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भारतीय मीडिया की एक शैली यह भी- हर अपराध में गढ़ो ‘सवर्ण विलेन’

हर रोज हमारा सामना ऐसी खबरों से हो रहा है, जिसमें मीडिया इस तरह से हेडलाइन बनाती है कि पाठकों को स्वतः लगे कि आरोपी ‘ऊँची जाति’ से हैं। पर उन घटनाओं के तथ्य बिल्कुल उलट होते हैं। यह भाषा का मसला नहीं है। सामान्य वर्ग के खिलाफ भारतीय मीडिया के नैरेटिव निर्माण की स्थापित शैली है।

हेडलाइन 1: कार में बंधक बुजुर्ग, दबंग और दरिंदगी… बोतल में भरकर पेशाब पिलाई, रायसेन कांड की पूरी कहानी
हेडलाइन 2: दलित दूल्हे को मंदिर जाने से रोका, विरोध के बाद हुक्का-पानी बंद
हेडलाइन 3: अजमेर में शादी के दौरान दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने का विरोध, पुलिस के साये में निकली बारात

आए दिन आप समाचार पत्रों और न्यूज वेबसाइट्स पर इस तरह की हेडलाइन पढ़ते होंगे। इस मामले में हिंदी-अंग्रेजी का विभेद नहीं है। हर भाषा में इस तरह के हेडलाइंस मिलते हैं।

इनको पढ़ते ही आपके मस्तिष्क में पहली छवि क्या उभरती है? आपको लगता है कि आरोपित कथित ऊँची जातियों से होंगे।

सामान्य वर्ग से आप करें घृणा, इसलिए हेडलाइन से नैरेटिव गढ़ रही भारतीय मीडिया

आगे बढ़ने से पहले इन तीनों हेडलाइन की सच्चाई संक्षेप में जान लेते हैं।

हेडलाइन 1 की सच्चाई

यह मामला मध्य प्रदेश के रायसेन का है। एक युवक गाँव की नाबालिग लड़की को भगा ले गया, उसके बाद यह घटना हुई। पीड़ित और आरोपित दोनों ST समुदाय से हैं।

हेडलाइन 2 की सच्चाई

दलित जोड़े ने मंदिर में प्रवेश करने से रोकने का आरोप जिन पर लगाया, वे ओबीसी हैं। पंचायत कर उनका हुक्का-पानी बंद करने वाले लोगों में दलित परिवार भी शामिल हैं। दलित दूल्हे द्वारा अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के बाद यह पंचायत हुई। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि दलित जोड़ा जब मंदिर आया तो दरवाजे बंद थे, इसलिए उन्हें अनुमति नहीं दी गई।

हेडलाइन 3 की सच्चाई

अजमेर के जिस लवेरा गाँव का यह मामला है, वह गुर्जर बहुल है। गुर्जर ओबीसी समुदाय में आते हैं। दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने का विरोध गाँव के ऊँची जाति के किसी व्यक्ति ने नहीं किया था। न गुर्जरों ने। इस पूरे मामले का जाति से कोई लेना-देना ही नहीं था। गाँव में 20 साल पहले हुई एक घटना के कारण एहतियातन पुलिस की तैनाती की गई थी।

एससी बनाम एससी, एसटी बनाम एसटी, दलित बनाम ओबीसी जैसे ऐसे हर एक मामले को भारतीय मीडिया दशकों से इसी तरह परोसती है, क्योंकि वे इस वामपंथी प्रोपेगेंडा को स्थापित करना चाहते हैं कि जब भी एससी, एसटी, ओबीसी पीड़ित दिखे तो आपको लगे कि आरोपित कथित ऊँची जातियों के ही होंगे। आज जो सामान्य वर्ग के लोगों के प्रति नफरत, ब्राह्णवाद हो बर्बाद जैसे नारे हमें सुनाई पड़ते हैं, वह दशकों से भारतीय मीडिया के इसी एजेंडे की उपज हैं।

ये ठीक उसी तरह है जैसे कोई मौलाना, कोई आलिम, कोई पादरी भी कोई अपराध करे तो शीर्षक में ‘पुजारी-प्रीस्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर आपके मस्तिष्क के साथ खिलवाड़ किया जाता है। ऐसी खबरों में प्रतीकात्मक चित्र भी इस तरह के इस्तेमाल किए जाते हैं कि आपको लगे कि आरोपित हिंदू पुजारी या संत ही हैं।

जब खबरों में जातीय पहचान स्पष्ट नहीं होती, तब भी मीडिया हेडलाइन को इसी तरह स्पिन करती है ताकि पाठक स्वतः मान ले कि आरोपित तथाकथित ‘ऊँची जाति’ से ही होंगे। यह सिर्फ भाषा का मसला नहीं है। यह नैरेटिव निर्माण की भारतीय मीडिया की एक स्थापित शैली है। जब खबर के इनपुट नैरेटिव के अनुसार हो तो जाति खुलकर बताओ और जब न हो या छिपानी हो तो ‘दबंग’, ‘युवक’, ‘मनचले’, ‘भीड़’, ‘विशेष समुदाय’ जैसे शब्द काम में लाओ।

