Monday, September 21, 2020
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क्या सचमुच बर्बाद हो गई है हमारी अर्थव्यवस्था? सरकार क्या कर रही है? (भाग 2)

यह गिरावट सामान्य है, जो कि कम्पनियों द्वारा दूरदर्शिता के अभाव के कारण पैदा हुई है। इस समय में प्राइवेट कम्पनियों को अपने कैश रिजर्व पर वापस जाना होगा क्योंकि सरकार को न तो चुनाव जीतना है, न ही वो पुरानी असफल नीति को अपनाने वाली है।

समाधान क्या है? क्या करे सरकार?

त्वरित समाधान तो मनमोहन सरकार वाला ही है कि फिर से फिस्कल डेफिसिट को 6% के ऊपर ले जाओ, फिर से बैंकों को पैसा दे दो, या योजनाओं के जरिए लोगों तक पैसा पहुँचा दो। इससे आम जनता खर्च करने लगेगी और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेगा। लेकिन आठ-दस सालों में वापस यही स्थिति आएगी। यह समाधान चुनाव जीतने के लिए किया जा सकता है लेकिन देश को इससे लम्बे समय में नुकसान ही होता है, फायदा नहीं।

फिस्कल डेफिसिट वाला रिस्क एक बार लिया जा सकता है लेकिन वो ऐसे देशों में संभव है जहाँ लोग टैक्स देते हैं। भारत में टैक्स नहीं देना एक गुण के तौर पर देखा जाता है, पढ़े-लिखे लोगों से लेकर व्यापारियों तक में टैक्स चोरी करना इस तरह से देखा जाता है जैसे कि कुछ अच्छा किया जा रहा हो। आप टैक्स ही नहीं देंगे तो सरकार के पास आमदनी बढ़ेगी ही नहीं।

अगर सरकार आम लोगों की मदद कर रही है तो बिजनेस करने वाले लोगों को भी अपना सारा टैक्स देना चाहिए। लेकिन टैक्स देना एक बिहेवियर चेंज करने की बात है, इसमें समय लगेगा। पिछली सरकार ने इस पर कोई सोच नहीं दिखाई, इस सरकार ने जीएसटी से लेकर इनकम टैक्स तक में सक्रियता दिखाते हुए इसका दायरा बढ़ाया है। लेकिन वो इतना बड़ा नहीं हुआ है कि फिर से 2008 की तरह का रिस्क लिया जा सके।

प्राइवेट सेक्टर को आगे आना होगा

प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करते हुए चीफ इकनॉमिक अडवाइजर, यानी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत में प्राइवेट कम्पनी को अगर लाभ होता है तो वो प्राइवेट लाभ है, वो कम्पनी का लाभ है; लेकिन जब वही कम्पनी घाटे में जाती है, तो वे कहने लगते हैं कि सरकार मदद नहीं कर रही! प्राइवेट कम्पनी अपने बिजनेस के तरीकों से लाभ कमाती है, या घाटे में जाती है। अगर आपकी नीतियों के कारण कम्पनी डूब रही है तो इसमें सरकार क्या करे?

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लेकिन माहौल ऐसे बनाया जाता है, सरकार को ब्लैकमेल किया जाता है कि जेट एयरवेज में इतनी नौकरियाँ खतरे में हैं, सरकार कुछ नहीं कर रही। सरकार तभी कुछ करेगी जब वो कम्पनी सरकारी होगी। वरना पंजाब नेशनल बैंक ने तो नीरव मोदी को लोन दिया था, आपके पैसे भी लेकर नहीं भागा, फिर सब उसे जेल में क्यों डालना चाहते हैं? वो इसलिए कि ऐसे लोग सिस्टम का फायदा न उठा सकें। साथ ही, प्राइवेट कम्पनियाँ जब अपने लाभ का हिस्सा सरकार के साथ नहीं बाँटती तो उनके घाटे पर सरकार मेरा या आपका पैसा क्यों खर्च करे?

