजेंडे में एनपीआर भी जोड़ दिया गया है) कभी नहीं आएगा और CAA वापस लेना होगा, तभी वे सड़क से उठेंगे।

इसी शाहीन बाग़ के घोषणा पत्र के आधार पर देश के कई जगहों से आपने यह भी सुना होगा कि अब विरोध CAA का है ही नहीं सरकार को, मोदी और अमित शाह को जाना होगा। अगली सरकार वही आएगी, जिसे मुस्लिम चाहेगा। उसे ये कानून देश में कभी न लाने का वादा करना होगा क्योंकि देश का मुस्लिम काफी डर गया है।

क्यों? पूछने की गुंजाईश वहाँ है ही नहीं। कोई पत्रकार भी शाहीन बाग़ के ‘अराजक गणराज्य’ में ये हिमाकत नहीं कर सकता। वहाँ के नियम इतने सख्त हैं कि शुरू से कुछ खास विचारधारा के लोगों और मीडिया की इंट्री ही वहाँ संभव रखी गई है। और बाकायदा नैरेटिव के हिसाब से उनके शो या रिकॉर्डिंग में वो सभी इंतजाम किए जाते हैं जिससे उनका उनका फेक नैरेटिव फैलता रहे। बाकी किसी को अनुमति लेकर भी रिकॉर्डिंग या सवाल पूछने की अनुमति नहीं, ऐसा करने पर आपको घूरती हुई भीड़ की निगाहें छलनी कर देंगी। चोरी से रिकॉर्डिंग करने की कोशिश की तो भीड़ आपको घेरकर लिंचिंग जैसा माहौल बना देगा। आपको हर हाल में वीडियो डिलीट करने के बाद ही मुक्ति मिलेगी। कल गुंजा कपूर के साथ जो हुआ वो तो बस एक छोटा सा नमूना था।

कुछ और मीडिया संस्थानों को बाद में सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया काण्ड के बाद प्रवेश की अनुमति मिली भी तो इस शर्त के साथ कि ये मीडिया संस्थान (जो इस पूरे प्रकरण का दोनों पक्ष जनता के सामने रखना चाहते हैं) इन्हें सिर्फ लाइव दिखाना होगा और ये कोई कठिन सवाल नहीं पूछ सकते। या ऐसा कुछ भी नहीं, जिससे उनका पूरा तंत्र एक्सपोज़ होता नजर आए। ऐसा अगर व्यवस्थापकों को होता दिखा तो दोनों बार चाहे ज़ी न्यूज़ और न्यूज़ नेशन का प्रकरण हो तब या बाद में दो बार इंडिया टीवी के रिपोर्टर को घेरकर उस पर माफ़ी माँगने तक का दबाव बनाया गया। और उनके लाइव रिपोर्टिंग को भी गलत लोगों से काउंटर सवाल करने के कारण बीच में रोक दिया गया। यहाँ तक कि बंद करो के खूब शोर के साथ ही पत्रकारों और कैमरामैनों को परेशान किया गया।

मंच से उन्मादी भाषण देता वक्ता

मंच और टेंट की ठीक-ठाक व्यवस्था है। यहाँ तक की खाने-पीने के लिए बीच के दिनों में लंगर के रूप में खाना बाँटा गया। जब पुलिस ने इसे बंद करा दिया और उसे लेकर विवाद हुआ तो खाने के तौर पर चिकेन बिरयानी और पैकेज्ड वॉटर को हमारे रिपोर्टरों ने कई दिनों तक नोटिस किया।

चिकन बिरयानी और पैक्ड वॉटर का वितरण

चूँकि, एक खास मीडिया के द्वारा शाहीन बाग़ को स्वतः पैदा हुआ आंदोलन करार देने की पूरजोर कोशिश हुई लेकिन ऐसा है नहीं। वहाँ की चाक-चौबंद व्यवस्था देखकर, मंच, टेंट, खाना, चाय, मंच के पीछे ही स्थित दवाखाना, बस स्टॉप का स्वरूप बिगाड़कर उसे लाइब्रेरी का रूप दे देना – इसे देखकर स्वतः वाला नैरेटिव कोरी बकवास है। शरजील इमाम द्वारा सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठी करके आसाम को भारत से अलग कर देने के भाषण के रूप में अपने मंसूबों को जाहिर करने के बाद पोस्टर के रूप में ऐसे कई मैप दिखाई दिए, जिसमें आसाम भारत से कटा हुआ था। पूरी लाइब्रेरी पोस्टरों से वैसे पटी-पड़ी है जैसा नजारा आपको अक्सर जामिया और JNU में देखने को मिलता है।

