नई शोधनीति में ‘राष्ट्रहित’ की अनुशंसा पर ये बिलबिलाहट क्यों?

इतना हल्ला क्यों मचाया है भाई? क्योंकि बात यह है कि सर्कुलर में 'नेशनल इंट्रेस्ट' शब्द ही क्यों सम्मिलित किया गया है? ये कौन लोग हैं जो इस बात को झुठलाना चाहते हैं कि राष्ट्रहित का चिंतन किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में और वामपंथी व्यवस्था में भी जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार का परम कर्तव्य होता है।

किसी सभ्यता की सामाजिक न्याय व्यवस्था वह गुलदस्ता होती है जिसका प्रत्येक फूल उसी समाज में घटित दुर्घटनाओं, संस्मरणों, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक चेतना एवं उसके सतत प्रवाह का फल है। मानव चेतना और बुद्धि का स्वभाव होता है कि वह सत्य के पक्षधर हैं। यह प्राकृतिक है, क्योंकि न्याय प्रकृति का ही मूल गुण है।बुद्धिजीवी इसे “Nature balances its act” की क्रिया से निरूपित कर देते है। हमे ज्ञात है भिन्न-भिन्न चिकित्सा पद्धतियाँ – यूनानी, चीनी, आयुर्वेद, मिस्री – आदि वहाँ की सभ्यता एवं उसी आधार पर जन्मी चिंतन प्रक्रिया का ही प्रारूप है। इसी के आधार पर हम कह सकते हैं कि सभ्यताओं के विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यम व उपक्रम भी भिन्न होते हैं। भारतीय सभ्यता इसका एक मूल उदाहरण है, जहाँ यदि रोजमर्रा की घरेलू क्रियाओं पर ध्यान दें तो पता चलेगा की यहाँ क्रिया-कलापों और संज्ञाओं का सूक्ष्म वर्गीकरण उपस्थित है। जैसे भारतीय सभ्यता ही घी और मक्खन का अंतर करती है। यह एक बहुत सूक्ष्म परख है जो प्राचीन भारतीय जीवन के अन्य क्षेत्रों जैसे खेती, शिक्षा, चिकित्सा, राज्यव्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि में खोजी जा सकती है।

मक्खन से घी बन जाने की यात्रा जटिल है परन्तु घी की आवश्यकता इस सभ्यता को क्यों पडी? संसार की अन्य सभ्यताएँ भी मक्खन में संतुष्ट थी। घी भारतवासियों की परंपरा का अभिन्न अंग है। जन्म, भोजन, यज्ञ , चिकित्सा और अंतिम क्रियाएँ घी की आहुती से पूर्ण होती हैं, इसके वैज्ञानिक कारण हैं। पश्चिमी सभ्यता रुचिकर भारतीय परम्पराओं का अंगीकरण कर रही है। योग हो या शुद्ध शाकाहारी भोजन परंपरा, उनका सन्दर्भ भारतीय ही है फिर चाहे वे उसका वरण कैथोलिक छतरी में करते हों। विश्व की आवश्यकता ने उसे वैश्विक गाँव बनाया है और गाँव में आवश्यकता अनुसार सहायता और सहभागिता का चलन ही उसे स्थिर रख पाता है। अतः किसका सामान किसके पास है यह तो पता होना चाहिए अन्यथा विवाद होगा।

विद्वान इसी विवाद को ‘Clash of Civilizations’ की संज्ञा देते हैं। अब सभ्यताओं की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने सामान की सूची तैयार करें जो पूर्ण रूप से सत्यापित हो, प्रयोगिक हो और सर्वमान्य भी हो। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘Intellectual Property Rights‘ इसी विवाद को ध्यान में रखते हुए प्रतिपादित किए गए हैं। भारतीय सभ्यता ने एक सहस्त्राब्दी की लम्बी ग़ुलामी के दौर से वापसी की है। यह स्वाभाविक है कि अब उसे अपने अस्तित्व की कसौटी से गुजरना है, अपनी खोयी हुई गरिमा को पुनः स्थापित करना है। अब यह अति आवश्यक हो जाता है की स्वतंत्र भारत में हम अपनी स्वदेशी व्यवस्थाओं से कुरीतियों और अव्यवस्था को विस्थापित कर दें। यह तभी संभव है जब स्वदेशी व्यवस्थाओं पर पुनः शोध प्रारम्भ हो और उन्हें प्रयोग में लेकर सत्यापित तथा स्थापित किया जाए।

