उत्तर प्रदेश की राजनीति को देखा जाए, तो इन दिनों सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का बौखलाया हुआ चेहरा। कभी वे विवादों में घिरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, तो कभी कपड़े उतारकर देश के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कॉन्ग्रेसियों की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं, तो कभी अपनी ही पार्टी के घोर विरोधी दलित समुदाय को लुभाने के लिए नए-नए जुमले गढ़ रहे हैं।
ये हरकतें सामान्य राजनीतिक रणनीति नहीं लगतीं। ये अकुलाहट के लक्षण हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश को ऐसा लग रहा है मानो जनता ने उन्हें पहले ही नकार दिया हो। उनका आत्मविश्वास हिल चुका है और वे अपनी ही लाइनों को तोड़ते जा रहे हैं। पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) का हवाई सपना जमीन पर उतरने के बजाय हवा में ही उड़ रहा है। आइए, तथ्यों के आईने में इस पूरे सिलसिले को समझें और देखें कि अखिलेश की राजनीतिक सोच, उनकी रणनीति और उनके भविष्य पर क्या असर पड़ रहा है।
पैराशूट लैंडिंग कर बने मुख्यमंत्री
पहले समझिए अखिलेश का राजनीतिक सफर। मुलायम सिंह यादव जैसे जमीनी नेता के बेटे होने के बावजूद अखिलेश की राजनीति में ‘पैराशूट लैंडिंग’ का तड़का हमेशा रहा। 2012 में जब वे मुख्यमंत्री बने, तो पिता की मेहनत से तैयार की गई यादव-मुस्लिम (एमवाई) की मजबूत दीवार पर सवार होकर सीधे सिंहासन तक पहुँच गए। मुलायम ने बरसों की मेहनत से पिछड़ों, यादवों और मुसलमानों का गठजोड़ खड़ा किया था। लेकिन अखिलेश ने उस आधार को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन को महज 54 सीटें मिलीं (सपा 47) जबकि भाजपा ने 312 सीटों का तूफान ला दिया। 2022 में सपा 111 सीटों तक पहुँची, लेकिन भाजपा 255 पर काबिज रही।
हालाँकि 2024 लोकसभा में गठबंधन की बदौलत सपा ने 37 सीटें जरूर जीतीं, लेकिन यह असली ताकत नहीं, बल्कि एंटी-इनकंबेंसी और गठबंधन का कमाल था। असली परीक्षा 2027 की है और अखिलेश समझ गए हैं कि अगर 2017 और 2022 की तरह जनता ने फिर नकारा तो उनका राजनीतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म। यही वजह है कि बेचैनी छिप नहीं रही।
पीडीए फॉर्मूला ही बन रहा सबसे बड़ी मुसीबत
अखिलेश की सबसे बड़ी मुसीबत उनका खुद का बनाया पीडीए फॉर्मूला है, जो हवाई सपना साबित हो रहा है। ‘पी’ यानी पिछड़े में यादव तो साथ हैं, लेकिन कुर्मी, काछी, कुशवाहा, जाट, लोध, गड़रिया, तेली, बिंद, निषाद, शाक्य जैसी जातियाँ या तो भाजपा के साथ जा चुकी हैं या बसपा की परंपरा में बंधी हैं। ‘डी’ यानी दलित और ‘ए’ यानी अल्पसंख्यक तो और भी बड़ी समस्या हैं।
AIMIM ने M वोटबैंक में लगाई सेंध
सबसे पहले अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम वोट बैंक की बात। यूपी की कुल जनसंख्या में मुसलमान करीब 19-20 प्रतिशत हैं। पिछले चुनावों के पैटर्न में इनमें से 80-85 प्रतिशत वोट परंपरागत रूप से सपा को जाते रहे। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने पिछले कुछ सालों में खासी जमीनी तैयारी की है। पूर्वी यूपी के आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया जैसे इलाकों में जहाँ मुस्लिम वोट सपा का गढ़ माना जाता था, वहाँ अब बँटवारे की आशंका साफ है।
