Monday, March 8, 2021
Home देश-समाज आखिर इतने कश्मीरी देहरादून पहुँचे कैसे? जानिए क्या है सच

आखिर इतने कश्मीरी देहरादून पहुँचे कैसे? जानिए क्या है सच

किसी मास्टरमाइंड ने सुझाव दिया कि क्यों न कश्मीर के छात्रों को फ़ार्मा और इंजीनियरिंग की सीटों का प्रलोभन दिया जाए। साथ ही कश्मीरी छात्रों से फीस की मशक्कत भी इन्हें नहीं करनी थी। कश्मीरी छात्रों के लिए प्रावधान है कि यदि वे कोई प्रोफेशनल कोर्स करते हैं, तो उनकी फीस में सहायता केंद्र सरकार करती है।

पुलवामा में हुई आतंकी घटना के बाद प्रोपेगैंडा-परस्त मीडिया के प्रपंचों की वजह से जनता और मीडिया तंत्र का ध्यान देहरादून जैसे छोटे शहरों में कश्मीरी युवकों की मौजूदगी पर केंद्रित हो गया है। लोग सोचने लगे हैं कि देहरादून में इतने कश्मीरी छात्र कहाँ से आ गए? पहले तो ऐसा नहीं था। फिर अचानक कौन सी लहर आई? क्या है ये सारा मामला?

दरअसल एक दौर आया था वर्ष 2006 के आस-पास, जब इंजीनियरिंग और पैरामेडिकल की पढ़ाई अचानक से डिमांड में आ गई थी। उस समय देहरादून में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट कॉलेज खुले। क्वालिटी हो या नहीं, कॉलेजों में जमकर एडमिशन हुआ करते थे। सीटें फुल और कॉलेज के मालिकों की जेबें भी भरी रहा करती थीं। सब मजे में चल रहा था। फिर आया साल 2008 की मंदी का दौर। जनता को भी समझ आ गया कि भेड़-बकरियों की तरह डिग्री लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला।

प्राइवेट कॉलेज में आई इस मंदी के दौर में इंस्टीटूट्स में एडमिशन कम होने लगे। कल तक जिन कॉलेज मालिकों की जेबें ठसा-ठस भरा करती थीं, उन्हें एक-एक सीट पर एडमिशन के लाले पड़ने लगे। शिक्षकों को सेलरी तक देने के लिए बगलें झाँकनी पड़ रही थीं।

ऐसे में किसी मास्टरमाइंड ने सुझाव दिया कि क्यों न कश्मीर के छात्रों को फ़ार्मा और इंजीनियरिंग की सीटों का प्रलोभन दिया जाए। इसमें कॉलेज वालों के कई फायदे थे। सीटें तो भरनी ही थीं। साथ ही कश्मीरी छात्रों से फीस की मशक्कत भी इन्हें नहीं करनी थी। कश्मीरी छात्रों के लिए प्रावधान है कि यदि वे कोई प्रोफेशनल कोर्स करते हैं, तो उनकी फीस में सहायता केंद्र सरकार करती है।

बस, ये आइडिया चल निकला। शिक्षकों से कहा जाने लगा कि सेलरी चाहिए तो सीटों पर एडमिशन करवाओ। ‘एजेंट्स’ श्रीनगर भेजे जाने लगे। इंजीनियरिंग और फार्मा सेक्टर में बेहतरीन जॉब के सपने बेचे जाने लगे।

जो लड़के-लड़कियाँ कश्मीर में सेना पर पत्थर फेंका करते थे, उन्हें फ्री की डिग्री लेने में भला क्या हर्ज होता। छात्र चाहे आसमानी किताब पढ़ें या एनाटॉमी पढ़ें, कॉलेज प्रशासन को उससे फर्क पड़ने वाला नहीं था।

खैर, सीटें भरने लगीं। मास्टरों को तनख्वाह भी मिलने लगी। सख्त हिदायत जाने लगी थी कि सभी को पास करना है। किसी की ‘इयर बैक’ न लगे। कॉलेज कैम्पस के बागों में बहार घुल गई। कॉलेज के आस-पास के लोगों को बढ़े हुए रेट पर किरायेदार मिलने लगे।

कीमत क्या चुकानी पड़ेगी, किसी ने भी नहीं सोचा। आज देहरादून में यही छात्र देश-विरोधी नारे लगा रहे हैं। फार्मा कंपनियों को इन ‘गुड फ़ॉर नथिंग’ एम्प्लॉईज को ‘एन्टी-नेशनल’ नोटिस भेजना पड़ रहा है। कौन जानता है कि IMA जैसे संस्थानों पर भी ये शांतिदूत नजरें रखे हुए हों और आर्मी की गतिविधियों की सूचना कहीं भेजते हों। देहरादून में ही DRDO और आयुध निर्माण फ़ैक्ट्री भी हैं, जिन्हें बेहद संवेदनशील माना जाता है।

