Monday, July 4, 2022
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काशी-मथुरा पाने की लड़ाई यह भी: SC में लड़ रहे अश्विनी उपाध्याय, कहा- वर्शिप एक्ट जैसा कानून बनाने का केंद्र को अधिकार ही नहीं

भाजपा नेता ने कहा कि संसद में कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बनाया जा सकता। संसद कानून बनाकर ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) में काशी विश्वेश्वर मंदिर (Kashi Visheshwar Temple) को तोड़कर उसके खंडहर पर बनाए गए ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure) की वीडियोग्राफी सर्वे में कई बातें स्पष्ट हो चुकी हैं। शिवलिंग और हिंदू प्रतीकों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि वहाँ मंदिर था। हालाँकि, मुस्लिम पक्ष पूजास्थल (विशेष प्रावधान)-1991 की आड़ लेकर मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव (Former PM Narsimha Rao) के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा साल 1991 में बनाए गए इस कानून को भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट वकील (BJP Leader & Supreme Court Advocate Ashwini Upadhyay) ने चुनौती दी है। उन्होंने इस कानून को असंवैधानिक बताया है।

एडवोकेट उपाध्याय का कहना है कि हिंदू लॉ कहता है कि जहाँ एक बार मंदिर बन गया है, वहाँ अगर एक-एक ईंट भी तक उखाड़ दी जाए तो वह मंदिर ही रहेगा, जब तक कि विग्रह का विसर्जन ना किया जाए। वहीं, इस्लामिक लॉ में कहा गया है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनेगी वह अपनी होनी चाहिए या किसी से खरीदा गया या दान (बिना भय, धमकी या लालच के) में प्राप्त होनी चाहिए। उसमें पहली ईंट भी मस्जिद के नाम की ही होनी चाहिए। किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल पर तो इसे बनाने का सवाल ही नहीं है।

केंद्र को ऐसा कानून बनाने का अधिकार नहीं

ऑपइंडिया से बात करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) कानून का बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है। यह कानून पब्लिक ऑर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने के नाम पर बनाया गया है, जबकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की होती है और यह राज्य सरकार का विषय है।

उन्होंने कि यह कानून धार्मिक स्थान की यथास्थिति बनाए रखने के नाम पर लाया गया है। भारत से बाहर के धार्मिक स्थल केंद्र सरकार का विषय है। जैसे पाकिस्तान स्थिति नानकाना साहिब, चीन स्थित कैलाश मानसरोवर, कंबोडिया स्थित मंदिर, हज आदि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भारत सरकार के पास है। भारत के अंदर स्थित तीर्थ स्थानों को लेकर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।

भाजपा नेता ने कहा कि संसद में कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बनाया जा सकता। संसद कानून बनाकर ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

याचिका में हिंदुओं के अधिकारों का हनन का मुद्दा

अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा गया है कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है, जो कि संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही यह कानून जो तिथि निश्चित करता है, वह हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित करता है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों को उनके पूजास्थलों पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोर्ट जाने से रोकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 और 49 का सीधा उल्लंघन है।

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है और पूजास्थल कानून इस मूल संरचना को ही खत्म करता है। यह कानून कहता है कि धार्मिक स्थलों को लेकर जो मुकदमा चल रहा है, वह खत्म हो जाएगा और आगे से कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा। यह संविधान के एक स्तंभ न्यायपालिका पर सीधा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विवाद का निपटारा कोर्ट के जरिए नहीं होगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और भीड़तंत्र हावी हो जाएगा।

अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा है। हमारे देवी-देवता ज्यूरिस्टिक पर्सन हैं। इनको भी वैधानिक अधिकार है। संपत्ति का अधिकार है। इस कानून के जरिए राम और कृष्ण के बीच भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि पूजास्थल कानून, 1991 कहता है कि अयोध्या का मामला इसके दायरे में नहीं आएगा, लेकिन यह मथुरा पर लागू होगा। इस तरह राम और कृष्ण के बीच में भेदभाव कर दिया गया।”

अपनी याचिका में दिए गए तथ्यों पर बात करते हुए उन्होंने बताया, “संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि हिंदू धर्म के मंदिर या मठ की जमीन देवता के नाम पर होती है। जो जमीन मंदिर के देवता के नाम पर एक बार चली गई, वह हमेशा देवता के नाम पर ही रहती है। उसे छीना नहीं जा सकता। उस संपत्ति को मैनेजमेंट कमिटी भले मैनेज करे, लेकिन उसका मालिकाना हक मैनेजमेंट कमिटी के पास नहीं होता। इसलिए मंदिर की जमीन को कोई पुजारी या महात्मा नहीं बेच सकता।”

अनुच्छेद 21 में दिए गए राइट टू जस्टिस (न्याय का अधिकार) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट जाना, वहाँ दलील देना और वहाँ से न्याय लेना इसके अंतर्गत आता है। पूजास्थल कानून कोर्ट का दरवाजा बंद कर दे रहा है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है।

पूजास्थल कानून को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख को भी अपने धर्म का पालन करना, उसका प्रचार-प्रसार करना, पूजा करना, रीति-रिवाज मानने आदि का अधिकार है। जब हमारे महादेव या कृष्ण या किसी देवता का स्थान ही कब्जे में होगा तो हम अपने अनुच्छेद 25 का पालन कैसे कर पाएँगे?”

इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक स्थानों के रख-रखाव का अधिकार देता है। उन्होंने पूछा कि जब मंदिर का मालिकाना हक ही हिंदुओं के पास नहीं है तो उसका रख-रखाव कैसे होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 26 का खुला उल्लंघन बताया।

भाजपा नेता उपाध्याय ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 29 में राइट टू कल्चर के तहत इस देश में हमें अपनी संस्कृति को बचाने व उसका संरक्षण करने का अधिकार है। कृष्ण जन्मभूमि दुनिया में एक ही है, मथुरा में। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का कोई स्थानापन्न (सब्सिट्यूट) नहीं है। कृष्ण का कोई दूसरा मंदिर, मथुरा का सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। इस तरह यह कानून हमें अपने कल्चर को फॉलो करने से रोक रहा है।”

उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 49 कहता है कि सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए, उनका रख-रखाव करे। काशी, मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला आदि सब सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये सब धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक विषय भी हैं।

मुस्लिम पक्ष जानता है कि कानून गलत है

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि उपरोक्त ग्राउंड पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पूजास्थल कानून, 1991 के खिलाफ PIL दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने इस PIL का अभी तक विरोध नहीं किया है। अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, “उन्हें पता है कि पूजास्थल कानून घटिया है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया। जबसे मैंने PIL दाखिल किया है, दो साल में ये लोग सुप्रीम कोर्ट आ गए होते। अगर कोई इसका विरोध नहीं किया तो इसका मतलब है कि मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों का कोई जवाब नहीं है।”

बता दें कि एडवोकेट उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है। इसको लेकर उपाध्याय का कहना है कि सरकार ने दो साल से इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है। इसका मतलब है कि ऊपर दिए गए जो तथ्य उठाए गए हैं, उसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए जवाब नहीं आया।

उन्होंने बताया कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को संसद में बिल द्वारा खत्म किया जा सकता है या सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी PIL यानी, इस विवादित कानून पर सुनवाई पूरे हुए ज्ञानवापी या मथुरा के ईदगाह मस्जिद को लेकर सुनवाई पूरी नहीं हो सकती।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
पत्रकार और इतिहास प्रेमी

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