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क्या है असम की सत्ता का गणित, कैसे मनोवैज्ञानिक लड़ाई में भारी पड़ रहे CM हिमंता बिस्वा सरमा, क्यों BJP के नेतृत्व वाले NDA के लिए जीत की हैट्रिक आसान?

असम की राजनीति पर दो दशकों से अधिक समय तक करीब से नजर रखने और पिछले कुछ महीनों से किए गए व्यापक जमीनी अवलोकन के आधार पर कहा जा सकता है कि 4 मई को जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे, तो बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए कम्फटेबल बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करती दिखेगी।

असम में 9 अप्रैल 2026 को विधानसभा चुनाव  होने जा रहा है। पत्रकार का काम भविष्यवाणी करना नहीं बल्कि परिस्थितियों का विश्लेषण करना होता है। यूँ भी चुनाव अनिश्चितताओं से भरा होता है। फिर भी ऐसे पैटर्न बन जाते हैं, जिससे बदलाव कई बार स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। ऐसी ही परिस्थिति असम चुनाव में दिख रही है।

असम की राजनीति पर दो दशकों से अधिक समय तक करीब से नजर रखने और पिछले कुछ महीनों से किए गए व्यापक जमीनी अवलोकन के आधार पर कहा जा सकता है कि 4 मई को जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे, तो बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए कम्फर्टेबल बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करती दिखेगी।

यह कोई दूरदर्शिता भी नहीं है। यह संरचनात्मक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक कारकों को जोड़कर देखने का नजरिया है। ये सत्ता पर काबिज एनडीए सरकार की तरफ झुक रहा है।

एजीपी प्रमुख अतुल बोरा और बीपीएफ प्रमुख हाग्रामा मोहिलरी के साथ हिमंता बिस्वा सरमा

एनडीए में भाजपा, असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) शामिल हैं, जो सामूहिक रूप से असम की लगभग सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा स्वयं सबसे अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है, जो गठबंधन के भीतर उसके प्रभुत्व को रेखांकित करता है।

लेकिन इस स्पष्ट एकजुटता के पीछे लेन-देन की राजनीति की कहानी छिपी हुई है। बीजेपी का बीपीएस और उसके प्रतिद्वंदी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के साथ संबंध असम में गठबंधनों की अस्थिरता की कहानी कह रहा है। 2016 में बीपीएफ का समर्थन करने से लेकर 2020 के बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद चुनावों में यूपीपीएल का समर्थन करने और फिर 2025 में वापस बीपीएफ का समर्थन करने तक, भाजपा ने गठबंधन निर्माण के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाई है।

परिसीमन से राजनीतिक बदलाव तक

असम के चुनावी परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2023 के परिसीमन के दौरान आया। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया है, नई सीटें बनीं और जनसांख्यिकीय संतुलन को पुनर्निर्धारित किया गया। हालाँकि ये प्रैक्टिस ऊपरी तौर पर प्रशासनिक प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके राजनीतिक परिणाम गहरे हैं।

जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, उनकी संख्या लगभग 35 से घटकर 24 रह गई है। चूँकि मुस्लिम मतदाता परंपरागत रूप से कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के प्रति एकजुट रहे हैं, इसलिए यह कमी विपक्ष की चुनावी क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है।

असम की मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है। हालाँकि अधिक संख्या में मुस्लिम आबादी होने के बावजूद अब सीटों के मामले में इसका लाभ कम होता जा रहा है। 2021 में कॉन्ग्रेस करीब 30 फीसदी वोट हासिल किए थे, लेकिन केवल 29 सीटें जीती थीं। 2026 में इससे भी बदतर हालत हो सकते हैं।

कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच गठबंधन के अभाव में, यह वोट बैंक बंट सकता है। अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में बहुकोणीय मुकाबले में थोड़े के अंदर से हार-जीत होती है, ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति हो सकती है, लेकिन ये जरूरी नहीं है कि ऐसी सीटें विपक्ष ही जीत जाएगी। इसके बजाय एनडीए के लिए मामूली अंतर से जीत हासिल करना ज्यादा आसान होगा।

सीएम सरमा के नेतृत्व का असर

यदि परिसीमन एनडीए की बढ़त के लिए संरचनात्मक आधार प्रदान करता है, तो नेतृत्व इसकी भावनात्मक और राजनीतिक ऊर्जा प्रदान करता है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अभी भारत में सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों में से एक बनकर उभरे हैं।

सीएम सरमा की लोकप्रियता पारंपरिक पार्टी विचारधाराओं से परे है। उनका शासन मॉडल राज्य में बुनियादी ढाँचे के विकास, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की सशक्त प्रशासनिक शैली मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है। सड़कें, पुल, स्वास्थ्य सुविधाएँ और डिजिटल सेवा वितरण ने कार्यकुशलता को और बढ़ाया है।

