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समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं: इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फिर से विचार करने से किया इनकार, समीक्षा याचिकाओं को किया रद्द

इन समीक्षा याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि निर्णय विरोधाभासी और स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण है। न्यायालय ने माना कि सरकार द्वारा भेदभाव के माध्यम से याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन इस भेदभाव को प्रतिबंधित करने का तार्किक अगला कदम उठाने में विफल रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 जनवरी 2025) को भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने पर विचार करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णय को चुनौती देने वाली समीक्षा याचिकाओं में कहा गया था कि सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देने के अपने पुराने फैसले की समीक्षा करे। हालाँकि, शीर्ष न्यायालय ने इन याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया।

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने चैंबर में समीक्षा याचिकाओं पर विचार किया। इसके बाद इन्हें खारिज कर दिया। अपने पुराने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है। जुलाई 2024 में जस्टिस संजीव खन्ना ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।

इसके बाद इन समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई के लिए एक नई पीठ का गठन किया गया था। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा अक्टूबर 2023 का फैसला सुनाने वाली मूल पीठ के एकमात्र सदस्य हैं, क्योंकि अन्य सभी सदस्य (सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एसके कौल, रवींद्र भट और हिमा कोहली) सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

समीक्षा पीठ ने कहा कि उसने उसने समलैंगिक विवाह पर पुराने निर्णयों को ध्यान से पढ़ा है और इन निर्णयों में कोई त्रुटि नहीं मिली। पीठ के आदेश में कहा गया है, “हमें रिकॉर्ड में कोई त्रुटि स्पष्ट नहीं मिली। हम आगे पाते हैं कि दोनों निर्णयों में व्यक्त किए गए विचार कानून के अनुसार हैं और इस तरह कोई हस्तक्षेप उचित नहीं है।”

दरअसल, 17 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था और कहा था कि यह विधायिका का मामला है। हालाँकि, बेंच के सभी जज इस बात पर सहमत थे कि भारत सरकार समलैंगिक रिश्ते में शामिल व्यक्तियों के अधिकारों की जाँच करने के लिए एक समिति का गठन करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से यह भी माना था कि समलैंगिक जोड़ों को हिंसा, जबरदस्ती या धमकी के बिना सहवास करने का अधिकार है। ऐसे संबंधों को विवाह के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता देने के लिए कोई निर्देश पारित करने से परहेज किया। तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसके कौल ने समलैंगिक जोड़ों के नागरिक संघ बनाने के अधिकार को मान्यता देने पर सहमत थे, लेकिन अन्य तीन न्यायाधीश असहमत थे।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई समीक्षा याचिकाएँ दायर की गईं। इन याचिकाओं में समलैंगिक जोड़ों के साथ होने वाले भेदभाव को स्वीकार करने के बावजूद उन्हें कोई कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं करने के निर्णय को गलत ठहराया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह मौलिक अधिकारों को बनाए रखने और उनकी रक्षा करने के न्यायालय के कर्तव्य का परित्याग है।

इन याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया था कि निर्णय विरोधाभासी और स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण है। न्यायालय ने माना कि सरकार द्वारा भेदभाव के माध्यम से याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन इस भेदभाव को प्रतिबंधित करने का तार्किक अगला कदम उठाने में विफल रहा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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