Saturday, September 25, 2021
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सत्ता के लिए अधीर कॉन्ग्रेस न मजहब विशेष की चौधरी बन पाई, न नेहरू से निभा पाई

कॉन्ग्रेस ने 2017-18 में जो कमाया था, उसे भी 2019 में वह गॅंवा बैठी। यहॉं तक कि दादी जैसी नैन-नक्श वाली उसकी हथियार भी चुनावी मैदान में फुस्स रही। उसने लोकसभा में जिसे नेता चुना उसने हर मौके का इस्तेमाल पार्टी की फजीहत कराने के लिए किया। 2020 में भी दुश्वारियॉं खत्म होने की उम्मीद नहीं।

देश के लिए बलिदान कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए सबसे ऊपर है। हमारी स्थापना के बाद से, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और आगे भी हमेशा सबसे पहले भारत है।

कॉन्ग्रेस ने यह ट्वीट शनिवार (28 दिसंबर 2019) को किया। अपने 135वें स्थापना दिवस पर। लेकिन, क्या उसके लिए 2019 का भी यही सच है? इसका आकलन करने के लिए उसके स्थापना दिवस से बेहतर मौका क्या हो सकता है।

2019 के कॉन्ग्रेस पर गौर करने से पहले 2017-18 के उसके कारनामों पर एक नजर डाल लेते हैं। 2014 के आम चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद हार की समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने एक समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि पार्टी की हार का एक बड़ा कारण हिंदू विरोधी छवि बन जाना है। यह छवि रातोंरात नहीं बनी थी। न ही इसमें भाजपा और मोदी के उभार का योगदान था। असल में सालों से जो कॉन्ग्रेस तुष्टिकरण के पत्ते फेंक रही थी उसके कारण ही आम हिंदुओं के मन उसकी यह छवि यह गहरी हुई थी। सो, कायदे से इस छवि से बाहर आने के लिए कॉन्ग्रेस को बहुसंख्यकों की भावनाओं का सम्मान करना सीखा। लेकिन, उसने मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा के बहाने इस छवि से बाहर निकलने का रास्ता तलाशा।

यही करण है कि 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गॉंधी मंदिरों की सीढ़ियॉं चढ़ते देखे गए।कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बकायदा ऐलान किया- राहुल गॉंधी जी सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि वह जनेऊधारी हिंदू हैं। गुजरात की सत्ता से कॉन्ग्रेस का वनवास तो खत्म नहीं हुआ, लेकिन अरसे बाद वह लड़ती दिखाई पड़ी। फिर आया 2018। इसी साल के अंत में तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा से छिटक कर कॉन्ग्रेस की झोली में गए। इसी साल राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल ने खुद को कौल ब्राह्मण और दत्तात्रेयी गोत्री बताया।

तीन राज्यों में जीत से उत्साहित कॉन्ग्रेस 2019 के आम चुनावों में औंधे मुॅंह गिरी। दादी इंदिरा गॉंधी जैसी नैन-नक्श का हवाला देकर जिस प्रियंका गॉंधी के लिए दावा किया जाता था कि वह सियासत में पूरी तरह सक्रिय होंगी तो मोदी मैजिक काफूर हो जाएगा, वह पार्टी महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की परंपरागत सीट से अपने भाई और पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गॉंधी की हार भी टाल नहीं पाईं। आम चुनावों के बाद पार्टी ने जिस अधीर रंजन चौधरी को लोकसभा में अपना नेता चुना उन्होंने पार्टी की फजीहत कराने का कोई मौका नहीं छोड़ा। यहॉं तक कि सदन में ही कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘निर्बला’ तक कह डाला। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए तो वह चौथे नंबर की पार्टी बन गई। हरियाणा में जाटों की हिंसा के सहारे सत्ता में लौटने का उसका सपना टूट गया। झारखंड में वह महज 14 फीसदी वोटरों का भरोसा ही जीत पाई। वैसे भी, लिबरलों को छोड़कर कॉन्ग्रेस से इन चुनावों में किसी को चमत्कार की उम्मीद नहीं थी और वह उम्मीदों पर खरी ही उतरी।

