नवरात्र के पावन पर्व से ठीक पहले वाराणसी की पवित्र गंगा माँ के बीचों-बीच नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन होना और उसमें चिकन बिरयानी जैसे माँसाहारी व्यंजन परोसना… यह घटना सिर्फ एक सामान्य इफ्तार नहीं, बल्कि सनातन आस्था के साथ सीधा खिलवाड़ है।
गंगा को मोक्षदायिनी माँ मानने वाले करोड़ों हिंदू भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का यह प्रयास स्पष्ट रूप से वोटबैंक की सियासत का नतीजा है। और इस पूरे खेल के केंद्र में हैं समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव। उन्होंने इस घटना को हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाकर तूल देने की कोशिश की, लेकिन इस्लामी विद्वानों ने खुद इसे गैर-इस्लामिक बताकर पल्ला झाड़ लिया। नतीजा? अखिलेश की तुष्टिकरण की राजनीति एक बार फिर बेनकाब हो गई है।
क्या है पूरा मामला, क्यों बढ़ा विवाद
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (17 मार्च 2026) को काशी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। इसमें रोजेदारों को फल-मेवे के साथ चिकन बिरयानी परोसी गई। ये वीडियो जब सोशल मीडिया पर सामने आया, तो बवाल मच गया।
वीडियो में साफ दिख रहा था कि नाव पर बैठे युवक बिरयानी खा रहे हैं और बची हुए हड्डियाँ-कचरा गंगा में फेंक रहे हैं। हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों ने तुरंत इस घटना पर विरोध जताया और शिकायत दर्ज कराई। जिसके बाद कोतवाली पुलिस ने 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। सभी पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने, पूजा स्थल की अपवित्रता और गंगा की शुचिता भंग करने के मामले में शिकायत दर्ज हुई है।
ये मामला सामने आया और अखिलेश यादव तुरंत वोटबैंक की रोटी सेंकने में जुट गए। अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान कहा कि प्रशासन ऐसी कार्रवाई सरकार को खुश करने के लिए कर रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर उन युवकों ने हथेली गरम कर दी होती, तो शायद उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती।
खैर, इस मामले में कॉन्ग्रेस के कुछ नेता भी उनके साथ जुड़ गए। पूरा प्रयास यह था कि घटना को हिंदू-मुस्लिम दंगा बनाने का रूप दिया जाए। लेकिन सच्चाई सामने आ गई। मुस्लिम समुदाय के कई जानकारों ने खुद इस आयोजन को गैर-इस्लामी करार दिया। उन्होंने कहा कि इफ्तार कोई पिकनिक या प्रदर्शन नहीं है, बल्कि अनुशासित मजहबी कार्य है। नमाज और रोजे की पवित्रता के साथ गंगा जैसी पवित्र नदी में मांसाहार और कचरा फेंकना बिल्कुल गलत है।
अखिलेश यादव को इस घटना से दिलचस्पी क्यों?
अब सवाल उठता है कि आखिर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को इस घटना में इतनी दिलचस्पी क्यों थी? जवाब साफ है- वोटबैंक। समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय से तुष्टिकरण पर टिकी हुई है। अखिलेश यादव हर मौके पर मुस्लिम वोट को लुभाने के लिए सनातन परंपराओं की उपेक्षा करते आए हैं। गंगा माँ सिर्फ पानी की धारा नहीं हैं। वे सनातन हिंदू धर्म की आत्मा हैं। करोड़ों लोग उन्हें माँ कहकर पुकारते हैं। नवरात्र जैसे पर्व के समय जब पूरे देश में माँ दुर्गा की आराधना चल रही हो, उस समय गंगा के बीच मांसाहार का प्रदर्शन करना जानबूझकर भावनाओं को चोट पहुँचाने का काम है।
गंगा की पवित्रता का अपमान कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार बनाना अखिलेश की खासियत है। चूँकि अखिलेश को गंगा की शुचिता से कोई लेना-देना नहीं। उनके लिए गंगा सिर्फ वोट का साधन है। इस बार भी उन्होंने सोचा कि अगर मुस्लिम युवाओं का साथ देकर हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया तो वोट मिल जाएगा।
यह घटना सिर्फ वाराणसी की नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश और देश की आस्था से जुड़ी है। गंगा पूरे भारत की जीवन रेखा है। सनातनी उसे माँ मानते हैं। रामायण-महाभारत से लेकर आज तक गंगा की पवित्रता अटूट रही है। ऐसे में नाव पर बैठकर बिरयानी खाना और अवशेष फेंकना न सिर्फ कानूनी उल्लंघन है, बल्कि नैतिक अपराध भी है।
स्थानीय प्रशासन ने जो कार्रवाई की, वह सराहनीय है। लेकिन अखिलेश ने इसे ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ बता दिया। उनका बयान- ‘डीएम-एसपी को इफ्तारी देनी चाहिए थी’ स्पष्ट रूप से पुलिस को धमकाने वाला है। क्या यह कहना है कि अगर पुलिस को रिश्वत मिल जाती तो गंगा की अपवित्रता को नजरअंदाज कर दिया जाता?
सपा का रहा है हिंदुओं को कुचलने का इतिहास
समाजवादी पार्टी का इतिहास ही तुष्टिकरण का है। मुलायम सिंह यादव के समय से लेकर अखिलेश तक, पार्टी ने हमेशा एक समुदाय को खुश करने की कोशिश की। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे हो या लव जिहाद के मामले, हर जगह अखिलेश ने हिंदू भावनाओं को कुचला। अब गंगा मामला भी उसी सिलसिले की कड़ी है। उन्होंने सोचा कि नवरात्र के समय यह विवाद खड़ा करके हिंदू समाज को बाँट लेंगे और मुस्लिम वोट पक्का कर लेंगे। लेकिन खेल उलटा पड़ता दिख रहा है।
अखिलेश यादव का यह बयान न सिर्फ गलत है, बल्कि खतरनाक भी। वे कह रहे हैं कि गंगा पर इफ्तार क्यों नहीं हो सकता? जवाब है क्योंकि गंगा किसी एक समुदाय की नहीं है। वह पूरी मानवता की है। हिंदू उसे माँ कहते हैं। मुस्लिम भी गंगा के किनारे रहते हैं और उसका सम्मान करते हैं। अखिलेश का पूरा बयान उनकी मानसिकता को दर्शाता है। वे चाहते हैं कि हर मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया जाए ताकि उनका वोट बैंक मजबूत रहे।
आज जरूरत है कि हर आयोजन में सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाए। गंगा की पवित्रता, धार्मिक गरिमा और सौहार्द- ये तीनों चीजें समाज की जिम्मेदारी हैं। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी ने इसे राजनीतिक हथियार तो बना लिया लेकिन अब जनता सबकुछ समझ चुकी है। यह घटना साबित करती है कि वोटबैंक की खातिर सनातन आस्था से खिलवाड़ करने वाले नेता अब बेनकाब हो चुके हैं।


