तेरा-मेरा रिश्ता क्या… रवीश ने कही, इमरान ने मानी: टीवी देखना, अख़बार पढ़ना सब बंद

ऐसे में लोग ये सवाल पूछने को स्वतंत्र हैं कि क्या रवीश कुमार की बात भारत में कोई नहीं मान रहा तो उनका दिल रखने के लिए इमरान ने उनकी सलाह मान ली है। जब एनडीटीवी पाकिस्तान को ख़ुश रखा करता है तो हो सकता है इमरान ने भी अपना फ़र्ज़ निभाया हो।

रवीश कुमार अक्सर अपने ‘प्राइम टाइम’ में लोगों से अपील करते हैं कि वो टीवी न देखें और अख़बार न पढ़ें। ये काफ़ी अजीब है क्योंकि जिस मीडिया इंडस्ट्री में काम करके रवीश कमाते हैं, वो उसी इंडस्ट्री के ग्राहकों को उससे दूर रहने की सलाह देते हैं। रवीश कुमार लगभग अपने हर शो में ‘टीवी मत देखिए’ ज़रूर बोलते हैं। एनडीटीवी की टीआरपी धड़ल्ले से गिर रही है, इसीलिए कहीं उनके कहने का मतलब ये तो नहीं होता कि तुमलोग मुझे नहीं देख रहे हो तो किसी को नहीं देखो। खैर, रवीश की इस कुंठा का कारण सबको पता है।

अब रवीश को ऐसी जगह से एक प्रशंसक मिला है, जहाँ से उनको उम्मीद भी नहीं होगी। अरे हाँ, ये बात ग़लत है क्योंकि वहाँ भी उनके प्रशंसक ख़ासे संख्या में हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि उन्होंने टीवी देखना छोड़ दिया है और अख़बार पढ़ना बंद कर दिया है। रवीश कुमार जान कर बहुत ख़ुश होंगे क्योंकि एक मुल्क़ का प्रधानमंत्री उनकी बात मान रहा है। इतना ही नहीं, इमरान ने बताया है कि वो शाम को होने वाले डिबेट शो भी नहीं देखते और न्यूज़ नहीं देखते।

जैसे अकबर ने दीन-ए-इलाही मजहब की स्थापना की थी और 3-4 लोग उससे जुड़े भी थे, इसी तरह रवीश कुमार की ‘टीवी नहीं देखो और अख़बार नहीं पढ़ो’ वाले गैंग में इमरान ख़ान शामिल हो गए हैं। दावोस में आयोजित ‘वर्ल्ड इकनोमिक फोरम 2020’ में इमरान ने ये बातें कही। इमरान ख़ान ने कहा कि वो 40 साल से सार्वजनिक जीवन में हैं और आलोचना के आदि रहे हैं लेकिन फिर भी पिछले 1.5 वर्षों से मीडिया कुछ ज्यादा ही उनके पीछे पड़ी हुई है। ठीक वैसे ही, जैसे रवीश कहते हैं कि मोदी उनके पीछे पड़े हुए हैं।

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बस अंतर इतना है कि इमरान ख़ान एक राजनेता होने के नाते जनता से कभी ये नहीं कहेंगे कि तुम वोट मत दो, मेरा भाषण नहीं सुनो या सरकार की बातों को गंभीरता से मत लो। रवीश तो इतने साहसी हैं कि टीवी से कमाई कर के जनता को बोलते हैं कि टीवी मत देखो। रवीश कुमार जिस अख़बार को गाली देते हैं, वो उन्ही अख़बारों की ख़बरों को आधार बना कर लेख भी लिखते हैं। वो लिखते हैं कि फलाँ अख़बार में फलाँ ख़बर आई है और फिर मोदी या भाजपा की आलोचना करते हुए अपने सभी विरोधियों को व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी का छात्र घोषित करते हैं।

लेकिन यही रवीश छोटे पत्रकारों को निशाना भी बनाते हैं। ‘हिंदुस्तान’ में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अयोध्या के दीपोत्सव में कैसे राम, सीता और लक्ष्मण के रूपों को हेलिकॉप्टर से उतारा गया और वहाँ कौन-कौन थे। साथ ही, रिपोर्टर ने लिखा था कि यह दृश्य ऐसा था जिसे महसूस किया जा सकता है, बयाँ करना मुश्किल है। रवीश की सुलग गई और उन्होंने उस रिपोर्टर को भला-बुरा बोलते हुए फेसबुक पर एक लेख लिख डाला। अयोध्या में लाखों दीपकों के बीच उस रिपोर्टर की अनूठी रिपोर्टिंग से घबराए रवीश ने उसे भला-बुरा कहा। और हाँ, ऐसे ही रिपोर्टरों को ख़बरों की कतरन का इस्तेमाल वो मोदी को गाली देने के लिए भी करते हैं।

वैसे एनडीटीवी पहले भी पाकिस्तान के काम आते रहा है। रवीश ने एक बार कहा था कि भारतीय मीडिया पाकिस्तान को ज़्यादा तूल देती है। बरखा दत्त ने एनडीटीवी में रहते कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग में भारतीय हितों की अनदेखी की थी। पठानकोट ओर एनडीटीवी ने संवेदनशील सूचनाएँ सार्वजनिक कर दी थी, जिसके लिए बाद में चैनल को माफ़ी माँगनी पड़ी थी। पुलवामा हमले का महिमामंडन किया गया था। कश्मीरी पुलिस की ‘बगावत’ को लेकर झूठे दावे किए गए थे। कश्मीर पर पाकिस्तानी रुख के समर्थन से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को बदनाम करने की कोशिश तक, फेरहिस्त लम्बी है।

ऐसे में लोग ये सवाल पूछने को स्वतंत्र हैं कि क्या रवीश कुमार की बात भारत में कोई नहीं मान रहा तो उनका दिल रखने के लिए इमरान ने उनकी सलाह मान ली है। जब एनडीटीवी पाकिस्तान को ख़ुश रखा करता है तो हो सकता है इमरान ने भी अपना फ़र्ज़ निभाया हो।

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