साध्वी प्रज्ञा: जिसने टूटी रीढ़ के साथ हिन्दू टेरर के नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर दिया

भोपाल में पार्टी की छत्रछाया में साध्वी प्रज्ञा ने अपनी और हिंदुत्व की लड़ाई खुद लड़ी, भोपाल के विकास का अपना विज़न भी जनता से साझा किया, साथ ही उनके ऊपर हुए बर्बरता की कहानी भी और उस पूरे षडयंत्र की कहानी बयान की जो मीडिया के एक धड़े ने एक गलत नैरेटिव के साथ परोसकर उल्टी गंगा बहा रखी थी।

लोकसभा चुनाव-2019 में कुछ सीटों पर चुनावी लड़ाई किसी जंग से कम नहीं रही, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और दिग्विजय के बीच की चुनावी लड़ाई भी न सिर्फ एक साध्वी और एक नेता की लड़ाई थी बल्कि यह लड़ाई सीधे-सीधे सच और झूठ के बीच थी। घटनाक्रमों और परिस्थितियों ने इसे एक तरह से धर्मयुद्ध में बदल दिया था। यह धर्म और अधर्म की लड़ाई बन चुकी थी।

जीत के समीकरण को समझने से पहले यदि आँकड़ों पर नज़र डालें तो साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ‘दिग्गी राजा’ अर्थात मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और साथ ही ‘हिन्दू आतंक’ के झूठ को स्थापित करने में सारी हदें पार करने वाले दिग्विजय सिंह को 3,64,822 वोटों के अंतर से हराया। लोकसभा चुनाव 2019 में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कुल 8,66,482 और दिग्विजय सिंह को 5,01,660 वोट मिले। प्रज्ञा ठाकुर को इस सीट पर 60% से भी ज्यादा वोट मिले हैं। बीएसपी कैंडिडेट माधो सिंह अहिरवार को 11,277 और नोटा को कुल 5,430 वोट मिले हैं।

साध्वी प्रज्ञा की जीत उम्मीद जगाने वाली है और साथ ही बहुतों के प्रोपेगेंडा को करारा तमाचा भी, इस चुनाव में साध्वी प्रज्ञा की जीत क्यों बड़ी है और दिग्विजय सिंह की हार ज़रूरी, ऐसा क्यों कहा जा रहा है? यह जानने के लिए हमें कुछ घटनाक्रमों को सिलसिलेवार समझना होगा।

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कायदे से, साध्वी प्रज्ञा की जीत की बुनियाद दिग्गी राजा ने खुद ही रख दी थी, जब रखी थी तो सोचा भी नहीं था कि ‘भगवा आतंक’ से लेकर हिंदुत्व और उसके प्रतीकों के प्रति नफ़रत का जो बीज वो बो रहे हैं, एक दिन जब वृक्ष बनेगा तो क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कल इसी के नीचे दबकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की हत्या हो जाएगी? अगर कोई सोचे की सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाकर या किसी शांतिप्रिय धर्म की मूल अस्मिता से खिलवाड़ कर, देश में लम्बे समय तक अपनी खोखली राजनीति को ज़िंदा रख पाएगा तो वह गफ़लत में है। बेशक पहले चल गया हो या छिप गया हो, लेकिन जब एक बार नक़ाब हटता है तो कहीं भी मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ता। दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ।

कॉन्ग्रेस काल में उन्होंने हिंदुत्व को कलंकित करने का जो षडयंत्र रचा था, उसका भंडाफोड़ तो होना ही था। हुआ भी और कॉन्ग्रेस अपने ही बिछाए जाल में बुरी तरह फँस गई।

साजिश के बीज

मालेगाँव में बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को 2008 में गिरफ्तार किया गया। उन पर इलज़ाम यह था कि उनके नाम पर जो स्कूटर रजिस्टर्ड था उसका इस्तेमाल धमाके की घटना को अंजाम देने के लिए हुआ है। हालाँकि, बाद में यह बात सामने आई कि दो साल पहले ही उसे उन्होंने बेच दिया था।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उन्हें इस मामले में क्लीन चीट दे दी है, अदालत ने उनके खिलाफ मकोका (MCOCA) के तहत आरोप हटा दिए हैं और अब उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है। इस मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने उन्हें 2017 में जमानत दे दी थी और तब से वह जमानत पर हैं।

