Wednesday, April 1, 2026
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LPG-पेट्रोल-डीजल के लिए पैनिक होना बंद करें, इंडक्शन की अचानक खरीदारी भी बढ़ाएगी दिक्कत: समझें- घबराहट में कैसे हम खुद को कर रहे हैं परेशान

मिडिल ईस्ट वॉर के बीच एलपीजी एजेंसियों, पेट्रोल पंपों और सीएनजी स्टेशनों पर लंबी लाइनें लग रही हैं। जिनके पास पहले से भरे सिलेंडर हैं, वे भी नया सिलेंडर लेने दौड़ पड़े हैं, जिससे वाकई जरूरतमंद लोगों को सामान नहीं मिल पा रहा है।

मिडिल ईस्ट वॉर के बीच भारत में राजनीतिक फायदे के लिए कुछ अफवाहें जोरदार तरीके से फैलाई जा रही है, जिसमें एलपीजी-सीएनसी-पीएनजी, पेट्रोल-डीजल की कमीं की बात कही जा रही है इन अफवाहों की वजह से लोग पैनिक में आ रहे हैं और अव्यवस्था फैल रही है।

किस तरह की अव्यवस्था फैल रही है? ये अव्यवस्था है अचानक एलपीजी एजेंसियों पर लोगों की लंबी लाइनों की, पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइनों की, सीएनजी पंपों पर भी कमोवेश यही स्थिति। जिन लोगों के घरों में सिलेंडर हैं, फिर भी वो भविष्य की चिंताओं में अभी से लाइन में लग गए हैं, तो ये अव्यवस्थाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे में वो लोग भी परेशान हो रहे हैं, जिन्हें वाकई जरूरत है।

कैसे पैदा की जा रही है भीड़ वाली सिचुएशन?

इस बात को एक उदाहरण से समझें कि एक एलपीजी गैस की एजेंसी पर आम तौर पर 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, इससे पूरे इलाके का काम चल जाता है। आम तौर पर लोगों के पास 2 सिलेंडर होते हैं। बड़े परिवारों के पास 4 या 6 भी, क्योंकि उनके पास 2 सिलेंडर वाले 2-3 कनेक्शन हो सकते हैं परिवार के अलग-अलग लोगों के नाम पर। लेकिन जब एलपीजी की कमीं की अफवाह फैलाई जाती है, तो ये सभी 3 लोग सिलेंडर की लाइन में लग जाते हैं, ये होते हुए भी कि उनके घरों में पहले से 3 सिलेंडर आम तौर पर भरे हैं और अगले 1-2 माह तक उन्हें नए सिलेंडर की जरूरत नहीं है, फिर भी पैनिक सिचुएशन की वजह से वो भी लाइनों में लग गए हैं।

ऐसे में जिस एलपीजी एजेंसी के पास हर दिन 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, वहाँ 2000 लोग सिलेंडर की डिमाँड लेकर अचानक आ गए। सिलेंडर की उपलब्धता आम दिनों जितनी ही यानी 200 की ही है, तो 1800 लोग बिना सिलेंडर के रह गए और वो हल्ला मचा रहे हैं कि सिलेंडर नहीं मिला। हकीकत ये है कि उनके घरों में पहले सिलेंडर हैं और भोजन सबके यहाँ बना है।

ऐसे में जो 200 आम लोग आम दिनों की सप्लाई वाले सर्कल में जिनका वाकई सिलेंडर खत्म हुआ है, उन्हें भी सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। तो पैनिक सिचुएशन क्रिएट हो रही है। हर दिन के हिसाब से इसी तरह के हल्ले में लोग जुड़ते चले जा रहे हैं और 4-5 दिनों में सिलेंडर की चाहत रखने वालों की संख्या 5-6000 को पार गई। हालाँकि घर में काम रुकने वालों की संख्या बेहद कम यानी 500-600 ही हैं, जो ऐसी पैनिक सिचुएशन की वजह से अब सिलेंडर नहीं पा रहे हैं।

इसी में सक्रिय होते हैं जमाखोर, ब्लैक में सिलेंडर बेचने वाले माफिया और दलाल… फिर जो सिलेंडर बुकिंग के माध्यम से 850 या 900 का मिल रहा है, वो पैनिक सिचुएशन का फायदा उठाकर वही सिलेंडर 2000-2500 रुपए में बेचने लग जाते हैं। साथ ही अपनी नाजायज ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन 200 सिलेंडरों पर भी डाका डालते हैं, जो आम लोगों के लिए है। हालाँकि ये स्थानीय प्रशासन की विफलता भी होती है।