पश्चिमी यूपी के शहरी-अर्धशहरी क्षेत्रों में भी एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारकर अच्छा वोट काट सकती है। जहाँ सपा और भाजपा की सीधी टक्कर है, वहाँ मुसलमान रणनीतिक तौर पर सपा को वोट देते हैं, लेकिन जहाँ मुस्लिम आबादी घनी है और विकल्प ज्यादा, वहाँ मुस्लिम सिर्फ ‘अपनी’ पार्टी की तरफ जाते हैं। महाराष्ट्र, बिहार से लेकर लगभग हर जगह ये तथ्य सामने आ चुका है।
कुंदरकी से सीमाँचल तक दिखी असलियत की झाँकी
इसका ज्वलंत उदाहरण है कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव (नवंबर 2024)। यहाँ मुस्लिम वोट 60 प्रतिशत से ज्यादा थे, फिर भी सपा के हाजी मोहम्मद रिजवान को भाजपा के रामवीर सिंह ठाकुर ने भारी अंतर से हरा दिया। सपा प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाए। मुस्लिम वोटों का बंटवारा (एआईएमआईएम को 8,111 वोट) ही वजह था।
बिहार के सीमांचल में भी एआईएमआईएम ने आरजेडी के मुस्लिम वोट छीने और आरजेडी को भारी नुकसान हुआ। ओवैसी यूपी में 200 सीटों पर लड़ने की तैयारी में हैं। सपा के लिए यह घातक है।
डी-वोटबैंक की किताब से दूर है सपा
अब ‘डी’ यानी दलित। यादव और दलितों के बीच जमीनी स्तर पर सदियों पुराना संघर्ष है… जमीन-जायदाद, सामाजिक प्रतिष्ठा और गाँव के प्रभाव को लेकर। दलित बसपा के कोर वोटर हैं, जबकि यादव सपा के। दोनों समुदायों के बीच तनाव अक्सर हिंसक रूप ले लेता है। अखिलेश पिछले पाँच साल से पीडीए का नारा लगा रहे हैं, लेकिन दलित यादवों के साथ आने को तैयार नहीं। जमीनी घटनाएँ इसकी गवाही देती हैं।
अभी 21 फरवरी 2026 को कानपुर देहात के सरगाँव में सपा नेता और प्रधान निधि यादव के बेटे अभय यादव और उसके साथियों ने दलित बस्ती में घुसकर फायरिंग की, दहशत फैलाई और एक दलित का घर फूँक दिया। चार लोग घायल हुए।
ठीक एक दिन पहले 20 फरवरी 2026 को बलिया जिले में 15 वर्षीय दलित लड़की के साथ दो यादव युवकों राजू यादव (26) और रोशन यादव (25) ने सामूहिक दुष्कर्म किया।
ये घटनाएँ अकेली नहीं। यूपी के कई जिलों में यादव-दलित टकराव की ऐसी खबरें आती रहती हैं। दलित जानते हैं कि चुनाव में चाहे किसी के साथ जाएँ, लेकिन यादव जिस पार्टी को समर्थन दे, उसके साथ कदापि नहीं। जाटव बसपा से चिपके हैं, पासी-धोबी-कोरी-वाल्मीकि भाजपा में भविष्य देख रहे हैं। अखिलेश लाख कोशिश करें, लेकिन यह दीवार नहीं टूट रही।
जातिवादी अंकगणित में फेल है पीडीए की संरचना
अखिलेश की राजनीतिक सोच पूरी तरह जातिवादी अंकगणित पर टिकी है। वे विकास की बात कम, ब्राह्मणों को क्षत्रियों के खिलाफ, यादवों को ब्राह्मणों के खिलाफ और दलितों-राजपूतों के बीच संघर्ष भड़काने में ज्यादा लगे रहते हैं। लेकिन ये प्रयोग फेल हो रहे हैं। वे समझ गए हैं कि मुलायम की तरह जमीनी संपर्क उनका नहीं।
मुलायम पहलवान थे, किसान थे, जनता के बीच रहते थे। अखिलेश ने सपा की पुरानी राजनीति को तोड़ दिया। उन्हें उम्मीद थी कि पीडीए नया आधार बनेगा, लेकिन यादवों के अलावा कुछ नहीं बचा। कुर्मी-काछी जैसे पिछड़े भाजपा से जुड़ चुके।
इसी बेचैनी में अखिलेश अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। विवादित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (जिन पर पोक्सो केस में एफआईआर हुई) का समर्थन कर रहे हैं, कह रहे हैं कि यह राजनीतिक साजिश है। वहीं AI समिट कपड़े उतारकर देश के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कॉन्ग्रेसियों की प्रशंसा कर रहे हैं।