थोड़ा पीछे से शुरू कर वर्तमान परिस्थियों पर आते हैं

कॉन्ग्रेस ने सहनशीलता और सहिष्णुणता की गौरवशाली परम्परा वाली सनातन धर्म के वाहकों को हिंदुत्व के दायरे में समेटकर और उसमें भी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए संघ और भाजपा के ‘भगवा’ के प्रति लगाव को देखते हुए उसे बदनाम करने के लिए हिन्दुओं को बदनाम करना चाहा, इसके लिए भी उसने संघ या बीजेपी से किसी भी तरह से जुड़े अधिकारियों और भगवाधारी साध्वी और संतों को चुना। शायद यह सोचकर कि इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं को बीजेपी से पूरी तरह से अलग कर दिया जाए, उनमें अनचाहा डर बैठा दिया जाए। ताकि उनका वोट और समर्थन तो हासिल हो ही साथ ही जातिगत समीकरण की वजह से दलित और वंचित उनके साथ ही रहेंगे या इनके वोटों के ठेकेदारों को कॉन्ग्रेस मिलाकर रखेगी और योजना के मुताबिक बाकी का नैरेटिव वामपंथी बुद्धिजीवी और उनके खेमें के पक्षकार स्वतः पूरी कर देंगें।

लम्बे समय से सत्ता में होने की वजह से कॉन्ग्रेसी दिग्गजों और उनके रणनीतिकारों को ठीक से पता था कि जनता को कैसे बेवकूफ बनाना है, उसे कब कौन से सब्जबाग दिखाने है या सिर्फ योजनाएँ बना देनी है, कहाँ से और कैसे पूरा होगा, इससे कोई सरोकार नहीं है या कोई भी उल-जलूल वादा कर सत्ता पर अधिपत्य जमाए रखना है। क्योंकि तब तक कॉन्ग्रेस के दिग्गजों से कठिन सवाल करने वाले ‘निष्पक्ष’ पत्रकार नहीं थे। जो थे वो स्टूडियो से ही पार्टी का मोर्चा संभालने वाले ‘पक्षकार’ थे। आज भी ऐसे लोग उसी नमक का क़र्ज़ उतारते नज़र आ जाते हैं।

खैर, सबने अपनी भूमिका निभाई, ‘भगवा आतंक’ अस्तित्व में आया लेकिन तमाम ‘निष्पक्ष’ लिबरल पत्रकार मानवता के सीने पर मूँग दलने वाले नक्सलियों, अलगाववादियों, उग्रवादियों का न धर्म ढूँढ पाए और न उनका कोई प्रतीक ही सामने ला पाए जिससे जनता इन्हें ठीक से पहचान सके। यहाँ तक कि यही मीडिया कश्मीर से लेकर देश के लगभग हर कोने में आत्मघाती हमलावरों व आतंकियों का भी कोई धर्म नहीं ढूँढ पाई थी। और तो और, उनके मानवाधिकारों की रक्षा में लगातार कैम्पेनिंग करती रही। यहाँ तक कि अफजल गुरु की फाँसी पर रोक लगाने के लिए भी आधी रात उसी गिरोह के कुछ भटके हुए लोग सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए थे।

देश को खोखला करने और राष्ट्रवाद को गाली बना देने में जिन लोगों ने कॉन्ग्रेस का साथ दिया था, उन सबने अपनी कीमत वसूली। परिणामस्वरुप कॉन्ग्रेस अपने ही घोटालों के बोझ से दबने लगी। देश की जनता को सारा खेल समझ आने लगा। जाँच एजेंसियाँ जो कॉन्ग्रेस के दबाव में हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा थी, आरोप पत्र तक दाखिल करने में असमर्थ होने लगीं। आरोप तो थे लेकिन सबूत नदारद। आप झूठ गढ़ सकते हैं, अपने दुष्प्रचार की मदद से उसे जनता के बीच फैला भी सकते हैं, लेकिन कोर्ट का क्या? उसे तो नैरेटिव नहीं बल्कि सबूत चाहिए। शायद पहले लगा हो कॉन्ग्रेस को कि वह भी मैनेज हो जाएगा क्योंकि इससे पहले कॉन्ग्रेसी दिग्गज नेताओं को संस्थाओं की स्वायत्तता से खेलने में महारत हासिल था।