नैरेटिव के हिसाब से पोस्टर बनाते बच्चे और शाहीन बाग की अस्थाई लाइब्रेरी

इसके आलावा अगर अन्य इंस्टॉलेशन की बात करें तो आपको सबसे बाहर की तरह एक तरह से एक घोषणा पत्र ही दिख जाएगा कि हम भारत के लोग CAA, NRC और NPR नहीं मानते। उसके बाद एक और इंस्टॉलेशन चर्चा का केंद्र था जिसका एक हिस्सा पिछले कई दिनों से हटा दिया गया है। उसमें इंडिया गेट की प्रतिलिपि पर CAA-NRC प्रदर्शनों के दौरान दंगाइयों द्वारा मारे गए या दूसरे शब्दों में कहें तो वामपंथी अफवाह तंत्र का शिकार होकर अपनी जान गँवाने वाले ‘दंगाइयों’ के नाम उन्हें ‘शहीद का मर्तबा’ देते हुए इंडिया गेट के उस रेप्लिका पर लिखा था। ठीक उसके बगल में ही एक जला हुआ, खंडित इंडिया गेट की अधूरी रेप्लिका थी, जिसे जलते हुए भारत के रूप में दर्शाया गया था। जिसकी जिम्मेदारी शासन की थी लेकिन कौन इस देश को जलाने में शामिल थे इस पर चुप्पी थी।

इंडिया गेट की रेप्लिका और खंडित इंडिया गेट, बाद में इंडिया गेट को हटा दिया गया है

आजादी के नारे और छोटे बच्चे

शाहीन बाग के प्रदर्शन स्थल पर दोपहर तक आम दिनों में उतनी भीड़ नहीं दिखती लेकिन शाम और रात होते-होते भीड़ बढ़ती जाती है। कई दिनों तो ये संख्या 10 हजार के पार भी नजर आई। आम तौर शाम और रात में ठीक-ठाक भीड़ रहती है। मंच पर भड़काऊ भाषण और मंच के बाहर इंस्टॉलेशन एरिया में आज़ादी के नारे बच्चों के द्वारा भी लगाए जाते हैं। ये एक तरह से उन बच्चों की ट्रेनिंग ही है पर इसे दूसरे रूप में देखा जाए बच्चों ने जो जहर मंच और वहाँ के वक्ताओं से बटोरा होता है, वही वे घेरा बनाकर बाँट रहे होते हैं।

यहाँ तक कि कई बच्चे मोदी और शाह को ख़त्म करने की बात करते भी नजर आए और लोग ऐसी बातों पर भी उसका मजा लेते नजर आए। उन्हें देखकर आप उनकी अबोधता भी समझ सकते हैं कि जिस जहर और नफ़रत का बीज अनजाने में ही आज बच्चों में बो दिया गया है। वही आगे जाकर एक दिन विषबेल बनेगा और यही बच्चे खुद को आपराधिक गतिविधियों में संलग्न करेंगे। लेकिन इसके जिम्मेदार आज के लोग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होंगे क्योंकि आज अपनी राजनीति के चक्कर में वो हर कुर्बानी देने को तैयार हैं। उनके लिए सरकार के खिलाफ फेक नैरेटिव बनाए रखने के लिए हर कीमत छोटी है।

शाहीन बाग का असली मकसद

पूरे घटना क्रम और वहाँ मौजूद खासतौर से वामपंथी और मुस्लिम प्रदर्शनकारियों से जब ऑपइंडिया रिपोर्टरों ने घुल-मिलकर जानना चाहा तो कई चौकाने वाले बयान नजर आए जैसे कुछ इसी बात पर अटके थे कि हिन्दू और दूसरे धर्म के लोग शरणार्थी और मुस्लिम इस सरकार के लिए घुसपैठिया हो गया है? आखिर CAA में मुस्लिमों को क्यों नहीं शामिल किया गया? जब तक मुस्लिमों भी शामिल नहीं किया जाएगा तब तक प्रदर्शन चलेगा? कुछ हम जानते हैं कि CAA हमारे लिए नहीं है लेकिन अगर उसमें NRC मिला दें तो सब गड़बड़ हो जा रहा है और अमित शाह कह चुका है। वो पीछे नहीं हटेगा।

