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क्या सरकार सच में CJP प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ले सकती है? जानिए कानून क्या कहता है

कानून के शासन से चलने वाले एक कामकाज करने वाले लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि जो लोग कानून तोड़ते हैं, चाहे वे प्रदर्शनकारी हों या आम नागरिक, उन्हें अपने कामों का नतीजा भुगतना पड़े।

NEET पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का हालिया प्रदर्शन तब खत्म हुआ, जब केंद्र सरकार ने उनकी सभी माँगें मानने का आश्वासन दिया। इन माँगों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग भी शामिल थी। प्रदर्शन ने सोमवार (20 जुलाई 2026) को गंभीर रूप ले लिया, जब CJP ने संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत के दौरान जंतर-मंतर से आगे बढ़कर संसद तक मार्च करने का फैसला किया। यह मार्च एक उच्च सुरक्षा क्षेत्र से होकर निकाला जा रहा था। उल्लेखनीय है कि प्रदर्शन की अनुमति केवल जंतर-मंतर तक ही दी गई थी, उससे आगे जाने की नहीं।

प्रदर्शनकारी 20 जुलाई तक जंतर-मंतर पर डटे रहे। इसी दिन संसद की ओर बिना अनुमति निकाले गए मार्च के दौरान पथराव और सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प की घटनाएँ हुईं। इसके बावजूद CJP अपनी माँगों पर अड़े रहे, जबकि ‘प्रदर्शनकारियों’ के हंगामे के चलते राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई।

क्या CJP और उसके ‘प्रदर्शनकारी’ कानून से ऊपर हैं?

CJP नेताओं की प्रमुख माँगों में एक यह भी थी कि सरकार प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करे। इसमें वे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, हंगामा किया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का काम किया।

स्पष्ट रूप से यह माँग उन लोगों को कानूनी कार्रवाई से बचाने की कोशिश थी, जिन्होंने हिंसा के जरिए सरकार पर दबाव बनाने में भूमिका निभाई। इस दौरान हालात ऐसे बने कि सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करना पड़ा। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से जंतर-मंतर और उसके आसपास मौजूद लोगों की जाँच में यह भी सामने आया कि भीड़ में शामिल कई लोगों के खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज थे।

हैरानी की बात यह रही कि केंद्र सरकार ने इस माँग को भी स्वीकार कर लिया। सरकार के इस फैसले ने कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या सरकार पर दबाव बनाकर असामाजिक तत्व अपनी माँगें मनवा सकते हैं? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और हिंसा करने के आरोपितों को बिना कानूनी कार्ऱवाई के छोड़ दिया जा सकता है? कानूनी नजरिए से देखें तो क्या सरकार उन मामलों की जाँच और कानूनी प्रक्रिया को रोक सकती है, जिनमें कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी है? क्या सरकार के पास दर्ज FIR वापस लेने का अधिकार है, खासकर उन लोगों के खिलाफ जिन पर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप हैं? आइए, इन सवालों के जवाब कानून के प्रावधानों के आधार पर समझते हैं।

अपराध केवल व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि राज्य के खिलाफ भी माना जाता है

आपराधिक कानून में किसी अपराध को केवल एक व्यक्ति के खिलाफ किया गया गलत काम नहीं माना जाता, बल्कि इस पूरे समाज और राज्य के खिलाफ अपराध माना जाता है। यही कारण है कि जब कोई अपराध होता है, तो आरोपित के खिलाफ मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी राज्य की होती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। इसी सिद्धांत के तहत एक नियम यह भी है कि एक बार कानूनी प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो उसे अदालत की अनुमति के बिना बीच में नहीं रोका जा सकता।

किसी अपराध के संबंध में FIR दर्ज होना भी कानूनी प्रक्रिया शुरू होने का एक महत्वपूर्ण चरण है। एक बार FIR दर्ज हो जाने के बाद उसे सरकार अपने स्तर पर न तो रद्द कर सकती है और न ही वापस ले सकती है। इसके लिए अदालत की मंजूरी जरूरी होती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी प्रभावशाली या ताकतवर आरोपित के दबाव में पीड़ित कानूनी कार्रवाई से पीछे हटने के लिए मजबूर न हो।

मौजूदा मामले में भी, भले ही सरकार ने हिंसा के आरोपों का सामना कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेने का आश्वासन दिया हो, लेकिन वह ऐसा सीधे तौर पर नहीं कर सकती। हालाँकि, कानून में कुछ ऐसे प्रावधान जरूर हैं जिनके तहत FIR वापस लेने या आपराधिक कार्यवाही रोकने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। आइए, इन कानूनी प्रावधानों को समझते हैं।