समय बदल रहा था, अब 2012-2013 के बाद से ही देश में सोशल मीडिया का तेजी से उभार और विस्तार हो रहा था। कॉन्ग्रेसी गिरोह के विरोध में भी कुछ मीडिया हाउस अस्तित्व में आ चुके थे या कॉन्ग्रेस से तंग आकर, जो सच है उसे निष्पक्षता से कहने का साहस दिखाने को तैयार हो गए थे। क्योंकि जनता सड़कों पर थी और आक्रोश चरम पर। यहाँ तक कि RVS मणि जैसे कुछ नौकरशाहों ने भी अपनी किताब में जो सच था उसे जनता के सामने ले आने का निश्चय कर लिया था। RVS मणि ने अपनी किताब ‘हिन्दू टेरर’ में इस पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है।

वर्त्तमान परिदृश्य: अधर्म के खिलाफ धर्म की जंग

लगभग 30 साल से बीजेपी जिस भोपाल से जीतती आ रही थी। जब वहाँ से कॉन्ग्रेस ने दिग्विजय सिंह को उतारा तो यह दिग्गी राजा को सबक सिखाने और साथ ही देश के सामने इस मामले से जुड़ी सच्चाइयों को पब्लिक डोमेन में लाने के लिए, उन्हें बहस का मुद्दा बनाने के लिए, बीजेपी के पास यह सुनहरा मौका था, जब एक षड्यन्त्रकारी के सामने एक पीड़िता को खड़ा कर दिया जाए, जिसने 9 साल तक इस षड्यंत्र की यंत्रणा सही है। हर वह दर्द झेला है जो एक साध्वी महिला को तोड़ देने के लिए और एक झूठ को स्थापित करने के लिए रचा गया था।

अमित शाह ने भोपाल से साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘कथित भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ है। बाद में अपने कई बयानों पर विवादों में घिरीं प्रज्ञा सिंह की उम्मीदवारी पर सवाल उठने लगे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नई दिल्ली में पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा था कि साध्वी को भाजपा का उम्मीदवार बना कर पार्टी ने कोई गलती नहीं की है। शाह ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं पर ‘भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा गढ़ने का सीधे-सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि साध्वी प्रज्ञा की भाजपा से उम्मीदवारी ‘भगवा या हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा’ के खिलाफ भाजपा का सत्याग्रह है।

लोकसभा उम्मीदवार घोषित होने के पहले साध्वी प्रज्ञा ने भी एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘‘मैं धर्मयुद्ध के लिए तैयार हूँ।” प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को ऐसे हिंदू विरोधी नेता की संज्ञा दी जो हिंदुओं को आतंकवादी बताते हैं। प्रज्ञा ने जनता से अपील की थी वह उनका साथ दें, उनकी जीत धर्म की जीत है।

हालाँकि, यह भी कहा जा रहा हैं कि 1984 दंगों के आरोपित कमल नाथ भी दिग्गी राजा को किनारे लगाना चाहते थे, इसलिए भी उनको भोपाल जैसी कठिन सीट दी गई। जबकि दिग्विजय ने भोपाल से लड़ने में अनिच्छा जताई थी। लेकिन कमलनाथ की बदौलत अब तो तय था कि दिग्विजय को भोपाल से ही लड़ना है, पार्टी ने घोषणा कर दी। 10 साल तक उसी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री अगर भागता तो भी जीत साध्वी की होती।

