Saturday, April 17, 2021
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अब ‘नए जिन्ना’ के साथ खुल कर ‘इलू-इलू’ करेंगे ‘कार वाले साहब’? GHMC चुनाव के बाद BJP के लिए खुला दक्षिण का रास्ता

अपना मेयर बनाने के लिए केसीआर को ओवैसी का समर्थन लेना होगा। इससे अमित शाह के उन आरोपों को मजबूती मिलेगी जिसमें उन्होंने कहा था कि ये दोनों नेता बंद कमरे में 'इलू-इलू' करते हैं और गुप्त समझौता करते हैं। इससे भाजपा को इन दोनों की मिलीभगत को बेनकाब करने में आसानी होगी।

ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (GHMC) के चुनावों में भाजपा ने जिस तरह से शानदार प्रदर्शन किया है, उससे तेलंगाना में TRS की मुश्किलें बढ़ गई हैं। भाजपा ने इस चुनाव को KCR बनाम मोदी भी नहीं होने दिया और ओवैसी भाइयों की कट्टरवादी राजनीति पर निशाना साधते हुए वोट माँगे। इस चुनाव में अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी पार्टी को हुआ है तो वो TRS है, जिसकी सीटों की संख्या 99 से सीधे 55 पर आकर रुक गई

5 लोकसभा क्षेत्रों और 24 विधानसभा क्षेत्रों में फैले इस चुनाव के बाद भाजपा की नजर सीधा 2023 में होने वाले तेलंगाना विधानसभा चुनाव पर है। 120 सदस्यीय विधानसभा में फ़िलहाल TRS के पास 102 और AIMIM के पास 7 सीटें हैं। ये सातों ही सीटें हैदराबाद की ही हैं। ऐसे में भाजपा के पास राज्य में पाने के लिए बहुत कुछ है और हिंदी पट्टी से बाहर निकल कर उत्तर-पूर्व में दबदबा बनाने वाली पार्टी अब बंगाल और दक्षिण में एंट्री ले रही है।

इन चुनाव परिणामों में भाजपा की सबसे बड़ी सफलता ये है कि कोई भी एक दल अपने बलबूते मेयर नहीं बना सकता। भाजपा को अपना मेयर बनाना नहीं है, पार्टी नेता साफ़ कर चुके हैं। ऐसे में अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान जो आरोप लगाया था कि ओवैसी और KCR बंद कमरे में ‘इलू-इलू’ करते हैं और गुप्त समझौता करते हैं, वो अब खुलेआम किया जा सकता है। इससे भाजपा को इन दोनों की मिलीभगत को बेनकाब करने में आसानी होगी।

सबसे ज्यादा संभावना है कि मेयर TRS का होगा और AIMIM के समर्थन से बनेगा। दोनों दलों के इस गठबंधन को भाजपा 2023 विधानसभा चुनाव में मुद्दे बनाएगी और जनता को बताने की कोशिश करेगी कि ये दोनों दल आपस में मिले हुए हैं। 48 सीटों के साथ भाजपा के पास अब राजधानी हैदराबाद में संगठन का दबदबा बढ़ाने में मदद मिलेगी। बूथ स्तर पर चुनावी मैनेजमेंट में विश्वास रखने वाली पार्टी के लिए ये अच्छा मौका है।

भाजपा ने इशारा दिया है कि अब आगे उसका निशाना मुख्यमंत्री KCR ही होंगे, जिनकी आरामतलबी को पार्टी जनता के समक्ष रखेगी। उनके बारे में एक कहावत है कि साहब कार से आएँगे और वोट माँगेंगे। उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न कार है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो कई-कई दिनों तक सचिवालय नहीं जाते और जनता के बीच में नहीं आते। ऐसे में ‘निजाम-नवाब कल्चर’ को खत्म करने की बात करने वाली भाजपा ये मुद्दा उठाने से चूकेगी नहीं।

TRS ने मुफ्त स्वच्छ जल देने का वादा किया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हैदराबाद का नाम भाग्यनगर रखने का वादा किया। वहीं अकबरुद्दीन ओवैसी ने वही कट्टरवादी रवैया अपनाते हुए ‘किसी के बाप से न डरने’ वाला बयान दिया था। उनके बड़े भाई असदुद्दीन ओवैसी ने अपने संसाधनों को जिताऊ सीटों पर केंद्रित करने के लिए आधी से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ी, जिससे TRS को फायदा मिला।

हालाँकि, इससे एक नुकसान ये भी हो सकता है कि अब तक कई मुद्दों पर TRS ने संसद में भाजपा का साथ दिया था और राष्ट्रवादी मसलों पर भी KCR अक्सर दूसरी विपक्षी पार्टियों से अलग रुख दिखाती थी। अब इसमें कुछ बदलाव आ सकता है, क्योंकि विपक्ष विहीन राज्य में बिना किसी सिरदर्द के सरकार चला रहे KCR के खिलाफ अब एक मजबूत विपक्ष खड़ा हो रहा है। अब वंशवाद बनाम लोकतांत्रिक पार्टी वाला मुद्दा भी उठेगा।

