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क्रिसमस के विरोध पर कहा- ‘शर्म करें हिंदू’, लाल किला ब्लास्ट वाले आतंकी उमर पर सवाल को बताया ‘Funny’: आरफा खानम ने बताया कितना दोगला है उनका इकोसिस्टम

भारत के लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम का सबसे असरदार हथियार न तो सिर्फ आँकड़ों से खेलना है, न ही चुनिंदा मुद्दों पर गुस्सा दिखाना। उनका असली हथियार है ‘बौद्धिक बेईमानी’ है, जिसे नैतिक श्रेष्ठता का जामा पहनाकर पेश किया जाता है।

यह एक सोची-समझी रणनीति है, जिसमें समर्थकों को गुमराह किया जाता है, मनचाहे नैरेटिव को साफ-सुथरा बनाकर फैलाया जाता है और असहज सच्चाइयों को दबा दिया जाता है। यह सब करते हुए ये लोग खुद को ‘संवैधानिक मूल्यों’ और ‘मानवाधिकारों’ का सबसे बड़ा रक्षक बताने लगते हैं।

असल में इस बौद्धिक बेईमानी का एक मकसद होता है- इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़ी आपराधिक घटनाओं को हल्की और साफ दिखाना। हिंसा को सीधे अपराध मानने के बजाए उसे परिस्थिति, नाराजगी या गलतफहमी बताकर पेश किया जाता है।

हाल ही में पद्मजा जोशी के The Buck Stops Here के एपिसोड में इसका साफ उदाहरण देखने को मिला। जब ‘द वायर‘ से जुड़ी ‘पत्रकार’ आरफा खानम शेरवानी से ऐसा सवाल पूछा गया, जिसने लेफ्ट-लिबरल नैरेटिव की मामूली सोच को चुनौती दी, तो यह पूरी मानसिकता उजागर हो गई।

बहस तो सिर्फ एक मंच थी। असली मुद्दा यह था कि कैसे तथाकथित लिबरल लोग अपराधी की पहचान और राजनीतिक मुद्दे और राजनीतिक फायदे के हिसाब से नैतिकता के पैमाने बदलते हैं और उसी आधार पर जनता की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने की कुछ घटनाओं को यह कहकर पेश किया गया कि ‘मोदी के भारत में ईसाइयों पर हमला’ हो रहा है। यह तरीका भारत के खुद को नैतिकता का ठेकेदार मानने वालों के लिए नया नहीं है।

कुछ गुमनाम और हाशिये के लोगों की हरकतों को जानबूझकर किसी विचारधारा से जुड़ा हुआ बताया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर आरोप लगाने का आधार बना दिया जाता है। इसके बाद पूरे हिंदू समाज को सामूहिक नैतिक दोषी ठहराने की कोशिश होती है और फिर वही जाने पहचाने चेहरे आगे आकर घोषणा कर देते हैं कि देश में धर्मनिरपेक्षता खत्म हो चुकी है।

राजनीति करने के लिए नैतिकता का चयनित पाठ

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम एक सख्त दोहरे खाँचे पर चलता है, जहाँ हिंदुओं को हमेशा ताकतवर जालिम दिखाया जाता है और मुस्लिमों को हर हाल में पीड़ित। किसी भी छोटी से बड़ी घटना को इसी नजरिए से देखा जाता है। यहाँ तथ्य पीछे रह जाते हैं और विचारधारा सबसे ऊपर होती है।

इसी वजह से क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाएँ तुरंत ‘बहुसंख्यक फासीवाद’ और यहाँ तक कि ‘नरसंहार’ का सबूत बना दी जाती हैं। न जाँच का इंतजार किया जाता है, न ही संतुलन रखा जाता है। सीधे पूरे हिंदू समाज को सामूहिक रूप से दोषी ठहरा दिया जाता है, जैसे यह कोई तय नैतिक सोच हो।

लेकिन जब बात इस्लामी आतंकवाद की आती है। खासकर जब उसमें पढ़े-लिखें पेशेवर लोग और साफ वैचारिक सोच शामिल हो, तो यही इकोसिस्टम अचानक बारीकियाँ, कानूनी सावधानी और प्रक्रियागत संयम की दुहाई देने लगता है।

यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं है। यह पूरी तरह जानबूझकर किया जाता है। यही बात तब सामने आई, जब आरफा से साफ और सीधे शब्दों में यह सवाल पूछा गया कि क्या वह हालिया नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए हमले में शामिल पढ़े-लिखे मुस्लिम पेशेवरों की भूमिका निंदा करेंगी या नहीं।