मुझे याद है कि मेरे एक मित्र ने नवोदय विद्यालय में पंजाब से माइग्रेशन से लौटने के बाद बताया था कि किस तरह साल 2002-03 के आस-पास पंजाब के नवोदय विद्यालय में माइग्रेशन पॉलिसी के तहत आए एक कश्मीरी छात्र ने बाथरूम में विस्फोटक रख दिया था। खतरा किस कदर है, इस एक उदाहरण से ही आप गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि हर कश्मीरी यही करता है, लेकिन ऐसे उदहारण मिलते हैं तो आम जनता का रवैया बदल ही जाता है।

अगर देहरादून में देश विरोधी तत्वों की कोई भी हरकत होती है, तो ऐसे छात्रों को एडमिशन देने वाले कॉलेज प्रशासन की भी जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही उन मकान-मालिकों पर भी गाज गिरनी चाहिए, जो बिना किसी वेरिफिकेशन के देश-विरोधी तत्वों को पनाह देते हैं।

पोस्ट को फर्जी सेकुलर मीडिया अन्यथा न ले, इसलिए कुछ बातों को स्पष्ट किया जाना अति आवश्यक है:

  • इस लेख का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति या स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया जाए। शिक्षा सबका अधिकार है। यहाँ सिर्फ नीयत पर सवाल उठाए हैं। सवाल उठाने के पीछे इन ‘विद्यार्थियों’ का इतिहास और दैनिक क्रियाकलाप ही जिम्मेदार भी हैं।
  • इस लेख में कॉलेज प्रशासन पर सवाल उठाए गए हैं। क्या उनकी नीयत शिक्षा देने की है? कॉलेज प्रशासन को सिर्फ फीस से मतलब होता है। ये पूछा जाना भी आवश्यक है कि क्या वे सही में क्वालिटी एजुकेशन दे रहे हैं।
  • सबसे मुख्य हिस्सा अब आता है। यदि आप शिक्षक हैं, और आपसे कहा जाए कि जो फेल भी हो रहा है, उसे किसी भी हाल में पास करो। कैसा लगेगा आपको? उन विद्यार्थियों को कैसा लगेगा जो मेहनत करते हैं और जिनके माता-पिता किसी तरह मुश्किल से फीस का जुगाड़ कर पाते हैं?
  • फिर से प्रश्न उठता है कि क्या देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ सेना की है? जब भी आपकी या हमारी जिम्मेदारी पर सवाल उठाए जाते हैं, तब हम बगलें झाँकने लगते हैं या फिर अतार्किक प्रश्न करने लगते हैं।
  • यहाँ पर सिर्फ सिचुएशन की समीक्षा की गई है। लेख यह नहीं कहता है कि कॉलेज किसी खास व्यक्ति या समुदाय को एडमिशन न दे या फिर कश्मीरियों को पढ़ने का अधिकार नहीं है।

देश में सबको बराबर अधिकार हैं, लेकिन देश के खिलाफ बोलने वाले अवांछित तत्वों को बाहर किया जाना भी जरूरी है।

देश की एकता और अखंडता को हानि पहुँचाने वाले मीडिया गिरोह और सूँघकर प्रोपेगैंडा बना लेने की क्षमता रखने वाले लोग बहुत ही बड़े स्तर पर अपनी विषैली मानसिकता के प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद देहरादून पुलिस ने ऐसे कुछ ‘विद्यार्थियों’ की धर-पकड़ शुरू की, जो भारतीय सैनिकों के बलिदान पर उत्सव मना रहे थे।

लेकिन JNU की फ्रीलॉन्स प्रोटेस्टर शहला राशिद ने अपने मीडिया गिरोह की घातक टुकड़ियों की मदद से अपने प्रोपेगैंडा को नया रंग दे दिया। मीडिया के इस समुदाय विशेष ने देहरादून जैसे छोटे शहर की हवा में भी जहर घोलने का काम किया और इस अफ़वाह को राष्ट्रीय खबर बना कर पेश किया कि देहरादून में कश्मीरी छात्रों पर जुर्म किए जा रहे हैं। अफ़वाह फैलाने और भीड़ को उकसाने को लेकर शहला रासिद के ख़िलाफ़ FIR भी दायर की गई। लेकिन वो वामपंथी ही क्या जिसकी पूँछ सीधी हो जाए!

