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सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी कौन, तय करेगा सुप्रीम कोर्ट? त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की मलयाली ब्राह्मण वाली भर्ती प्रक्रिया पर माँगा जवाब

सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी पर सिर्फ मलयाली ब्राह्मण की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए केरल हाई कोर्ट ने कहा था, "अनुच्छेद 25(2)(बी) द्वारा संरक्षित अधिकारों के हिस्से के रूप में कोई भी हिंदू यह दावा नहीं कर सकता कि मंदिर को दिन-रात पूजा के लिए खुला रखा जाना चाहिए या उसे व्यक्तिगत रूप से वे सेवाएँ करने देना चाहिए, जो केवल अर्चक ही कर सकते हैं।"

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (9 अगस्त 2024) को सबरीमाला अयप्पा मंदिर के मेलशांति (प्रमुख पुजारी) के पद के लिए सिर्फ मलयाली ब्राह्मणों के आवेदन को लेकर केरल सरकार से जवाब माँगा है। दरअसल, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने एक अधिसूचना जारी की थी। इसमें पात्रता के रूप में मलयाली ब्राह्मण होने की अनिवार्यता बताई थी। बोर्ड के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की खंडपीठ ने केरल राज्य (देवस्वम विभाग के माध्यम से), देवस्वम आयुक्त, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड को इस संबंध में नोटिस जारी किया है। इस मामले में अगली सुनवाई 25 अक्टूबर 2024 को होगी। केरल हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

दरअसल, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड द्वारा मेलशांति के लिए निकाली गई भर्ती के खिलाफ दो गैर-ब्राह्मण पुजारियों ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में गैर-ब्राह्मण पुजारियों ने तर्क दिया है कि प्रमुख पुजारी के चयन को मलयाली ब्राह्मण समुदाय के व्यक्तियों तक सीमित करना भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है।

केरल हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना अस्पृश्यता है। कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत अधिकार केवल पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार है। यह ऐसी सेवाएँ करने का अधिकार नहीं देता है, जिन्हें केवल अर्चक (पुजारी) ही करने के हकदार हैं।

केरल हाई कोर्ट ने कहा था, “जैसा कि श्री वेंकटरमण देवरु [एआईआर 1985 एससी 255] में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने माना है कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) द्वारा संरक्षित अधिकार पूजा के उद्देश्य से मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार है। इसका यह अर्थ नहीं है कि यह अधिकार पूर्ण और असीमित है।”

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने आगे कहा था, “अनुच्छेद 25(2)(बी) द्वारा संरक्षित अधिकारों के हिस्से के रूप में हिंदू जनता का कोई भी सदस्य यह दावा नहीं कर सकता है कि मंदिर को दिन-रात पूजा के लिए खुला रखा जाना चाहिए या उसे व्यक्तिगत रूप से वे सेवाएँ करने देना चाहिए, जो केवल अर्चक ही कर सकते हैं।”

कोर्ट ने कहा, “हमें डब्ल्यू.पी.(सी) संख्या 14136/2021 में याचिकाकर्ता के विद्वान वकील के इस तर्क में बिल्कुल भी दम नहीं लगता है कि देवस्वम आयुक्त द्वारा जारी अधिसूचना के खंड 1 में निर्धारित शर्त कि सबरीमाला देवस्वम और मलिकप्पुरम देवस्वम के मेलशांति के रूप में नियुक्ति के लिए आवेदक एक ‘मलयाली ब्राह्मण’ होगा।”

त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (सबरीमाला मंदिर को नियंत्रित करने वाला सरकारी निकाय) ने 27 मई 2021 को एक अधिसूचना जारी किया था। इसमें सबरीमाला धर्मस्थ मंदिर और मलिकप्पुरम मंदिर में शांतिकरन (पुजारी) के पद के लिए केवल मलयाली ब्राह्मण समुदाय के सदस्यों से आवेदन आमंत्रित किए थे।

इसके बाद जुलाई 2021 में हाई कोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की गई और कहा गया कि यह अधिसूचना सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 21 की अवहेलना है। याचिका में कहा गया कि मेलशांति पद पर नियुक्ति एक धर्मनिरपेक्ष कार्य माना गया है और इसे एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड केरल सरकार द्वारा नियंत्रित है और यह मंदिर बोर्ड द्वारा प्रशासित है। इसलिए यह संविधान का उल्लंघन है। इसमें आगे कहा गया है कि इस पद पर ब्राह्मणों के अन्य लोगों की नियुक्ति से संविधान के अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) और 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) का उल्लंघन नहीं होता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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