Tuesday, October 19, 2021
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स्वतंत्रता के मायने: एक भारतीय को चाहिए ‘आजादी’ इन 8 तरह के लोगों से…

इतनी जल्दी देश नहीं बदलता। आशाएँ बहुत जल्दी बदलती हैं, देश को बनने में समय लगता है। देश को बनने दीजिए। इस आज़ादी के दिन का सम्मान कीजिए। अपने सवालों में विचार लाइए। सवाल पूछने से पहले अपनी ज़मीन तलाश लीजिए कि क्या आप अपना सवाल पूछ रहे हैं, या किसी 'वाद' या विचारधारा का।

आजादी का मतलब हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। आज के संदर्भ में यह शब्द अपने आप में एक अलग स्तर की व्यापकता लिए चलता है। वामपंथी गैंग के लिए इसके मायने बिलकुल ही अलग हैं, और गैर-वामपंथियों के लिए अलग। ‘हिन्दुओं से आजादी’ भी इसी एक शब्द में समेट दी गई है, जो बार-बार, रूप बदल कर हमारे कानों तक पहुँचती है। साथ ही, ‘केरल माँगे आजादी’ जैसे संदर्भ भी इसी शब्द में सिमटे हुए हैं। इसे इतनी बार गलत तरीके से समझाने की कोशिशें हुई हैं कि लोग भूल जाते हैं कि पंद्रह अगस्त का दिन क्या है, और स्वतंत्रता दिवस के मायने क्या हैं।

यूँ तो भारतीय राष्ट्र को मिली आजादी एक ‘ट्रांसफर ऑफ पावर’ कही जाती है, क्योंकि यहाँ तमाम संघर्षों के बाद भी देश को बाँट कर एक ऐसी स्थिति बना दी गई जो स्मृति में नासूर की तरह रिसता रहा है। मैं भी, व्यक्तिगत तौर पर, कॉन्ग्रेस की अंग्रेजियत का प्रखर विरोधी रहा हूँ कि आजादी के बाद भी हमने औपनिवेशिक प्रतीकों को ध्वस्त करने की जगह उसी में गौरव क्यों महसूस किया? आजादी के बाद भी जॉर्ज पंचम की मूर्ति दिल्ली में, या क्वीन विक्टोरिया के नाम पर इमारत कोलकाता में क्यों है?

आखिर ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ को ध्वस्त क्यों नहीं किया गया? क्या संसद भवन जैसी इमारतों को डायनामाइट से उड़ा नहीं देना चाहिए था? क्या इनकी दीवारों से गुलामी की बदबू नहीं आती होगी कॉन्ग्रेस के नेताओं को? अंग्रेजों की छाप की हर वैसी चीज को मिटा देना था, जो हम आने वाले समय में बना सकते थे। सड़कें और रेल हमारे काम की हैं, इसलिए उनको रखते, लेकिन मूर्तियों, इमारतों और नामों को ढोने के पीछे ‘श्वेत चमड़ी’ के आकर्षण के अलावा क्या कारण रहे होंगे? क्या कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र अपने आपको गुलाम रखने वाली, हत्यारिन सरकारों की मूर्तियाँ ढोता है?

खैर, जो हो गया, वो तो हो ही चुका है लेकिन पिछले कुछ सालों में स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार राष्ट्रवाद को ले कर एक जागरुकता आई है, वो मुझे आशान्वित रखती है। मुझे यह संतुष्टि मिलती है कि अब युवा वर्ग सवाल करने लगा है, दुरात्माओं के मुँह बंद करने लगा है, और वाकई में राष्ट्र को ले कर प्रतिबद्ध दिखता है।

आजादी किसी जंजीर से मुक्त होना भर नहीं, आजादी एक सोच है जो हमें मुक्त करती है। आज़ाद होना, स्वतंत्र होना कोई छूने की बात नहीं है, वो महसूस करने की बात है। इसका मतलब है कि आप वैचारिक रूप से आज़ाद हैं कि आप खुले दिमाग से सोच सकते हैं, आपकी सोच पर पहरा नहीं है। आप अगर ये कह पा रहे हैं कि आपकी सोच पर पहरा है, और वो सुना जा रहा है, तो फिर आपकी सोच स्वतंत्र है।