आपने गौर किया होगा कि जब आरोपित ब्राह्मण, ठाकुर या किसी अन्य सवर्ण समुदाय से होते हैं, तो कई मीडिया संस्थान बिना झिझक हेडलाइन में लिखते हैं;

  • दलित युवक की ठाकुरों ने की पिटाई
  • ब्राह्मण परिवार ने दलित महिला को प्रताड़ित किया
  • उच्च जाति के लोगों ने मंदिर में प्रवेश से रोका

हम यह नहीं कहते कि ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं होनी चाहिए। न हम यह कह रहे हैं कि ऐसे मामलों में तथ्य छिपाने चाहिए। लेकिन जब इस तरह की अन्य घटनाओं में इसी मापदंड को लागू नहीं किया जाता है तो यह समस्या बन जाती है।

रोज हम ऐसी खबरों को देखते हैं जिसमें आरोपित के OBC, SC/ST या राजनीतिक रूप से संवेदनशील किसी समुदाय से होने पर, मीडिया हेडलाइन से उसकी जातीय पहचान गायब कर देती है। चाहे ऑनर किलिंग से जुड़े मामले हो या चुनावी हिंसा या मजहबी समूह के उपद्रव।

ऐसे मामलों को ‘दबंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर ऊँची जातियों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है या फिर भीड़, विशेष समुदाय, दोस्त, स्थानीय लोग जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उनकी पहचान छिपा दी जाती है। इसके ठीक उलट जब मामला मुस्लिमों से जुड़े सामान्य विवाद का भी हो और आरोपित हिंदू हो तो मीडिया तुरंत उसकी धार्मिक पहचान को उजागर कर देती है।

वैसे भी ‘दबंग’ कोई ऐसा शब्द नहीं है जो किसी खास समूह की पहचान हो। या फिर यह कोई कानूनी शब्द भी नहीं है जिससे अपराध की व्याख्या होती हो। असल में यह ऐसा शब्द है जो अक्सर तथ्यों की जगह पूर्वाग्रह से उपजा होता है।

‘दबंग’ के जरिए पाठक के मन में एक खास सामाजिक छवि को उभारने का प्रयास किया जाता है। पाठक को लगे की आरोपित गाँव का कोई प्रभावशाली व्यक्ति होगा। ​ऊँची जाति से होगा। उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होगा। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं होती। ऊपर के उदाहरणों से यह पहले ही स्पष्ट है।

अब सवाल है कि भारतीय मीडिया ऐसा क्यों करती है? इसका सबसे बड़ा कारण है भारत की मुख्यधारा की मीडिया पर वामपंथी-लिबरल गैंग का कब्जा। इनके पूर्व निर्धारित वैचारिक फ्रेम हैं। जिसमें हर घटना को उत्पीड़क बनाम पीड़ित के तय प्रोपेगेंडा में फिट कर परोसा जाता है। कुछ समुदायों का नाम लेने से यह बचते हैं। जमीन की सामाजिक जटिलताओं की समझ का अभाव भी शहरों के वातानुकूलित न्यूजरूम में बैठे पत्रकारों के पास है। इसके अलावा क्लिकबेट पत्रकारिता भी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने में योगदान दे रही है, क्योंकि सनसनीखेज शब्द ज्यादा बिकते हैं।

इसके कारण पाठकों को घटनाओं की अधूरी जानकारी मिलती है। सामाजिक अविश्वास बढ़ता है। जमीनी समस्याओं की न तो सही से पहचान हो पाती है और न ही उनका समाधान निकलता है। साथ ही पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी गिरती है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि ऐसे हर मामले में जाति/समुदाय की पहचान केवल तभी बताई जाए, जब वह घटना के संदर्भ में प्रासंगिक हो। मसलन पानी के पाइप के लिए दो पड़ोसियों के बीच विवाद होने पर पीड़ित को ‘दलित-मुस्लिम’ बताना और आरोपित को ‘दबंग-हिंदू’ बताना, क्योंकि यह विवाद जाति या मजहब के कारण नहीं हुई है। या फिर मीडिया को यह तय करना चाहिए कि जाति-धर्म के चयनात्मक खुलासे की जगह वह हर मामले में आरोपित की जाति-मजहब का स्पष्ट रूप से उल्लेख करेगी।

वैसे भी पत्रकारिता का काम तथ्य बताना है। सोशल इंजीनियरिंग गढ़ना या तुष्टिकरण करना नहीं। इसके ठेकेदार राजनीतिक दल देश में पहले से भरे पड़े हैं। पत्रकारिता को उनका औजार नहीं बनना चाहिए।

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अजीत झा
अजीत झा
संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

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