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बिहार में नहीं मिलेगा 65% कोटा, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक से किया इनकार: जाति गिनने के बाद बढ़ाया था आरक्षण

आरक्षण में बढ़ोतरी के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा किए गए आरक्षण संबंधी संशोधनों को भारतीय संविधान के खिलाफ बताया। हाई कोर्ट ने कहा कि ये संशोधन अनुच्छेद 15(4) और 16 (4) के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताते हुए इसे खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (29 जुलाई 2024) को बिहार में बढ़ाए गए आरक्षण को लेकर पटना हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। याचिका में बिहार सरकार ने पटना हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती है। दरअसल, पटना हाई कोर्ट ने SC, ST, OBC और EBC के लिए आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 65% करने के बिहार सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने अपील पर सुनवाई की अनुमति दी है। बिहार राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट से पटना उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ से संबंधित इसी तरह के कानून में अंतरिम आदेश पारित किया है।

श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से इसी तरह अंतरिम राहत देने का आग्रह किया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर एक बड़ी बेंच द्वारा भी विचार करने की आवश्यकता हो सकती है। इस मामले पर सितंबर में सुनवाई होगी।

बता दें कि 20 जून 2024 को पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति हरीश कुमार की पीठ ने एक जनहित याचिका पर बिहार आरक्षण (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए) (संशोधन) अधिनियम 2023 और बिहार (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में) आरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2023 को रद्द कर दिया था।

दरअसल, साल 2023 में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की गठबंधन सरकार ने राज्य में जाति सर्वे कराया था। सर्वे के आँकड़ों के आधार पर राज्य सरकार ने कानून में संशोधन किया। नए कानून के तहत अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) के लिए मौजूदा कोटा 18% से बढ़ाकर 25% कर दिया गया था। इसके साथ ही पिछड़े वर्गों (OBC) के आरक्षण कको 12% से बढ़ाकर 18% कर दिया गया।

इसके साथ सरकार ने अनुसूचित जातियों (SC) के आरक्षण को 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों (ST) के कोटा को दोगुना करके 1 प्रतिशत को बढ़ाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया था। ये सब कुछ राज्य में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण को बढ़ाया गया था। लालू यादव की पार्टी राजद लगातार इसकी माँग कर रही थी।

इस कानून के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई। इस पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा किए गए आरक्षण संबंधी संशोधनों को भारतीय संविधान के खिलाफ बताया। हाई कोर्ट ने कहा कि ये संशोधन अनुच्छेद 15(4) और 16 (4) के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताते हुए इसे खारिज कर दिया।

संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्य को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के किसी भी वर्ग की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है। इसी तरह अनुच्छेद 16 (4) में प्रावधान है कि राज्य किसी भी पिछड़े वर्ग के लिए पद आरक्षित कर सकता है, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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