लेकिन, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की YSRCP के रूप में एक बड़ी पार्टी है, जो संसद में भाजपा का साथ दे सकती है। CAA पर भी आंध्र प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों ने संसद में भाजपा का साथ दिया था। ऐसे में राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव या अहम मसलों और संसद में वोटिंग के मामले में KCR के अन्य विपक्षी दलों का साथ देने के खतरे को भाजपा अब मोल लेने की स्थिति में आ गई है। ओडिशा में नवीन पटनायक भी कुछेक मसलों पर उसका साथ देते हैं।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने हैदराबाद में तो रैलियाँ की ही, लेकिन साथ ही जिस तरह से सिकंदराबाद के सांसद जी किशन रेड्डी ने चुनाव प्रचार किया, उससे पार्टी को फायदा मिला। भाजपा जनता को ये समझाने में कामयाब रही कि ओवैसी और KCR साथ हैं। इससे ये भी पता चलता है कि सीएम के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी बढ़ रही है, जो 2023 में उनके 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के साथ चरम पर होगी।

हालाँकि, इसे सिर्फ भाजपा आलाकमान की अंतिम सप्ताह में की गई रैलियों के मद्देनजर ही नहीं देखा जाना चाहिए। इसकी रणनीति राज्य की यूनिट ने तैयार की थी और प्रदेश भाजपा ने कार्यकर्ताओं को सड़क पर काफी पहले से उतार रखा था। जब अकबरुद्दीन ओवैसी ने PV नरसिम्हा राव और NTR के नाम पर बने स्थलों को ध्वस्त करने की बात की तो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बंदी संजय ने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो सबसे पहले AIMIM का दफ्तर मिट्टी में मिला दिया जाएगा।

हाल ही में जब हैदराबाद में बाढ़ आई थी, तब पुराने शहर में कुछ AIMIM कार्यकर्ताओं को वित्तीय सहायता देकर इतिश्री कर ली गई। भाजपा ने इस मुद्दे को भी उठाया कि संकट के काल में राज्य की दोनों बड़ी पार्टियाँ नदारद रहीं। TRS का अति-आत्मविश्वास उसे ले डूबा, क्योंकि एग्जिट पोल्स में 75 सीटें देख कर ही KCR-KTR पिता-पुत्र के पोस्टरों का दूध से अभिषेक शुरू हो गया था। ओवैसी को तेजस्वी सूर्या ने ‘नया जिन्ना’ बता दिया, जो मीडिया में बहस का मुद्दा बना।

हालाँकि, वोट शेयर के मामले में चौथे स्थान पर रही भाजपा के लिए ये चिंता का विषय ज़रूर है, लेकिन अब उसके पास एक रणनीति है कि किन क्षेत्रों पर ध्यान देना है और कहाँ उन्हें दिक्कत है। एक और बात जो भाजपा के पक्ष में गई, वो ये है कि KCR के मंत्री बेटे KTR को संगठन और सरकार में बड़ी भूमिका देने के खिलाफ पार्टी ने आवाज़ उठाई और बताया कि भाजपा कैसे इन वंशवादी पार्टियों से अलग है।

योगी फैक्टर और मजबूत हो रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव में हमने उनका दमदार स्ट्राइक रेट देखा। वहाँ उन्होंने 18 सीटों पर चुनाव प्रचार किया और उनमें से 13 भाजपा जीतने में कामयाब रही। हैदराबाद में भी जहाँ उन्होंने रैली की, उस सीट को भाजपा ने हथिया लिया। उनके बयान पूरे चुनाव में मीडिया की चर्चा का हिस्सा बने रहे। हिंदुत्व के नए फायरब्रांड नेता के रूप में उनकी स्थिति बहुत ही मजबूत हुई है।

कुल मिला कर भाजपा ने जिस दक्षिण में एंट्री का स्वप्न अटल-आडवाणी के काल से देखा था, वो अब साकार हो रहा है। कर्नाटक में पार्टी सत्ता में रही है और अभी भी है। लेकिन केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में उसके लिए हमेशा चीजें मुश्किल रही हैं। हैदराबाद के सहारे अगर पार्टी तेलंगाना में मजबूत स्थिति में आती है तो फिर पड़ोसी आंध्र और उसके बाद केरल में जा सकती है। तमिलनाडु में AIMIM के साथ गठबंधन जारी रहेगा, अतः निकट भविष्य में वहाँ पार्टी के लिए संभावनाएँ कम हैं।

अंत में बात कॉन्ग्रेस की, जो बात करने लायक ही नहीं है। राहुल-सोनिया प्रचार करने नहीं गए। परिणाम आने के बाद आलाकमान को बचाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने कॉन्ग्रेस और TDP के पुराने वोटरों को अपने पाले में किया। हैदराबाद में रहने वाले आंध्र प्रदेश के लोगों की पहली पसंद भाजपा बनी और इस मामले में उसने कॉन्ग्रेस को पछाड़ा। भाजपा को असली आत्मविश्वास नवंबर के दुबक्क उपचुनाव में जीत से मिली थी।

यहाँ एक बात का जिक्र करना आवश्यक है कि आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेलंगाना से TDP गायब हो गई। ये होना ही था, क्योंकि विभाजन के लिए हुए आंदोलन में जिस कदर हिंसा हुई थी और जो पागलपन देखने को मिला था, उसके बाद दोनों राज्यों के राजनीतिक दलों का एक-दूसरे के राज्य से सफाया सा हो गया। भाजपा के पास पाने के लिए यहाँ सब कुछ है, खोने के लिए कुछ नहीं। भाजपा का कुछ भी इन दोनों राज्यों में दाँव पर नहीं लगा है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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