आज़ाद आप होते हैं, किए नहीं जा सकते। आप अपनी आज़ादी के लिए प्रयत्न करते हैं। वैयक्तिक आज़ादी की भावना सामाजिक आज़ादी की नींव है। आज़ादी एक तरह के सुरक्षा की भावना देता है। आज़ादी का मतलब है बोलने की आज़ादी, सोचने की आज़ादी, आलोचना की आज़ादी, अपने लिए एक बेहतर जीवन के प्रयासरत रहने की आज़ादी। ये आपको दी नहीं जा सकती, ये आप महसूस करते हैं। दी इसलिए नहीं जा सकती क्योंकि वो सैंतालीस में दे दी गई थी। अब आपके ऊपर है कि आप इसको कैसे देखते हैं।

हाँ, सबकी परिभाषाएँ अलग हैं आज़ादी को लेकर। आज़ादी आखिर है क्या? एक सामान्य आदमी के लिए इसके क्या मायने हैं? सबसे निचले तबके के सबसे निरीह भारतीय के लिए आज़ादी का क्या मतलब है? क्या सबसे अमीर और सबसे ग़रीब, सबसे अनपढ़ और सबसे बड़े विश्वविद्यालय से पढ़े नवयुवक, सबसे अनभिज्ञ और सबसे समझदार, एक पुरुष और एक स्त्री, एक भ्रूण और अस्सी-सौ साल के बुज़ुर्ग, के लिए आज़ादी के मायने एक हैं?

आप सवाल उठाइए। वो आपका मौलिक अधिकार है। आप प्रदर्शन कीजिए। आप हंगामा कीजिए। सब कुछ कीजिए जो संविधानसम्मत हैं। लेकिन संविधान की हर बात पर गौर कीजिए। उसका एक हिस्सा अपने हिसाब से प्रयोग में मत लाइए। वही संविधान आपको अपने देश की बेहतरी में योगदान माँगता है। वही संविधान कुछ प्रतीकों का सम्मान खोजता है, क्योंकि उसको लिखने वालों ने वो दौर देखा था जब सोलह साल का खुदी राम बोस फाँसी पर लटका दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने बंगाल का अकाल भी देखा जो चर्चिल ने होने दिया, क्योंकि यहाँ का अनाज अंग्रेज़ी जनता के लिए आने वाले दिनों के बफर स्टॉक के रूप में रखवा दिया गया था। उन्होंने लाखों बंगालवासियों को चीलों द्वारा खा जाए जाने की ख़बरें सुनी होंगी। उन्होंने जलियाँवाला बाग देखा होगा, विभाजन में रेलों में भरे आते-जाते डिब्बों से बाहर लटकते हाथ और सर देखे होंगे।

इतनी जल्दी देश नहीं बदलता। आशाएँ बहुत जल्दी बदलती हैं, देश को बनने में समय लगता है। देश को बनने दीजिए। इस आज़ादी के दिन का सम्मान कीजिए। अपने सवालों में विचार लाइए। सवाल पूछने से पहले अपनी ज़मीन तलाश लीजिए कि क्या आप अपना सवाल पूछ रहे हैं, या किसी ‘वाद’ या विचारधारा का।

आजादी को ले कर पिछले सालों में ‘हमको चाहिए आजादी’ की डफली खूब पीटी गई। ऐसी आजादी के केन्द्र में कभी भी भारतीय हिन्दू नहीं रहा। इस पूरी मुहिम का एकमात्र लक्ष्य हिन्दुओं को नीचा दिखाना, या उनके प्रतीकों पर आक्रमण था। इसलिए, मैं नीचे एक लिस्ट देने जा रहा हूँ कि एक भारतीय के तौर पर मुझे किस-किस से आजादी चाहिए।

