प्रेस फ्रीडम का रोना रो रहे NDTV और रॉय दम्पति का काला चिट्ठा: शेयर्स की धोखाधड़ी से लेकर ICICI लोन तक

प्रणय रॉय की माने तो कोर्ट, सेबी और सीबीआई, सभी के सभी मोदी सरकार के प्रभाव में कार्य कर रहे हैं। अपने खिलाफ कार्रवाई को 'मीडिया की स्वतन्त्रता' से जोड़ कर अपनी लॉबी यानी 'गिरोह विशेष' को सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय करना चाह रहे हैं।

एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय देश छोड़ कर भागना चाह रहे थे लेकिन उन्हें एयरपोर्ट पर रोक लिया गया। एनडीटीवी ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ बताया। एनडीटीवी ने रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ चल रहे मामलों को एक झटके में फेक और प्रमाणरहित करार दिया। एनडीटीवी ने दावा किया कि रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ कार्रवाई सरकार की धमकी है कि मीडिया संस्थाएँ उनकी तरफदारी करें वरना उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। जबकि, सच्चाई यह है कि रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और क़ानून का उल्लंघन के कई मामले चल रहे हैं और जाँच एजेंसियों ने उन्हें दोषी भी पाया है।

आईसीआईसीआई लोन फ्रॉड केस: कैसे क्या हुआ?

एनडीटीवी ने आर्थिक धोखाधड़ी भरे कारनामे 2004 से ही शुरू कर दिए थे, जब उसने ‘जनरल अटलांटिक पार्टनर्स इन्वेस्टमेंट (GA)’ के साथ करार किया। इस करार के दौरान एनडीटीवी ने ‘अंतरंग व्यापार का प्रतिषेध विनियम’ और ‘Substantial Acquisition of Shares and Takeovers विनियम’ का उल्लंघन किया। इसका पूरा विवरण आप यहाँ पढ़ सकते हैं। रॉय दम्पति ने GA से एनडीटीवी के शेयर्स 439 रुपए के भाव से वापस ख़रीदे, जब इसका मूल्य 400 रुपए चल रहा था।

इससे बाकि निवेशकों को भी मौक़ा मिल गया कि वे अपने-अपने शेयर्स इसी दाम पर बेच डालें, जिस मूल्य पर रॉय दम्पति ने उन्हें वापस ख़रीदा था। इसके बाद रॉय दम्पति ने एनडीटीवी के 14.99% शेयर्स गोल्डमैन सैक्स नामक कम्पनी को बेच कर फिर नियमों का उल्लंघन किया। इससे गोल्डमैन को एनडीटीवी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में अपना प्रतिनिधि भेजने का मौक़ा मिल गया। इस डील के बारे में न तो सम्बंधित अधिकारियों को कुछ बताया गया, न सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सूचना दी गई और न ही निवेशों को भनक लगने दिया गया।

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न एनडीटीवी और न ही गोल्डमैन ने इस बारे में किसी को कुछ बताया। इन शेयर्स को ओपन-मार्केट व्यापार के रूप में दिखाया गया, जबकि इन्हें पूर्व निर्धारित योजना के तहत बेचा और ख़रीदा गया था। नीचे गोल्डमैन सैक्स द्वारा नॉमिनेट किए गए डायरेक्टर का पत्र है, जो उसने एक निवेशक को जवाब देते हुए लिखा था।

एनडीटीवी के डायरेक्टर (गोल्डमैन सैक्स द्वारा नॉमिनेटेड) का निवेशक को लिखा गया पत्र

इस पत्र में उसने ख़ुद को गोल्डमैन सैक्स द्वारा निवेश किए गए निश्चित फंड का नॉमिनी बताया था। डायरेक्टर ने लिखा कि वह उन फंड्स का प्रबंधन संभालता है। 2016 में सेबी ने गोल्डमैन सैक्स से जुड़ी 2 संस्थाओं के ख़िलाफ़ जाँच शुरू की, जो इस डील का हिस्सा थे। प्रणय और राधिका रॉय ने 2 कंपनियों को कई लाख शेयर बेचे, जिनका मूल्य 400 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से 360 करोड़ रुपए होते। इसके बाद रॉय दम्पति ने शेयर्स वापस खरीदना चाहा लेकिन उनके पास फंड्स की कमी थी।

फंड्स की कमी पूरी करने के लिए रॉय दम्पति ने इंडिया बुल्स से 501 करोड़ रुपए का लोन लिया। इस लोन को चुकाने के लिए आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ का लोन लिया गया। इस ट्रांज़ैक्शन के पीछे की सच्चाई जानने के लिए हमें उस एफआईआर की तह तक जाना होगा, जो रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ जून 2017 में दर्ज की गई थी।

रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ एफआईआर

इस एफआईआर में रॉय दम्पति के अलावा आरआरपीआर होल्डिंग नमक कम्पनी और आईसीआईसीआई के कुछ अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया था। आरआरपीआर होल्डिंग कम्पनी में रॉय दम्पति के अधिकतर शेयर्स हैं। इन सबके ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया। इस एफआईआर में 403.85 करोड़ रुपयों की मनी लॉन्ड्रिंग समेत आईसीआईसीआई को हुए 48 करोड़ रुपए के नुकसान का भी जिक्र है, जो प्रणय-राधिका के कारण हुआ।

अगस्त 2009 में रॉय दम्पति ने एनडीटीवी के अपने शेयर्स को आरआरपीआर होल्डिंग्स को 4 रुपए प्रति शेयर की दर से बेच डाला जबकि शेयर्स का असली बाजार मूल्य उस समय 140 रुपए प्रति शेयर था। इसके बाद मार्च 2010 में जब शेयर्स का असली बाजार भाव उतना ही था, आरआरपीआर होल्डिंग ने 34.79 शेयर्स 4 रुपए प्रति शेयर की भाव से एनडीटीवी को वापस बेच डाला। आरआरपीआर होल्डिंग्स कम्पनी के संस्थापक रॉय दम्पति ही हैं। उन्होंने इंडिया बुल्स से 501 करोड़ रुपए का लोन लिया।

अक्टूबर 2008 में आरआरपीआर ने आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ रुपये लोन लिया। इस लोन के लिए रॉय दम्पति ने अपने शेयर्स रखे लेकिन सम्बंधित सरकारी संस्थाओं व अधिकारियों को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी गई, अर्थात इसे छिपा कर दिया गया। सेबी के नियमों का उल्लंघन हुआ। एफआईआर की कॉपी का वह हिस्सा आप भी देखिए।

रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ एफआईआर की कॉपी का हिस्सा

नियमों के मुताबिक, बैंक किसी भी कम्पनी के 30% से ज्यादा शेयर्स गिरवी के रूप में नहीं रख सकता, जबकि इस मामले में यह आँकड़ा 60% से भी अधिक रहा, जो सेबी और एमआईबी के नियमों का सीधा उल्लंघन था।

आईसीआईसीआई बैंक को नुकसान

आरआरपीआर होल्डिंग और वीसीपीएल के बीच हुए करार की जानकारी आईसीआईसीआई बैंक को भी थी। बता दें कि रॉय दम्पति ने वीसीपीएल नमक कम्पनी के साथ भी बेनामी करार किया था, जिससे एनडीटीवी का कंट्रोल वीसीपीएल का पास चला गया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि आरआरपीआर ने अपने बैलेंस शीट में स्वीकार किया है कि उसे आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं, लेकिन आईसीआईसीआई ने एक पत्र लिख कर बता दिया कि आरआरपीआर के पास उसका कोई बकाया नहीं है। कैसे?

सबसे पहले आईसीआईसीआई का वह पत्र देखिए जिसमें कहा गया है कि सारा बकाया लोन चुकता कर दिया गया:

आईसीआईसीआई कहता है कि आरआरपीआर ने लोन चुका दिए

अब आरआरपीआर का बैलेंस शीट देखिए जिसमें कहा गया है कि उसे आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं:

आरआरपीआर कहता है कि आईसीआईसीआई को 15 करोड़ रुपए देने हैं

एफआईआर के अनुसार, आईसीआईसीआई को कुल 48 करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ। यह भी बड़ा खुलासा हुआ कि प्रणय रॉय और राधिका रॉय के पास लोन चुकता करने के लिए फंड्स थे लेकिन उन्होंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया। एक और गौर करने लायक बात यह है कि वीसीपीएल ने 53.85 करोड़ आरआरपीआर को ट्रांसफर किए और उसी दिन यह रुपए प्रणय रॉय के व्यक्तिगत खाते में भेज दिए गए। यानी आईसीआईसीआई को तो घाटा हुआ लेकिन प्रणय रॉय को तो फायदा हुआ।

वो सवाल जिनका जवाब मिलना ज़रूरी है

रॉय दम्पति ने आख़िर इस बात को क्यों छिपाया कि आरआरपीआर होल्डिंग को जो 375 करोड़ रुपए का लोन दिया गया, उसके लिए एनडीटीवी के शेयर्स को गिरवी रखा गया था? इसे बात को छिपाने के पीछे क्या मकसद था?

