Thursday, April 25, 2024
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एक लेख में 8 बार बु* शब्द का प्रयोग बताता है कि ‘दि प्रिंट’ का दिमाग कहाँ घुसा हुआ है

जिस खास शब्द पर ये पूरा का पूरा लेख है, उसे इसमें बार-बार प्रयोग करने की बजाए उसकी जगह कुछ और भी लिखा जा सकता था। या फिर एक बार लिख कर इशारों में भी समझाया जा सकता था। लेकिन, लेख की मंशा स्पष्ट है कि उसने बार-बार इस शब्द का प्रयोग किया, क्योंकि उसे ऐसे शब्द सर्च करने वालों से ट्रैफिक चाहिए।

पहले ऐसा होता था कि कोई अपनी किसी बात पर पलटने के लिए कम से कम एकाध साल या उससे ज्यादा तो लेता ही था। अब उसका उलटा हो गया है। अब आज के दिन कोई ‘बड़ा’ पत्रकार कुछ बोलता है और दूसरे ही दिन उसे भूल कर उससे अलग बात बोलता है। ताज़ा मामला शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ का है, जिसमें महिलाओं के जननांग से सम्बंधित एक शब्द के जरिए बिहारियों और भोजपुरी भाषियों को नीच दिखाने की कोशिश की गई है।

उदाहरण के रूप में आप रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई को देखिए। ये दोनों पूछते नहीं थकते थे कि कोरोना और चीन सहित कई मुद्दे होने के बावजूद मीडिया में सुशांत मामला क्यों चल रहा है? अब वही राजदीप रिया का इंटरव्यू लेकर दिन-रात इसी मामले पर ट्वीट और शो कर रहे हैं। वहीं रवीश के चैनल एनडीटीवी पर भी सुशांत ही चल रहा है। ऐसे ही शेखर गुप्ता का ‘दि प्रिंट’ एक शब्द के सहारे एक भाषा और प्रदेश को बदनाम करने चला है।

एक ऐसा शब्द, जिसके बारे में दावा किया गया है कि उसे भोजपुरी वाले सर्च करते हैं। पोर्न वेबसाइटों पर हजारों प्रकार के वीडियोज होते हैं और उनके स्पिसिफिक कीवर्ड्स होते हैं, जिनके जरिए उन वीडियोज को देखने वाले उन्हें सर्च करते हैं। ये ज्यादातर अंग्रेजी में होते हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि न्यूज़ वेबसाइट अब वैसे हर कीवर्ड को पकड़ कर उसकी विधाओं को समझाने में लग जाएँ।

अगर वो ऐसा करते हैं तो फिर पोर्न वेबसाइट्स और खबरिया पोर्टलों में अंतर ही क्या रह गया? ठीक ऐसे ही, शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ ने भी एक ऐसा कीवर्ड पकड़ा, जिस पर खबर बना कर इंटरनेट पर उस शब्द की सर्च लिस्ट में भी आया जाए और साथ ही उसे सर्च करने वालों के बहाने एक पूरे समुदाय और प्रदेश को बदनाम किया जाए। इंटरनेट पर रोज ऐसे लाखों कीवर्ड्स सर्च होते हैं, लोग वीडियोज देखते हैं।

‘दि प्रिंट’ ने बार-बार इस शब्द का प्रयोग किया

हम पत्रकारिता में नैतिकता जैसी बात तो कह ही नहीं रहे, हम ‘दि प्रिंट’ की उस धूर्तता के बारे में बताना चाह रहे हैं कि जिस शब्द को कथित तौर पर भोजपुरी वाले विकिपीडिया पर खोज कर पढ़ते थे, वो अब शेखर गुप्ता स्वयं SEO की चालाकी से उन्हें अपने पोर्टल पर उपलब्ध करा रहे हैं। साथ ही, वो नैतिकता की चादर भी ओढ़ रहे हैं कि ‘देखो, भोजपुरी लोग क्या-क्या गंदी और फ्रस्ट्रेशन से भरी चीजें खोज रहे हैं, जबकि बाकी लोग कोविड के बारे में जानना चाहते हैं।’

लेकिन, सवाल तो ये है कि क्या ये इतना महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर जान-बूझकर इतना लम्बा-चौड़ा लेख लिखा जाए। जो लेख उस शब्द को सर्च करने वालों को गाली दे रहा है, उसी लेख में इस शब्द का 8 बार प्रयोग है। आपने किसी प्रोफेसर से बात कर लिया और उसके बयान डाल दिए तो क्या इससे आपकी धूर्तता छिप जाती है? ऐसे मीडिया पोर्टल्स SEO के लिए कुछ भी परोसते हैं और लेख के नाम पर खानापूर्ति करते हैं।

