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Sunday, May 31, 2020
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दंगों में मारे गए हिन्दुओं के परिवारों की मदद करना भी पाप है क्या? कपिल मिश्रा से बौखलाया गुप्ता जी का ‘द प्रिंट’

भारत के टुकड़े करने की बात की शरजील इमाम ने। हिन्दुओं को धमकाया वारिस पठान ने। शाहीन बाग़ के हिन्दुत्वविरोधी प्रदर्शनों में भाषण दिया अमानतुल्लाह खान ने। दंगों में हिन्दुओं का कत्लेआम किया ताहिर हुसैन ने। लेकिन, दोषी कौन? कपिल मिश्रा।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

कपिल मिश्रा निशाना हैं। कपिल मिश्रा तब से निशाना हैं, जब से उन्होंने दिल्ली में माहौल खराब करने वाले उपद्रवियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। शाहीन बाग़ में प्रदर्शन पर बैठे उपद्रवियों के कारण कई बड़ी सड़कों पर महीनों जाम का माहौल रहा, बच्चों और ऑफिस जाने-आने वालों को प्रतिदिन परेशानी हुई और स्थानीय लोगों का जीना मुश्किल हो गया। शाहीन बाग़ की तर्ज पर पूरी दिल्ली को बंधक बनाने की योजना थी लेकिन कपिल मिश्रा ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस तरह से लोगों को बंधक नहीं बनाया जा सकता और सड़कें खाली कराई जाएँ, वरना वो इसके विरोध में सड़क पर उतरेंगे।

सम्पूर्ण दिल्ली की मनोदशा बयाँ करने की सज़ा उन्हें बदनाम करने की कोशिशों के रूप में मिली। हालाँकि, दिल्ली में दंगे भड़कने उनके बयान से पहले ही शुरू हो गए थे लेकिन उन्हें जबरदस्ती ‘बलि का बकरा’ बनाने का प्रयास किया गया। ऑपइंडिया ने भी एक वीडियो के जरिए इसका पर्दाफाश किया कि किस तरह उनके बयान से पहले ही मुस्लिम दंगाई भीड़ द्वारा पत्थरबाजी और राह चलते लोगों की पिटाई शुरू कर दी गई थी। लेकिन, वामपंथी गैंग ने एक सुर में दंगों के लिए कपिल मिश्रा को बदनाम करना शुरू कर दिया।

भारत के टुकड़े करने की बात की शरजील इमाम ने। हिन्दुओं को धमकाया वारिस पठान ने। शाहीन बाग़ के हिन्दुत्वविरोधी प्रदर्शनों में भाषण दिया अमानतुल्लाह खान ने। दंगों में हिन्दुओं का कत्लेआम किया ताहिर हुसैन ने। लेकिन, दोषी कौन? कपिल मिश्रा। दंगाई भीड़ द्वारा मार डाले गए हिन्दुओं को छोड़ दिया गया। न तो कोई मीडिया वाला उनकी खोज-ख़बर लेने गया और न ही किसी ने ये चिंता जताई कि आखिर मृत हिन्दुओं के परिवारों का भरण-पोषण कैसे होगा? ऐसे समय में कपिल मिश्रा आगे आए और उन्होंने क्राउडफंडिंग की पहल कर के सभी पीड़ित परिवारों से मिलना-जुलना शुरू किया और उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

कपिल मिश्रा भले ही हालिया दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन दंगों के बाद जनता की मदद करने के लिए जब दिल्ली सरकार का कोई मंत्री-विधायक नहीं पहुँचा तो कपिल मिश्रा ने ये बीड़ा उठाया। कुल 1 करोड़ रुपए जमा करने का लक्ष्य रखा गया था, जो पूरा हो चुका है। अब वो और डोनेशन नहीं लेंगे। इन रुपयों में से कई लोगों की मदद की गई है, औरों की की जा रही है। मिश्रा सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार अपडेट कर रहे हैं कि इन रुपयों में से किसे कितना दिया जा रहा है। जनता के धन में से एक-एक पैसे का हिसाब उन्हें दिया जा रहा है।

कपिल मिश्रा के इस प्रयास से ‘द प्रिंट’ खफा हो गया है। शेखर गुप्ता के प्रोपेगंडा पोर्टल को इस बात से भी दिक्कत है कि एक-एक रुपया देने वाले लोगों के ट्वीट्स को भी कपिल मिश्रा रीट्वीट क्यों कर रहे हैं। उसने लिखा है कि ‘दंगे भड़काने के आरोपित’ कपिल मिश्रा क्राउडफंडिंग कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो ताहिर हुसैन पुलिस कस्टडी में किस बात के लिए है? समाजसेवा के लिए? अंकित शर्मा की हत्या करने वाले कौन लोग थे? कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या किसने की? और हाँ, दिल्ली दंगा शुरू होने के समय हाथ में पिस्तौल लहराते हुए पुलिस पर गोलीबारी कर रहा शाहरुख़ कौन था? क्या इन सबको बचाने के लिए कपिल मिश्रा का नाम बार-बार दोहराया जा रहा है?