आरआरपीआर के बैलेंस शीट में साफ़-साफ़ दिखता है कि उसे आईसीआईसीआई बैंक को रुपए भुगतान करने बाकी हैं लेकिन बैंक कहता है कि सारे रुपए पे कर दिए गए हैं। यह विरोधाभास क्यों?

आख़िर आईसीआईसीआई ने लोन से मिलने वाले ब्याज को छोड़ दिया, क्यों? जानबूझ कर नुकसान सहने का कारण क्या?

आईसीआईसीआई ने एक ऐसे करार का हिस्सा बनना क्यों स्वीकार किया, जिसमें सेबी व अन्य कई नियम तोड़े गए और क़ानून का उल्लंघन हुआ?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस समय आईसीआईसीआई बैंक के टॉप लेवल पर वो कौन से अधिकारी थे, जिनके कारण यह करार संभव हो पाया और क्या किन्हीं बड़े राजनेताओं व उद्योगपतियों से उनके सम्बन्ध थे?

एफआईआर क्या कहता है?

अब यह जानते हैं कि एफआईआर में क्या डिमांड्स किए गए हैं। सबसे पहले एफआईआर का वो वाला हिस्सा पढ़ लीजिए:

एफआईआर कॉपी में किए गए डिमांड्स

एफआईआर में माँग की गई है कि इस पूरे मामले की जाँच सीबीआई से कराई जाए। इस बात को लेकर संशय है कि आख़िर एनडीटीवी का असली मालिक है कौन? एनआईआर इसका पता लगाने को कहता है। गुप्त रूप से एनडीटीवी का नियंत्रण इधर से उधर किया गया और आईसीआईसीआई ने इसमें क्या किरदार निभाया? एफआईआर कॉपी पूछती है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की वजह क्या थी? इसका उद्देश्य क्या था?

एक और बड़ा सवाल यह है कि एनडीटीवी के 85 मिलियन डॉलर के फंड्स विदेश में क्या कर रहे थे और उन्हें भारत वापस क्यों लाया गया, जिससे उसके प्रोमोटरों को 403 करोड़ रुपयों का फायदा हुआ?

रॉय दम्पति के अन्य कारनामे

2015 में सेबी ने एनडीटीवी पर 2 करोड़ रुपए का आर्थिक दंड लगाया क्योंकि कम्पनी ने यह बात छिपाई थी कि इनकम टैक्स ने उससे 450 करोड़ रुपए टैक्स जमा कराने को कहा था। फरवरी 2014 में इस सम्बन्ध में नोटिस मिलने के बावजूद एनडीटीवी ने स्टॉक एक्सचेंज को इससे सम्बंधित कोई सूचना नहीं दी, जो नियमों का उल्लंघन है। 2018 में सेबी ने एनडीटीवी पर फिर से आर्थिक दंड लगाया। SAT ने भी पाया कि एनडीटीवी ने नियमों का उल्लंघन किया है।

नीरा राडिया ने प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ के पत्रकार एमके वेणु से बात करते हुए कहा था कि वो और मनोज मोदी (मुकेश अंबानी का क़रीबी) ने कहा था कि वे प्रणय रॉय से मिलने दिल्ली जा रहे हैं, क्योंकि उनका समर्थन करना ज़रूरी है। हालाँकि, रिलायंस ने एनडीटीवी में किसी भी प्रकार के निवेश की बात को नकार दिया है। लेकिन, ‘नीरा राडिया एंगल’ बताता है कि इसमें बहुत लोच है।

इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि एनडीटीवी के ख़िलाफ़ चल रहे मामले या रॉय दम्पति के ख़िलाफ़ हो रही कार्रवाई का मीडिया की स्वतंत्रता से कुछ लेना-देना नहीं है। प्रणय रॉय की मानें तो कोर्ट, सेबी और सीबीआई, सभी के सभी मोदी सरकार के प्रभाव में कार्य कर रहे हैं। आईसीआईसीआई लोन वाली स्टोरी संडे गार्डियन ने की थी, जिसके बाद एनडीटीवी के उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दर्ज कराया। हालाँकि, अदालती फैसला एनडीटीवी के पक्ष में नहीं आया। प्रणय रॉय इसे ‘मीडिया की स्वतन्त्रता’ से जोड़ कर अपनी लॉबी यानी ‘गिरोह विशेष’ को सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय करना चाह रहे हैं।

(यह लेख OpIndia की एडिटर नूपुर शर्मा द्वारा लिखे गए अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है।)

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