सोशल मीडिया पोस्ट के लिए पत्रकारों (या आम नागरिकों) की गिरफ़्तारी पर कहाँ खड़े हैं आप?

ये टुटपुँजिए पत्रकार, जिन्हें दस लोग ठीक से पढ़ते नहीं, जिनकी उपलब्धियों में वाहियात पोस्ट लिखना, गाली-गलौज, अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातें शामिल हैं, उसे पकड़ कर सरकार बेकार के हीरो ही पैदा कर रही है।

नेहरू बाबा ने पहले संविधान संशोधन में ही ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर अस्पष्ट शब्दों का सहारा लेकर ऐसे ब्रेक लगाए थे जो सरकारें और न्यायालय अपने हिसाब से समझ सकती हैं, और उस पर कार्रवाई कर सकती हैं। नेहरू बाबा को संपूर्ण स्वतंत्रता से भय रहा हो या वो आलोचना का गला घोंटना चाहते हों, मुझे नहीं पता, लेकिन सत्य यह है कि भारतीय संविधान में ‘एब्सलूट फ़्रीडम’ नहीं है। आपकी स्वतंत्रता वहाँ ख़त्म हो जाती है, जहाँ से दूसरे की शुरू होती है।

राहुल गाँधी ट्वीट कर रहे हैं कि पत्रकारों को छोड़ा जाए और यूपी सरकार ने जो किया है वो मूर्खतापूर्ण है क्योंकि उनके हिसाब से राहुल गाँधी पर जितने फेक न्यूज और प्रोपेगेंडा फैलाए गए हैं, सब पर कार्रवाई की जाए तो हर न्यूज पेपर में स्टाफ़ की कमी हो जाएगी। ये ट्वीट राहुल गाँधी का है जिनकी पार्टी उस सरकार में हिस्सेदार है जहाँ हाल ही में कुमारस्वामी पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए एक पत्रकार को गिरफ़्तार किया गया है।

राहुल गाँधी वर्तमान में जीने वाले व्यक्ति हैं। अंग्रेज़ी में जिसे ‘लिविंग इन द मोमेंट’ कहा जाता है। फ़र्क़ बस इतना है कि कई लोग इस दर्शन को जीवन में निजी चुनाव के कारण उतारते हैं, वहीं कई लोग स्मृतिदोष के कारण ऐसा करने को मजबूर होते हैं। राहुल गाँधी वर्तमान में सिर्फ इसलिए जीते हैं क्योंकि उन्हें अपने ही पार्टी, परिवार या देश के इतिहास का तो छोड़िए, एक दिन पहले की घटना तक का भी भान नहीं होता।

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राहुल गाँधी को इंडियन एक्सप्रेस पर कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा की गई छापेमारी की याद कैसे होगी भला जब उनके पिता की सरकार ने लगातार, एक के बाद एक दफ़्तरों पर सरकारी अफ़सरों की टोली भेज कर रेड्स किए थे क्योंकि अख़बार सरकार और रिलायंस के बीच के धंधे पर लिख रहा था। राहुल को जब यही याद नहीं रहता कि अमेठी के वो सांसद थे, तो इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी और पिता के कारनामे क्यों याद रहेंगे!

उसके बाद राजदेव रंजन जैसे पत्रकारों की राजद-जदयू सरकार में हत्या से लेकर, लगभग हर दिन बंगाल में हो रही राजनैतिक हत्याओं पर चुप्पी साधने वाले पत्रकार एक पत्रकार की गिरफ्तारी पर प्रेस क्लब में जा रहे हैं। ये लोग गौरी लंकेश कांड पर भी प्रेस क्लब में गए थे, लेकिन उसी समय के आसपास बाईस और पत्रकारों को भी अलग-अलग राज्यों में मार दिया गया था, उस पर न ट्वीट आए, न पोस्ट लिखे गए।

बेचारों-सी शक्ल लेकर धूर्तता भरी बात करने वाले रवीश कुमार लेख लिख रहे हैं कि अनुपम खेर ‘इंसाफ़’ माँग रहे हैं जबकि उन्हें ये कहना चाहिए था, वो कहना चाहिए था। बात यह है कि रवीश जी खुद को ज्ञान का सागर समझ कर अवसाद में डूब चुके हैं। वो जो अनुपम खेर को करने कह रहे हैं, बेचारे खुद ही नहीं कर पाते। अनुपम खेर अगर अपनी तख्ती पर रवीश द्वारा सुझाए शब्द नहीं लिख पा रहे तो सवाल यह भी है कि रवीश ने कब अपनी विचारधारा के विपरीत जा कर ममता बनर्जी को लताड़ा और इस्तीफा माँगा कि आपके राज्य में कानून व्यवस्था बर्बाद है, नहीं सँभल रही तो छोड़ दीजिए?

