राहुल गाँधी के ‘तमगे’: सुप्रीम कोर्ट की फटकार, नेशनल हेराल्ड घोटाला और झूठा प्रलाप

"मेरे खिलाफ 15 से 16 मुकदमे हैं। जब आप सैनिकों को देखते हैं तो उनके सीने पर कई सारे पदक होते हैं। हर मुकदमा मेरे लिए पदक के समान है। इनकी संख्या जितनी अधिक होगी मैं उतना खुश होऊँगा।"

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी गुरुवार को अपने संसदीय क्षेत्र केरल के वायनाड में थे। यहाँ वनयांबलम में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के एक कार्यक्रम को उन्होंने संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों को ‘तमगा’ बताया। ऐसा-वैसा तमगा भी नहीं। मुकदमों की तुलना सैनिकों को बहादुरी के लिए मिलने वाले पदक से की।

उन्होंने कहा, “मेरे खिलाफ 15 से 16 मुकदमे हैं। जब आप सैनिकों को देखते हैं तो उनके सीने पर कई सारे पदक होते हैं। हर मुकदमा मेरे लिए पदक के समान है। इनकी संख्या जितनी अधिक होगी मैं उतना खुश होऊँगा।” उन्होंने कहा कि भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ देशभर में जो मुकदमे दर्ज कराए हैं उनसे वह डरे नहीं हैं। वे जब भी वे मेरे खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज कराते हैं तो वे मेरे सीने पर एक पदक जड़ते हैं।

चूॅंकि राहुल गॉंधी ने तुलना सैनिकों के पदक से की है तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उनके खिलाफ कैसे कैसे मुकदमे दर्ज हैं। कुछ मामले, जैसे 144 तोड़ने का, जुलूस निकालने का, सरकार के खिलाफ बयानबाजी करने का, परिस्थितियों के हिसाब से शायद राजनीति से प्रेरित हो सकते हैं और आप उन्हें राजनितिक ‘तमगा’ भी मान सकते हैं। लेकिन, यदि मामला गबन से जुड़ा हो, सुप्रीम कोर्ट की दुहाई देकर झूठ बोलने का हो तो न तो इसे राजनीति मानकर खारिज किया जा सकता है और न इसे ‘तमगा’ बताकर इसकी तुलना सैन्य पदक से की जा सकती।

नेशनल हेराल्ड- देश के लिए सस्ते में मिला, राहुल के लिए

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आज भले नेशनल हेराल्ड कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा पत्र बन कर रह गया हो, लेकिन इतिहास में इसकी बहुत महत्वपूर्ण जगह है। राहुल की दादी के पिता पंडित नेहरू ने इसे उस समय शुरू किया था, जब आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। पंडित नेहरू इसमें प्रधानमंत्री बनने के बाद भी लेख लिखते थे और पीएम बनने के पहले इसके ‘अंतरराष्ट्रीय संवाददाता’ थे। सरकार से अखबार और मीडिया के लिए रियायती दर पर मिली इसकी सम्पत्ति का बाजार मूल्य ₹5,000 करोड़ के आसपास बताया जाता है।

लेकिन एक दिन तकनीकी रूप से इसकी मालिक कम्पनी Associated Journals Limited (AJL) कॉन्ग्रेस पार्टी से बिना ब्याज का ₹90 करोड़ का क़र्ज़ लेती है और लौटाना ‘भूल’ जाती है। पहले तो सवाल यह उठता है कि क्या कॉन्ग्रेस एक राजनीतिक दल होने के नाते लाला और साहूकार की तरह पैसे का लेन-देन कर सकती है। तो बहाना यह मारा गया कि नहीं, पंडित नेहरू का अख़बार था, इसलिए कॉन्ग्रेस ने दे दिया।

अब दे भी दिया तो कायदे से कॉन्ग्रेस को इस क़र्ज़ की वसूली करनी चाहिए थी, क्योंकि कॉन्ग्रेस का पैसा देश के चंदे से इकठ्ठा हुआ है, राष्ट्र की सम्पत्ति है, लोगों को खैरात बाँटने के लिए नहीं है। लेकिन कॉन्ग्रेस ने इसकी वसूली नहीं की। इसकी जगह (कथित तौर पर, क्योंकि मामला अदालत में लंबित है) राहुल गाँधी, उनकी मम्मी सोनिया, ‘अंकल’ मोतीलाल वोरा आदि के साथ मिलकर महज़ ₹50 लाख की एक कम्पनी Young Indian बनाते हैं, जो ₹5,000 करोड़ की सम्पत्ति और ₹90 करोड़ के क़र्ज़ वाली AJL को अपने में समेट लेती है। यही है नेशनल हेराल्ड घोटाले का मूल।