कुछ तो इसी धुन में दिखे कि अब मुस्लिमों के साथ सेक्युलर हिन्दू भी आ गए हैं जो चाहते हैं कि ऐसी सरकार आए जो मुस्लिमों के अनुसार काम करे। हम अमित शाह को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाने देंगे। तभी हमारे रिपोर्टर ने एक प्रदर्शनकारी से पूछ लिया कि भाई जान समझ नहीं आ रहा है कि कैसे हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा? इस पर जवाब यही कि हम टीवी में देखे थे कि मोदी और अमित शाह हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। अब इसके बाद हमारे रिपोर्टर ने अपनी समझ का प्रयोग करते हुए वहाँ से खिसक लेना ही बेहतर समझा कि सब कौन सा चैनल देख रहे हैं। और डोज कहाँ से आ रहा है। जहाँ एक तरफा रिपोर्टिंग को ही सच के रूप में परोसा जाता है और दूसरे को अश्पृश्य घोषित कर उससे दूर रहने की सलाह हर रोज दी जाती है।

एक थोड़े ज़्यादा पढ़े लिखे प्रोटेस्टर से जब पूछा गया तो वह बोले हम तो बस यहाँ का नाटक देखने आ जाते हैं कि कैसे दिल्ली में शिक्षा की बात करने वाले लोग इन जाहिलों को उनकी जहालत से निकालने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। एक ग्रुप में खड़े कुछ लोगों ने तो ये साफ कह दिया, “अब ये प्रोटेस्ट CAA-NRC के विरूद्ध नहीं है। ये एक मौका है बीजेपी और आरएसएस के नेताओं को ये दिखा देने का कि मुस्लिम कितना संगठित है। अब वो दिन दूर नहीं जब सब जगह हमारे लोग होंगे या हम जिसे चाहेंगे, जो हमारे लिए काम करेगा उसी की सरकार बनेगी, हम सरकार बनाएँगे भी और गिराएँगे भी।”

कुल मिलाकर, ऐसी कई बातें हैं जो इस पूरे विरोध-प्रदर्शन के पीछे की सुनियोजित साजिश की तरफ इशारा करती है कि किस तरह से कुछ खार खाए अस्थिरता के समर्थक और समस्याओं पर पहले वाले वामपंथी गिरोह के लोग तीन तलाक, आर्टिकल-370 और राम मंदिर के फैसले से बौखलाए मुस्लिमों की भीड़ का उपयोग करते हुए तब अस्थिरता का माहौल पैदा करना चाहा जब उन्हें लगा कि अगर CAA लागू हो गया और उसके बाद NRC भी आ गया तो बीजेपी की सत्ता इतनी मजबूत हो जाएगी कि आने वाले समय में उसे चुनावी गणित में हराना मुश्किल हो जाएगा।

अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी मुस्लिम जमात के मोहरों की तरह प्रयोग कर हर तरफ से ख़ारिज और धकियाये जा रहे वामपंथी और कॉन्ग्रेसी गुट ने, विपक्षी और आम आदमी पार्टी की मिली-भगत से इस अराजकता को हवा देने की कोशिश की। जिससे पैदा हुए हलचल से डरकर बीजेपी CAA कानून वापस ले ले। चूँकि, वैसा कुछ नजर नहीं आ रहा है इसलिए अभी भी किसी भी हद तक जाने के लिए भ्रम का माहौल बनाए रखा गया है। काम से काम दिल्ली विधानसभा चुनावों तक और सबसे कम पढ़ी-लिखी मुस्लिमों की भीड़ मोहरों के रूप में चंद खिलाडियों की कठपुतली बनकर नाच रही है। जिसका जल्द ही भंडाफोड़ होना तय है।

 

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रवि अग्रहरि
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