पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नाम बदलने’ के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। कोलकाता की ऐतिहासिक और बेहद व्यस्त सड़कों में से एक ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ (Suhrawardy Avenue) का नाम अब बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ (Gopal Mukherjee Road) कर दिया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा जारी इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे ‘ऐतिहासिक न्याय’ और ‘हिंदुओं के स्वाभिमान की बहाली’ बताकर जश्न मना रही है, वहीं कॉन्ग्रेस और वामपंथी खेमे में इसके खिलाफ तीखा विरोध देखा जा रहा है।
कॉन्ग्रेस इस फैसले को भाजपा की ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ करार दे रही है और सोशल मीडिया पर आम हिंदुओं को भाजपा कार्यकर्ता बताकर उनका मजाक उड़ा रही है। कॉन्ग्रेस का तर्क है कि यह सड़क ‘बंगाल के कसाई’ कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके चाचा और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (VC) डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी।
मूर्खों की जमात है यह भाजपाइयों की। हसन सुहरावर्दी और हुसैन सुहरावर्दी में फ़र्क़ ही नहीं पता इन जाहिलों को। https://t.co/DR8GXy93Ly
— Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ (@Pawankhera) June 21, 2026
लेकिन क्या वाकई इतिहास इतना सीधा और साफ है? क्या सिर्फ नाम का अंतर होने से एक देशद्रोही और अंग्रेजों के मददगार परिवार का दाग धुल जाता है? क्या कॉन्ग्रेस का इस सुहरावर्दी परिवार से लगाव सिर्फ आज का है या इसके तार देश के बंटवारे, जवाहरलाल नेहरू और पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह तक जुड़े हुए हैं? आइए इस पूरी कड़वी हकीकत, दफन इतिहास और ‘गोपाल पाठा’ के शौर्य की कहानी को विस्तार से समझते हैं।
कौन था हसन सुहरावर्दी? अंग्रेजों की चाटुकारिता और ‘सर’ की उपाधि का सच
कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम साल 1933 में डॉ. हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक बड़े सर्जन और शिक्षाविद थे। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि हसन सुहरावर्दी को अंग्रेजों ने ‘सर’ (Sir) की उपाधि और यह सड़क उनके किसी ‘अकादमिक योगदान’ के लिए नहीं, बल्कि भारत की एक महान बेटी और स्वतंत्रता सेनानी के साथ गद्दारी करने के इनाम में दी थी।
बात 6 फरवरी 1932 की है। कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन (Sir Stanley Jackson) भाषण दे रहा था। उसी समय 21 साल की एक निडर बंगाली स्वतंत्रता सेनानी बीना दास (Bina Das) अपनी डिग्री लेने के बहाने वहाँ पहुँचीं। उनके पास एक रिवॉल्वर थी, जिसे उन्होंने अपनी पोशाक में छुपा रखा था। भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के संकल्प के साथ बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर एक के बाद एक 5 गोलियाँ दाग दीं।
गवर्नर जैक्सन ने किसी तरह झुककर अपनी जान बचाई। इसी दौरान वहाँ मौजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. हसन सुहरावर्दी ने देशभक्त बीना दास को पीछे से दबोच लिया और उन्हें ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।
इतिहास की गवाही: हसन सुहरावर्दी ने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की जान बचाने के लिए अपने ही देश की एक क्रांतिकारी बेटी को अंग्रेजों के क्रूर शिकंजे में सौंप दिया। इस ‘वफादारी’ से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने हसन सुहरावर्दी को ‘सर’ (Knighthood) की उपाधि से नवाजा और साल 1933 में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रख दिया।
इस घटना के बाद बीना दास को 9 साल की कठोर जेल हुई। उनके साथ जुड़ीं अन्य महिला क्रांतिकारियों, जैसे कमला दासगुप्ता (जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था), को लंबे समय तक जेल की कालकोठरी में यातनाएँ सहनी पड़ीं। कॉन्ग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है, वह असल में अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था। इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का कट्टर समर्थक था और उसकी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहाँ की राजनीति में सक्रिय हो गई।
‘बंगाल के कसाई’ हुसैन सुहरावर्दी से क्या था हसन का रिश्ता?