पत्रकारिता में यह तकनीक अब घिस गई है। कुछ लोगों के पास ट्रैफिक को ड्राइव करने के लिए बस सेक्स का ही सहारा बचा है। लल्लनटॉप इस गर्त में बहुत पहले गिर कर, पाठकों की गाली खा-खा कर चर्चा से दूर जा चुका है। ‘दि प्रिंट’ के लेखों पर अगर आप निगाह डालेंगे तो पता चलेगा कि कुछ खास पत्रकारों का मुख्य बीट ही ऐसे ‘सेक्स’ संबंधित लेख हैं, जहाँ लेखक/लेखिका सस्ती लोकप्रियता के लिए, वृहद समाज पर ‘अरे वो तो ये पढ़ रहे हैं, वो ऐसा खोज रहे हैं, उनके दिमाग में ये कचरा ऐसे आता है’ जैसी बातें कहते हुए अपनी यौन कुंठा का वमन करता/करती हैं।

ऐसे लेखों का औचित्य क्या है? इससे किसका भला हो रहा है? क्या इसका औचित्य भोजपुरी बोलने वालों को नीचा दिखाना नहीं है? 1.5% लोगों ने अगर कोई शब्द खोजा तो उसे आधार बना कर, उसे प्रमुखता से, बिना किसी * से छुपाने की कोशिश करते हुए, 8 बार लिखना बताता है कि लेख लिखने के लिए लिख दिया गया है। साथ ही, लिखने वाले ने लगातार एक क्षेत्र के लोगों पर निशाना साधा है, जैसे कि यही 1.5% ‘पिछड़े तबके के लोग’ उस पूरे तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस खास शब्द पर ये पूरा का पूरा लेख है, उसे इसमें बार-बार प्रयोग करने की बजाए उसकी जगह कुछ और भी लिखा जा सकता था। या फिर एक बार लिख कर इशारों में भी समझाया जा सकता था। लेकिन, लेख की मंशा स्पष्ट है कि उसने बार-बार इस शब्द का प्रयोग किया, क्योंकि उसे ऐसे शब्द सर्च करने वालों से ट्रैफिक चाहिए। वैसे भी बिहार और भोजपुरी का मजाक बनाने से आउटरेज नहीं होता, ये सोच कर वो खुद को सेफ समझते होंगे।

बिहार और भोजपुरी को बदनाम करने के लिए एक खास शब्द का बार-बार प्रयोग

जहाँ इसमें हिंदी, पंजाबी और मराठी लोगों द्वारा सर्च किए गए कीवर्ड्स को हाइलाइट करते हुए उसकी तुलना भोजपुरी भाषा के इस शब्द को सर्च किए जाने से करते हुए बताया गया है कि कैसे बाकी प्रदेशों के लोग कितने अच्छे हैं और बिहारी कितने गिरे हुए, वहीं दूसरी तरफ दूसरे और तीसरे नंबर पर इस शब्द के रहने को भी ऐसे बड़ी बात बना कर पेश किया गया है, जैसे ये कोई बहुत बड़ी समस्या हो।

ऐसा कुछ तो है नहीं कि इस पर बात करने से कोई बहुत बड़ी समस्या का समाधान मिल जाएगा? ये तो किसी से छिपा नहीं है कि भोजपुरी गानों और फिल्मों में अश्लीलता का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन ये किसी भाषा की समस्या न होकर उस भाषा की मनोरंजन इंडस्ट्री की समस्या है। ये उनलोगों की समस्या है, जो इससे रुपए बना रहे हैं और इसे प्रचारित कर रहे हैं। लेकिन, असली समस्या पर शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ को बात करनी होती तो इस शब्द को 8 बार नहीं लिखा जाता।

इसके बाद इसी शब्द के सहारे पोर्न देखने, इंटरनेट पर लैंगिक असमानता, गैंगरेप के बाद वीडियो वायरल होने और सेक्स के टैबू होने जैसी ‘बड़ी-बड़ी’ समस्याओं की बात की गई है। जबकि असल में इनमें से किसी का भी इस शब्द को सर्च किए जाने से कोई सम्बन्ध है, ऐसा वो साबित नहीं कर पाया। साथ ही भोजपुरी को ‘अंडरप्रिविलेज्ड’ भाषा करार दिया गया है। इस लेख का उद्देश्य ही है- एक खास भाषा को बदनाम कर ट्रैफिक जुटाना।

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