Saturday, September 26, 2020
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राणा अयूब जैसों को चाहिए प्रोपगेंडा चलाने के लिए माल पानी, वरना जो मोदी सरकार कहेगी वो उसके उलट मायने खुद गढ़ लेंगी

राणा अयूब मोदी सरकार की बुराई करते-करते, हिंदुत्व को कोसते-कोसते उस गड्ढे में जाकर गिर पड़ी है। जहाँ पर उन्हें पाकिस्तान की तारीफ सुहाती है लेकिन वे ये नहीं समझ पातीं कि मुस्लिम पत्रकारिता करते करते जिस देश में वह रहती है, वे अब उसी के ख़िलाफ़ अपनी नफरतें जाहिर करने लगी हैं।

देश में कोरोना से जंग लड़ने के दौरान जगह-जगह स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले हो रहे हैं। पुलिसकर्मियों पर थूका जा रहा है। साधुओं की लिंचिंग हो रही है। अस्पताल में अश्लील हरकतें जारी हैं। तबलीगी जमात अब भी जगह-जगह छिपे बैठे हैं। मौलाना साद का कुछ पता नहीं चल रहा। मगर, राणा अयूब जैसे मीडिया गिरोह के लोगों के लिए मुद्दा आज भी इनमें से कुछ नहीं है। उनके लिए देशव्यापी परेशानी का आज भी एक नाम है- इस्लामोफोबिया। मुरादाबाद से लेकर पालघर तक सामने आई तस्वीरें एक आम इंसान के लिए भले ही झकझोर देने वाली हैं। लेकिन इस गिरोह के लिए इन तस्वीरों का मोल शून्य बराबर है। 

इस्लामोफोबिया के बैनर तले एक अपराध की खबर को भी मजहबी रंग देकर वैश्विक परेशानी बनाने वाला गिरोह आज देश की अधिकांश समस्याओं और घटनाओं पर चुप्पी साधा हुआ है। कुछ एक हैं, जो खुद को इंसानियत का पैरोकार बताकर बैलेंस होने में जुटे है। मगर, राणा अयूब जैसे पत्रकार तो इस बीच अपना असली चेहरा दिखाने पर इस कदर उतारू हैं कि वो इन घटनाओं के जिक्र में अपना विपक्षी मत देने से भी परहेज कर रहे हैं और खुलेआम सिर्फ़ इस्लामोफोबिया के प्रोपगेंडे को आगे बढ़ाकर केंद्र सरकार को कोस रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर अयूब के केवल हाल के दो ट्वीट देखिए। एक ट्वीट में वे केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर अपनी कुंठा व्यक्त करती हैं और दूसरे ही पल प्रधानमंत्री के बयान को अरब देशों का दवाब कहती हैं। अब हालाँकि दोनों ही ट्वीट को एक नजर में देखकर उनकी केंद्र सरकार के प्रति नफरत साफ पता चलती है। लेकिन यदि इन ट्वीटों पर थोड़ा समय दिया जाए तो ये भी पता चलता है कि राणा अयूब मोदी सरकार की बुराई करते-करते, हिंदुत्व को कोसते-कोसते उस गड्ढे में जाकर गिर पड़ी है। जहाँ पर उन्हें पाकिस्तान की तारीफ सुहाती है लेकिन वे ये नहीं समझ पातीं कि मुस्लिम पत्रकारिता करते करते जिस देश में वह रहती है, वे अब उसी के ख़िलाफ़ अपनी नफरतें जाहिर करने लगी हैं।

जी हाँ। वे मात्र मुस्लिम देशों को अपना आका समझने लगी है। स्थिति ये हो गई है कि उन्हें अगर झूठ नफरत फैलाने के लिए अपने विपक्षियों के बयानों से पर्याप्त माल पानी नहीं मिलता तो वे उसे खुद गढ़ लेती हैं। जैसा कि उन्होंने दो इन दो ट्वीट्स में किया। एक में वे वह देश के पीएम का मखौल उड़ाने से नहीं चूँकीं और इस बात को गुमान का विषय समझा कि उनका पीएम दूसरे देशों के दबाव में है। और दूसरे में वे देश की तारीफ करने वाले मंत्री पर इल्जाम लगाने से नहीं रुकी, जो उनके समुदाय का ही है। बस उसकी सोच कट्टरपंथियों ने नहीं मिलती

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पहले ध्यान दीजिए प्रधानमंत्री मोदी ने दो दिन पहले अपने देश के नागरिकों को हिम्मत देने के लिए एक ट्वीट किया। उन्होंने उस ट्वीट में देश की ओर से विश्व को आश्वस्त किया कि कोरोना जैसी महामारी में वे एकजुट हैं। वे कहते हैं चूँकि कोरोना वायरस हमला करने से पहले धर्म, जाति, रंग, भाषा और सीमाएँ नहीं देखता है। इसलिए मुश्किल वक्त में सबको साथ मिलकर इस चुनौती से निपटने की जरूरत है।