प्राइवेट सेक्टर कई बार इस चक्कर में रहता है कि सरकार की ओर से कुछ मदद मिल जाएगी तो उसका अपना कैश रिजर्व बचा रहेगा। हर ठीक-ठाक कम्पनी के पास कुछ पैसे होते हैं, जो वो अपने पास बचा कर रखती है। व्यापारी को अगर लोन मिल जाए तो वो दूसरों के पैसों पर अपना व्यापार करने में सहजता दिखाता है क्योंकि अगर व्यापार डूब गया तो उसे वो पैसा बैंक को नहीं लौटाना पड़ेगा। लेकिन अपना पैसा जब लगाना हो, तो लोग ज्यादा सोच-समझ कर पैसा लगाते हैं।

ऑटो सेक्टर के साथ क्या हुआ?

जब पैसा अपना दाँव पर हो, तब प्राइवेट सेक्टर ऐसी स्थिति में नहीं पड़ता कि केवल सेंटीमेंट के आधार पर प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ा ले- जो कि पिछली बार हुआ था। उदाहरण के लिए ऑटो सेक्टर में ठीक-ठाक बूम आया था। पिछले कुछ सालों में तो टैक्सी कम्पनियों ने लोगों को ओला या ऊबर के लिए कार खरीदने में मदद की। इससे हुआ यह कि कारों की बिक्री शुरू में तो बढ़ी लेकिन यह दो साल में ही थम भी गई। बड़े शहरों में लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि भला कार क्यों खरीदें! जब एक फोन करने पर ड्राइवर के साथ कार आ जाती है, तो अपने घर पर रखने, बीमा करवाने, मेंटेनेंस और ड्राइवर का टेंशन कौन ले!

इसके साथ ही 2004-05 से मिडिल क्लास के लोगों ने कार लेनी शुरू कीथी, और पिछले सात-आठ सालों में ग्रामीण इलाकों में भी हर घर में मोटर सायकिल पहुँचने लगी थी। कार या मोटर सायकिल एक बार लेने का मतलब है कि लोग फिर लम्बे समय तक दोबारा नहीं लेंगे- क्योंकि यह आलू-टिंडे की तरह हर हफ्ते खत्म होने वाली या चाइनीज़ रेनकोट की तरह हर बरसात में रीप्लेस होने वाली चीज़ ही नहीं है। फिर ओला-ऊबर के कारण ऑटो सेक्टर में डिमांड घटती चली गई। जिन्होंने गलत आशा के चलते ज्यादा प्रोडक्शन शुरू कर दिया था, उन पर दबाव बढ़ने लगा, और अंततः शिफ्टें बंद करनी पड़ी, यूनिटों में ताले लगने लगे।

लेकिन फिर भी स्थिति इतनी ‘भयावह’ नहीं हुई है जितनी दिखाई जा रही है। यह गिरावट सामान्य है, जोकि कम्पनियों द्वारा दूरदर्शिता के अभाव के कारण पैदा हुई है। इस समय में प्राइवेट कम्पनियों को अपने कैश रिजर्व पर वापस जाना होगा क्योंकि सरकार को न तो चुनाव जीतना है, न ही वो पुरानी असफल नीति को अपनाने वाली है।

सरकार अगर वापस पुराने ढर्रे पर चलने लगे तो बिजनेस करने वालों को फिर से एक आसान रास्ता दिख जाएगा कि अगले कुछ साल वो फिर से वैसे ही बिजनेस कर लेंगे। लेकिन, सरकार अगर कड़ा रुख अपनाते हुए, इन प्राइवेट कम्पनियों को अपने पैसे अपने बिजनेस में लगाने पर मजबूर करती है, तो इन कम्पनियों के पास गम्भीरता से सोच कर, सही जगह पैसा लगाने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचेगा। इससे सरकार की ऐसी छवि भी बनेगी कि ये सरकार क्विक फिक्स वाली नहीं है, इसलिए अपने पैसे को दूसरे का समझ कर नुकसान कराने की बजाय सही तरीके से बिजनेस करने में बेहतरी है।

मैनुफैक्चरिंग में समस्या अलग ही है

इसमें दूसरी बात यह है कि पहले मैनुफैक्चरिंग धीरे-धीरे बदलती थी, अब टेक्नॉल्जी हर जगह घुस गई है और हर सेक्टर की मैनुफैक्चरिंग पर इसका सीधा असर दिखने लगा है। साल भर में कारों में एकदम ही नया फीचर आ जाता है। उसी तरह कई और सेक्टरों में लगातार तकनीकी बदलाव हो रहे हैं, जिसमें फैक्ट्री में लगने वाले मशीनों से लेकर वहां क्या बन रहा है, और उसमें नया क्या हो रहा है तक शामिल हैं। इसके कारण प्राइवेट कम्पनियाँ असमंजस में होती हैं कि नया यूनिट लगाएँ या नहीं, क्योंकि संभव है कि अगले साल कुछ ऐसी तकनीक आ जाए कि लोग उसी को खरीदने लगें।