सीएम सरमा की राजनीतिक पकड़ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आशीर्वाद यात्रा जैसे व्यापक जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से उन्होंने मतदाताओं के साथ सीधा संबंध स्थापित किया है। ये महज राजनीतिक रैलियां नहीं हैं, बल्कि ये जनता से अपील हैं, जो एक ऐसे नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत करते हैं, जो वादे को पूरे करता है।

इसके विपरीत, असम में गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार को इस तरह की रणनीति अपनाने में कठिनाई हो रही है। बूथ स्तर पर संगठनात्मक कमजोरियाँ इस नुकसान को और बढ़ा देती हैं। भारत में चुनाव अब केवल संदेशों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सुनियोजित लामबंदी के माध्यम से भी जीते जाते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जहाँ भाजपा और उसका वैचारिक तंत्र निर्णायक बढ़त बनाए हुए है।

ध्रुवीकरण और पहचान का मुद्दा

बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों के मुद्दे पर चर्चा किए बिना असम की राजनीति का कोई भी विश्लेषण अधूरा है । यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है।

भाजपा हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है। डेमोग्राफी बदलाव और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर सरमा की बयानबाजी लोगों को जागरूक कर रही है। आलोचक इसे ध्रुवीकरण बताते हैं, लेकिन इसकी चुनावी प्रभावशीलता निर्विवाद है।

पिछले चुनावों में, भाजपा को एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के रूप में एक सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी मिल गया था, जिनकी छवि का इस्तेमाल जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरे के प्रतीक के रूप में किया गया था। एआईयूडीएफ के कॉन्ग्रेस से गठबंधन तोड़ने और उसके प्रभाव में कमी आने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

रकीबुल हुसैन जैसे व्यक्तियों को राजनीतिक हमलों के नए केंद्र के रूप में स्थापित किया है। कॉन्ग्रेस के भीतर आंतरिक मतभेदों के उजागर होने के बाद इसकी प्रासांगिकता और बढ़ गई है। भाजपा ने इन विभाजनों का प्रभावी ढंग से हथियार के रूप में उपयोग करते हुए कॉन्ग्रेस को परस्पर विरोधी हितों में सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ दल के रूप में चित्रित किया है।

विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस अक्सर अपनी ही गलतियों के प्रतिद्वंदियों को बल देती है। चुनाव प्रचार के अहम मौकों पर विवादित हस्तियों की मौजूदगी और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सार्वजनिक असहमति भाजपा को बने बनाए मुद्दे मुहैया करा देती है, जिन पर वह खुल कर अपनी राय रख सकती है।

दलबदल एक अहम वजह

चुनाव सिर्फ संख्या के बारे में ही नहीं, बल्कि धारणा के बारे में भी होते हैं। कॉन्ग्रेस से हुए दलबदल का भाजपा में बड़ा प्रभाव पड़ा है।

भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे नेता व्यक्तिगत रूप से चुनावी समीकरण को भले ही न बदल पाएँ, लेकिन उनके जाने से कॉन्ग्रेस के भीतर अस्थिरता को ओर मजबूती मिली है।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने दलबदलुओं को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रयास किए। अक्सर निर्णय अंतिम रूप दिए जाने के बाद भी विरोधाभाषी बयान आते रहे। इससे कॉन्ग्रेस में हताशा का दौर हैं। इसके विपरीत, भाजपा आत्मविश्वास से भरी, यहाँ तक कि हावी भी दिखाई देती है, जिससे उसकी मनोवैज्ञानिक बढ़त और भी मजबूत होती है।

सीएम सरमा ने कॉन्ग्रेस के भीतर अपने प्रभाव का दावा करके इस धारणा को और भी पुख्ता कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे दलबदल का अनुमान लगा सकते हैं या यहां तक ​​कि उसे अंजाम भी दे सकते हैं। चाहे ये दावे अतिशयोक्तिपूर्ण हों या नहीं, वे विपक्षी खेमे में अविश्वास पैदा करते हैं और मतदाताओं के भरोसे को कम करते हैं।

जमीन के बजाए कागजों में सिमटी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने एक मूलभूत समस्या है यह है कि पार्टी जमीनी हकीकत से दूर कागजों तक सिमट कर रह गई है। हालाँकि कॉन्ग्रेस गठबंधन में कई पार्टियाँ शामिल हैं, लेकिन उनकी संयुक्त शक्ति सीमित ही है।

अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के नेतृत्व वाली आर.डी. और ए.जे.पी. का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में तो है, लेकिन राज्यव्यापी संगठनात्मक क्षमता उनमें नहीं है। जिन निर्वाचन क्षेत्रों में वे चुनाव लड़ रहे हैं, उनमें से कई या तो नव-परिसीमित हैं या संरचनात्मक रूप से उनके लिए प्रतिकूल हैं। वर्तमान विधानसभा में दोनों पार्टियों के पास कुल मिलाकर केवल एक-एक सीट है, क्योंकि केवल अखिल गोगोई ही विधायक हैं। उनके लगातार हंगामे के कारण सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद शिवसागर सीट पर उनका कब्जा बरकरार रहने की उम्मीद है, लेकिन लुरिंज्योति गोगोई की जीत अभी भी अनिश्चित है।

अति चर्चित 3G गठबंधन: गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई

चुनावी गणित में भले की प्रतिस्पर्धा दिख रही हो, लेकिन वोट का पूरी तरह ट्रांसफर करने की क्षमता का अभाव गठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करता है। चुनावों के लिए न केवल साझा लक्ष्य बल्कि जमीनी स्तर पर समन्वय भी आवश्यक है।

मतदाताओं के एक वर्ग में यह उम्मीद है कि गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के समर्थन में अहोम समुदाय एकजुट दिख रहा है। ये भाजपा को चुनौती दे सकता है। हालाँकि, परिसीमन ने इस समुदाय के प्रभाव को कम किया है जिससे विपक्ष को ज्यादा फायदा दिखता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

गायक जुबीन गर्ग की मौत का मुद्दा

सांस्कृतिक हस्ती जुबीन गर्ग के निधन ने असम की जन चेतना को झकझोर दिया है। बहुत कम ही ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें विभिन्न समुदायों में इतना व्यापक लोकप्रियता हासिल हो।

इतिहास बताता है कि भावनात्मक मुद्दे हमेशा चुनावी नतीजों में तब्दील नहीं होते। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019-20 में हुए विरोध प्रदर्शन तीव्र और व्यापक थे, फिर भी वे भाजपा को 2021 में सत्ता में लौटने से नहीं रोक पाए।

ज़ुबीन गर्ग की विरासत, सीएए विरोधी भावना की तरह है। इसके वोट में तब्दील होने की संभावना कम है। वोट अक्सर शासन, पहचान और दूसरे राजनीतिक मुद्दों को लेकर असम में दिए जाते रहे हैं।

भाजपा को कमियों को करना होगा दुरुस्त

अपनी कई खूबियों के बावजूद, भाजपा कमजोरियों से मुक्त नहीं है। बीजेपी की निर्भरता इनदिनों कॉन्ग्रेस, एजीपी और अन्य पार्टियों से आए ‘बाहरी’ उम्मीदवारों पर काफी बढ़ गई है।

इसके घोषित उम्मीदवारों में नए चेहरे काफी हैं। इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना पनप रही है, जो खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। यदि आंतरिक असहमति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया, तो इससे स्थानीय स्तर पर दिक्कतें आ सकती हैं।

असम में भाजपा का पिछला रिकॉर्ड हाई संगठनात्मक अनुशासन का रहा है। सरमा और सोनोवाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में, पार्टी ने आंतरिक विरोधों पर विजय पाई है।

असम में एनडीए की संभावित जीत किसी एक कारण की वजह से नहीं, बल्कि कई वजहों से होता हुआ दिख रहा है। परिसीमन ने चुनावी मानचित्र को भाजपा के पक्ष में बदल दिया है। विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है और संगठनात्मक रूप से कमजोर है। नेतृत्व, शासन और राजनीतिक संचार भाजपा को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। ध्रुवीकरण मतदाताओं के व्यवहार को लगातार प्रभावित कर रहा है और मनोवैज्ञानिक तौर पर सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में है।

चुनाव, बेशक, अब भी चौंकाने वाले हो सकते हैं। स्थानीय कारक, उम्मीदवारों से जुड़ी परिस्थितियाँ और मतदाताओं की भावनाओं में अंतिम समय में होने वाले बदलाव पूर्वानुमानों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन अप्रत्याशित उथल-पुथल को छोड़कर, भविष्य की दिशा स्पष्ट दिख रही है।

जब असम के मतदाता 4 मई को अपना फैसला सुनाएँगे, तो यह न केवल एक सरकार बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था को फिर से समर्थन होगा, बल्कि यह भाजपा की संरचनात्मक लाभ को रणनीतिक क्रियान्वयन के साथ संयोजित करने की क्षमता की भी जीत होगी।

(मूलरूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Dr. Prosenjit Nath
Dr. Prosenjit Nath
The writer is a technocrat, political analyst, and author. He pens national, geopolitical, and social issues.

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