कुल मिलाकर इससे स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती ही जाती है। यही नहीं करना है। लोगों को शांत रहने की जरूरत है और गैस की सप्लाई डिमांड के हिसाब से एजेंसी भी बढ़ाएगी तो 4-6 दिनों में स्थिति सामान्य होती जाएगी।

क्या है एलपीजी को लेकर आधिकारिक आँकड़ा

सरकार की तरफ से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने बताया कि जंग से पहले, हर दिन औसतन 55.7 लाख सिलेंडर बुक किए जाते थे। अब यह आँकड़ा बढ़कर करीब 76 लाख बुकिंग प्रतिदिन तक पहुँच गया है।

सरकार का कहना है कि जंग के हालात के बीच LPG सिलेंडर की बुकिंग में यह अचानक आया उछाल लोगों में घबराहट की वजह से है। इस स्थिति से निपटने के लिए एलपीजी कंपनियों ने बुकिंग की समयसीमा को शहरी इलाकों के लिए 25 दिन और ग्रामीण इलाकों के लिए बढ़ाकर 45 दिन कर दी है, ताकि जमाखोरी न हो सके। हालाँकि सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस स्थिति से निपटने के लिए LPG डिस्ट्रिब्यूटर्स के पास गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

ऐसी ही स्थिति पेट्रोल-सीएनजी-डीजल पंपों पर

एलपीजी को लेकर मचे भगदड़ जैसी ही स्थिति सीएनजी, पेट्रोल-डीजल की हो चली है। वाहन चालक अपने वाहनों में टंकी तो फुल करा ही रहे हैं, पैनिक फैलाकर बनाई गई इमरजेंसी वाली हालत के हिसाब से वो कनस्तरों में भी पेट्रोल-डीजल भर ले रहे हैं। चूँकि भारत के लोग भविष्य की बहुत ज्यादा चिंता करते हैं ऐसे में वो वर्तमान को भी अव्यवस्था की भेंट चढ़ा रहे हैं और पैनिक फैलाकर बढ़ाई गई सामान की माँग को भी सप्लाई की तुलना में 2-3 गुना बढ़ा दे रहे हैं। यहाँ भी वाकई जरूरतमंद लोग पिस रहे हैं।

इंडक्शन की तरफ शिफ्ट हो रहे लोग, अचानक बढ़ी माँग

अब बात करते हैं अचानक बाजार में बढ़ी इलेक्ट्रिक चूल्हे यानी इंडक्शन की माँग की। ये अचानक बढ़ी माँग और पैनिक सिचुएशन आपकी गर्मी के मौसम को भी खराब करने वाली है। पहली बात तो ये कि आम दिनों में जिस दुकान से 1 या 2 इंडक्शन की बिक्री होती थी, आप ने हो-हल्ले के बीच मुँहमाँगे दामों पर एक ही दिन में सारा स्टॉक खाली कर दिया। अब इंडक्शन की डिमांड बढ़ गई। यहाँ भी जिनका गैस वाकई खत्म हुआ है, वो इंडक्शन भी नहीं पा रहे हैं, तो हर तरफ पैनिक फैल सकता है।

इसका दूरगामी असर देखिए- लोग इंडक्शन भी खरीद रहे हैं, लाइनों में लगकर गैस सिलेंडर भी ले रहे हैं। और अब घरों में एलपीजी का इस्तेमाल कम करके खाना इंडक्शन पर बना रहे हैं। मार्केट में सिर्फ इंडक्शन की माँग ही नहीं बढ़ रही, साथ ही इंडक्शन पर चढ़ने वाले बर्तनों की भी माँग बढ़ गई। उनकी कीमतें काफी बढ़ गई। आम लोग अपनी जेबें ढीली कर रहे हैं, क्यों? क्योंकि एक फर्जी सा माहौल बनाया गया कि एलपीजी की कमी ‘हो’ सकती है।

इस दूरगामी असर में आपकी गर्मी कैसे खराब होगी?