मैनुफैक्चरिंग को लेकर दूसरी समस्या यह है कि भारत में बनाने वालों से ज्यादा बेचने वाले हैं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि यहाँ आप जो बैग लाजपत नगर मार्केट में खरीदती हैं, या जो टीशर्ट पालिका बाजार में मिलती है, वो जरूरी नहीं कि लुधियाना की फैक्ट्री में बना हो। पारम्परिक तौर पर भारत में व्यापारियों ने कहीं से खरीद कर किसी और जगह लाभ पर बेचने में ज्यादा झुकाव दिखाया है। वो चीन से बैग खरीदते हैं, यहाँ बेच लेते हैं।

ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि मैनुफैक्चरिंग के लिए सिर्फ फैक्ट्री लगाकर आप बिजनेस नहीं कर सकते। चीन ने जब खुद को मैनुफैक्चरिंग का केन्द्र बनाया तो उसने अपनी जमीनी, हवाई और जलीय मार्गों पर सामानों की आवाजाही के लिए बेहतरीन तंत्र विकसित किया। वहाँ से कहीं भी बना सामान तुरंत दूसरी जगह पहुँच सकता है। भारत में हवाई परिवहन महँगा है, जलीय परिवहन पर किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया, सड़क पर इतने बैरियर लगे होते थे कि ट्रक सड़कों की साइड में दिन भर खड़े होते थे, रेलगाड़ी तो कभी समय पर आती ही नहीं…

आप यह देखिए कि आप समय से किसी भी सामान को पहुँचा नहीं सकते। फिर कोई कम्पनी यहाँ निवेश कर के, फैक्ट्री लगा कर पैसे क्यों फँसाएगी? व्यापारी तीन से पाँच घंटे की फ्लाइट से या समुद्री मार्ग से सस्ते दरों पर सामान भारत में मँगवा कर, बिना किसी माथापच्ची के लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा?

अब जाकर सरकार ने जलमार्ग पर ध्यान देना शुरु किया है, जीएसटी के कारण सड़कों पर से बैरियर हट रहे हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (यानी मालगाड़ियों के लिए समर्पित ट्रैक) पर कार्य हो रहा है। ये सारी चीजें मैनुफ़ैक्चरिंग को बेहतर करने के लिए उठाए गए वो कदम हैं जिनका लाभ कुछ सालों बाद मिलेगा। ये न तो एक दिन में तैयार हो सकते हैं, न बिना तैयार चीजों के केवल हवाई ‘विश्वास’ के आधार पर कोई समझदार व्यक्ति फैक्ट्री खोल लेगा। इसलिए प्राइवेट सेक्टर असमंजस में रहता है कि वो अपना पैसा लगाए भी तो कैसे!

सरकार की नीतियाँ और उसकी अपनी छवि

सरकार को बाजार में यह दिखाना होगा कि वो उनके लिए रास्ते तैयार कर रही है। मैनुफ़ैक्चरिंग के लिए ‘मेक इन इंडिया’ जरूरी है लेकिन उसे बनाने के बाद पहुँचाना उतना ही आवश्यक है। इसके साथ ही नीतिगत फैसलों पर सरकार के यूटर्न लेने से कई बार इंडस्ट्री का विश्वास सरकार से उठने लगता है। जैसे कि ऑटो सेक्टर में ही कभी सरकार यह कहती है कि अगले कुछ सालों में हम पूरी तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर आ जाएँगे, और फिर वित्त मंत्री कहती है कि नहीं, डीजल भी रहेगा।

