Sunday, January 24, 2021
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प्रजासुखे सुखं राज्ञः… तबलीगी और मजदूरों की समस्या के बीच आपदा में राजा का धर्म क्या

प्रवासी श्रमिक भारत के नागरिक हैं। वे किसी भी राज्य के हों तथा आजीविका के लिए कहीं भी रहते हों, देश के संसाधनों पर उनका उतना ही अधिकार है, जितना किसी और नागरिक का। इन्हें वह सब मिलने का हक था, जो कि किसी अन्य नागरिक को मिलता है। पर ऐसा नहीं हुआ। कुछ राज्यों की सरकारों ने इन्हें बोझ समझा और...

किसी आपदा के वक़्त राजा का धर्म क्या है? जब किसी देश पर कोई विपत्ति आती है तो राजा का और आज के संदर्भ में सत्तासीन नेताओं का जनता के प्रति क्या कर्तव्य है? इस राजधर्म की बड़ी सुंदर व्याख्या भारतीय वांग्मय में की गई है। कोरोना आपदा के बीच राजा का प्रजा के प्रति धर्म को समझना आवश्यक है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं :
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।” – अर्थात जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी होती है, उसे नरक मिलता है।

इसी बात को एक और तरह से उन्होंने लिखा है।
“सोचिअ नृपति जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना। – यानी जो शासक अपनी जनता को अपने प्राण के समान प्यारा नहीं मानता वह सोच करने के लायक है।

राजा के धर्म का निरूपण कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी किया है। वे लिखते हैं :
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)
– अर्थात्, प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

एक अन्य ग्रन्थ में प्रजा को संतान के बराबर बताया गया है।
“पुत्र इव पितृगृहे विषये यस्य मानवाः। निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तम॥”

इन सभी ग्रंथों की उक्तियों का एक ही निचोड़ है कि राजा को जनता का उसी तरह ध्यान रखना चाहिए, जिस तरह एक पिता अपने पुत्र की देखभाल करता है। आज के लोकतान्त्रिक सन्दर्भ में इस बात का सीधा अर्थ है- जो शीर्ष पर बैठा हुआ नेता अपनी संतान की तरह लोगों के प्राण, उनकी आजीविका तथा सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, वह राज करने लायक नहीं है।

इसी सिद्धांत को कोरोना संकट और उससे उत्पन्न स्थितियों पर भी लागू किया जाना चाहिए। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कोरोना एक ऐसी बीमारी है, जिसका पूर्वानुमान लगाना किसी के लिए संभव नहीं था। जिसकी तैयारी कर पाना किसी के वश में नहीं था। इस छूत की बीमारी से बचने के कोई स्थापित मानक नहीं थे। लेकिन इस विपत्ति के समय एक ही अपेक्षा थी कि सत्तासीन नेता इस पर राजनीति न करें और लोगों को बीमारी से बचाने के लिए और उनकी तकलीफें दूर करने के लिए जो भी मुनासिब हो, वो करें।

कोरोना के साथ भारत के अब तक के अपेक्षाकृत सफल युद्ध में दो बड़ी दुर्घटनाएँ हुईं हैं। इन घटनाओं ने इस बीमारी के फैलाव और उससे पैदा हुई तकलीफों को और बढ़ा दिया। पहली गंभीर घटना थी, तबलीगी जमात के कारण कोरोना के संक्रमण का जबरदस्त फैलाव। पहले तो ऐसा लगा कि यह इतना बड़ा झटका है जिससे उबर पाना मुश्किल होगा।

पर देश ने बड़े धैर्य, संयम, जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ ज़रूरी सख्ती के साथ इसका सामना किया। मोटे तौर पर तब्लीगी जमात की पोंगापंथी, मूर्खता, जाहिली और दकियानूसी सोच से उत्पन्न इस संकट को ठीक तरीके से हल किया गया।

यह संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि दूसरी बड़ी विपदा देश के सामने आ गई। वह थी देशभर से मजदूरों के पलायन की समस्या। इस संकट का सामना मेरे विचार से उतनी अच्छी तरह नहीं हुआ, जिस तरीके से किया जा सकता था। मजदूरों की एक विकट समस्या सबसे ज्यादा विकराल हुई देश की वित्तीय राजधानी मुंबई तथा देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली में। देश में ज्यादातर मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं।

आज देश में कोरोना संक्रमण के जितने मामले हैं, उनमें से आधे से अधिक इन चार राज्यों- महाराष्ट्र (52667), दिल्ली (14053), उत्तर प्रदेश (6268) और बिहार (2686) में ही हैं। कुछ हद तक यह समस्या गुजरात में भी देखी गई।

सबसे पहले इस समस्या के संकेत दिखाई दिए दिल्ली में। देश में लॉकडाउन 25 मार्च को शुरू हुआ था। उसके तीन दिन बाद 28 मार्च को राजधानी दिल्ली में अचानक मजदूरों को संदेश मिला कि उनके जाने के लिए दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर व्यवस्था की गई है। ये बस अड्डा दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर है। कई मोहल्लों में व्हाट्सएप के जरिए व अन्य संचार माध्यमों के जरिए मजदूरों तक यह अफवाह पहुँचाई गई।