भाजपा और राष्ट्रवादी विचारकों का कहना है कि सुहरावर्दी चाहे ‘हसन’ हो या ‘हुसैन’ दोनों एक ही कट्टरपंथी और भारत-विरोधी सुहरावर्दी परिवार के सदस्य थे। हसन सुहरावर्दी रिश्ते में हुसैन शहीद सुहरावर्दी (Huseyn Shaheed Suhrawardy) का सगा चाचा था। और यह हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन था? इसे इतिहास ‘बंगाल का कसाई’ (Butcher of Bengal) के नाम से जानता है।
साल 1946 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का आह्वान किया, तब बंगाल का मुख्यमंत्री यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, उसकी पूरी स्क्रिप्ट इसी हुसैन सुहरावर्दी ने लिखी थी।
हुसैन ने मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस को बैरकों में रहने का आदेश दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी। देखते ही देखते कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से पट गईं, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और घरों को फूंक दिया गया। इस नरसंहार के पीछे इसी सुहरावर्दी परिवार का हाथ था।
नेहरू का ‘सुहरावर्दी प्रेम’ और कॉन्ग्रेस का पुराना तुष्टिकरण
अब सवाल उठता है कि कॉन्ग्रेस को इस सुहरावर्दी परिवार से इतनी हमदर्दी क्यों है? आर्काइवल रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी जो जीवनभर रही।
यही वजह थी कि जब दिसंबर 1948 में यानी देश के बँटवारे और कोलकाता नरसंहार के दो साल बाद जब ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर भारत सरकार ने इनकम टैक्स (आयकर) की देनदारी का शिकंजा कसा, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद उसके बचाव में उतर आए। नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखे। नेहरू ने चिंता जताई कि सुहरावर्दी पर कार्रवाई करने से ‘राजनीतिक परिणाम’ खराब हो सकते हैं, इसलिए मामले को रफा-दफा किया जाए या ढील दी जाए।
यह वही हुसैन सुहरावर्दी था जो भारत में करोड़ों की संपत्ति और अपनी काली यादें छोड़कर बाद में पाकिस्तान भाग गया और वहाँ का प्रधानमंत्री बना। कॉन्ग्रेस के इसी सुहरावर्दी प्रेम के कारण दशकों तक कोलकाता के दिल में हिंदुओं के हत्यारों और स्वतंत्रता सेनानियों के गद्दारों के परिवार का नाम चमकता रहा।
हिदायतुल्लाह कनेक्शन: कार्यवाहक राष्ट्रपति और पाकिस्तान जाने वाला परिवार
कॉन्ग्रेस के शासनकाल में तुष्टिकरण की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका एक और उदाहरण मोहम्मद हिदायतुल्लाह (M. Hidayatullah) का देश के शीर्ष पदों पर बैठना है। हिदायतुल्लाह भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) भी बने।
यहाँ हिदायतुल्लाह और सुहरावर्दी परिवार के तार जोड़ना महत्वपूर्ण है। हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था। शाइस्ता सुहरावर्दी मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थी। उसके शौहर मोहम्मद इकरामुल्लाह पाकिस्तान के लिए लगा और मोहम्मद अली जिन्नाह का बहुत करीबी था। हिदायतुल्लाह इसी इकारामुल्लाह का सगा छोटा भाई था।
एक तरफ इकरामुल्लाह पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव था और बाद में कनाडा, फ्रांस, पुर्तगाल और यूके में पाकिस्तान का राजदूत था और 1963 में मरा, तो दूसरी तरफ मोहम्मद हिदायतुल्लाह यहाँ भारत में न्यापालिका में सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। आजीद से पहले वो सेंट्रल प्रोविंस का जज था और 1954 में वो नागपुर हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना, जो उस समय देश का सबसे कम उम्र का चीफ जस्टिस था।
साल 1956 में वो एमपी का चीफ जस्टिस बना और 1968 में भारत का चीफ जस्टिस। इसके बाद 1969 में वो कार्यवाहक राष्ट्रपति रहा, जब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी और फिर CJI पद से रिटायर होने के बाद 1979 में देश का उप राष्ट्रपति भी बना। इस बीच 1982 में कुछ समय वो देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति एक बार फिर से बना। तब भी केंद्र में इंदिरा गाँधी की ही सरकार थी। सोचिए सुहरावर्दी परिवार की जड़ें देश में कहाँ से कहाँ तक फैली रही और कॉन्ग्रेस कैसे उसे पालती-पोसती रही। आज के जमाने में भी सवाल पूछ लिए जाए तो शायद कॉन्ग्रेसियों के पास कोई ढंग का जवाब न हो।
हकीकत यह है कि हिदायतुल्लाह का परिवार भी उसी सुहरावर्दी नेटवर्क और मुस्लिम लीग की विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। देश के विभाजन के बाद हिदायतुल्लाह के परिवार के कई करीबी लोग और रिश्तेदार भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ बड़े पदों पर आसीन हुए। लेकिन इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज जब सुहरावर्दी के नाम पर चोट होती है, तो कॉन्ग्रेस के पूरे इकोसिस्टम को दर्द होता है।
BJP is gloating over changing the name of a lane on Kolkata which was named after Hassan Suhrawardy
— Supriya Shrinate (@SupriyaShrinate) June 22, 2026