रवीश ने कितनी बार ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों में हुई पत्रकारों की हत्याओं को लेकर डभोलकर, पनसरे, कलबुर्गी आदि का दोष निवर्तमान सरकारों पर डाला है? शून्य बार। इसलिए रवीश जो कर रहे हैं वो पत्रकारिता नहीं है, और यही कारण है कि मैं इन लोगों के पीछे तब तक लगा रहूँगा जब तक ये अपनी लिबरपंथी से बाज़ नहीं आ जाते।

ये कहना बहुत आसान होता है कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा रही है जब आपके मालिक के घर पर टैक्स चोरी के केस में छापे पड़ते हैं। मुसलमानों के प्रतीकों पर दो शब्द बोलने वाला यूपी की जेल में पड़ा हुआ है और त्रिशूलों पर कंडोम बनाने वाले, ‘सेक्सी दुर्गा’ फिल्म बनाने वाले, हिन्दू प्रतीकों को बलात्कार का पर्याय बताने वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ ले लेते हैं, और आप डिफ़ेंड करते हैं।

किसी भी नागरिक को सोशल मीडिया पोस्ट आदि के लिए जेल में ले जाना अनुचित है। ये ग़ैरक़ानूनी नहीं है, लेकिन क़ानूनों को बदलने की ज़रूरत है। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग हमेशा आलोचना, गाली और कट्टर विरोध झेलेंगे क्योंकि वो प्रकृति है विरोध की। इसमें हर तरह की घृणित गालियाँ दी जाएँगी, अफ़वाह फैलाए जाएँगे। ये मानवीय प्रकृति है जिसे आप पूरी तरह से दबाने पर उतरेंगे तो शायद हर पाँच साल पर हर व्यक्ति एक बार जेल में होगा।

आज ही किसी ने मुझे कुछ स्क्रीनशॉट्स भेजे जिसमें फेसबुक पर एक मुसलमान और एक ईसाई यह लिख रहा है कि वो रेप करना चाहता है, रेप की धमकी दे रहा है। ये कैसी मानसिकता है और इस विचार को बढ़ावा कौन दे रहा है? ऐसा नहीं है कि हिन्दू ऐसा नहीं करते। संदर्भ बदलते ही इस तरह के लोग ऐसी कुत्सित विचारधारा का प्रदर्शन करते हैं।

इसका समाधान, या पब्लिक फ़िगर को लेकर की गई टिप्पणियों पर पुलिसिया प्रतिक्रिया सही नहीं है। यहाँ दिन भर में अरबों कमेंट टाइप होते हैं, करोड़ों बातें लिखी जाती हैं, लाखों सत्ता-विरोधी बातें पोस्ट होती हैं, और हजारों लोग बहुत ही घटिया शब्दों का प्रयोग करते हैं। आप कितनों को पकड़ेंगे? क्या आपके जेल में जगह है? क्या आपकी पुलिस के पास प्राथमिकताएँ हैं ऐसी कि वो कमेंट या पोस्ट के लिए जेल में डाले?

क्या हमारे पास इतना समय है कि ऐसे सड़कछाप पत्रकारों के ट्वीट पर उसके घर दो पुलिस वाले को भेज कल उठवा लिया जाए जबकि हर मिनट बलात्कार हो रहे हैं? क्या सरकारों की पुलिस या कोर्ट जैसी संस्थाओं के पास ऐसी बातों के लिए समय है जबकि करोड़ से अधिक गंभीर केस लंबित पड़े हैं?

समाधान फेसबुक या ट्विटर लाएगा जब उनकी एआई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) की तकनीक हिन्दी सहित तमाम भाषाओं में लिखे जा रहे शब्दों को स्वतः ब्लॉक करने लगेगी। अभी यह तकनीक शैशवावस्था में है और अंग्रेज़ी के शब्दों पर ही थोड़ा-बहुत काम कर पा रही है। यह तस्वीरों को देखकर अब हिंसक तस्वीरें, विडियो आदि को पोस्ट होने के पहले ही सेकेंड में डिलीट करने में सक्षम है। लेकिन भाषा को समझना, शब्दों को समझना और उनके संदर्भ में उनका अर्थ निकाल कर उन्हें ब्लॉक कर पाना, अभी टेक्नॉलॉजी की दुनिया में एक बहुत बड़ा चैलेंज है।

इसे आप तकनीक से ही सुलझा सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र में गालियाँ देने वाले हर घर में हैं, और आपके जेल पहले से ही क्षमता से कई गुणा ज्यादा भरे हुए हैं। साथ ही, क्या सरकारों के पास इतना समय है कि वो किसी नेता को मिल रही गालियों पर अपना समय व्यर्थ करे? ये पत्रकार आदि जो काम कर रहे हैं, उनके पोस्ट्स का अगर बहुत व्यापक असर न हो रहा हो, तो इन्हें लिखने की छूट होनी चाहिए।

