शास्त्री जी के समय कॉन्ग्रेस नेताओं ने की थी 370 हटाने की वकालत, अपना ही इतिहास भूली पार्टी

कॉन्ग्रेस आज अपनी ही पार्टी के पुराने शीर्ष नेताओं की भावना के प्रतिकूल कार्य कर रही है। जब दिसंबर 1964 में इस पर बहस चली थी तब कुछ सांसदों ने कहा था कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर और शेष भारत के बीच की बड़ी दीवार है।

अनुच्छेद 370 के मुख्य प्रावधानों को निरस्त करने के साथ ही जम्मू कश्मीर विशेष राज्य नहीं रहा और इसे 2 केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने का रास्ता भी साफ़ हो गया। केंद्रीय गृह मंत्री ने संसद में संविधान संशोधन विधेयक पेश कर इस मैराथन कार्य को अंजाम दिया। अब जम्मू कश्मीर विधायिका सहित केंद्र शासित प्रदेश होगा, वहीं लद्दाख विधायिका रहित केंद्र शासित प्रदेश होगा। संसद में दिए गए विभिन्न भाषणों में अमित शाह ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों से राज्य को हुए नुकसानों की चर्चा की। अब देश के अन्य हिस्सों के लोग जम्मू कश्मीर में संपत्ति ख़रीद सकते हैं। साथ ही राज्य में अब्दुल्ला व मुफ़्ती परिवार के एकछत्र राज का भी अंत हो गया।

जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की राजनीतिक भागीदारी में जो विषमता थी, वो भी अब दूर हो जाएगी। यहाँ इतिहास भी याद करने की ज़रूरत है। क्या आपको पता है कि सितम्बर 1964 में जब लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे, तब संसद में इसी तरह का एक बिल पेश किया था। उस समय संसद में इस पर ज़ोरदार बहस हुई थी और कई सांसदों ने अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का समर्थन किया था। उस समय आर्य समाज के नेता प्रकाश वीर शास्त्री ने जम्मू कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने सम्बन्धी प्राइवेट मेंबर बिल संसद में पेश किया था।

अनुच्छेद 370 पर प्रकाश वीर शास्त्री के बिल का कई कॉन्ग्रेस सांसदों ने किया था समर्थन

तब कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता के हनुमंथैया ने लोकतंत्र की भावना का हवाला देते हुए गृह मंत्री ने निवेदन किया था कि इस बिल को स्वीकार किया जाए। मैसूर के मुख्यमंत्री रह चुके के हनुमंथैया बंगलोर से चुन कर आते थे और कॉन्ग्रेस के अनुभवी नेताओं में से एक थे। रेलवे और उद्योग जैसे कई मंत्रालय संभाल चुके हनुमंथैया का प्रकाश वीर शास्त्री के बिल को समर्थन यह दिखाता है कि उस समय बड़े कॉन्ग्रेस नेता भी जम्मू कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा हटाने और अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के पक्ष में थे। प्रकाश वीर शास्त्री 1977 में एक ट्रेन दुर्घटना का शिकार हो गए थे, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी।

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सत्ता पक्ष और विपक्ष भी इस मसले पर एक दिखा था। अनुच्छेद 370 पर चर्चा करते हुए दिसंबर 1964 में तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने कहा था- “अनुच्छेद 370 को चाहे आप रखें या न रखें, इसकी सामग्री को पूरी तरह से खाली कर दिया गया है। इसमें कुछ भी नहीं छोड़ा गया है। हम इसे एक दिन, 10 दिनों या 10 महीने में विनियमित कर सकते है और इस पर विचार हम सभी ही करेंगे।” इससे पता चलता है कि लाल बहादुर शास्त्री की सरकार के मन में भी कहीं न कहीं ये बात थी कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए क्या किया जाए?

आज कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेता भरता सरकार के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद ने तो इस दिन को काला दिन तक बता दिया। कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने अगर अपनी ही पार्टी का संसदीय इतिहास देखा होता तो शायद वे ऐसा नहीं करते। ख़ुद भीमराव अम्बेडकर अनुच्छेद 370 के विरोधी थे। कॉन्ग्रेस आज अपनी ही पार्टी के पुराने शीर्ष नेताओं की भावना के प्रतिकूल कार्य कर रही है। जब दिसंबर 1964 में इस पर बहस चली थी तब कुछ सांसदों ने कहा था कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर और शेष भारत के बीच के बड़ी दीवार है।

कुछ सांसदों ने इस अनुच्छेद को जम्मू कश्मीर और शेष भारत के बीच एक बड़े पहाड़ की संज्ञा भी दी थी। तब गृहमंत्री नंदा ने कहा था कि ये न तो पहाड़ है और न ही दीवार बल्कि एक टनल है। पंजिम के सांसद पीटर अगस्टस ने पूछा कि आख़िर हमें किसी टनल की ज़रूरत ही क्या है? नंदा ने जवाब देते हुए कहा कि इसे आप एक पार्टीशन समझ लीजिए, जिसे हम जब चाहें तब हटा सकते हैं। उन्होंने कहा था कि इसे हटाने के रास्ते में कुछ नहीं आ सकता। आज जब इस पार्टीशन को केंद्र सरकार की मजबूत इच्छशक्ति के कारण हटा दिया गया है, यही कॉन्ग्रेस तिलमिलाई क्यों हुई है?

हालाँकि, जवाहरलाल नेहरू ने ये ज़रूर कहा था कि अनुच्छेद 370 घिसते-घिसते अपनेआप ख़त्म हो जाएगा लेकिन नवंबर 1963 में संसद में उन्होंने इसके समर्थन में अजीबोगरीब तर्क भी दिए थे। पंडित नेहरू ने कहा था कि अगर अनुच्छेद 370 नहीं रहा तो देश के अलग-अलग हिस्सों से सक्षम लोग जम्मू कश्मीर में संपत्ति ख़रीदने की होड़ में शामिल हो जाएँगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा था कि लोगों द्वारा राज्य में ज़मीन ख़रीदने से वहाँ की ज़मीन के भाव भी आसमान छूने लगेंगे, जिससे स्थानीय लोगों को घाटा होगा।

अगर किसी क्षेत्र में ज़मीन के भाव बढ़ते हैं तो इससे वहाँ के स्थानीय लोग को घाटा हो, ऐसा शायद ही देखा गया है। जहाँ भी विकास कार्य तेज़ी से होते हैं, विश्वविद्यालय खुलते हैं या बड़े उद्योग स्थापित होते हैं, उस क्षेत्र व आसपास के इलाकों में ज़मीन का भाव बढ़ना लाजिमी है और इससे स्थानीय जनता को फायदा ही होता है। हालाँकि, नेहरू ने अपने इस बयान के पीछे कोई तर्क नहीं दिया था कि ज़मीन के भाव बढ़ने से स्थानीय लोगों को घाटा क्यों होगा?

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