लाल किला के पास हुए आंतकी हमले को लेकर सवाल आरफा को लगा ‘मजेदार’

वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुबुही खान ने एक ऐसा सवाल पूछकर इस पाखंड को उजागर कर दिया, जिसने लेफ्ट-लिबरल सोच की असलियत सामने रख दी। दिल्ली के लाल किला के पास हुए आतंकी हमले में मुस्लिम डॉक्टरों की भूमिका का जिक्र करते हुए सुबुही खान ने पूछा कि क्या आरफा खानम को इस जिहादी हिंसा के लिए भी शर्मिंदगी महसूस होती है, जैसे कि उन्हें हिंदुओं से क्रिसमस की सजावट तोड़े जाने वाली घटनाओं पर हो रही है।

अपने तीखे सवाल में सुबुही खान ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक पढ़े-लिखे डॉक्टर ने फिदायीन (आत्मघाती) हमला किया और उसे ‘शहादत’ बताया गया। इसके बाद उन्होंने आरफा से सीधा और बेहद असरदार सवाल पूछा- क्या एक भारतीय मुस्लिम होने के नाते इस आंतकी घटना पर उनका भी सिर शर्म से झुकता है, जैसे वह बहुसंख्यक समाज से उम्मीद करती हैं कि वे क्रिसमस की सजावट तोड़ने जाने वाली घटनाओं पर शर्म महसूस करें?

इस सवाल पर आरफा खान ने न तो निंदनीय, न ही आत्ममंथन की प्रतिक्रिया दी। बल्कि उन्होंने सवाल को ही खारिज कर दिया। आरफा ‘यह बहुत मजेदार सवाल है’ कहकर मुस्कुराने लगीं और यही बात उन्होंने कई बार दोहराई।

यह कोई जबान फिसलने वाली प्रतिक्रिया नहीं थी। यह विचारों की ट्रेनिंग का खुला प्रदर्शन था।

लेफ्ट-लिबरल सोच के लिए इस्लामी आतंकवाद कोई नैतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक असुविधा है। यह पीड़ित होने की बनाई गई कहानी को बिगाड़ देता है और समर्थकों को सुनाए जा रहे नैरेटिव में उलझन पैदा करता है। इसीलिए इसे या तो छोटा दिखाया जाता है या कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा दिया जाता है, या फिर मजाक बनाकर टाल दिया जाता है।

कुछ मामले विचाराधीन, कुछ में संक्षिप्त निर्णय

जब दबाव बढ़ा, तो आरफा खान ने वही जाना-पहचाना बहाना पकड़ते हुए कहा, “मामला अभी जाँच में हैं।” कानून और प्रक्रिया यह अचानक दिखने वाला सम्मान तब अच्छा लगता, अगर यह चुनिंदा न होता।

जब किसी हिंदू कार्यकर्ता पर आरोप लगते हैं, तो यही लोग तुरंत नैतिक फैसला सुना देते हैं। तब न अदालत मायने रखती है, न जाँच की जरूरत समझी जाती है। अपराध पहले मान लिया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर थोप दिया जाता है। लेकिन जैसे ही बातचीत में जिहाद आता है, तब नैतिक फैसला अनिश्चित समय के लिए टाल दिया जाता है। यह कानून की सावधानी नहीं है। यह नैरेटिव को संभालने की कोशिश है।

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम हिंसा का विरोध नहीं करता, वह उसे वर्गों में बाँट देता है। गलत पक्ष की हिंसा को विचारधारा से जोड़ा जाता है, जबकि सही पक्ष की हिंसा को परिस्थिति, गलती या मजाक बताकर हल्का कर दिया जाता है।

बांग्लादेश पर उतर गया मुखौटा

अगर आरफा खान की बांग्लादेश पर की गई टिप्पणियों को देखा जाए, तो यहाँ उनकी बौद्धिक बेईमानी और भद्दी हो जाती है। जब इस्लामी भीड़ ने शेख हसीना को सत्ता से हटाया, तो शेरवानी ने इस उथल पुथल को ‘लोकतांत्रिक बदलाव’ बताकर सराहा।