अब मरता क्या न करता, साध्वी प्रज्ञा के हिंदुत्व वाले सेंटीमेंट को बेअसर करने के लिए और एक बार फिर हिन्दुओं को भरमाने के लिए कंप्यूटर बाबा से लेकर मिर्ची बाबा के नेतृत्व में हठयोग से लेकर मिर्ची यज्ञ तक सारे जतन किए, यहाँ तक पार्टी अध्यक्ष जनेऊधारी राहुल गाँधी की तरह मंदिरों के चक्कर भी लगाए, लेकिन कुछ काम नहीं आया। उनका सारा नाटक, पार्टी के फ़र्ज़ी नारे से लेकर चुनावी वादे भी बेअसर रहे।

साध्वी प्रज्ञा की जीत दिग्गी जैसे धूर्त नेताओं के साथ-साथ उन तमाम ‘पक्षकारों’ के लिए भी करारा तमाचा है, जो उन पर आरोप सिद्ध न होने के बावजूद, यहाँ तक कि NIA की अदालत से बरी होने, मकोका हटाए जाने के बाद जब वह कानून सम्मत तरीके से 2017 से जमानत पर बाहर हैं, उनको लगातार इस तरह से पेश करते रहें जैसे वह एक खूँखार किस्म की आतंकी है। जबकि ऐसे ही पत्रकारों के लिए सजायाफ्ता लालू जैसे लोग सामाजिक न्याय के ‘मसीहा’ बने हुए हैं। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ में उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार नज़र आ रहा है।

जबकि, कोर्ट का साफ मानना है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो तब तक कोई भी अपराधी नहीं होता, अगर आरोप लगना ही अपराधी होने का सबूत है तो ऐसे ‘पक्षकारों’ और ‘चाटुकारों’ के लिए जमानत पर चल रहे पूरे खानदान में ‘प्रॉमिसिंग प्राइममिनिस्टर’ नज़र नहीं आना चाहिए। 1984 के दंगो को खुला समर्थन देने वाले प्रधानमंत्री के लिए आज भी ‘मिस्टर क्लीन’ का ताज पहनाने के लिए न्यौछावर हो जाने वाले, और उसी दंगे के आरोपित कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया तो किसी के कंठ से कोई भी कठिन सवाल नहीं फूटा। और न ही देश में विरोध की कोई लहर उठी, न कोई अवार्ड वापसी हुई। उसी दंगे के आरोपित यशपाल सिंह आदि को भी उसी चश्में से देख सकें तो आरोपित और अपराधी का घालमेल करें, नहीं तो निष्पक्षता का मुखौटा उतारकर, यह स्वीकार करें कि हम पत्रकार नहीं बल्कि ‘पारिवारिक पक्षकार’ हैं। जो बीजेपी से जुड़े मामलों में जज और परिवार से जुड़े मामलों के ताउम्र वकील हैं।

खैर, जनता ने साध्वी प्रज्ञा को संसद में भेजकर और कॉन्ग्रेस के तमाम फ़र्ज़ी वायदों को धता बताते हुए एक बार फिर उसका सूपड़ा साफ कर और दिग्गी राजा जैसे धूर्त नेताओं को उसके किए की, प्रतीकात्मक ही सही, सजा देकर अपना मत और जनमत ज़ाहिर कर दिया है। लेकिन उन ‘पक्षकारों’ को कौन सजा देगा जो लगातार पत्रकारिता की आड़ में झूठ परोस रहे हैं और लगातार जनता की आड़ लेकर अपनी नफरत और कुंठा को देश की आवाज़ बना कर परोस रहे हैं? क्या उनके लिए भी कोई सजा है?

शायद सीधे-सीधे नहीं पर उनके झूठ का नकाब उतरना और उनका बार-बार झूठा साबित होना ही आने वाले समय में उनकी प्रासंगिकता को ख़त्म कर देने के लिए पर्याप्त है। कहते हैं कि अगर एक बार किसी की विश्वसनीयता ख़त्म हो गई तो उसकी कही हर बात सिर्फ मनोरंजन का साधन रह जाती है और ऐसे नेता और ‘पक्षकार’ पत्रकार ताश की गड्डी का महज एक जोकर होकर रह जाते हैं, जो होते तो हैं लेकिन ज़रूरी नहीं, उनके बिना भी धूमधाम से खेल जारी रहता है।

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