कॉन्ग्रेस में ‘G’ प्रथा को तोड़िए चिदंबरम जी, सबरीमाला-राम मंदिर आपसे न हो पाएगा

सबरीमाला मंदिर कोई प्रथा नहीं हैं बल्कि यह एक विश्वास है, ठीक उसी तरह जैसे हिंदू का विश्वास राम मंदिर में है, मुसलमान का विश्वास अल्लाह में है और ईसाईयों का विश्वास ईशु में।

लोकसभा चुनाव को अब ज्यादा समय नहीं बाक़ी बचा है। कुछ ही महीनों बाद यह तय हो जाएगा कि सत्ता की कुर्सी पर आने वाले पाँच सालों के लिए जनता किसे चुनेगी। चुनाव चाहे पंचायत का हो या फिर नगर निगम का, हवाओं में ऑक्सीजन से ज्यादा राजनीति अपने आप ही महसूस होने लगती है। और ऐसे में फिर, साल 2019 हो- लोकसभा के चुनाव हों- सत्ता में भाजपा की सरकार हो… तो सोचिए! विपक्षी पार्टियों में कितना हड़कंप होगा। हवा छोड़ दीजिए, खाने-पीने की चीजों तक पर राजनीति होगी। न सरकार के फैसलों को छोड़ा जाएगा और न देश की सेना को।

ऐसे ही थोड़ी बुआ-बबुआ ने सालों पुरानी दुश्मनी को भुलाकर अपने मेल को महागठबंधन का नाम दिया है… ‘राजनीति में कभी न आऊँगी’ कहने वाली प्रियंका ऐसे ही कॉन्ग्रेस की महासचिव थोड़ी बनी हैं… ज़हरीली शराब के मुद्दे पर ऐसे ही अखिलेश योगी सरकार को दोषी थोड़ी बता रहे हैं… ऐसी अनेकों अनेक बातें आपको सिर्फ़ यही बता रही हैं कि चुनाव नज़दीक है और अब कुर्सी की लड़ाई के लिए हर हथकंडा आज़माया जाएगा। अब इन हथकंडों में फिर चाहे राहुल को मशीन से आलू डालकर सोना ही क्यों न निकालना पड़ जाए, वो निकालेंगे और ऐसे करके एक बार फिर वो देश को सोने की चिड़िया जरूर बनाएँगे।

लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं लेकिन राजनैतिक दल अपने मेनिफ़ेस्टो पर फ़ोकस करने से ज्यादा बयानबाज़ी करने में व्यस्त हैं। यह बात देश का लगभग हर नागरिक जानता है कि राम जन्मभूमि और सबरीमाला दो ऐसे संवेदनशील मामले हैं जिनसे हिंदू लोगों की धार्मिक भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। एक तरफ जहाँ अयोध्या में भगवान राम को छत दिलाने के लिए लोगों की जद्दोजहद ज़ारी है तो वहीं सबरीमाला में भगवान अयप्पा द्वारा लिए मूल प्रण को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

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ऐसे में लोकतांत्रिक देश की सबसे ‘सेकुलर’ पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का इस मामले पर बयान है कि राम मंदिर विश्वास का मामला है जबकि सबरीमाला ‘प्रथा’ है। चिदंबरम का मानना है कि इन मामलों को एक दूसरे के साथ मिलाना नहीं चाहिए। चिदंबरम ने यह टिप्पणी अपनी किताब ‘अनडॉटेड: सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ किताब के विमोचन के दौरान कही है।

पूर्व वित्त मंत्री ने सबरीमाला और राम मंदिर पर पूछे सवालों का जवाब देते हुए कहा, “राम मंदिर प्रथा का मामला नहीं है, यह विश्वास का मामला है, जबकि सबरीमाला एक प्रथा है जो कि आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ है।”

चिदंबरम का कहना है कि बीते चार साल देश के लिए त्रासदी से कम नहीं है, हर ओर तानाशाही ही नजर आई है। साथ ही पिछले चार सालों में किसानों के साथ इतना बुरा बर्ताव हुआ है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती है। चिदंबरम ने पूरी बातचीत में अपनी पार्टी को स्पष्ट तौर पर सेकुलर पार्टी बताते हुए कहा कि भाजपा की छवि साफ़ तौर पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक विरोधी बनी है।

चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेता का ऐसा बयान वाकई किसी को भी सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या वाकई भाजपा के काल में यह सब चल रहा है। क्या वाकई सबरीमाला मात्र एक प्रथा है। ऑपइंडिया पर लिखे आर्टिकल में  स्पष्ट रूप से इस बात का वर्णन है कि सबरीमाला मंदिर कोई प्रथा नहीं हैं बल्कि यह एक विश्वास है, ठीक उसी तरह जैसे हिंदू का विश्वास राम मंदिर में है, मुसलमान का विश्वास अल्लाह में है और ईसाईयों का विश्वास ईशु में।

सबरीमाला में औरतों के प्रवेश पर जो निषेध है वो सिर्फ इसलिए क्योंकि उस मंदिर में विराजमान अयप्पा भगवान ने ब्रहमचर्य का प्रण लिया था, जिसके कारण उस मंदिर में तय उम्र की महिलाओं का जाना मना है। अब खुद सोचिए, अगर यह विश्वास नहीं है तो फिर क्या है… कल को अगर चिदंबरम राम मंदिर बनने पर ही कहने लगें कि राम तो मात्र एक कल्पना है ऐसे में उनके लिए इतना विवाद सिर्फ़ लोगों की अंधभक्ति को दिखाता है… तो क्या कर लिया जाएगा… शायद कुछ भी नहीं। क्योंकि जिन्हें भावनाओं को बिना जाने-समझे प्रथा का नाम देना है, वो कल को क्या कह दें, कुछ नहीं पता। ख़ास यह है कि ऐसे लोगों को फ़र्क़ भी कुछ नहीं पड़ता कि उनके कहने से कितने लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं। अपने अधिकारों पर लड़ने वाले ‘सेकुलर’ लोग भगवान की निजता के अधिकार को ‘प्रथा’ बताकर छीनने की कोशिश कर रहे हैं… कलयुग यही है।

मुझे लगता है कि माननीय पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को अर्थशास्त्र से जुडे़ मुद्दों पर ही सीमित रह जाना चाहिए। उन्हें गौर करना चाहिए कि राहुल की न्यूनतम आय की घोषणा पर उनके द्वारा लगाया अनुमान गलत कैसे हो सकता है, क्योंकि समाजिक मुद्दों पर दिए गए उनके बयान तो किसी भी रूप में संतोषजनक नहीं हैं, ऐसे में वो अर्थशास्त्र पर ही फोकस करें।

‘विश्वास और आस्था’ को ‘प्रथा’ का नाम देने वाले चिदंबरम जी को पहले इन शब्दों में फर्क समझने की अति आवश्यकता है। प्रथा वो है, जिसमें कॉन्ग्रेस पार्टी की विचारधारा लीन है। ‘परिवारवाद’ है प्रथा चिदंबरम जी… और अगर ये प्रथा नहीं है तो ‘राहुल गाँधी’ ही क्यों कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष हैं… आप बन जाइए! आँकड़ों पर तो आप ‘गल्त’ हो ही चुके हैं अब सामाजिक मुद्दों पर भी बोलने लगे हैं, हद है। और इतनी उम्मीद तो हमें आप से है ही कि आप आज़ादी से पहले अस्तित्व में आई कॉन्ग्रेस पार्टी की साख़ यह कहकर तो बिलकुल धूमिल नहीं करेंगे कि हम एक तरफ से आलू डालेंगे तो वो दूसरी तरफ से सोना आएगा… उसके लिए राहुल गाँधी ही ‘परफ़ेक्ट’ हैं क्योंकि ‘प्रथा-वश’ वो अध्यक्ष भी हैं आपके।

मैं बतौर देश की नागरिक आप राजनेताओं की राजनीति को लगातार समझने का प्रयास कर रहीं हूँ, थोड़ा आप भी हम नागरिकों की जरूरतों और भावनाओं को समझने का प्रयास कीजिए। वरना आप सिर्फ मौक़ापरस्त होकर बयानबाजी करते रहेंगे और अपने लिए मौके की माँग करते रह जाएँगे।

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