यह गंभीर जाँच का विषय है कि किसने राजनीतिक स्वार्थों के कारण यह अफवाह फैलाई। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार, दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं का इसमें हाथ था। पार्टी के विधायक राघव चड्ढा की एक विवादित ट्ववीट भी इस दौरान आई जिसमें कहा गया था कि उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मज़दूरों को पिटवा रहें हैं। जबकि यह बात झूठी निकली।

लाखों मजदूर जब आनंद विहार बस अड्डे पर पहुँचे तो अफरा-तफरी तो मचनी ही थी। इस घटना के चित्र, खबरें और वीडियो मीडिया में छाए रहे। दुनिया में ये संदेश गया कि मजदूर बेहद परेशान हैं। अब यह जिम्मेदारी हर उस राज्य की थी, जहाँ भी यह प्रवासी मजदूर रह रहे हैं।

इन राज्यों को सुनिश्चित करना था कि श्रमिकों की ठीक से व्यवस्था हो। उन में आई हुई स्वाभाविक अनिश्चितता और बेचैनी कम हो। उनके खाने-पीने का सही इंतजाम हो। साथ ही उन से रहने की जगहों का किराया ना माँगा जाए। इस सबका उद्देश्य कोरोना के फैलाव को आगे बढ़ने से रोकना था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें कई जगह कोताही हुई।

उधर 15 अप्रैल को मुंबई में बांद्रा के पास एकाएक कई हजार मजदूर जमा हो गए। उन्हें भी यह बताया गया था कि उनके लिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। विनय दुबे नाम के एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर बाकायदा लॉकडाउन के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाया, जिसे मुंबई की पुलिस और प्रशासन ने अनदेखा किया। जबकि दिल्ली की घटना के बाद मुंबई को मुस्तैद होना चाहिए था।

असल में इस व्यक्ति के साथ नरमी बरती गई क्योंकि इसके सत्ताधारी नेताओं के साथ नज़दीकी रिश्ते थे। उधर कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि मजदूरों को अपने राज्यों में चले जाना चाहिए।

इस सारे घटनाक्रम से प्रवासी मजदूरों में खासी बेचैनी फैली। फिर तो हर जगह ऐसी घटनाओं का सिलसिला आरंभ हुआ। गुजरात में भी कई जगह ऐसा हुआ। राज्यों ने मज़दूरों की मनःस्थिति समझने में संवेदनहीनता का परिचय दिया। मजदूर गहरे संकट में थे। अधिकतर मजदूर एक साथ छोटे-छोटे कमरों, झोपड़ियों या अस्थायी निर्माणों में रहते है। वे घर से दूर थे। कामकाज बंद हो चुके थे। बेकार श्रमिक बदहाल थे।

छोटे-छोटे दड़बों में रहने वाले मजदूरों की मानसिक अवस्था क्या होगी, इसे समझा जा सकता है। उन्हें चिंता रही होगी- अपने घरबार की; उन्हें चिंता हो रही चिंता होगी अपने काम की; चिंता रही होगी अपनी जान की; उन्हें दूर बसे अपने परिवार की चिंता रही होगी।

यों भी जब पूरी दुनिया में कोरोना के संक्रमण और मौत का मंजर फैला हो तो व्यक्ति अपनों के साथ रहना चाहता है। इसलिए मजदूरों की दिक्कत समझी जा सकती है। उसके साथ सहानुभूति होनी चाहिए थी। जैसा कि हमने ऊपर कहा कि राजा का धर्म होता है अपनी प्रजा की चिंता संतान की तरह करें। पर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात में शुरू के दिनों में स्थानीय नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। 

ऐसा लगा कि महाराष्ट्र और दिल्ली में वहाँ का स्थानीय नेतृत्व चाहता था कि जितना जल्दी से जल्दी हो ये मजदूर अपने घरों को लौटे। यह एक गैर ज़िम्मेदार सोच थी, जो प्रवासी मज़दूरों को अपना नहीं बल्कि दूसरा समझती थी। इसमें अपनत्व नहीं बल्कि फौरी राजनीतिक स्वार्थ का भाव था। दिल्ली और मुंबई की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में इन प्रवासी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रवासी श्रमिक भारत के नागरिक हैं। वे किसी भी राज्य के हों तथा आजीविका के लिए कहीं भी रहते हों, देश के संसाधनों पर उनका उतना ही अधिकार है, जितना किसी और नागरिक का। इन्हें वह सब मिलने का हक था, जो कि किसी अन्य नागरिक को मिलता है। पर ऐसा नहीं हुआ, इसके कारण मजदूरों में दूसरेपन का संदेश गया। इसके कारण पहले से ही एकाकी, क्षुब्ध, परेशान और काम न होने के कारण चिंतित मजदूरों में संदेश गया कि उन्हें घर लौटना चाहिए।