इसके बाद जो हुआ, वह बिल्कुल अनुमान के मुताबिक था- हिंदुओं के घर जलाए गए, मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया और इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं की हत्या की। सबसे डरावना मामला हाल ही में सामने आया, जब दीपू चंद्र दास को कथित ईशनिंदा के आरोप में इस्लामी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।

इसके बावजूद अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले रक्षक पूरी तरह चुप रहे। न कोई गुस्सा दिखा, न कोई अंतरराष्ट्रीय अभियान चला, न ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े भाषण दिए गए। क्योंकि इस मानसिकता में हिंदू पीडित माने ही नहीं जाते। उनका दर्द तय की गई कहानी में फिट नहीं बैठता, इसीलिए उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, जैसा कुछ हुआ ही न हो।

देश को गुमराह और जनमत को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश

इसी तरह लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम खुद को जिंदा रखता है और अपने समर्थकों के साथ-साथ आम जनता को गुमराह करता है। यह काम सिर्फ खुली झूठी बातों से नहीं होता, बल्कि लोगों की नैतिक सोच को धीरे-धीरे खास दिशा में ढालकर किया जाता है।

नैतिकता अब कर्म या उसके नतीजों पर नहीं टिकी रहती, बल्कि पहचान के आधार पर तय की जाती है। हिंसा की निंदा या उसका बचाव उसकी क्रूरता के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात पर होता है कि उसे करने वाला कौन है। अपराध खुद दूसरी प्राथमकिता हो जाता है, अपराधी की राजनीतिक पहचान सबसे अहम बन जाती है।

सामूहिक दोष भी चुनिंदा तौर पर थोपा जाता है। कुछ गिने-चुने लोगों की हरकतों के लिए पूरे हिंदू समाज से शर्म महसूस करने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब इस्लामी हिंसा की बात आती है, तो सामूहिक आत्ममंथन की माँग को सख्ती से खारिज कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं, जो लोग सवाल उठाते हैं, उन्हें ‘इस्लामाफोबिया’, ‘धार्मिक नफरत बढ़ाने’ जैसे आरोप लगाकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि उन्होंने आतंकवादियों पर सवाल उठाए, जिन्होंने धर्म का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए की। जो लोग हर समय ‘समाज की जिम्मेदारी’ पर उपदेश देते हैं, वही लोग जैसे ही जवाबदेही अपनी पसंदीदा जमात तक पहुँचती है तो अचानक व्यक्तिगत सोच की आड़ ले लेते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं।

जब उग्रवाद असुविधाजनक हो जाता है, तो उसे कानूनी बहानों के पीछे छिपा दिया जाता है। ‘मामला अदालत में है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि नैतिक बहस को चुप कराने, निंदा को अनिश्चित समय तक टालने और जनता का ध्यान भटकाकर खत्म करने के लिए किया जाता है। यहाँ कानूनी प्रक्रिया न्याय का साधन नहीं, टालने का तरीका बन जाती है।

असहज सवालों के जवाब नहीं दिए जाते हैं, उनका मजाक उड़ाया जाता है। जिहाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद से जुड़ी जायज चिंताओं को ‘मजाकिया’ बताकर अपने समर्थकों को खतरों का सामना करने के बजाए उन्हें हँसी में उड़ाने की आदत डालता है। यह मजाक कोई संयोग नहीं है, यह एक सोची-समझी ट्रेनिंग है। इससे यह संकेत दिया जाता है कि किन सवालों की इजाजत है और किन पर चुप रहना जरूरी है।

सबसे अहम बात यह है कि यहाँ संवेदना को भी हथियार बना दिया जाता है। पीड़ित होने का दर्जा सोच-समझकर बाँटा जाता है, सिर्फ वहीं जहाँ उससे वैचारिक फायदा हो। जो पीड़ा तय कहानी को मजबूत करती है, उसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाता है।

लेकिन जो दर्द उस कहानी को बिगाड़ देता है, उसे या तो छोटा दिखाया जाता है या संदर्भों में उलझा दिया जाता है या पूरी तरह मिटा दिया जाता है। इस सोच में करुणा इंसानी नहीं, बल्कि लेन-देन का सौदा बन जाती है।

चुनिंदा आक्रोश से उजागर होता पैटर्न

यह चुनिंदा नैतिकता का पाठ कोई अलग-अलग मौके की बात नहीं है, बल्कि लगातार दिखाई देता है और आरफा खानम शेरवानी का रिकॉर्ड भी इसे साफ दर्शाता है। जहाँ वह ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे नारे को मजहब का शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति बताकर जोर-शोर से बचाती हैं, वहीं ‘आई लव महादेव’ कहने के कारण हिंदुओं पर हुए हिंसक हमलों पर वह खामोश रही हैं।