पूरे देश मे देहरादून की छवि एक बेहद पढ़े-लिखे संपन्न और ‘हेट्रोजिनस कल्चर’ वाले शहर की रही है। भारत देश के सबसे शानदार शैक्षणिक संस्थानो के अलावा दूसरे बेहद महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान भी यहाँ पर मौजूद हैं। पूरे देश से पढ़ाई की खातिर लोग देहरादून जाते हैं, जिससे काफी हद तक यहाँ की अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलता है। देहरादून के निवासी का इन प्रोपेगैंडा-परस्त गिरोहों से सिर्फ एक निवेदन है कि वो इस शहर की बेदाग छवि को ख़राब करने की कोशिशों को रोक दें।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

नवीन नौटियाल
घुमक्कड़ी जिज्ञासा...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

सबसे आगे उत्तर प्रदेश: 20 लाख कोरोना वैक्सीन की डोज लगाने वाला पहला राज्य बना

उत्तर प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहाँ 20 लाख लोगों को कोरोना वैक्सीन का लाभ मिला है।

रेल इंजनों पर देश की महिला वीरांगनाओं के नाम: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय रेलवे ने दिया सम्मान

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इंदौर की रानी अहिल्याबाई और रामगढ़ की रानी अवंतीबाई इनमें प्रमुख हैं। ऐसे ही दक्षिण भारत में कित्तूर की रानी चिन्नम्मा, शिवगंगा की रानी वेलु नचियार को सम्मान दिया गया।

बुर्का बैन करने के लिए स्विट्जरलैंड तैयार, 51% से अधिक वोटरों का समर्थन: एमनेस्टी और इस्लामी संगठनों ने बताया खतरनाक

स्विट्जरलैंड में हुए रेफेरेंडम में 51% वोटरों ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और हिजाब पहनने पर प्रतिबंध के पक्ष में वोट दिया है।

BJP पैसे दे तो ले लो… वोट TMC के लिए करो: ‘अकेली महिला ममता बहन’ को मिला शरद पवार का साथ

“मैं आमना-सामना करने के लिए तैयार हूँ। अगर वे (भाजपा) वोट खरीदना चाहते हैं तो पैसे ले लो और वोट टीएमसी के लिए करो।”

‘सबसे बड़ा रक्षक’ नक्सल नेता का दोस्त गौरांग क्यों बना मिथुन? 1.2 करोड़ रुपए के लिए क्यों छोड़ा TMC का साथ?

तब मिथुन नक्सली थे। उनके एकलौते भाई की करंट लगने से मौत हो गई थी। फिर परिवार के पास उन्हें वापस लौटना पड़ा था। लेकिन खतरा था...

अनुराग-तापसी को ‘किसान आंदोलन’ की सजा: शिवसेना ने लिख कर किया दावा, बॉलीवुड और गंगाजल पर कसा तंज

संपादकीय में कहा गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए की जा रही है, क्योंकि उन लोगों ने ‘किसानों’ के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया है।

प्रचलित ख़बरें

मौलाना पर सवाल तो लगाया कुरान के अपमान का आरोप: मॉब लिंचिंग पर उतारू इस्लामी भीड़ का Video

पुलिस देखती रही और 'नारा-ए-तकबीर' और 'अल्लाहु अकबर' के नारे लगा रही भीड़ पीड़ित को बाहर खींच लाई।

14 साल के किशोर से 23 साल की महिला ने किया रेप, अदालत से कहा- मैं उसके बच्ची की माँ बनने वाली हूँ

अमेरिका में 14 साल के किशोर से रेप के आरोप में गिरफ्तार की गई ब्रिटनी ग्रे ने दावा किया है कि वह पीड़ित के बच्चे की माँ बनने वाली है।

आज मनसुख हिरेन, 12 साल पहले भरत बोर्गे: अंबानी के खिलाफ साजिश में संदिग्ध मौतों का ये कैसा संयोग!

मनसुख हिरेन की मौत के पीछे साजिश की आशंका जताई जा रही है। 2009 में ऐसे ही भरत बोर्गे की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी।

‘ठकबाजी गीता’: हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी ने FIR रद्द की, नहीं माना धार्मिक भावनाओं का अपमान

चीफ जस्टिस अकील कुरैशी ने कहा, "धारा 295 ए धर्म और धार्मिक विश्वासों के अपमान या अपमान की कोशिश के किसी और प्रत्येक कृत्य को दंडित नहीं करता है।"

‘मासूमियत और गरिमा के साथ Kiss करो’: महेश भट्ट ने अपनी बेटी को साइड ले जाकर समझाया – ‘इसे वल्गर मत समझो’

संजय दत्त के साथ किसिंग सीन को करने में पूजा भट्ट असहज थीं। तब निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी बेटी की सारी शंकाएँ दूर कीं।

‘40 साल के मोहम्मद इंतजार से नाबालिग हिंदू का हो रहा था निकाह’: दिल्ली पुलिस ने हिंदू संगठनों के आरोपों को नकारा

दिल्ली के अमन विहार में 'लव जिहाद' के आरोपों के बाद धारा-144 लागू कर दी गई है। भारी पुलिस बल की तैनाती है।
- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

292,301FansLike
81,966FollowersFollow
393,000SubscribersSubscribe