Hassan Suhrawardy was a prominent physician and the Vice-Chancellor of the University of Calcutta between 1930 and 1934
They mistook it for being named after Huseyn Shaheed… pic.twitter.com/9mZ7lx47Ev
कौन थे गोपाल पाठा? जिन्होंने कोलकाता के हिंदुओं को कटने से बचाया
अब बात करते हैं उस महानायक की, जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ रखा गया है। कोलकाता के लोग उन्हें आदर और गर्व से ‘गोपाल पाठा’ (Gopal Patha) कहते हैं। ‘पाठा’ बांग्ला शब्द है जिसका अर्थ होता है बकरा। गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक व्यवसाय था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाते थे।
16 अगस्त 1946 को जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी के गुंडों ने हिंदुओं का सामूहिक संहार शुरू किया, तब हिंदू समाज नेतृत्वविहीन और असहाय था। उस समय महज 5 फीट 4 इंच के कद वाले गोपाल पाठा हिंदुओं के रक्षक बनकर सामने आए। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”
गोपाल पाठा ने स्थानीय युवाओं को एकजुट किया और ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ (Indian National Force) नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने कसाई सुहरावर्दी के दंगाइयों को करारा जवाब दिया। गोपाल पाठा और उनके साथियों के इसी पराक्रम का परिणाम था कि मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह से पाकिस्तान में मिलाने और हिंदुओं को खदेड़ने का मंसूबा मिट्टी में मिल गया। उन्होंने अपनी जान पर खेलकर हजारों हिंदू परिवारों, माताओं और बहनों की रक्षा की।
सितंबर 1946 में महात्मा गाँधी कोलकाता आए। उन्होंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति की अपील करते हुए अपने-अपने हथियार उनके चरणों में सरेंडर करने को कहा। मुस्लिम लीग के गुंडों ने अपने कुछ जंग लगे हथियार गाँधी जी के सामने रख दिए।
जब गाँधी जी के दूत गोपाल पाठा के पास पहुँचे और उनसे हथियार डालने को कहा, तो गोपाल पाठा ने गाँधी जी के सामने जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया, “मैं अपने हथियार गाँधी जी के चरणों में क्यों रखूँ? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी महिलाओं को उठाया जा रहा था, तब गाँधी जी कहाँ थे? क्या गाँधी जी हमारी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेंगे? अगर कोई अपराधी मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूँगा, यह मेरी नजर में हिंसा नहीं, मेरा धर्म है। मैं हथियार नहीं डालूँगा।”
गोपाल पाठा ने अंत तक हथियार सरेंडर नहीं किए, क्योंकि वे जानते थे कि कायरता से शांति नहीं खरीदी जा सकती।
गोपाल मुखर्जी रोड हिंदुओं के सम्मान की बहाली, ये बीजेपी सरकार का साहसिक कदम
दशकों तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का राज रहा, जिन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गोपाल पाठा जैसे नायक को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा।
लेकिन पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के माध्यम से ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करके एक ऐतिहासिक भूल को सुधारा है।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम उस व्यक्ति (या परिवार) के नाम पर रहा जिसने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार की साजिश रची और सत्ता का दुरुपयोग किया। वीर गोपाल मुखर्जी के नाम पर इस सड़क का नामकरण कर, जिन्होंने हजारों मासूमों की जान बचाई, आखिरकार इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह समय पश्चिम बंगाल के असली नायकों को याद करने और उन्हें सम्मान देने का है।”
I commend the historic decision taken by the Kolkata Municipal Corporation, yesterday, on the solemn occasion of Paschimbanga Divas, which would be instrumental in rectifying a historical wrong.
— Suvendu Adhikari (@SuvenduWB) June 21, 2026
Suhrawardy Avenue will now be renamed as Gopal Mukherjee Road.
For decades, a major… pic.twitter.com/eUmZj1msE9
नाम बदलना क्यों है हिंदुओं का वास्तविक सम्मान?
कॉन्ग्रेस आज भले ही ‘हसन’ और ‘हुसैन’ के नाम का तकनीकी खेल खेलकर हिंदुओं का मजाक उड़ाए, लेकिन सच यही है कि हसन सुहरावर्दी ने देश की बेटी बीना दास को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेजों से वफादारी निभाई थी, और उसी के परिवार ने भारत मां के टुकड़े किए थे। ऐसे किसी भी व्यक्ति या परिवार का नाम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर होना देश के स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन के शिकार हुए लाखों निर्दोष हिंदुओं का अपमान था।
भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर यह साबित किया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, न कि भक्षकों और गद्दारों का। यह फैसला केवल एक सड़क का नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।


