Tuesday, April 20, 2021
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नक्सली हमले पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले कन्हैया कुमार, 76 CRPF जवानों की मौत का जश्न किसने मनाया था? युद्ध में चीन के साथ कौन था?

रवीश कुमार को दिए इंटरव्यू में इसी कन्हैया कुमार ने कहा था कि जिन आदिवासियों को नक्सली कह कर मारा जाता है, वो निर्दोष और भोले-भाले लोग हैं। JNU में इसी कन्हैया कुमार के गैंग पर भारतीय सेना के अपमान का आरोप लगा था। आज ये खुद को जवानों का हितैषी बता कर पेश कर रहे।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों ने घात लगा कर हमारे सुरक्षा बलों पर हमला किया, जिसमें 22 जवान बलिदान हो गए। ये नक्सलियों की एक सोची-समझी साजिश थी, क्योंकि 3 गाँव खाली करा लेना और किसी क्षेत्र में 15 दिनों तक डटे रहने का अर्थ है कि उन्हें वहाँ के कुछ लोगों से समर्थन मिला और उनके शहरी आकाओं से भी। लेकिन, कन्हैया कुमार जैसे लोग इस नक्सली हमले और बलिदानी जवानों की लाशों पर राजनीति कर रहे हैं।

कन्हैया कुमार ने इस दुःखद घटना को लेकर किए गए अपने ट्वीट में लिखा, “बाप गृहमंत्री, बेटा BCCI सेक्रेटरी… बाप किसान, बेटा जवान… बेशर्म सत्ता से पूछिए कि कितने मंत्रियों के बच्चे फ़ौज में शामिल होते हैं? कायराना नक्सली हमले में लहू देश के आम लोगों का बहता है और कुर्सीजीवी इसका फ़ायदा उठाते हैं। देश को ये साज़िश समझनी होगी। वीर जवानों व किसानों को नमन!” क्या आपको किसी हिसाब से भी यह शोक जताने वाला ट्वीट लगता है?

अब आते हैं मंत्रियों के या उनके परिजनों के फ़ौज में होने की बात पर। केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की बेटी सेना में हैं। उनकी बेटी कैप्टन डॉक्टर श्रेयसी निशंक हरिद्वार के रुड़की स्थित मिलिट्री हॉस्पिटल में सेवारत हैं। वो 2018 में आर्मी मेडिकल कॉर्प्स में शामिल हुई थीं। उनकी इस उपलब्धि पर उनके पिता ने कहा था कि बेटियाँ किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं होतीं। क्या इससे कन्हैया कुमार के झूठ का पर्दाफाश नहीं होता?

केंद्रीय सड़क एवं परिवहन राज्यमंत्री विजय कुमार सिंह (जनरल वीके सिंह) भारत के सेना प्रमुख रहे हैं। जनरल वीके सिंह गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र से लगातार दो बार बड़े अंतर से सांसद बने हैं। वे भारतीय सेना के डेकोरेटेड अधिकारी रहे हैं, जिन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए। ये तथ्य भी कन्हैया कुमार के दावों की पोल खोलता है। केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर इसी साल ‘टेरिटोरियल आर्मी’ में कैप्टन बने। वो इस पद पर जाने वाले न सिर्फ पहले केंद्रीय मंत्री, बल्कि पहले सांसद हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाई सेना में सूबेदार हैं और LAC पर पहरा देते हैं। सूबेदार शैलेन्द्र मोहन यूपी सीएम के छोटे भाई हैं, जो सालों भर संवेदनशील क्षेत्र में पेट्रोलिंग में लगे रहते हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री BC खंडूरी सेना में मेजर जनरल हुआ करते थे। अप्रैल 2019 में 7 और उसी साल जुलाई में 2 सैन्य अधिकारियों ने रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा के लिए भाजपा को अपनी पहली पसंद बनाया।

केंद्रीय मंत्री रहे राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने 1990-2013 तक सेना में सेवा दी थी और वो जम्मू-कश्मीर के आतंकरोधी ऑपरेशन का हिस्सा भी रहे थे। वो रिटायर्ड कर्नल हैं। जसवंत सिंह और जगतवीर सिंह जैसे सैन्य अधिकारियों ने राजनीतिक पारी के लिए भाजपा को पहली पसंद बनाया। असली बात तो ये है कि वामपंथी नेता अक्सर सेना को गाली देते हैं और फिर पूछते हैं कि तुम्हारे परिजन सेना में क्यों नहीं हैं?