सितंबर 2025 में गुजरात के गाँधीनगर जिले के बहियाल गाँव में एक हिंदू युवक के सोशल मीडिया पोस्ट ने भयंकर और एकतरफा सांप्रदायिक हिंसा भड़काई, जिसमें उसने भगवान शिव के प्रति भक्ति जताई थी। उसकी दुकान को तोड़कर आग लगा दी गई। हिंदुओं की गाड़ियों में आगजनी, गरबा समारोह पर हमला किया गया। पुलिसकर्मी भी मारे गए और लगभग 80 घरों वाले हिंदू मोहल्ले में हजारों की भीड़ ने उत्पात मचाया।

सीसीटीवी फुटेज में मुस्लिम भीड़ पत्थर फेंकते, लाठियाँ चलाते और हिंदू संपत्ति को चुन-चुनकर तोड़ते दिखी, जबकि गवाहों के वीडियों में एक हिंदू माँ अपने लापता बेटे के लिए दहशत में रोती भी दिखाई दी।

इतना सब होने के बावजूद शरेवानी की तरफ से कोई गुस्सा या नारजगी नहीं दिखाई दी। न अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई उपदेश, न संविधानिक मूल्यों पर कोई लेक्चर। उनकी खामोशी जोरदार थी।

यह चुप्पी और भी ज्यादा सप्ष्ट हो जाती है, जब इसकी तुलना उनके इस्लामी नारे बचाने के रुख से की जाए। ये नारे अक्सर दंगों, आगजनी, पत्थरबाजी, पुलिस पर हमलों और ‘सर तन से जुदा’ जैसी खुली धमकियों के साथ जुड़े रहे हैं।

शेरवानी लगातार कहती हैं कि ये नारे केवल धर्म की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन उन्होंने कभी सवाल नहीं उठाया कि ये नारे इतनी बार हिंसा के साथ क्यों जुड़े होते हैं या धर्म के नाम पर ‘युद्ध’ जैसी पोस्टर की भाषा क्यों PFI जैसे समूहों की पुराने बाते दोहराती हैं, जिन्होंने खुले तौर पर हिंदुओं के नाश की कल्पना की थी।

हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने से लेकर लव जिहाद जैसे दर्ज मामलों को नजरअंदाज करना और जबरन इस्लामी धर्मांतरण के अपराधियों की सुरक्षा करने वाली खबरों बचाव करना। यही है आरफा खान शेरवानी की पत्रकारिता।

इन घटनाओं को मिलाकर देखा जाए तो एक साफ पैटर्न सामने आता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यह सोच बताती है कि हिंदू अभिव्यक्ति को हमेशा उकसावे के रूप में देखा जाता है, जबकि इस्लामी हिंसा को परिस्थिति के अनुसार और जवाबदेही को इच्छानुसार माना जाता है। वो भी बस तब तक जब तक यह पसंदीदा कहानी को चुनौती न दे।

बौद्धिक बेईमानी कोई कमजोरी नहीं, इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम की नींव

टीवी की बहस में जो हुआ, वह शब्दों की कमी नहीं थी। बल्कि ईमानदारी की कमी थी। आतंक पर पूछे गए सवाल पर हँसी कोई घमंड नहीं था, बल्कि असलियत का खुलासा था।

आज भारत में लेफ्ट-लिबरल सोच समान सिद्धांतों पर नहीं चलती है। यह छूट और अपवादों पर चलती है। इसका मकसद न्याय नहीं, बल्कि नैरेटिव पर कब्जा करना है और बौद्धिक बेईमानी इस सिस्टम की कोई खामी नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है।

जब नैतिकता शर्तों पर तय होने लगे, तो भरोसा टूट जाता है। जब आतंक को हल्का बताया जाए, तो पत्रकारिता मर जाती है। और जब समर्थकों को बार-बार गुमराह किया जाए, तो एक दिन विश्वास भी खत्म हो जाता है।

यह नकाब किसी गलती से नहीं उतरा है। यह इसीलिए उतरा क्योंकि सच में यह ताकत होती है कि वह खुद को सामने ले आए, चाहे यह इकोसिस्टम उसे पसंद करे या नहीं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

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