यहाँ सवाल ये है कि जब पूरा मीडिया हिन्दुओं के दुःख-दर्द को छिपाने में लगा हुआ है और दंगाइयों के कुकृत्यों को ढकने में प्रयासरत है, कोई एक व्यक्ति यदि पीड़ितों के हित के लिए उठ खड़ा हुआ है तो इन प्रोपेगंडा पोर्टलों को पच क्यों नहीं रहा? किसी मुसलमान को एक झापड़ लगने वाले आरोप को किसी हिन्दू को सैकड़ों बार चाकू गोद कर मार डालने से तुलना करने वाले इन पोर्टलों की ये पुरानी आदत है। ‘द प्रिंट’ इस बात के लिए भी खफा है कि कपिल मिश्रा ने उसके पत्रकारों से बात क्यों नहीं की। मिश्रा ने उन्हें पहले ही लताड़ लगाते हुए बता दिया था कि वो फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा फैलाने वालों से बात नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था:

तुम्हारा न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ एक पक्षपाती फेक न्यूज़ फैक्ट्री है। बावजूद इसके कि तुमलोग मेरे ख़िलाफ़ लगातार एक घृणास्पद अभियान चला रहे हो, मुझे चारों ओर से भारी समर्थन मिल रहा है। ज़मीन पर तुम जहाँ भी लोगों से बात करोगे वहाँ से मेरे लिए समर्थन आएगा लेकिन ‘द प्रिंट’ जैसी फेक न्यूज़ फैक्ट्री को ये पसंद नहीं। मुझे ज़रूरत ही नहीं है कि अपना समर्थन साबित करने के लिए तुम्हारे पोर्टल में लेख प्रकाशित करवाऊँ। दिल्ली की जनता ने तुम्हारे प्रोपेगेंडा को नकार दिया है। तुम जाकर इस पर लेख लिखो कि मोहम्मद शाहरुख़ बचपन में कितना क्यूट था। तुम लिखो कि कैसे ‘बुरे हिन्दुओं’ ने ताहिर हुसैन को एक आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर दिया।”

ये पूरा गिरोह बार-बार हिन्दुओं को पीड़ित मानने की जगह ‘दोनों ही तरफ के लोग मरते हैं’ वाला राग अलाप रहा है। जबकि सत्य यह है कि मुसलमान भीड़ ने दंगों की अच्छी-खासी तैयारी की थी। अगर कोई अपने समुदाय को ले कर कुछ करना चाहता है तो समस्या क्या है? क्या फंड जुटाना गुनाह है? क्योंकि पहले तो दंगे का पीड़ित ही इन्हें नहीं मान रहे थे, अब लाशें सामने हैं तो नए गीत रचे जा रहे हैं। पीड़ितों के लिए पैसा इकट्ठा करना अमानवीय और विभाजनकारी कैसे है? चूँकि चार चम्पुओं से बयान ले लिए गए कि ये अनैतिक है, मानवीय मूल्यों के खिलाफ है, भेदभाव करता है, उससे ये साबित नहीं हो जाता कि मरने वाले हिन्दू परिवारों को लोगों की हत्या नहीं हुई है। जिनके बच्चे मरे, जिनकी बेटियों को नग्न करके दुराचार किया गया, जिनकी शादी में सिलिंडरों को उड़ाने की योजना थी, जिनके बच्चों को छः मुसलमानों ने दो-दो घंटे चाकू मारे… उन्हें अब आर्थिक मदद से भी महरूम किया जाएगा?

दिलबर नेगी का हाथ-पाँव काट कर उसी दुकान में लगाई आग में जिन्दा झोंक दिया गया, जिसमें वो काम करते थे। विवेक अपनी दुकान में बैठे थे, तभी वहाँ दंगाई भीड़ ने हमला किया और उनके सिर में ड्रिल कर डाला। दिनेश खटीक अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे, उन्हें गोली मार दी गई सिर में। इसी तरह आलोक तिवारी भोजन खा कर टहलने निकले, उन्हें मार डाला गया। उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार के पास रुपए नहीं थे। ताहिर हुसैन की ईमारत में जमा सैकड़ों गुंडों ने कई हिन्दुओं को मार डाला और कइयों के घरों को तबाह कर दिया। मंदिरों तक को नहीं बख्शा गया। क्या इन सबको मदद नहीं दी जानी चाहिए?

दिक्कत ये है कि पीड़ितों की मदद ‘द प्रिंट’ से इसीलिए देखी नहीं जा रही है क्योंकि इससे लोगों को पता चल रहा है कि कहाँ किस हिन्दू को किस तरह से दंगाई मुस्लिम भीड़ ने मारा। इससे उस गुट के सभी मीडिया संस्थानों की पोल खुल रही है, जिन्होंने हिन्दुओं की मौतों को छिपाया क्योंकि इसके बाद उन्हें बताना पड़ता कि किसकी मौत कैसे हुई। फिर दंगाइयों की पहचान बतानी पड़ती, जो उनके प्रोपेगंडा में फिट नहीं बैठता। इसीलिए, आज कोई व्यक्ति पीड़ितों, मार डाले गए हिन्दुओं के परिवारों और बच्चों के लिए खड़ा हुआ है तो उनसे देखा नहीं जा रहा। कपिल मिश्रा भी इन पोर्टलों को भाव नहीं दे रहे। उनका कहना है- “ये जितनी गाली दे रहे हैं, उससे जनता उतनी ज्यादा जागरूक होकर डोनेट कर रही है।

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