अदालत के बाहर समझौते का प्रावधान

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ( BNSS), 2023 में कुछ आपराधिक मामलों को अदालत के बाहर आपसी समझौते से निपटाने का प्रावधान है। हालाँकि, यह सुविधा केवल कुछ चुनिंदा और अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराधों के लिए ही उपलब्ध है। ऐसे अपराधों को कंपाउंडेबल (समझौतायोग्य) अपराध कहा जाता है।

BNS की धारा 359 में कंपाउंडेबल अपराध की सूची और उनसे जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। साधारण मारपीट, धोखाधड़ी, घर में अनधिकृत प्रवेश, गलत तरीके से रास्ता रोकने के कुछ मामले और चोरी जैसे अपराध इस श्रेणी में आते हैं। वहीं, हत्या, दुष्कर्म, दंगा और डकैती जैसे गंभीर अपराध कंपाउंडेबल नहीं होते। इनमें से कुछ मामलों में पक्षकार बिना अदालत की अनुमति के समझौता कर सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में अदालत की मंजूरी जरूरी नहीं होती है।

CJP के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के मामलों में सरकार इस कानूनी प्रावधान का सहारा नहीं ले सकती। इसकी वजह यह है कि सुरक्षाकर्मियों पर हमला, पथराव, पुलिस वाहनों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसे आरोप कंपाउंडेबल अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए ऐसे मामलों का निपटारा अदालत के बाहर समझौते के जरिए नहीं किया जा सकता।

FIR रद्द या वापस लेने की बात

अच्छी बात यह है कि एक बार FIR दर्ज हो जाने के बाद सरकार या कार्यपालिका (Executive) उसे अपनी मर्जी से वापस नहीं ले सकती। जैसे ही FIR दर्ज होती है, मामला अदालत के अधिकार में चला जाता है। इसके बाद सरकार पुलिस स्टेशन को यह आदेश नहीं दे सकती कि FIR वापस ले ली जाए या संबंधित अदालत/मजिस्ट्रेट से यह नहीं कह सकती कि उस FIR पर आगे कार्रवाई न की जाए। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि पीड़ित व्यक्ति और कमजोर पक्ष पर किसी ताकतवर व्यक्ति या दबाव का असर न पड़े।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब कानून सरकार को FIR वापस लेने का अधिकार ही नहीं देता, तो फिर सरकार यह वादा कैसे कर सकती है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस ले ली जाएँगी?

दरअसल, इसका एक दूसरा कानूनी रास्ता होता है। पुलिस अपनी जाँच पूरी करने के बाद अगर उसे लगता है कि मामला आगे चलाने लायक नहीं है, तो वह अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। इसके बाद अदालत उस रिपोर्ट पर फैसला करती है। इसी प्रक्रिया के जरिए आरोपित को राहत मिल सकती है, जैसे उसे बरी किया जा सकता है, आरोपों से मुक्त किया जा सकता है या मामला बंद किया जा सकता है।

क्लोजर रिपोर्ट

पुलिस अपनी जाँच पूरी होने के बाद BNSS की धारा 193 के तहत अदालत में क्लोजर रिपोर्ट या फाइनल रिपोर्ट दाखिल करती है। यह रिपोर्ट तब दाखिल की जाती है, जब पुलिस को पहली नजर में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता जिससे यह साबित हो कि FIR में बताए गए अपराध को अंजाम दिया गया है। या फिर पुलिस आरोपित तक नहीं पहुँच पाती, या जाँच में पता चलता है कि शिकायत झूठी थी।

लेकिन सिर्फ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देने से मामला अपने आप बंद नहीं हो जाता। अंतिम फैसला अदालत का होता है। अदालत यह देखती है कि पुलिस की जाँच सही और पूरी है या नहीं।

अगर अदालत पुलिस की जाँच से संतुष्ट हो जाती है, तो वह क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर सकती है और मामला बंद कर सकती है। ऐसी स्थिति में FIR रिकॉर्ड में बनी रहती है, लेकिन उस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं होती और केस बंद हो जाता है। वहीं, अगर अदालत को लगता है कि जाँच पूरी नहीं हुई है या पुलिस के निष्कर्ष सही नहीं है, तो वह मामले में दोबारा या आगे की जाँच कराने का आदेश दे सकती है।