दिल्ली जैसे शहर में बीते 2 साल से गर्मियों में पीक पर 8000 मेगावॉट से 8500 मेगावॉट बिजली की माँग होती है। सरकारें और वितरण कंपनियाँ इसी हिसाब से बिजली की खरीद करती हैं, ताकि गर्मी में आम लोगों तक बिजली की निर्बाध सप्लाई बनाई रखी जा सके। लेकिन पैनिक सिचुएशन की वजह से लोग इंडक्शन पर शिफ्ट हो रहे हैं, तो बिजली की माँग भी अचानक डेढ़ गुनी तक हो जाएगी।

ऐसे में जो सरकार और बिजली वितरण कंपनी अपनी सालाना जरूरत के हिसाब से 8000 से 8500 मेगावॉट की बिजली खरीद रही है, वो माँग के मुताबिक 9500 से 10,500 मेगावॉट की बिजली कहाँ से लाएगी?

बात सिर्फ आम लोगों तक ही नहीं है, इसी पैनिक सिचुएशन की वजह से छोटे मोटे व्यवसाय, होटल, रेस्टोरेंट भी इंडक्शन की तरफ शिफ्ट होंगे, और जब माँग आम स्थिति की तुलना में डेढ़ गुना बढ़ जाएगी तो ट्रांसमिशन लाइनों से लेकर बिजली की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा। अचानक बढ़ी माँग पूरी न कर पाने की वजह से सरकारों की स्थिति बिगड़ेगी, बिजली कंपनियाँ रेट भी बढ़ा सकती हैं, साथ ही बिजली की कटौती भी बढ़ेगी।

ऐसे में क्या करें और क्या न करें?

सबसे पहले काम ये करें कि सामान्य जीवन जिए। किसी पैनिक में न पड़ें। देश में आम माँग की तुलना में आम सप्लाई लाइन पर कोई असर नहीं पड़ा है। ऐसे में लाइनों में न लगें। मिडिल ईस्ट में तनाव कम हो या न हो, सरकार ने अपनी जरूरत के हिसाब से 42 देशों से आपके लिए पेट्रोल-डीजल की व्यवस्था कर रखी है। ऐसे में न तो पेट्रोल-डीजल की कमीं आम लोगों को होगी, न ही सीएनजी-पीएनजी-एलपीजी की। किसी युद्ध का भारत के लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

ऐसे में एक-दूसरे की देखा-देखी इंडक्शन की तरफ न दौड़ें और सामान्य जिंदगी जिएँ। इंडक्शन की तरफ दौड़ने से आपकी गर्मी खराब होनी तय है। अगर यही स्थिति रही, तो गर्मियों में लंबी बिजली कटौती के लिए भी तैयार रहें और इसके लिए सरकार को न कोसें। क्योंकि सरकार और बिजली कंपनियाँ उसी माँग के आधार पर चल रही हैं, जितनी अब तक आम तौर पर रही है। डिमाँड आप बढ़ाएँगी, तो परेशान भी आप ही होंगे। सरकार तो खैर आगे-पीछे कुछ न कुछ इंतजाम कर ही लेगी। ये बात सारी दुनिया पर लागू है।

मिडिल ईस्ट वार पर आपको क्यों नहीं पड़ना चाहिए फर्क?

सबसे पहले तो ये समझें कि जो ब्रेंट ऑयल या कोई भी मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल है, वो सीधे आप तक नहीं पहुँच रहा है। वो कच्चा तेल होता है। अभी आने वाला तेल आप तक पहुँचने में 4-5 महीने तक का समय लग जाता है। यानी अभी तो आपके पास 4-5 महीने तक पैनिक की कोई वजह नहीं है।

दूसरा कि मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल आपके लिए होता ही नहीं है। आपके लिए सरकार अन्य देशों से जरूरत का सामान मँगा ही रही है। ये तेल होता है देश की बड़ी बड़ी रिफायनरियों के लिए। इन रिफायनरियों में जो कच्चा तेल आता है, वो रिफाइन होकर दूसरे देशों यानी यूरोप-अफ्रीकी देशों में बेचा जाता है। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ ही नायरा एनर्जी, रिलायंस जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं।

ऐसे में उन रिफायनरियों को मिलने वाले तेल और उनके बिजनेस से आम लोगों को क्यों परेशान होना चाहिए ये सोचने वाली बात है।

फिर अभी भारत सरकार ने अपने रणनीतिक तेल भंडारों को छुआ तक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, पूरी दुनिया में 1 बूँद की सप्लाई रुकते तक भी भारत के पास इतना तेल है कि वो आम लोगों की जिंदगियों पर कुछ महीनों तक कोई फर्क नहीं पड़ने देगी।