इससे  देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। देश में प्रवासी मज़दूरों की संख्या करोड़ों मे हैं। इन सब की व्यवस्था करना इतना सरल भी नहीं था। पर न तो इन तक सही संदेश पहुँचाने की व्यवस्था की गई और ना ही समाज के इस अहम हिस्से से संवेदशील तरीके से संवाद किया गया।

इसके बाद भागमभाग का जो मंजर फैला उसे हमने देखा, उससे एक अंतरराष्ट्रीय नेरेटिव बना कि सरकारे तकलीफ में पड़े हुए अपने मजदूरों के प्रति संवेदनशील नहीं है। दुनिया भर के मीडिया में असंख्य सही और गलत स्टोरी इस पर चली है। हर स्तर पर अपने देश की व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। अभी भी इस पर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, जो अत्यंत अफसोसजनक है। इससे नेताओं को बचने की आवश्यकता है। 

इनमें से ज्यादातर प्रवासी मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश ने एक बड़ी हद तक संवेदनशीलता दिखाई, वहीं बिहार के नेताओं का आचरण उचित नहीं था। शुरू में बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में जब बिहार के लोग लौटेंगे तो उसके लिए राज्य तैयार नहीं है। संकट के समय ऐसा बयान उचित नहीं था। देश के हर नागरिक को अपने घर जाने का अधिकार है। बिहार की सरकार को इस तरह का संवेदनहीन बयान नहीं देना चाहिए था।

उधर महाराष्ट्र सरकार का पूरा रिस्पॉन्स भ्रम से भरा हुआ था। ऐसा लगा कि उन्हें पता ही नहीं था कि क्या करना है। पहले तो लॉकडाउन को बड़े लचर तरीके से लागू किया गया। मुंबई देश की वित्तीय धड़कन है। वहाँ कोरोना रोकने के लिए जो प्रशासनिक मुस्तैदी चाहिए थी, वह नदारद थी। इस प्रशासनिक लचरपन को राजनीतिक बयानबाजी की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता। 

शायद राज्य सरकार चाहती थी कि प्रवासी जल्द से जल्द दूर चले जाएँ और राज्य की समस्या कम हो जाए। पर हुआ उसका उल्टा ही। शुरू के दिनों में महाराष्ट्र में लॉकडाउन को लेकर जो अनिश्चितता बनी, उसके कारण वहाँ परिस्थिति विषम से विषमतर होती गई l आज स्थिति है कि महाराष्ट्र में 52,000 से ज्यादा कोरोना पीड़ित हैं।

महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में इसकी तैयारी नहीं है। राजनीतिक रस्साकशी और नेतृत्व की अनुभवहीनता के कारण महाराष्ट्र जैसी सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था ऐसे लगता है कि लाचार हो गई है। इससे उलट उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो मुख्यमंत्री योगी ने शुरू के दिनों में लॉकडाउन में बेहद सख्ती दिखाई और बाद में मजदूरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार रखा।

इसी के कारण शायद वे अपने यहाँ कोरोना के संक्रमण को काफी सीमित रख पाए है। उधर गुजरात और तमिलनाडु में भी शुरू में इस समस्या की अनदेखी की गई। वहाँ भी मजदूरों के संकट को कम करके आँका गया। दिल्ली का हाल भी बुरा है। तीनों राज्यों में कोरोना संक्रमण की स्थिति नाज़ुक है।

कहा जा सकता है कि इस विपदा की घड़ी में कुछ राज्यों का नेतृत्व कसौटी पर सही नहीं उतरा। उसने मजदूरों को तकलीफ में फँसे अपने देशवासियों के रूप में न देखकर एक समस्या के रूप में देखा। उस समस्या को अपने से दूर रखने की कोशिश की। नेतृत्व में ज़रूरी संवेदनशीलता के अभाव से ये समस्या और भी गंभीर हो गयी। नहीं तो हमें देश में ऐसे दृश्य नहीं देखने को मिलते जो आज मीडिया में दिखाई दे रहे हैं।

फिर भी यह कहना पड़ेगा कि भारतीय समाज ने हर स्थान पर प्रवासी परिवारों से अपनत्व का व्यवहार किया। हर स्थान पर जिससे जितना संभव हुआ, लोगों ने इनके दिक्कते दूर करने के लिए प्रयास किए।

सामाजिक-धार्मिक संस्थानों जैसे गुरुद्वारों, मंदिरों, स्थानीय संस्थाओं, सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सैकड़ों अन्य छोटे बड़े संगठनों और व्यक्तिगत तरीके से लोगों ने जितना भी बन पड़ा, अपने इन प्रवासी मजदूर भाइयों के लिए किया। खाना, पानी, वाहन, राशन, चिकित्सा  आदि की व्यवस्था की। अगर यह सामाजिक शक्ति भारत में नहीं होती तो यह संकट कितना बड़ा हो सकता था, इसकी कल्पना करना भी तकलीफदेह है।

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