मौजूदा मामले में सरकार के इशारे पर पुलिस हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि पूरे देश ने इन प्रदर्शनों को हिंसक होते देखा था और कई घटनाएँ लोगों के मोबाइल कैमरों और सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड भी हुई हैं। ऐसे में पुलिस के लिए यह कहना मुश्किल हो सकता है कि कोई सबूत नहीं मिला। इसके अलावा, आखिर में मामला बंद होगा या नहीं, इसका फैसला पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा।

अभियोजन वापस लेना

FIR दर्ज होने के बाद आपराधिक मामले को रोकने का एक और कानूनी तरीका है अभियोजन वापस लेना। BNSS की धारा 360 के तहत सरकारी वकील (Public Prosecutor) अदालत से मुकदमा वापस लेने की अनुमति माँग सकता है। लेकिन यहाँ भी अंतिम फैसला अदालत ही करती है।

जब सरकारी वकील अदालत से ऐसी अनुमति माँगता है, तो उसे पहले यह बताना होता है कि उसे केंद्र सरकार से इस संबंध में मंजूरी मिली है। इसके बाद अदालत इस बात की जाँच करती है कि मुकदमा वापस लेने की माँग ईमानदारी से की गई है या नहीं। साथ ही अदालत यह भी देखती है कि यह फैसला न्याय के हित में है, किसी राजनीतिक दबाव में नहीं लिया गया है और किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने के लिए नहीं किया जा रहा है।

अगर अदालत को लगता है कि मुकदमा वापस लेने से न्याय का हित पूरा होगा, तभी वह इसकी अनुमति देती है।

लेकिन इस मामले में ऐसा करना आसान नहीं होगा। प्रदर्शन के दौरान हुई तोड़फोड़ और उसके बाद केंद्र सरकार की ओर से उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न करने का बयान, दोनों ही बातें सार्वजनिक रूप से सामने आई थीं। ऐसे में सरकारी वकील के लिए अदालत को यह भरोसा दिलाना मुश्किल होगा कि मुकदमा वापस लेना न्याय के हित में है।

इसके अलावा, कानून में एक और महत्वपूर्ण रोक भी है। BNSS की धारा 360 के तहत सरकारी वकील उन मामलों में मुकदमा वापस लेने की अनुमति नहीं माँग सकता, जिनमें केंद्र सरकार की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया हो। यानी जिन FIR में यह दर्ज है कि प्रदर्शनकारियों ने सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, उन्हें इस प्रावधान के तहत वापस नहीं लिया जा सकता।

FIR रद्द कराना

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पास यह विशेष अधिकार होता है कि वे जरूरत पड़ने पर किसी FIR को रद्द कर सकते हैं। यह अधिकार तब इस्तेमाल किया जाता है, तब अदालत को लगता है कि कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल हो रहा है या फिर न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

हालाँकि, अदालतें इस अधिकार का इस्तेमाल बहुत कम मामलों में करती हैं। ऐसा तभी होता है, जब सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट पूरी तरह संतुष्ट हो जाए कि FIR रद्द करना ही न्याय के हित में है और इससे मामले में पूरा न्याय हो सकेगा।

लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा होता नहीं दिखता। जिन प्रदर्शनकारियों पर खुलेआम हिंसा और तोड़फोड़ करने के आरोप हैं, उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करना न्याय के हित में नहीं माना जाएगा। इसलिए ऐसे मामलों में अदालत से FIR रद्द कराने की संभावना काफी कम रहती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जाँच पर दिया जोर

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रूख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान जिसने भी कानून अपने हाथ में लिया है, उसे कानून का सामना करना होगा। कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए पहले से दर्ज FIR की जाँच जारी रखने की अनुमति दी।

भारत के CJI सूर्यकांत ने कहा कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोपों कि निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को यह निर्देश भी दिया, जहाँ इसी तरह के प्रदर्शन हुए थे, कि जिन प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें रिहा किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख CJP नेतृत्व को पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ करने वाले लोगों को सरकार के बयान के आधार पर कानूनी कार्रवाई से बचाया जाए। लेकिन ऐसा करना न तो कानून के मुताबिक सही है और न ही नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है।

कानून के शासन वाले किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि लोग आपसी समझौते या किसी राजनीतिक वादे के आधार पर कानून से बच निकलें। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब कानून सबके लिए बराबर हो और कानून तोड़ने वाले हर व्यक्ति, चाहे वह प्रदर्शनकारी हो या आम नागरिक, अपने किए की जिम्मेदारी उठाए।

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Aditi
Aditi
Senior Writer at OpIndia

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