लेकिन अपनी जिस छवि को तोड़ने के लिए 2017-18 में वह तीन-तिकड़म करती दिख रही थी, उससे बाहर निकलने के उसे 2019 में दो बड़े मौके मिले। उसने दोनों हाथों से इसे गॅंवाया। अगस्त में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए शेष भारत की भावनाओं के सम्मान का। कश्मीर में किए गए नेहरू के प्रयोगों का फातिहा पढ़ने का। लेकिन, इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस ने विरोध के जो सुर दिखाए उसका हवाला लेकर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ पहुॅंच गया। मजहब विशेष की तरफदार बनते-बनते उसकी छवि देश विरोधी हो गई। यही कारण है कि उस समय सोशल मीडिया में ऐसे संदेशों की भरमार थी जिसमें कहा गया था- दरअसल कॉन्ग्रेसी विरोध नहीं कर रहे हैं, कॉन्ग्रेस का पिंडदान कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए दूसरा मौका आया इस साल के आखिरी महीने में। इस्लामी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का रास्ता साफ करने के लिए केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लेकर आई। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू की सोच के साथ खड़े होने का। वही सोच जिसकी झलक तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा 8 जनवरी 1948 को बीजी खेर को भेजे टेलीग्राम में मिलती है। इसमें नेहरू ने कहा है- स्थितियों को देखते हुए (सिंध में गैर-मुस्लिमों की हत्या और लूट-पाट हो रही थी), सिंध से हिन्दू और सिख लोगों को निकालना होगा। पहले लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र पर टिके रहने का। इस घोषणा पत्र को नेहरू ने खुद तैयार किया था। इसमें कहा गया था- पिछले चार सालों की सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों का पुनर्वास है। इस पर तात्कालिक और लगातार ध्यान देने की जरूरत है।

जब इस वादे की याद दिलाई गई तो कॉन्ग्रेस को वह भी रास नहीं आया। केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि मोदी सरकार ने महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस द्वारा किया गया वो वादा पूरा किया है जो उन्होंने पाकिस्तान में प्रताड़ित किए गए लोगों से किए था। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की नींव साल 1985 और 2003 में रख दी गई थी। मोदी सरकार ने इस अधिनियम को केवल कानूनी रूप दिया है। खान के यह कहने पर कॉन्ग्रेस ने उनसे उस कार्यक्रम में नहीं आने को कहा जिसका उन्हें न्योता भेजा गया था। यहॉं जानना जरूरी है कि आरिफ मोहम्मद पुराने कॉन्ग्रेसी रहे हैं और राजीव गॉंधी की कैबिनेट में भी थे। इस कानून से जिन लोगों को लाभ होना है उनमें बहुतायत दलित और वंचित तबके से हैं। लेकिन, कॉन्ग्रेस की शह पर इसके खिलाफ जिस तरह के हिंसक प्रदर्शन हुए उसने कॉन्ग्रेस के बहुसंख्यक विरोधी होने की धारणा को और मजबूत किया है। यहॉं तक कि दिल्ली से लेकर देश के अन्य हिस्सों में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कॉन्ग्रेस के नेता नामजद तक हुए हैं।

बावजूद इसके कॉन्ग्रेस समुदाय विशेष का भरोसा जीतने में भी कामयाब होती नहीं दिख रही। सीएए विरोधी हिंसा के बीच झारखंड में चुनाव हुए। लोकनीति और सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि भले ही भाजपा इस राज्य में हार गई हो, लेकिन उसे मजहब विशेष के भी 14 फीसद वोट मिले हैं। यानी, वह दौर भी बीत चुका है कि जब समुदाय विशेष आँख मूॅंद कॉन्ग्रेस के पीछे लग लेते थे।

कॉन्ग्रेस की दुश्वारियॉं इतनी ही नहीं हैं। महाराष्ट्र में भले ही वह पिछले दरवाजे से सत्ता में उसी तरह एडजस्ट हो चुकी हो जैसा उसने 2018 में कर्नाटक में किया था। लेकिन, 2019 में कर्नाटक का प्रयोग असफल साबित हुआ था। महाराष्ट्र के भी लक्षण वैसे ही दिख रहे। झारखंड में तो कॉन्ग्रेस का उसी सरकार के विरोध में धरने पर बैठने का इतिहास ही रहा है, जिनमें वह शामिल रही है। यहॉं तक कि अब उसे चलाने में गॉंधी परिवार की दिलचस्पी भी नहीं दिखती। सोनिया ने तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में एक भी रैली नहीं की। प्रियंका की एकमात्र रैली झारखंड में हुई। राहुल ने महाराष्ट्र और झारखंड में पॉंच-पॉंच तथा हरियाणा में दो रैलियॉं की।

2019 में भी कॉन्ग्रेस के पास कोई रणनीति नहीं दिखी। न उसकी सोच स्पष्ट रही। हॉं, नीयत का खोट हर मौके पर दिखा। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या सीएए, एनपीआर या फिर एनआरसी। इन सभी मसलों पर कॉन्ग्रेस के झूठ एक-एक कर सामने आ रहे हैं। ऐसे में 2020 कॉन्ग्रेस के लिए किसी भयावह सपने जैसा साबित हो तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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