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गत वर्षों में भारत सरकार ने एक निर्णय किया था कि देश में यह मूल्यांकन किया जाए कि कितना सोना किस व्यक्ति के अधिकार में है, ज्ञात हो जाए और इसके बाद उसे चलन में लाया जाए। यह देश की आर्थिक उन्नति में लाभदायक सिद्ध हो सकता था, निहित भ्रष्टाचार पर चोट हो सकती थी परन्तु ‘Standard Reference Material’ के तौर पर उच्च गुणवत्ता का सोना ही उपलब्ध नहीं था जो की भारतीय मानकों पर आधारित हो और स्वदेशी भी हो। इतनी महीन समस्याओं के समाधान के लिए भी हमारे वैज्ञानिक संस्थान पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।

इसका कारण खोजने के लिए शोधार्थियों को कुछ नीचा देखना पड़ सकता है परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि हम आलसी या मंद बुद्धि हो गए हैं बल्कि हम कुछ दिशाहीन हैं। इस पथभ्रष्टता के पीछे विफल हो चुकी नीतियों का भारत जैसे विकासशील देश में लागू हो जाना है। जो हमे दिन प्रतिदिन अंधी दौड़ में लगा रही है जिसके अगुवा सफल और विकसित देश हैं। इन्ही विकसित देशों की विफल वैज्ञानिक, सामाजिक, नैतिक, न्यायिक, नीतियों  के आगे हम अपनी स्वदेशी व्यवस्थाओं को बौना कर रहे हैं।

हमे चाहिए कि हम अच्छे से अच्छे शोध के माध्यम से इन्ही स्वदेशी व्यवस्थाओं को उन्नत करें, नीतियाँ उन्नत करें। इस कार्य के लिए सरकारों की सुदृढ़ इच्छाशक्ति अति आवश्यक है जहाँ ये समझा जाए की स्वदेशी शोध का क्या महत्त्व है और उसकी क्या आवश्यकताएँ हैं। हमारी न्याय व्यवस्था भी इसी स्वदेशी शोध से उत्पन्न सन्दर्भों के आभाव में विदेशी सन्दर्भों पर भरोसा कर न्याय एवं सुझाव देती है। फिर चाहे वो न्याय भारतीय परम्पराओं को अस्वस्थ कर दे। यही मुख्य वजहों में से एक है कि भारतीयता, पाश्चात्य सभ्यता का लिबास ओढ़ रही है। सरकारों की कमज़ोर इच्छाशक्ति, शोध की दिशाहीनता, शोधार्थियों की पराधीन मानसिकता इस उन्नति में मुख्य रूप से बाधक हैं। इनमें से कुछ समस्याएँ हमारे परिवेश और वातावरण के कारण होती हैं जो अस्थायी और उपचार योग्य हैं।

एक वीभत्स और भयानक समस्या भी हैं जिसे ‘अज्ञात के भय‘ की संज्ञा दी जा सकती है।  यह समस्या शिक्षाविदों की ‘सामंतवादी मानसिकता की जड़ता’ के कारण है। जिसमें एक खास शिक्षण क्षेत्र के प्राध्यापक या शोधकर्ता स्वयं को उस क्षेत्र का क्षेत्रपाल समझने लगते हैं और किसी भी नवीनता का पुरजोर विरोध करते हैं। समयानुकूल परिवर्तन के प्रति जड़ रवैया रखते हैं। यह तबका सदैव व्यवस्थाओं और सरकारों के प्रति शिकायतपूर्ण, निंदात्मक रहा करता है। अपनी जन्मभूमि और पहचान पर शर्मिन्दा रहता है। अपनी पात्रता के औज़ार से रोज़ नई परिभाषाएँ गढ़कर सामाजिक एकता और देश की सम्प्रभुता को चुनौती देता है। निकट इतिहास में कॉन्ग्रेस सरकार में देश के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी को परमाणु समझौते पर इसी गिरोह ने झुकाया था।

भारत में रक्षा समझौता हो या कोई सामाजिक, आर्थिक, नीति यह गिरोह उसे समस्या बनाकर प्रस्तुत करने में महारथी है। यह परम्परा तब और आगे चली जाती है जब इसी गिरोह के हाथों नई पीढ़ी का चयन यथास्थिति बनाए रखने की दिशा में किया जाता है। नई नीतियाँ जो इस परंपरा के लिए मुफीद न हो, इस गिरोह को पीड़ा देती हैं। अतः इस मानसिकता से निजात पाने के लिए दृढ संकल्प, सकारात्मक इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत की आवश्यकता है।

अभी 25 मार्च 2019 को एक घटना सामने आयी जिसमें केरल विश्वविद्यालय के अंग्रेजी संस्थान की प्रोफेसर डॉ मीणा. टी. पिल्लई, जो कि अंग्रेजी और तुलनात्मक साहित्य अध्ययन बोर्ड की सदस्य भी हैं, ने अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। डॉ पिल्लई ने विश्वविद्यालय के द्वारा सभी विभागाध्यक्षों को जारी उस सर्कुलर के विरोध में पद त्याग दिया जिसमे लिखा था- “All the Heads of the Department are hereby directed to convene the meeting of faculties and to prepare a shelf of projects to be taken for research study pertaining to their subject considering national priorities. The student can opt from the shelf of projects.”