ऐसे में, जब कोई कन्हैया कुमार यह कह रहा होता है कि मोदी सरकार के मंत्रियों या उनके परिजन सेना में नहीं हैं, तो वो चाहता है कि आप जनरल वीके सिंह, कैप्टन श्रेयसी निशंक और कैप्टन अनुराग ठाकुर के बारे में ये सब न जान पाएँ। ये लोग उस विधारधारा के समर्थक हैं, जिसकी पुरोधा अरुंधति रॉय जैसे लोग हैं। अरुंधति रॉय ने एक अंतरराष्ट्रीय मंच से खुलेआम कहा था कि भारतीय सेना अपने ही लोगों को मारती है।

आज जब ऐसे लोग घड़ियाली आँसू लेकर आ जाएँ तो क्या इससे वो देशभक्त साबित हो जाएँगे? रवीश कुमार को दिए इंटरव्यू में इसी कन्हैया कुमार ने कहा था कि जिन आदिवासियों को नक्सली कह कर मारा जाता है, वो निर्दोष और भोले-भाले लोग हैं। JNU में इसी कन्हैया कुमार के गैंग पर भारतीय सेना के अपमान का आरोप लगा था। आज ये खुद को जवानों का हितैषी बता कर पेश कर रहे।

अब आते हैं कन्हैया कुमार जैसों के इतिहास पर, जिससे पता चल जाता है कि सेना को लेकर बहाए गए इनके आँसू घड़ियाली हैं। जिस छत्तीसगढ़ में ये नक्सली हमला हुआ है, उसी राज्य में अप्रैल 2010 में 76 CRPF जवानों को नक्सलियों ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था। उसी राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा था कि इस घटना के बाद JNU में जवानों की मौत का जश्न मनाया गया, जिससे वो व्यथित हो गए थे।

अधिकारी SRP कल्लूरी हमले के समय उसी क्षेत्र में DIG हुआ करते थे। उन्होंने याद दिलाया था कि किस तरह कुछ तथाकथित लेखकों ने तब इस जघन्य वारदात को ‘जनता की जीत’ बताया था। अप्रैल 2010 में JNU में ABVP और कॉन्ग्रेस का छात्र संघ NSUI, दोनों ने ही वामपंथियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने जवानों की हत्या का जश्न मनाया। बचाव में वामपंथियों ने कहा था कि वो तो बीएस ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ का विरोध कर रहे थे।

नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाने का विरोध करने वाले ये नक्सली आज उन जवानों के हितैषी बन रहे हैं। तब NSUI के महासचिव रहे शेख शाहनवाज ने बताया था कि DSU (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन) और AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स यूनियन) ने जवानों की हत्या का जश्न मनाया था। बता दें कि AISA राजनीतिक दल CPI(M-L) लिबरेशन का छात्र संघ है। कन्हैया कुमार CPI के नेता हैं। फिर इनमें और प्रतिबंधित SIMI में कोई अंतर ही कहाँ रहा?

अब आते हैं भारत में वामपंथियों के इतिहास पर। याद कीजिए, 2020 में भारत-चीन के बीच संघर्ष में जब हमारे कई जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे तब इन चीन समर्थक वामपंथी दलों ने अपने बयान में कहीं भी चीन की निंदा नहीं की थी। 50 के दशक में तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू जब चीन के साथ नजदीकियाँ बढ़ा रहे थे, तब कॉन्ग्रेस में भी उनका विरोध हुआ। लेकिन, चीन ने तब CPI से अपील की थी कि वो नेहरू का साथ दे।

1959 में CPI ने तिब्बत पर चीन के आक्रमण का समर्थन किया था और कहा था कि तिब्बत को चीन मध्यकालीन अंधकार से निकाल रहा है। तब वामपंथी पार्टियों ने तिब्बत के विद्रोह के पीछे ‘भारतीय प्रतिक्रियावादियों और पश्चिमी साम्राज्यवादियों’ का हाथ बताया था। चीन सीमा पर खड़ा था और CPI उसे भारत की सीमा मान भी नहीं रही थी। कोलकाता और पंजाब में चीन समर्थक वामपंथी खासे सक्रिय थे।

आज कन्हैया कुमार को सबसे पहले अपनी पार्टी से पूछना होगा कि सेना में उनके परिजनों के होने की बात तो दूर, वामदलों के कितने नेताओं ने भारतीय सेना का समर्थन किया है? कन्हैया कुमार को सवाल खुद से पूछना होगा कि JNU में जब देशविरोधी नारे लगे थे तो उसके बाद आरोपों की सूई घूम-फिर कर उन तक क्यों पहुँची थी? अर्बन नक्सलियों के समर्थक खुद को जंगली नक्सलियों का विरोधी बताने के हक़दार नहीं।

अंत में ये याद दिलाना ज़रूरी है कि शाहीन बाग़ और किसान आंदोलन के दौरान भीमा-कोरेगाँव में खून बहाने वाले नक्सलियों की रिहाई की माँग की गई थी। मार्च 2021 में ऐसे ही एक नक्सली वरवरा राव स्वास्थ्य कारणों के आधार पर 6 महीने की जमानत लेने में कामयाब रहा। उस पर माओवादियों के साथ मिल कर हमले की साजिश रखने का आरोप है। मार्च में वरवरा राव छूटा। अप्रैल में 22 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए।

छत्तीसगढ़ में काफी प्लानिंग के बाद करीब 400 नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर हमला किया था। इस माओवादी हमले का नेतृत्व प्रतिबंधित संगठन के ‘बटालियन नंबर 1’ का कुख्यात कमांडर माडवी हिडमा कर रहा था, जिसकी तलाश पुलिस को कई वर्षों से है। जवान जब जोनगुडा, जीरागाँव और टेकलगुड़ुम से अपने कैम्प लौट रहा था, तभी ये हमला हुआ। नक्सली ये तीनों गाँव खाली करा चुके थे।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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