अब कार बनाने वाले तो यही सोचेंगे कि डीजल-पेट्रोल वाली गाड़ियों को बनाना कम करते हुए बंद कर देते हैं, और इलेक्ट्रिक इंजन की तकनीक और मैनुफ़ैक्चरिंग पर पैसा लगाते हैं। इस तरह की नीतियाँ लम्बे समय तक के लिए होती हैं, इसलिए सरकारों को सोच समझ कर बोलना चाहिए ताकि बिजनेस करने वालों के बीच यह भरोसा रहे कि यह सरकार जो बोलती है, वो करती है। अगर नीतियाँ तीन महीने में घोषणा के बाद बदलती रहेंगी, जो कि मोदी सरकार में कई बार हो चुका है, तो इंडस्ट्री उसे सही सिग्नल नहीं मानती।

पॉलिसी, यानी नीतियों से इंडस्ट्री को दिशा मिलती है कि वो कहाँ अपना पैसा लगाए। इसलिए वो कभी नहीं चाहते कि सरकार बदल जाए। वो चाहते हैं कि सरकार बने, फैसले पर डटी रहने वाली सरकार बने और वो ऐसे फैसले ले जिससे पब्लिक में डिमांड हो और उनका व्यवसाय बढ़े। इसलिए इंडस्ट्री वैसी सरकारें नहीं चाहतीं जो गठबंधन से चलतीं हैं, और सही समय पर सही फैसले लेने में सकुचातीं हैं।

ऐसा ही एक फैसला है बैंकों के विलय का। हाल ही में घाटे में चलने वाले कुछ बैंकों का विलय हुआ। सरकार की मंशा यह है कि जो बैंक अकेले घाटे में थे और अपनी पूँजी में कमी के कारण लोन देने में सक्षम नहीं थे, वो अब एक साथ हो जाएँगे तो उनकी पूँजी बढ़ जाएगी, और वो बड़ी कम्पनी को बड़े लोन देने में सक्षम हो पाएँगे। ये बैंकिंग में चल रहे क्राइसिस के लिए त्वरित समाधान है, जिससे इनका अपना व्यवसाय बढ़ेगा। लेकिन इन बैंकों को यह देखना होगा कि जिसे यह लोन देंगे, उससे रिकवर करने के लिए उनके पास क्या तरीके हैं।

सरकार ने जब अपने गलत फैसलों को सुधारते हुए नए कदम उठाए हैं तो इससे अर्थव्यवस्था को संबल मिला है। कम्पनियों में उम्मीद जगी है कि सरकार सकारात्मक बदलाव के लिए प्रयासरत है। बाजार सेंटीमेंट पर खूब चलता है। सेंसेक्स और निफ्टी जैसे सूचकांक सरकार की नीतियों और फैसलों के हिसाब से उठते और गिरते हैं। अगर बाजार को लगता है कि सरकार ने अच्छे कदम उठाए हैं तो मार्केट में सुधार आता है, वो ऊपर जाता है। ऊपर जाने का मतलब है कि बाहरी कम्पनियाँ भारत में अपना पैसा लगाने को उत्सुक होंगी क्योंकि चीन में अमेरिका से ट्रेड वॉर के कारण स्थिति थोड़ी नकारात्मक है।

जीडीपी का नीचे जाना

लेकिन इस तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर का भाजपा के कार्यकाल में सबसे नीचे जाना चिंतनीय है। भले ही इस पर वैश्विक मंदी का भी प्रभाव है, लेकिन ग्रोथ रेट नीचे जाने के कारण हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रहेंगे। इसका मतलब यह है कि लोग अभी भी चीन में शी जिनपिंग के सत्ता में डटे रहने के कारण, वहाँ का रुख कर सकते हैं।

अंत में एक सवाल जो हम सब सोशल मीडिया पर पूछते हैं और मजाक भी बनाते हैं कि जीडीपी से क्या होता है। आम तौर पर जब भाजपा सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है कि जीडीपी ऊपर जा रही है, हम विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, तब विरोधियों की तरफ से जवाब आता है कि भारत के गरीबों को यही आँकड़ा खिला दो। कहने का उनका तात्पर्य यह होता है कि बढ़ते जीडीपी से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भारत में लोग भूखे हैं।

लेकिन यही लोग तब झुंडों में आते हैं जब वही जीडीपी दर नीचे जाती है। जीडीपी घट नहीं रही है, बस उसके बढ़ने की गति कम हुई है। ऐसे में कहने लगते हैं कि मोदी ने तबाही फैला दी, बर्बाद हो गया देश। तब आँकड़ों को गरीबों को खिलाने वाला तर्क नहीं आता। तब यही आँकड़े देश की सही स्थिति बताते हैं, जबकि जब बेहतर हो रहा हो तो भारत में गरीब ज्यादा हो जाते हैं।