वामपंथियों से आजादी

वामपंथी इस राष्ट्र का ही नहीं, विश्व के लिए एक कोढ़ के समान है। हर बीमारी की जड़ में यही वामपंथ या ऐसी ही विषैली सोच है जो आतंकियों, नक्सलियों, अपराधियों और आपाराधिक प्रवृत्ति के लोगों और संस्थाओं को प्रश्रय देती है। देशविरोधी ताकतों के ये वामपंथी बचाते हैं, और हर संभव कोशिश करते हैं कि भारत विखंडित हो कर बिखर जाए। इसलिए, इस विचारधारा की जड़ों में कन्सन्ट्रेटेड हायड्रोक्लोरिक अम्ल डालने की आवश्यकता है। इस विचारधारा का खात्मा विश्व कल्याण के लिए अत्यावश्यक है। हमें वामपंथियों से आजादी मिलनी चाहिए।

मीडिया गिरोह से आजादी

मीडिया का एक गिरोह जिस तरह से देश में चल रही हर योजना, हर बात में नकारात्मकता सिर्फ इसलिए खोज लेता है, क्योंकि सरकार उसके मतलब की नहीं है, ऐसे गिरोह से राष्ट्र को आजादी मिलनी चाहिए। दंगाइयों को ‘कवर फायर’ देने से ले कर ‘आपातकाल’ जैसे शब्दों को आवारा सांड के खेत में घुसने जैसा आम बनाने तक इस गिरोह ने जनता को कुछ भी बेहतर नहीं दिया। यह गिरोह सदैव वामपंथियों को एक प्लेटफ़ॉर्म देता रहा है, जहाँ से वो अपने जहर की बिक्री करते रहें। यही मीडिया गिरोह कई संदर्भों में दंगों को भड़काने में अहम भूमिका निभाता रहा है। एक समुदाय के भीतर ‘तुम्हें देश से भगाने की तैयारी हो रही है’ जैसी भावनाएँ डालने वाले लोग इसी गिरोह के हैं।

लिब्रांडुओं से आजादी

लिबरल ब्रीड ने जिस तरह से ‘लिबरल’ शब्द का गलत फायदा उठाया है, उसके कारण से इस शब्द को गाली की तरह देखा जाने लगा है। वैचारिक रूप से सबसे ज्यादा अनुदार लोग आज लिबरल कहे जाते हैं, जिनके लिए ‘मैं ही सही हूँ, पूरी दुनिया गलत है’ एक ध्येय वाक्य बन चुका है। इन लोगों से बोलने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि ये कभी भी ढंग की बात नहीं कहते।

दंगाइयों से आजादी

दंगा करना कई लोगों का मजहबी कर्तव्य बन चुका है। छोटी-सी बात को अपने मन से ही आधार बना कर लोग सड़कों पर उतर आते हैं। पुलिस मजबूर सी दिखती है, क्योंकि उन्हें नेताओं के आदेशों से चलना पड़ता है। नेताओं को वोटबैंक से चलना होता है। दंगाइयों के कारण बंगाल में दो दिन में रेलवे की ₹250 करोड़ की संपत्ति जला दी गई, दिल्ली में कितने करोड़ गए, गिनती नहीं और लाशों की तो बात ही न की जाए। वही काम बेंगलुरु में उसी शैली में हुआ। इस पर सरकारों को सोचना होगा कि एक समुदाय के दंगों को कब तक ‘आहत होने’ के नाम पर झेला जाता रहेगा।

इस्लामी कट्टरपंथियों से आजादी

इस्लामी कट्टरपंथियों ने कई बार देश और दुनिया को धमाकों से ही नहीं, अपने विचारों से भी दहलाया है। छोटे बच्चों में दूसरे मजहब के खिलाफ घृणा भरी जाती है, पत्थर थमा दिए जाते हैं और सड़कों पर पैदल सैनिकों के रूप में उतारा जाता है। इस कट्टरपंथी सोच ने भारत में लाखों जानें ली हैं और सैकड़ों करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान किया है। ऐसी मजहबी संस्थाएँ चिह्नित की जानी चाहिए और उन्हें बंद किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में देश जलने से भी बचे और पुलिस/सेना को छर्रों से उन पर फायरिंग न करनी पड़े।