यह सर्कुलर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस सुझाव पर जारी हुआ जिसमें यह अनुशंसा की गयी की पीएचडी का रुझान उन शीर्षकों की ओर जाए जो राष्ट्रहित में हैं। अब यदि सरकार को समस्या समझ में आई है तो यह गिरोह समस्या बन रहा है। इसे राष्ट्र खतरे में लगने लगा है क्योंकि इनकी राष्ट्रीयता निर्धारण की स्वयंभू प्रभुसत्ता को चुनौती मिल रही है। इन क्षेत्रपालों का शासन क्षेत्र संकट में है।  क्या कारण है कि देश के अन्य संस्थानों जिनमें “Institute of Eminence” भी निहित हैं, ने इस अनुशंसा पर हो रही शुरूआती राजनीति पर अब तक कोई अपेक्षित स्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं दी? अगर यह एक गलत मंशा है तो? जबकि इन्हीं संस्थानों के प्रोफेसर वैश्विक पटल पर एक पहचान रखते हैं।

इस खास तरह के गिरोह के शोध कार्य का तुलनात्मक अध्ययन मानकों के आधार पर जैसे “एच इंडेक्स”, “साइटेशन”, “Peer Reviewed Journals”  किया जाए तो पता चलेगा कि सभी प्रकाशित पत्रों में कितने राष्ट्रहित में है, कितने साधनवाही हैं या सिर्फ ऐसी समस्याओं का प्रतिपादन है जो इस समाज के बीच वैमनस्य और भेद को जन्म दे रही है। उपरोक्त मानकों की बात तो दूर की कौड़ी है। इतना हल्ला क्यों मचाया है भाई? क्योंकि बात यह है कि सर्कुलर में ‘नेशनल इंट्रेस्ट’ शब्द ही क्यों सम्मिलित किया गया है? इस गिरोह की मनोदशा क्या है? ये कौन लोग हैं जो इस बात को झुठलाना चाहते हैं कि राष्ट्रहित का चिंतन किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में और वामपंथी व्यवस्था में भी जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार का परम कर्तव्य होता है।

जिन्हें “राष्ट्रहित” शब्द से ही परहेज़ हो उनके विषय में क्या समझा जाना चाहिए? यहाँ अंग्रेजी के “बोर्ड ऑफ़ स्टडीज” के मेंबर के रूप में इनकी उपयुक्तता बनती थी? यह पाठक स्वयं निर्धारित करें। ये भी साफ़ है कि डॉ पिल्लई ने नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं दिया। ये वैसा ही है जहाँ “अवार्ड वापसी गिरोह” पुरस्कार की राशि डकार कर मोमेंटो ही वापस करता है और दबाव बनाता है। यह उनकी अपनी निजी स्वतंत्रता भी हो सकती है कि वो ऐसा कर रही हैं परन्तु विषय गंभीर हो जाता है जब शशि थरूर और राहुल गाँधी जैसे राजनेता इसका समर्थन कर रहे हैं, ट्वीट और रीट्वीट कर रहे हैं।

पूर्व में ही गढ़ी जा चुकी इस राजनैतिक पृष्ठभूमि में डॉ पिल्लई केवल बलि का बकरा ही साबित होने वाली हैं। या यूँ कहा जा सकता हैं ऐसा उन्होंने स्वयं के लिए चुना हैं। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बौने लोग रातों रात कीर्तिमान बनाकर प्रस्तुत होते हैं। इनके बौनेपन की ये प्रमाणिकता होती है की ये नतीज़न कुछ न कर पाने में पारंगत हैं। वो एक हिंदी की कहावत है – वही ढाक के तीन पात, न चौथा लगे, न पाँचवे की आस। निकट भविष्य में भारतीय शिक्षाविद जगत में षड्यंत्रजनित भारी भूचाल का अंदेशा है। इस गिरोह का सर्वोत्तम गुण है कि जो नीति देश हित में हो ये उसके खिलाफ जान की बाज़ी लगाता है।  इसकी शिनाख्त आवश्यक है अतः देश का शोधार्थी अपने कर्त्तव्य और राष्ट्रिय चरित्र का वहन करे

लवी त्यागी
रिसर्च स्कॉलर
DST INSPIRE (फेलो)

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