Homeविचारराजनैतिक मुद्देनेताओं को मिल रहा नोटिस, बैठकों से MLA हो रहे गायब, पार्षद ग्रुप बनाकर...

नेताओं को मिल रहा नोटिस, बैठकों से MLA हो रहे गायब, पार्षद ग्रुप बनाकर दे रहे इस्तीफा: क्या बंगाल में हार के बाद टूटने लगी TMC?

बंगाल की राजनीति फिलहाल एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। बीजेपी अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आत्मविश्वास में है जबकि TMC आत्ममंथन और असंतोष के बीच झूलती दिख रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह केवल हार के बाद का अस्थायी झटका है या फिर बंगाल की राजनीति में एक बड़े शक्ति परिवर्तन की शुरुआत।

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद पार्टी का जोश एकदम हाई है तो वहीं ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के भीतर कलह लगातार बढ़ती जा रही है। बीजेपी के हाथों मिली करारी हार के बाद ऐसा साफ तौर पर लग रहा है कि TMC के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है।

राजनीति में हार सीटों की संख्या तो घटाती ही है, साथ ही साथ वो नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल की भी परीक्षा लेती है। बंगाल में यही होता दिखाई दे रहा है। TMC के भीतर का असंतोष अब धीरे-धीरे पार्टी से बाहर निकल सतह पर आने लगा है। चुनाव के बाद की घटनाओं के अगर डॉट्स कनेक्ट करने की कोशिश करें तो लग रहा है कि कहीं ममता बनर्जी की पार्टी उसी दौर में तो नहीं पहुँच रही जहाँ यह चुनावी झटका TMC के संगठन के लिए संकट में बदलने लगा है।

विधानसभा चुनाव के बाद जब TMC ने नई सरकार के खिलाफ चुनाव बाद हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और फुटपाथ दुकानदारों के मुद्दे पर विधानसभा परिसर में विरोध प्रदर्शन किया तो पार्टी के भीतर असहज तस्वीर सामने आई। 80 विधायकों वाली पार्टी के धरने में केवल 36 विधायक पहुँचे। यानी आधे से भी कम।

यह केवल कुछ विधायकों की गैर-मौजूदगी का मामला नहीं है बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। जब कोई पार्टी विपक्ष में जाती है तो उसका पहला बड़ा प्रदर्शन उसके मनोबल और एकजुटता की परीक्षा माना जाता है। अगर उसी मंच पर बड़ी संख्या में विधायक गायब दिखें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है।

यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। इससे पहले 19 मई को कालीघाट में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में हुई अहम बैठक में भी करीब 15 विधायक नहीं पहुँचे थे। और जो पहुंचे, उनमें भी कई नेताओं ने बंद कमरे की राजनीति पर सवाल उठा दिए। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बैठक के दौरान कुछ विधायकों ने साफ कहा कि सिर्फ बैठकों और रणनीति चर्चा से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा, जमीनी स्तर पर काम और आत्ममंथन की जरूरत है।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोलकाता और हावड़ा के कुछ विधायकों ने जहाँगीर खान के चुनाव से हटने को लेकर सीधे शीर्ष नेतृत्व से सवाल पूछे। मतदान से महज दो दिन पहले उम्मीदवार का मैदान छोड़ देना अपने आप में बड़ा मामला था लेकिन पार्टी नेतृत्व ने कोई कार्रवाई ना करके इसे और मुश्किल बना दिया। क्योंकि फालता विधानसभा सीट अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, इसलिए इन सवालों को अभिषेक के नेतृत्व पर सवाल के तौर पर भी देखा गया।

लंबे समय से पार्टी में यह धारणा बनाई गई थी कि अभिषेक बनर्जी संगठन के भविष्य हैं। लेकिन चुनावी हार के बाद पहली बार उनके फैसलों और नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर ही चर्चा शुरू हुई है। यह चर्चा कोई 1-2 दिन की नहीं है, यह हार के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। कथित पार्टी विरोध बयानों के लिए TMC ने अपने ही 5 प्रवक्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।

यह कदम अपने आप में बताता है कि पार्टी नेतृत्व भीतर उठ रही आवाजों को लेकर असहज है। किसी भी राजनीतिक दल में जब हार के बाद सवाल उठते हैं और उनका जवाब संवाद से ज्यादा कार्रवाई से दिया जाने लगे तो यह अक्सर अंदरूनी बेचैनी का संकेत माना जाता है।

अगर मामला केवल विधायकों की नाराजगी तक सीमित होता, तब भी इसे सामान्य चुनावी प्रतिक्रिया कहा जा सकता था। लेकिन इस मामले में TMC की टेंशन बढ़ाई है सबसे निचले और महत्वपूर्ण ईकाई स्थानीय निकाय ने। उत्तर 24 परगना की कांचरापाड़ा नगरपालिका में 24 में से 15 पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा और हलीशहर नगरपालिका में 23 में से 16 पार्षदों ने सामूहिक तौर पर पद छोड़ दिया है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि बीजेपी की बंगाल में मजबूत होती स्थिति इस असंतोष को और हवा दे सकती है। बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ सत्ता बदलने के बाद दल-बदल की राजनीति भी तेज हो जाती है। जिस तरह कभी वाम दलों के नेताओं ने TMC का रुख किया था, उसी तरह अब TMC के भीतर भी राजनीतिक भविष्य को लेकर नई महत्वकाँक्षाएँ शुरू होना असंभव नहीं है।

हालाँकि, हम यह आज ही नहीं कर सकते कि TMC कल ही टूटने जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में संकट अचानक नहीं आता, उसके संकेत पहले दिखने लगते हैं। कभी कम होती बैठकों की उपस्थिति, कभी नेतृत्व पर उठते सवाल, कभी सामूहिक इस्तीफे और कभी पार्टी प्रवक्ताओं पर अनुशासनात्मक कार्रवाई ये सब संकेत अक्सर बड़े राजनीतिक बदलावों से पहले दिखाई देते हैं।

बंगाल की राजनीति फिलहाल एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। बीजेपी अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आत्मविश्वास में है जबकि TMC आत्ममंथन और असंतोष के बीच झूलती दिख रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह केवल हार के बाद का अस्थायी झटका है या फिर बंगाल की राजनीति में एक बड़े शक्ति परिवर्तन की शुरुआत।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कॉन्ग्रेस ने अडानी पर किया वार, चीन को पहुँचा सीधा फायदा: केन्या सरकार ने नैरोबी एयरपोर्ट का टेंडर बदला, चीनी कंपनी को 50% महंगे...

केन्या के नैरोबी एयरपोर्ट विस्तार प्रोजेक्ट में अडानी की जगह चीनी कंपनी को ठेका मिलने से आर्थिक और राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। इन सबमें चीन का नाम क्यों आ रहा है... आइए जानें

एक दीपक जलाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचा दिया बवाल… केरल के निलाविलक्कु विवाद से क्या समझे आप? क्या सेक्युलर होने का ठेका सिर्फ...

फातिमा तहिलिया विवाद के बाद फिर उठे सवाल- जब दूसरे समुदाय अपनी धार्मिक सीमाएँ तय करते हैं, तो समायोजन की उम्मीद सिर्फ हिंदुओं से क्यों?
- विज्ञापन -