छद्मसेकुलर लोगों से आजादी

सेकुलर शब्द को गाली बनाने वाले लोगों ने हर हिन्दूफोबिक बात को ही सेकुलर बना दिया है। हिन्दुओं की देवी-देवताओं पर पोस्टर, चुटकुले, सोशल मीडिया पोस्ट आदि बनाए जाते हैं, जो कि काफी घटिया स्तर के और अपमानजनक होते हैं। इसे ‘मतभिन्नता’ या ‘अभिव्यक्ति’ का नाम दे कर यही सेकुलर बचाने की कोशिश करते हैं। हालाँकि, हिन्दू या जुड़े हुए धर्मों के अलावा किसी और पर किसी ने अलग संदर्भ में भी कुछ कह दिया तो उसके गर्दन उतारने की बात को भी टीवी पर उचित ठहराया जाता है। तब यही सेकुलर गैंग ऐसी हिंसा को उचित ठहराता है कि ‘लिखना नहीं चाहिए था’। ये हर बार बताते हैं कि हिन्दुओं के खिलाफ नीचता चलेगी लेकिन इस्लाम पर एक टिप्पणी भी बर्दाश्त नहीं होगी। ऐसे सेकुलरों ने शब्द की परिभाषा बदल दी है। हमें इनसे आजादी चाहिए ताकि समाज में समान रूप से विचारों पर सामूहिक सहमति या असहमति बन सके।

टुटपुँजिया कॉमेडियन्स से आजादी

कॉमेडी के नाम पर जो अश्लीलता और हिन्दूघृणा परोसी जा रही है, वो सस्ती लोकप्रियता के लिए भले ही अच्छी हो, पर समाज के लिए नहीं है। भाषा की मर्यादा जैसी कोई चीज वैसे भी नहीं रही ऐसी जगहों पर, क्योंकि सुनने वाले भी कुंठित या अनभिज्ञ लोग होते हैं और सुनाने वालों को लगता है कि लोग उसके चुटकुलों पर हँस रहे हैं। वैसे, होता इसके उलट है कि लोग चुटकुलों पर नहीं, चुटकुलेबाजों द्वारा भरी सभा में माँ-बहन की गालियाँ दे सकने की बात पर हँसते हैं। इसके अलावा देवी-देवताओं और हिन्दू ग्रंथों पर बनते चुटकुलों का कोई ओर-अंत ही नहीं, क्योंकि हिन्दू सहिष्णु होता है और इन बातों को इग्नोर करता रहता है। ऐसे लोगों पर प्रतिबंध लगना चाहिए जिन्होंने हिन्दुओं की आस्था को उपहास का पात्र समझ लिया है। क्योंकि एक दिन हिन्दुओं का धैर्य टूट जाएगा और फिर कुछ ऐसा होगा जो उनकी कल्पना के परे होगी। वैसे कई बार ऐसे नकली चुटकुलेबाज राह चलते पीटे जा चुके हैं।

बोनस: नकली फैक्टचेकरों से आजादी

ऑल्टन्यूज जैसी संस्थाओं ने फैक्टचेक के नाम पर सिर्फ अजेंडा चलाया है। खास मजहब से जुड़ी हर खबर की फैक्टचेक कर के नामोनुरूप ‘ऑल्टरनेट’ फैक्ट पैदा करना इनका पेशा है। जामिया के दंगाइयों के हाथ के पत्थर को वॉलेट कहना हो या तब्लीगी जमात के लोगों द्वारा कोरोना फैलाने और थूकने आदि की खबरें, ऑल्टन्यूज ने पुरजोर कोशिश की कि उनका सत्य सामने न आए। साथ ही, सरकार को घेरने के लिए ऐसी संस्थाएँ किसी मृतक के परिवार को अपने फैक्टचेक का हिस्सा बनाने के लिए कोचिंग तक देते देखे गए हैं। ये लोग फैक्टचेक के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथी अजेंडा और वामपंथी विचारों को समाज में डालते रहते हैं। और हाँ, जब कुछ करने को न हो तो ये लोग इंटरनेट पर घूम रहे मीम्स और चुटकुलों का भी फैक्टचेक करते हैं ताकि लोगों को लगे कि ये कुछ कर रहे हैं। ऐसे अजेंडाबाज लोगों से भी राष्ट्र को आजादी मिलनी चाहिए जो नाम में फैक्टचेक लिखते हैं, और कुकर्म से ऑल्टरनेट फैक्ट पैदा करने में व्यस्त रहते हैं।

 

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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