पता नहीं कॉन्ग्रेस को Young Indian ने AJL पर चढ़ा ₹90 करोड़ का क़र्ज़ चुकाया या नहीं, लेकिन चाहे ऐसा किया हो या न किया हो, ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। जनहित के लिए, जनता का मीडिया बनाने के लिए रियायती सम्पत्ति से बनाए हुए ₹5,000 करोड़ पर देश की जनता का हक़ था- AJL को खुद को Young Indian को बेचने का हक ही नहीं था।

यही हेराफेरी, चार सौ बीसी राहुल गाँधी का तमगा है?

‘चौकीदार चोर है’ किसने कहा था?

राहुल गाँधी जब साल भर से पूरे देश में मोदी के खिलाफ राफेल में घोटाले का आरोप लगा-लगाकर थक गए, लेकिन जनता उनके बहकावे में नहीं आई; “चौकीदार चोर है” चिल्ला कर देख लिया, करोड़ों लोगों ने अपने नाम में ही चौकीदार लगा लिया, तो राहुल गाँधी ने अपना झूठ सुप्रीम कोर्ट के मुँह से बोलना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने राफेल से जुड़ी याचिका को केवल सोचने भर के लिए स्वीकार क्या किया तो उन्होंने कह दिया, “अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है- चौकीदार चोर है।”

भाजपा को सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए भी था, क्योंकि अदालत ने ‘चौकीदार’ नरेंद्र मोदी को किसी भी तरीके से दोषी नहीं माना था और वह गई भी। और पहली ही सुनवाई में राहुल गाँधी ने मान लिया कि ‘चुनावी और मौसमी गर्मी में’ ज़बान फिसल गई। जाते-जाते तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने माफ़ तो कर दिया, लेकिन अगर न करते तो शायद आज राहुल गाँधी जेल के अंदर होते।

अपना झूठ सुप्रीम कोर्ट के मुँह से बोलना राहुल गाँधी का तमगा है?

आरएसएस के खिलाफ झूठा प्रलाप

राहुल गाँधी ने गाँधी जी के हत्यारे गोडसे को संघ का सदस्य बताया था, जो कि झूठ था। ऐसा भी नहीं हो सकता कि उन्हें पता नहीं हो, क्योंकि संघ 1948 में गाँधी की हत्या के दिन से ही इस झूठ के खिलाफ सच का प्रचार कर रहा है। लेकिन राहुल गाँधी ने यह जाने हुए भी न केवल इस झूठ को कहा, बल्कि अपने शब्दों पर कायम भी रहे।

लोगों को इतिहास के बारे में बरगलाने को ही राहुल गाँधी अपना तमगा मानते हैं?

राहुल गाँधी के खिलाफ ऐसे ही ओछी हरकतों के कारण चल रहे मामलों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है, मसलन असम के एक मंदिर में कथित तौर पर खुद अंदर नहीं गए और ठीकरा “कुछ आरएसएस वाले लोगों” के सिर पर फोड़ दिया– वह भी संसद में; नीरव मोदी-ललित मोदी के गुनाहों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपने आरोपों के आधार पर उन्होंने सारे मोदी को ही ‘चोर’ बता दिया, जिसके बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी से लेकर सूरत के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने उनके ऊपर मानहानि का मुकदमा कर दिया, इत्यादि।

उनके खिलाफ मामले इसी तरह की वाहियात हरकतों के इतने सारे मामले हैं कि जिस चैनल एनडीटीवी के वह ‘फेवरेट’ हैं, जिसके एंकर रवीश कुमार उनके आगे-पीछे घूमकर इंटरव्यू लेते हैं, उसी चैनल ने उनके खिलाफ मामलों का एक अलग टैग ही बना रखा है

चाहे झूठ बोलना हो या फिर गबन का मामला। ये न केवल कानूनी रूप से गलत हैं, बल्कि नैतिक और सामाजिक तौर पर भी ये गुनाह ही माने जाते हैं। एक व्यक्ति जो देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष रहा हो, 4 बार सांसदी जीत चुका हो, 50 के वय में हो उसे सार्वजनिक तौर पर ऐसे तमगों के लिए उसी तरह माफी मॉंगनी चाहिए जैसा राफेल मामले में राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट में किया था। लेकिन, कॉन्ग्रेसियों का चरित्र ही ऐसा नहीं है। शायद इसलिए तुलसीदास को लिख कर जाना पड़ा,

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥

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