अगर इनके ट्वीट या पोस्ट से दंगे भड़कने का डर हो, लोगों को क्षति पहुँच सकती हो, लोगों में द्वेष फैलने की आशंका हो तो इस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन, अगर वो प्रधानमंत्री मोदी को या मुख्यमंत्री योगी को गाली दे रहा हो, कुछ अश्लील कमेंट कर रहा हो तो उस पर पुलिस भेजना हर लिहाज से गलत है। आप चाह कर भी ऐसे मामलों में कुछ भी नहीं कर सकते। आप हर व्यक्ति तक नहीं पहुँच सकते। मुझे कोई यह बताए कि क्या उस पत्रकार ने जो शेयर किया वो ज़्यादा घटिया है या सोनिया, राहुल, ममता, केजरीवाल समेत दसियों नेता द्वारा मोदी को दरिंदा, हरामखोर, हत्यारा, चोर आदि कहना?

पुलिसों ने इन नेताओं को क्यों गिरफ़्तार नहीं किया? क्योंकि आप नहीं कर सकते। मोदी जी खुद ही कहते हैं कि रैलियों में ये सब चलता रहता है। जब रैलियों में यह सब चलता रहता है तो फिर आम जनता को विरोध हेतु गाली देने का अधिकार क्यों नहीं है? अगर कानून लगाना है तो पहले तो नेता लोगों पर लगाया जाए जिनकी बातें करोड़ों लोग सुनते हैं। ये टुटपुँजिए पत्रकार, जिन्हें दस लोग ठीक से पढ़ते नहीं, जिनकी उपलब्धियों में वाहियात पोस्ट लिखना, गाली-गलौज, अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातें शामिल हैं, उसे पकड़ कर सरकार बेकार के हीरो ही पैदा कर रही है।

नेता हैं तो गालियाँ पड़ेंगी। ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी जरूर है लोकिन 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में, कोर्ट और पुलिस दोनों ही ओवरटाइम कर रही है, वहाँ इन टुटपुँजिया केसों पर सरकार द्वारा ध्यान देना बताता है कि सरकारों की प्राथमिकताएँ हिली हुई हैं। बहुत सी बातें गलत हैं लेकिन उपेक्षा करनी होती है उनकी। हर सोशल मीडिया ट्रोल से सरकार भिड़ नहीं सकती, न ही ऐसा करना सही है।

इन बातों से कितना नुकसान हो रहा है, किसका नुकसान हो रहा है, क्या इसका प्रभाव व्यापक है, क्या इससे सही में समाज को क्षति पहुँच सकती है आदि प्रश्नों का जवाब सोचने के बाद ही ऐसी कार्रवाई करने की बात होनी चाहिए। मुझे लगता है कि देश में रवीश कुमार जैसों के पाँच साल के अजेंडाबाजी के बाद भी मोदी का बहुमत पा जाना बहुत कुछ कहता है। इस बहुमत का सीधा मतलब यह है कि जब रवीश कुमार जैसे लोगों के लगातार लिखने-बोलने से जनता पर कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ा तो ये दो कौड़ी के इंटरनेट ट्रोल किसी सरकार या नेता की छवि क्या ख़ाक बिगाड़ेंगे।

इसलिए सरकारों को थोड़ा चिल करना चाहिए। ट्रोलों से ट्रोल निपट लेंगे। सोशल मीडिया पर हर विचारधारा के ट्रोल उचित मात्रा में उपलब्ध हैं और अपने विरोधियों को दिन-रात अपने इंटरनेट और बिजली के ख़र्चे पर धोते रहते हैं। इसमें सरकार को उलझना ही नहीं चाहिए क्योंकि कानूनन जिसने आपको गाली दी, वो गलत है तो आपको डिफ़ेंड करते हुए जिसने उस पत्रकार की माँ-बहन को गोली दी, वो भी तो गलत ही है। क्या सरकार इस एक ट्वीट के ही दायरे में आए हर ट्रोल को जेल भेज सकती है? उत्तर है: नहीं।

मतलब सरकार की पुलिस जब स्वतः संज्ञान ले या किसी की सूचना पर कार्रवाई करे, तो उसी पुलिस की ज़िम्मेदारी है कि अगर उस चोर के भी अधिकारों का हनन हुआ है, उस पर भी व्यक्तिगत टिप्पणियाँ की गई हैं, तो उसे भी कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। इसलिए, मेरा कहना यही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकार थोड़ा आराम से फ़ैसले ले, क्योंकि कविवर रहीम ने दोहे में (नहीं) कहा है:

जैसे को तैसा मिले, मिले नीच को नीच 
पानी में पानी मिले, मिले कीच में कीच
वामी को कामी मिले, जिनका नहीं है मोल
ज्ञानी को ज्ञानी मिले, मिले ट्रोल को ट्रोल
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