दलितों को लुभाने के लिए ‘पीडीए पाठशाला’ जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर विश्वास नहीं जगा पा रहे। यही नहीं, वे अब अपनी ही लाइनों तोड़ रहे हैं। कभी ब्राह्मण-क्षत्रिय विभाजन, कभी यादव-दलित गठजोड़ का ढोंग कर रहे हैं, लेकिन सफलता के नाम पर उनके पास है अभी तक एक बड़ा सा शून्य।
यूपी की लड़ाई से अभी बाहर ही दिख रहे हैं अखिलेश यादव
अखिलेश इन दिनों ज्यादातर समय यूपी के बाहर दिल्ली में बिता रहे हैं। यहाँ तक कि यूपी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान भी वे प्रदेश के मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय नहीं दिखे। बजट सत्र में वे केंद्र पर हमला बोल रहे थे, लेकिन यूपी की सड़कों, स्कूल, अस्पताल, किसान की समस्या पर चुप्पी उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
यह रवैया साफ बताता है कि वे योगी आदित्यनाथ के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। चूँकि योगी सरकार की विकास की राजनीति, जिसमें एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, कानून व्यवस्था का उनके पास कोई जवाब नहीं है। ऐसे में सपा अगर 2027 में तीसरी बार हारी तो अखिलेश के पास कुछ नहीं बचेगा।
जाति के घेरे से निकलो अखिलेश, वर्ना…
राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर कहूँ तो अखिलेश की सोच 90 के दशक की है। मुलायम का एमवाई फॉर्मूला तब काम किया जब सामाजिक न्याय की लहर थी। आज युग बदल गया है। आज का युवा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर माँग रहा है, जबकि अखिलेश अभी भी जाति के घेरे में फंसे हैं। भले ही पीडीए के नारे ने 2024 लोकसभा में आंशिक कामयाबी दिलाई, लेकिन विधानसभा चुनाव में हर सीट पर अलग गणित होता है। फिर बिना जमीनी काम के, बिना विकास के एजेंडे के सिर्फ नारे कभी सफलता नहीं दिला पाए हैं, ऐसा इतिहास भी कहता है।
ऐसे में उनकी अकुलाहट का राज साफ है कि 2027 के चुनाव को लेकर वो अभी से भयभीत हो चुके हैं। अगर सपा तीसरी बार बुरी तरह हारी तो अखिलेश यादव का राजनीतिक सफर समाप्ति की ओर बढ़ जाएगा। वे जानते हैं कि योगी का मॉडल जनता को पसंद आ रहा है। विकास की राजनीति जाति की राजनीति को पीछे छोड़ रही है। इसलिए वे बौखला रहे हैं। नए प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयोग बुरी तरह से फेल हो रहे हैं।
बहरहाल, अंत में एक बिन माँगी सलाह देना चाहूँगा कि अखिलेश जी, अगर सच में भविष्य बचाना है तो पीडीए के हवाई सपने छोड़िए। जमीनी स्तर पर काम कीजिए। विकास की भाषा बोलिए। परिवारवाद से ऊपर उठिए। वरना 2027 नहीं, बल्कि 2032 तक भी इंतजार करना पड़ेगा और तब तक राजनीति और आगे निकल चुकी होगी, गंगा जी में बहुत पानी बह चुका होगा। सिर्फ अकुलाहट से कुछ नहीं होने वाला। आपको फिलहाल आत्मचिंतन कर नए सिरे से रणनीति बनाने और उस पर अमल करने की जरूरत है।
अंत में सिर्फ इतना ही… कि अखिलेश की राजनीति का भविष्य वाकई संकट में है, लेकिन लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। अगर वे बदलें तो बदलाव आ सकता है, वरना इतिहास महज उन्हें एक और ‘पैराशूट नेता’ के रूप में ही याद रखेगा।