इसे इस बात से समझें कि एशिया-प्रशांत इलाके के देशों यानी साउथ-ईस्ट देशों जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, ताईवान, कंबोडिया, जापान जैसे देश कच्चा तेल और यूरोप के देश कच्चा तेल मँगाने की जगह भारत की रिफायनरियों से रिफाइन किया गया तेल मंगाते हैं। उन देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम करीब डेढ़ से 2 गुना हो चुका है। लेकिन भारत में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम में 1 पैसे का इजाफा नहीं किया गया है। जबकि सीएनजी-पेट्रोल पंपों पर लाइन तो पड़ोसी बाँग्लादेश में भी लग चुकी है। लेकिन भारत के लोग क्यों परेशान हो रहे हैं?

देश में पैनिक फैलाकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं लोग, दुश्मन देश

भारत के लोग सिर्फ इसलिए परेशान हो रहे हैं क्योंकि उनके आसपास राजनीतिक आग्रहों से ग्रस्त लोगों ने पैनिक फैलाया हुआ है। वो तो चाहते हैं कि लोग सरकार से नफरत करें और सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएँ और उन्हें सत्ता मिल जाए।

यही बात भारत के दुश्मन देशों और उन कथित पश्चिमी मित्र देशों पर भी लागू होती है। वो भारत की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो भी देश में सत्ता परिवर्तन और कठपुतली सरकार चाहते हैं। वो भारत का विकास रोकना चाहते हैं, अमेरिकी डीप स्टेट से जुड़े लोगों के बयान से लेकर अमेरिकी डिप्टी विदेश मंत्री तक भी ये बयान दे चुके हैं। वो नहीं चाहते कि भारत में स्थायित्व रहे और वो विकसित देश बने, क्योंकि ऐसा होने पर भारत कभी उनका पिछलग्गू नहीं रहेगा। बीते 12 सालों में मोदी सरकार की स्वतंत्र विदेश नीति इसी रास्ते पर चल रही है।

भारत के पड़ोस को देखिए, फिर करिए गहरा विचार

आप अपने आसपास के देशों को देखें फिर इस बात पर विचार करें। उदाहरण के लिए… पड़ोसी नेपाल में अमेरिकी कठपुतली सत्ता में आ चुका है। बांग्लादेश में भी छात्र आंदोलन के नाम पर भारत की मित्र सरकार को अपदस्थ कर दिया गया। आज बांग्लादेश की हालत खराब है। श्रीलंका में भी सत्ता परिवर्तन किया गया। पाकिस्तान पहले से अमेरिका की कठपुतली बना हुआ है। मौलाना मुनीर ट्रंप के यहाँ अक्सर हाजिरी मारने जाता है। म्यांमार की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। मालदीव में भी सत्ता परिवर्तन कुछ सालों में हुआ है और राजनीति को एंटी इंडिया की चाशनी में डुबो दिया गया है।

ईरान पर अमेरिकी आक्रमण जारी ही हैं, बाकी मिडिल ईस्ट अमेरिकी कठपुतली बने हुए हैं। अफगानिस्तान में किसी के घुसने की हालत नहीं है। चीन की इकोनमी पर अमेरिकी दबाव जगजाहिर है। साउथ कोरिया में राष्ट्रपति जेल (अमेरिका का कितना हाथ- ये अंदरुनी लोग बताएँगे) में हैं। जापान ने अपनी सैन्य नीति परिवर्तित कर ली है। रूस भी अमेरिका के साथ पींगे बढ़ा रहा है। हर तरफ यही खेल, कि किस तरह से भारत को पंगु बनाया जाए।

देश की ताकत बनिए, कमजोर नहीं

अब ये आप लोगों पर है कि आप क्या सोचते हैं इस बारे में और देश के साथ इस स्थिति में कैसे खड़े होते हैं। पैनिक होती भीड़ की शक्ल में… या समझदार आत्मनिर्भर भारत के मजबूत प्रहरी की शक्ल में। ऐसे में पैनिक फैलाना बंद करें और देश के साथ मजबूती से खड़े हों। कोई भी स्थिति स्थाई नहीं होती, ये वक्त भी गुजर जाएगा। फिर रही बात ट्रंप की, तो 2-3 साल में उसका भी बोरिया बिस्तर सिमट जाएगा। भारत शान से आगे बढ़ता जाएगा, जिसपर आने वाले दशक में आपको भी गर्व होगा। और ये बात पूरी दुनिया को दिखेगी भी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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