अब, इस महामारी के दौरान और कथित इस्लामोफोबिया की अफवाहों के बीच ये ट्वीट देश के प्रधानसेवक की ओर से आना एक सामान्य और सराहनीय बात है। लेकिन राणा अयूब को इसमें अरब व इस्लामिक देशों का दबाव दिखता है। वो मानती है कि इस्लामिक देशों की फटकार के कारण प्रधानमंत्री एकजुट होने की बात कह रहे हैं। वरना उनकी नजर में तो नरेंद्र मोदी सिर्फ़ भारत को हिंदुओं का देश बनाना चाहते हैं। 

यहाँ दिलचस्प चीज़ ये भी देखने वाली है कि आज जिस अरब देश की आड़ में अयूब नाक ऊँची कर रही हैं। उसी अरब देश को वे उस समय कोस चुकी हैं, जब उसने प्रधानमंत्री को highest civilian award से सम्मानित किया था। पर, आज चूँकि अयूब की धारणा है कि यूएई व अन्य इस्लामिक देशों के कारण प्रधानमंत्री ने ऐसा ट्वीट किया तो उन्हें उनकी तारीफ करने से कोई गुरेज नहीं है और उन्हें अपना कर्ता-धर्ता मानने से भी।

इसके बाद, केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के बयान पर अयूब की प्रतिक्रिया देखिए। जहाँ वे उनके प्रति अपनी कुँठा निकालती हैं और भाजपा नेता को केंद्र सरकार के कर्मों को व्हॉइटवॉश करने वाला करार देती हैं। क्यों? ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि नकवी मानते हैं कि भारत मुस्लिमों के लिए एक सुरक्षित और सुंदर देश हैं। साथ ही ये भी कहते हैं कि इस देश में मुस्लिमों के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार सुरक्षित हैं।

जाहिर है। मुख्तार अब्बास नकवी की ये बात राणा अयूब को क्यों पचेगी। जिनका मानना है कि आऱएसएस के कार्यकर्ता  मुस्लिमों के घर में घुसकर उन्हें मारते हैं। जिनकी तारीफ पाकिस्तान तक करता है। जो प्रोपगेंडा फैलाने और इस्लामोफोबिया को बढ़ाने के लिए हिंसा के माहौल में भी मस्जिद में तोड़-फोड़ का वीडियो शेयर कर देती हैं। कोरोना के बीच सिर्फ़ अपना अजेंडा ट्विटर पर चलाती है। वे खुलकर मुस्लिमों से संबंधित घटनाएँ अपने ट्वीट पर शेयर करती है, उनके लिए एक्टिव हो जाती हैं। मगर, साधुओं की लिंचिग को बात करने का विषय भी नहीं समझतीं। वे विदेशों में भारत के ख़िलाफ़ कही बातों को प्रमुखता से बताती हैं और रमजान को महसूस करती हैं। मगर स्वास्थ्यकर्मियों पर होते अत्याचारों से कोई सरोकार नहीं रखती… वहीं राणा अयूब बिलकुल जाहिर है कि वे मुख्तार अब्बास नकवी की बात पर अपना गुस्सा दिखाए और केंद्र सरकार पर अपनी कुंठा निकालें।

क्योंकि, दिक्कत वास्तविकता में ये नहीं है कि उनकी सोच के ख़िलाफ़ भी कोई उसी समुदाय का व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया देता है। उनकी दिक्कत तो ये है कि वो जो चाहती हैं आखिर उसे उनका विपक्षी क्यों नहीं बोल रहा। उनकी परेशानी ये है कि न ही कोई भारत की तारीफ में दो शब्द बोले और न ही भारत की ओर से लोगों को आश्वस्त करे। उन्हें चाहिए अपने प्रोपगेंडा के लिए हवा, उन्हें चाहिए उसके लिए सामग्री। अगर विपक्षी उन्हें ये सब समय समय से मौजूद कराता रहता है तो उनका इस्लामोफोबिया का रोना जारी रहता है यानी उनके अस्तित्व को ऑकसीजन मिलती रहती है। लेकिन जैसे ही कोई देश में एकजुटता की बात करता है, मुस्लिमों को यहाँ सुरक्षित बताता है तो वो भड़क जाती हैं। उन्हें लगता है जैसे देश और देश की सरकार इस्लामिक देशों में उनकी छवि को धूमिल कर देंगे। फिर आखिर पाकिस्तान का कौन पत्रकार उनकी तारीफ करेगा और उन्हें पत्रकारिता की आड़ में कट्टरपंथ फैलाने का सहारा देगा। वे कैसे अपना अजेंडा चलाएँगी और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एक निश्चित पाठकों को बरगलाएँगी।

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