ख़ैर, यह बात समझनी ज़रूरी है कि जीडीपी के घटने और बढ़ने का असर आम आदमी पर पड़ता है। यह असर इतना इमीडिएट नहीं होता कि वहाँ सरकार ने कहा कि ग्रोथ रेट कम हुई और यहाँ आपके घर से आटा घट गया, और आपके नल से पानी सूख गया। लेकिन हाँ, अगर यह ग्रोथ रेट नहीं सुधरी तो आप उसी आटे या कपड़े पर कम खर्च करेंगे।

इसे ऐसे देखिए कि आप जहाँ काम करते हैं, उस कम्पनी को भारत की बढ़ती जीडीपी के कारण फायदा होगा तो वो फायदा आपकी सैलरी में वृद्धि के तौर पर आएगा। यानि जीडीपी बढ़ रही है तो बहुत संभावना है कि आपकी कम्पनी का व्यवसाय भी बढ़ ही रहा होगा, और उसका मुनाफा भी। साल के अंत में उसी मुनाफे का एक हिस्सा वह अपने कर्मचारियों को एक तय प्रतिशत वृद्धि के साथ देगी। अब, जब यही मुनाफा कम हो जाएगा तो आपका इन्क्रीमेंट भी कम होगा। मतलब सैलरी उतनी नहीं बढ़ेगी जितनी बढ़नी चाहिए। कई बार तो ऐसा भी होता है कि महँगाई सात प्रतिशत बढ़ी और सैलरी छः। मतलब, आप पिछले साल से कम चीजें ही खरीद सकते हैं, भले ही सैलरी में वृद्धि हुई हो।

इसका दूसरा नुकसान यह होता है कि कई बार छोटी कम्पनियाँ खराब होती अर्थव्यवस्था में अपना बचाव नहीं कर पातीं। बड़ी कम्पनियाँ कुछ लोगों की छँटनी कर सकतीं हैं, कुछ शिफ्ट बंद कर सकतीं हैं। लेकिन छोटी कंपनियों का तो भट्टा ही बैठ जाता है। मतलब भारत जैसे देश में, जहाँ रोजगार पहले ही एक समस्या है, वहाँ और लोग बेरोजगार हो जाएँगे।

इन सबके कारण कंज़्यूमर सेंटिमेंट यानी उपभोक्ता के मनोभावों में परिवर्तन आने लगते हैं। वो अपनी नौकरी को लेकर ज्यादा सजग हो जाता है। पैसे बचाने लगता है। पैसा कम खर्च होने से उस पर आधारित कई उद्योगों के नुकसान पहुँचता है, जिसके कारण और नौकरियाँ जाती हैं। ये चक्रीय तरीके से काम करता है।

इसलिए जीडीपी का बढ़ना हमेशा बेहतर होता है। भले ही गरीबी हो, लेकिन बढ़ती जीडीपी के कारण ही उन गरीबों के लिए गेहूँ और चावल को सस्ते दरों में पहुँचाना संभव हो पाता है। इसी बढ़ती जीडीपी के कारण सरकार हाइवे को चौड़ा कर पाती है, गरीबों को मुफ्त इलाज दे पाती है, सब्सिडी के माध्यम से लोगों को लोन दे कर स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर सकती है। इसलिए इसका बढ़ते रहना आवश्यक है।

साथ ही, जब यह घटती है, और कुछ न किया जाए, तो भी स्थिति चिंताजनक होती है। लेकिन सिर्फ एक तिमाही के गिरे आँकड़ों पर परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। इससे अर्थव्यवस्था बर्बाद नहीं होती चाहे कोई कितना भी चिल्ला कर कहे। हर देश को ये उतार-चढ़ाव झेलना होता है। अगर यह लगातार गिरती रहे, और सरकार कदम न उठाए तो परेशानी की बात ज़रूर है। लेकिन सरकार ने जिस तरीके से अपने गलत फैसलों को मोड़ा है, कुछ एहतियाती कदम उठाए हैं, उससे आशा है कि बेहतरी होगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात को आसान शब्दों में समझने के लिए इस लेख का पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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